मंगलवार, जनवरी 12, 2010

एक दिन या पूरा एक जीवन? भाग २.

ट्रेन की उदघोषणा से सौम्या वर्तमान में लौटी, ट्रेन चन्डीगढ पहुंच रही थी। सौम्या ने अपना हैंडबैग संभाला और उतरने को तैय़ार हो गई। ईधर सौम्या प्लेटफार्म पर उतरी ही थी कि मोबाईल बज उठा। निशा ही थी, “हां सौम्या, हाऊ आर यू? आई होप यू मस्ट हैव गेट डाऊन बाई नाऊ।”

“अरे यार, जस्ट उतर कर अभी कोच के बाहर ही खडी हूं। चल अच्छा हुआ तेरा फोन आ गया। आगे का प्रोग्राम बता।”

“देख सौम्या, मुझे गलत मत समझना। देयर इज ए स्लाईट चेंज इन द प्रोग्राम ड्य़ू टू डिले इन द फ़्लाईट आफ अवर क्लाईंट। पहले वो तुम से एक घंटा पहले पहुंचने वाले थे लेकिन फ्लाईट रिशेड्यूल होने के कारण वो दो बजे से पहले उधर नहीं आ पायेंगे। हमारे पास उनकी मेल अभी आई है एंड ही इज रियली फीलिंग सारी फार आल दिस। यार, प्लीज तू वेटिंग रूम में पहुंच कर रेस्ट कर ले या अपना मार्कशीट वाला काम कर ले, तेरे पास पूरे चार घंटे का समय है। मैं तुझे बाद में अपडेट करती हूं। मैं जानती हूं तू सरकमस्टांसज को समझेगी।”

“निशा, कुछ कहानियों जैसा नहीं लग रहा, क्या? खैर, इस पोजिशन में तू क्या कर सकती है और मैं भी क्या कर सकती हूं। देख, किसी भी हालत में मैं शाम की शताब्दी से दिल्ली लौट जाऊंगी। इस बीच तुम्हारा विदेशी क्लाईंट आ गया तो ठीक है, वरना मैं उनके साथ मीटिंग अटेंड नहीं कर पाऊंगी और प्लीज इस बारे में तू मुझे कुछ और मत कहना।”

“थैंक्स सौम्या, और निश्चिंत रहो मैं तो तुम्हें ट्रेन मिस करने की क्या कहूंगी, मि. पियरे खुद ही इस बारे में कह चुके हैं कि किसी लेडी को अननेसेसरी परेशान करने की बजाय वह मीटिंग रिशेड्यूल करना पसंद करेंगे। सो, एंजाय योअरसेल्फ फोर एट लीस्ट फ़ुल फ़ोर आवर्स। बाद में बात करते हैं, बाय़”,

“बाय, लेकिन याद रखना किसी दिन मैं भी तुझे एक्सिडेंटली तेरे मियां से दूर करूंगी और कम से कम चार दिन के लिये। बाय”

