शनिवार, जनवरी 09, 2010

एक दिन या पूरा एक जीवन?


दिल्ली-कालका शताब्दी अपनी पूरी रफ़्तार से भाग रही थी और लगभग पैंतालीस मिनट में सौम्या को उसके गंतव्य स्टेशन पर उतार कर अपनी मन्जिल की ओर चली जाने वाली थी। सौम्या के मन में विचार शताब्दी से भी तेज भाग रहे थे। जैसे-जैसे स्टेशन पास आ रहा था, उसका असमन्जस और गहराने लगा। एक नया अनुभव लिया जाये या लीक न बदलने का फ़ैसला, कुछ तय नहीं कर पा रही थी। अभी लगभग दस दिन पहले तक जीवन कितना सरल था, वही घिसा-पिटा रुटीन, सुबह अलार्म की आवाज पर उठना, नित्य-कर्मों से फ़ारिग होकर अपना व अनुज का लंच तैयार करना, बीच में ही नाश्ता तैयार करना और अपनी चाय काम करते-करते निपटाना जैसे कि शरीर न होकर मशीन हो। अनुज आठ बजे घर से अपने ओफ़िस के लिये निकल लेता और रह जाती सौम्या और उसके अपने कुछ मिनट। अब यह उस पर निर्भर था कि इन चंद मिनटों को आराम के लिये इस्तेमाल करे या जो टापिक आज क्लास में लेना था उस पर एक नजर मार ले। और अमूमन प्रोफ़ेशनलिस्म आराम पर भारी साबित होता। प्राईवेट कालेज ही सही, डिग्री कालेज की लेक्चररशिप एक भारी जिम्मेदारी है, अगर मानो तो और खास तौर पर यदि कोई अस्थाई नियुक्ति पर हो। वैसे तो अनुज केन्द्र सरकार का गजेटड अधिकारी है और दो जनों के लिये उसका वेतन बहुत है लेकिन कुछ तो अपने जीवन का खालीपन दूर करने के लिये और कुछ भविष्य को देखते हुये शादी के बाद भी सौम्या ने नौकरी जारी रखी थी और अब इस रुटीन की आदत भी पक चुकी थी, सो जिन्दगी इसी तरीके से चलती जा रही थी। वो तो उस दिन निशा के फ़ोन ने कुछ सोच-विचार में डाल दिया नहीं तो जिन्दगी जैसे अब तक कट रही थी, आगे भी कट जानी थी। उस दिन कालेज से आकर लंच ही कर रही थी जब निशा का फ़ोन आया। जब से निशा की शादी हुई थी संपर्क कुछ कम हो गया था, वरना स्कूल से लेकर पोस्ट-ग्रेज्यूएशन तक शायद ही कोई दिन गया हो जब दोनों अलग हुई हों। अब पहले जैसा मिलना तो नहीं हो पाता था पर बात होती रहती थी। हालचाल पूछने के बाद निशा ने सौम्या से जब पूछा कि क्या वो एक दिन की छुट्टी ले सकेगी तो सौम्या मना नहीं कर सकी। काम पूछने पर उसने बताया कि उनके ओफ़िस का कोइ क्लायंट बाहर से आ रहा है और सचिवालय के किसी अधिकारी से मुलाकात के लिये दो तीन घंटे के लिये उसे एक इंटरप्रेटर की जरूरत है और हमारे ओफ़िस का फ़्रेंच इंटरप्रेटर सीरियस बीमार है। अपने क्लायंट को मना कर नहीं सकते हैं और हमारे डायरेक्टर ने यह मैनेज करने के लिये मुझे कह दिया है। निशा का यह कहना सौम्या को बहुत अजीब लगा कि कुछ अगर-मगर सोचने की जरुरत नहीं है, तेरा शताब्दी से चन्डीगढ आने जाने का टिकट और एक दिन के दो हजार रुपये का भुगतान मेरी गारंटी। क्लायंट एक बहुत ही सभ्य और शालीन बुजुर्ग है और मुश्किल से एक-दो घंटे की मीटिंग होनी है साथ ही मुझे याद है कि तुम्हारी एम.एस.सी. की डुप्लिकेट मार्कशीट उसी ओफ़िस से मिलनी है, अगर कहो तो अनुज से मैं बात कर लेती हूं।
सौम्या एकदम से कुछ नहीं सोच पाई और अनुज से सलाह करने के बाद ही निशा को कुछ बताने की कह कर उसने फ़ोन रख दिया था। ………….जारी…..











































5 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

    कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
    वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
    डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
    इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
    और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

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  2. हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अगर समुदायिक चिट्ठाकारी में रूचि हो तो यहाँ पधारें http://www.janokti.blogspot.com . और पसंद आये तो हमारे समुदायिक चिट्ठे से जुड़ने के लिए मेल करें janokti@gmail.com
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    जयराम "विप्लव"
    Editor
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  3. रोचक कहानी..अगला भाग भी अभी पढ़ती हूँ..

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