सौम्या ने टाईम देखा, अभी पौने दस बजे थे। यानि पूरे चार घंटे उसके पास हैं बिल्कुल अपने। जब फंस ही गये हैं इन हालात में तो क्यों किसी को कोसना। सबसे पहले तो फ्रेश होकर प्लेट्फार्म की चाय पी जाये। अब धीरे-धीरे सौम्या को थोडा सा मजा भी आने लगा बिना किसी प्लान के समय बिताने की सोचकर ही ऐसा लग रहा था जैसे कोई खजाना हाथ लग गया हो। नहीं तो जब से होश संभाला था शायद ही कभी रिलेक्स फील किया हो। पहले मां की हर पल की निगरानी, अपनी पढाई की फिक्र और मां के जाने के बाद से जब से चाचा-चाची के पास जाकर रहना शुरू किया तो एक पल भी अपने लिये निकालना मुहाल हो गया था। हां, चुराये गये कुछ पलों में साधारण युवतियों वाली फैंतेसी जरूर एंजाय करी थी कि कल को जब शादी हो जायेगी तो वो अपना समय अपनी सुविधा से प्लान कर सकेगी। ये फैंतेसी वास्तविकता का रूप नहीं ले सकी हालांकि अच्छे अकादमिक रिकार्ड के कारण उसकी शादी आसानी से हो गई थी। उस समय़ अनुज भी उसी की तरह प्राईवेट शिक्षण संस्थान में नौकरी कर रहा था। शादी के बाद जहां अनुज अपनी नौकरी के साथ केवल कंपीटिशन की तैयारी कर रहा था, सौम्या अपनी नौकरी के साथ, घर की पूरी जिम्मेदारी तो उठा ही रही थी, बाजार से लेकर सामाजिक जिम्मेवारियां तक सभी उसी के सर पर आ गई थीं। वह थी कि जैसे इंसान न होकर कोई मशीन हो चुकी थी। अपनी कोई इच्छा नही, अरमान नहीं बस सोते जागते एक ही सोच कि किसी तरह अनुज मन माफिक नौकरी पा सके। जब अनुज की नियुक्ति ग्रेड ’ए’ सरकारी अधिकारी के रूप में हुई तो अधिकतर क्रेडिट अनुज की मेहनत को और बचा-खुचा ईश्वर और बुजुर्गों के आशीर्वाद को मिला। सौम्या के मायके में तो कोई सगा-संबंधी रहा ही नहीं था, ससुराल में सबको उससे अपेक्षायें ही थीं और उसे लग रहा था कि वो इन अपेक्षाओं पर पूरी ही उतर पाये तो बहुत होगा। कुछ मलाल था तो यही कि अनुज ने एक बार भी उससे यह नहीं कहा था कि सौम्या मेरी सफलता के पीछे तुम्हारा भी कुछ न कुछ योगदान तो है या कि मैंने जो चाहा था पा लिया अब तुम्हारी बारी है जाओ छू लो तुम भी आसमान, मेरी तरफ से तुम्हें छूट है। लेकिन यहां तो उससे अपेक्षायें और भी ज्यादा हो गईं थी और बातचीत में सरकारी अधिकारियों वाला अंदाज भी आ गया था। खैर, इन खयालों को झटकते हुये सौम्या फर्स्ट क्लास वेटिंग रूम में दाखिल हुई।

वेटिंग रूम से निकलकर सौम्या टी-स्टाल की तरफ चल दी। बचपन में जब कभी पापा के साथ ट्रेन में जाती थी तो हर स्टेशन पर चाय-चाय की आवाज सुनकर वो पूछती थी कि पापा ये लोग घर चाय क्यूं नहीं पीते। पापा समझाते कि बेटा हर चीज का अपना विशिष्ट स्वाद होता है। आज उसके लिये यह पहला मौका था जब वो घर के बाहर अकेली चाय पियेगी और वो भी बिल्कुल अकेली। अचानक सामने से अपना नाम सुनकर वो अचकचा गई।

“अरे सौम्या, तुम?”

“राजीव सर, आप यहां? नमस्ते”

जारी………

2 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी और वास्तविकता के धारातल पर लिखी कहानियाँ ब्लॉग जगत में ज़्यादा लिखने वाले नही हैं.आप अब उनमें से एक हो गये हैं जिनके लेखन में पाठक को बाँधने की क्षमता है.
    कहानी के इस भाग को पढ़ कर लगा की 'सौम्या' जैसी ना जाने कितनी स्त्रियाँ हैं जिनका अपने पति की उन्नति में बहुत योगदान होता है और उन्हें कभी इसका श्रेय नहीं मिलता .
    सिर्फ़ अपने पति से दो शब्द सुनने की भी तमन्ना दिल में दबा कर रख देनी पड़ती है क्यूंकी यही तो सीखा है ना बचपन से कि स्त्रियों को अपेक्षाएँ रखनी ही नहीं चाहीए ना समाज से ना अपनो से...यह एक कड़वा सच है कि एक पति कभी भी अपनी पत्नी के 'कद' को खुद से बड़ा नहीं देख सकता ,ना ही बढ़ते हुए..!
    अगले भाग की प्रतीक्षा ..

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  2. @ अल्पना वर्मा
    -----------
    अल्पना जी, शुरुआत में ही वत्स जी व आप जैसे मूर्धन्य ब्लागर्स से टिप्पणी प्राप्त करना कल्पनातीत सा लग रहा है। सही मायने में मेरी स्थिति यहां प्रेप के शिशु जैसी है,जिसे आता कुछ नहीं है लेकिन सकारात्मक पक्ष यह है कि सीखने को बहुत कुछ है और प्रेरणायें भी उप्लब्ध हैं। आशा है धीरे-धीरे कुछ परिपक्वता आ जायेगी। पुन: आपका धन्यवाद।

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