गुरुवार, जनवरी 21, 2010

एक दिन या पूरा एक जीवन? भाग ३

“सर, आप तो पंजाब में कहीं ट्रांसफर होकर गये थे, यहां कैसे?”

“सौम्या, ये पंजाब की राजधानी ही तो है। खैर, मेरी बात हटाओ, तुम यहां कैसे और वो भी अकेली?”

सौम्या ने सारी बात राजीव को बताई। राजीव उस बैंक का कर्मचारी था जो सौम्या के कालेज की बिल्डिंग में स्थित था और उस छोटी सी शाखा में कर्मचारी बहुत कम होने के कारण और दोनों की नियोक्ता संस्थान में अच्छे संबंधों के कारण भी राजीव की छवि उस कालेज की सभी कर्मचारियों के बीच खासी अच्छी थी। अभी लगभग एक साल पहले ही उसका ट्रांसफर पंजाब के किसी गांव में हुआ था, हालांकि उससे भी एक साल पहले वह कालेज वाली शाखा से दूसरी स्थानीय शाखा में स्थानांतरित हो चुका था। राजीव उम्र में सौम्या से लगभग बारह साल ज्यादा था। देखने में अति साधारण, लेकिन अपने साधारण व्यक्तित्व को उसका सभ्य व्यवहार ढक लेता था और वह खुद सौम्या से बहुत प्रभावित था। एक बार उसके एक साथी ने उससे मजाक में पूछा भी था कि जब भी यह मैडम आती है वो उसको विशिष्ट सेवायें देने की कोशिश करता दिखाई देता है, आखिर उसमें ऐसी क्या खास बात है? राजीव ने भी हंसकर टाल दिया था कि मुझे तो इसमें कोई ऐसी बात ही नहीं दिखाई देती जो खास नहीं हो। सही मायने में वह सौम्या के सुदर्शन व्यक्तित्व, व्यवहार, बुद्धि और स्वभाव को ’परफेक्ट ब्लेंड’ कहता और मानता भी था। उसका अपना अनुभव इस बारे में खासा अच्छा था कि आमतौर पर हर लडकी में कोई खास गुण बहुतायत में होता है एवं बाकी गुण या तो बिल्कुल नदारद होंगे या गौण, लेकिन सौम्या के संपर्क में आने के बाद उसे अपनी गलती का एहसास हुआ पर अभी भी वो ऐसे चरित्र को विरला ही मानता था। दोनों ही एक दूसरे का पूरा सम्मान करते थे और एक हद तक एक दूसरे से फ्रैंक थे लेकिन उनके संबंधों में किसी भी तरह का स्वार्थ कभी बीच में नही आया था, शायद दोनों को अपनी व सामने वाले की सीमाओं का ग्यान था। तीन चार वर्ष तक ऐसे ही चलता रहा था और एक बार कुछ गलतफहमी सी हो गई, उसके बाद मुलाकात तो होती थी पर रिश्तों में एक ठंडापन सा आ गया था। इसी बीच राजीव को मालूम चला कि उसका ट्रांस्फर दूसरी शाखा में होने जा रहा है और उसने बिना किसी को बताये चुपचाप ट्रांस्फर स्वीकार कर लिया, हालांकि वह चाहता तो ट्रांसफर रुकवाना उसके लिये बहुत मामूली काम था और दूसरी शाखा उसके लिये सुविधाजनक भी नहीं थी। उसका भावुक मन अंदर से बुरी तरह आहत था कि सौम्या ने उसे गलत समझ लिया था और स्पष्टीकरण का मौका भी नहीं दिया था, बल्कि अपने-आप को बहुत रिजर्व कर लिया था। वो उसकी परेशानी के लिये भी खुद को जिम्मेदार मानते हुये बहुत आसानी से वहां से हटने के लिये तैयार हो गया और ट्रांसफर को चुपचाप स्वीकार कर लिया था। स्थानीय शाखा होने के कारण कभी-कभी सौम्या से सडक पर आमना-सामना हो जाता था तो दोनों तरफ से अभिवादन हो जाता पर संपर्क बिल्कुल कटा नहीं था। एकाध बार सौम्या बैंक के कार्य से उसकी शाखा में भी आई, व्यवहार दोनों का ही हमेशा की तरह मर्यादित रहा। सौम्या भी यह महसूस करती थी कि वह राजीव के लिये किसी आम ग्राहक से कहीं ज्यादा महत्व रखती है। जब राजीव का ट्रांसफर पंजाब हो गया और उसने अपने पुराने संपर्कों को नया फोन नं दिया तो उसने सौम्या को भी अपना नंबर बता दिया और साथ ही कहा कि भविष्य में अगर किसी काम में मदद कर सका तो उसे खुशी होगी। उसके बाद सौम्या ने कभी उसे फोन नहीं किया और उसने भी कभी सौम्या को दोबारा फोन नहीं किया। आज अचानक एक तीसरे शहर में एक-दूसरे को देखकर दोनों अचंभित से हो गये। पता नहीं, नई जगह होने के कारण या पुरानी जान-पहचान होने के कारण सौम्या को कुछ भी अजीब नहीं लग रहा था और सारी बात उसे बताते हुये राजीव के परिवार आदि की कुशलता पूछनी शुरू की। राजीव ने बताया कि वह अपने कुछ मित्रों को ट्रेन में बिठाकर आया है और संयोग से आज का दिन पता नहीं क्यों उसने अकेले बिताने के लिये आफिस से लीव ले रखी है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. एक सुझाव कहानी या लेख में अगर पैराग्राफ कर दे तो पढने में अच्छा लगेगा

    उत्तर देंहटाएं
  2. @dhiru singh
    ----------------

    ठाकुर साहब, सुझाव के लिए धन्यवाद, अभी यह बालक अनाड़ी है, आप जैसे दिग्गजों की सलाह वांछनीय हैं, भविष्य में ध्यान दूंगा| स्नेह बनाये रखियेगा, यही आकांक्षा है|

    उत्तर देंहटाएं
  3. भावों में लपेटे कथानक को खूबसूरती से बुना है...
    क्या यह कहानी का अंत है??क्योंकि ऐसा लगता है ..कहानी और विस्तार मांगती है...:)

    उत्तर देंहटाएं
  4. @अल्पना वर्मा जी
    ------------
    टिप्पणी के लिये धन्यवाद। यह अंत बिल्कुल नहीं है। इस भाग के अंत में जारी लिखना भूल गया था, शुरूआती दौर के कारण ऐसी बहुत सी गलतियों की अपेक्षा रख सकती हैं, हां गलती रिपीट नहीं होगी, ये विश्वास दिलाता हूं। अगले भाग में अंतराल ज्यादा हो गया है, जिंदगी की क्रासवर्ड में उलझा हुआ हूं, आशा है जल्दी ही लौटूंगा।
    आपका मेरे ब्लाग पर आना ही मेरे लिये उपलब्धि है, पुन: धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  5. संजय जी,
    मैंने ये पहले नहीं पढ़ा था...
    आज पढ़ रही हूँ...क्यूँ लग रहा है कि ये संस्मरण है....?
    सौम्या और सौम्या को जीतने वाला आपस में मिलते ही होंगे, अब भी..:)
    बहुत अच्छा लिखते हैं आप...
    जारी रहिये...

    उत्तर देंहटाएं

सिर्फ़ लिंक बिखेरकर जाने वाले महानुभाव कृपया अपना समय बर्बाद न करें। जितनी देर में आप 'बहुत अच्छे' 'शानदार लेख\प्रस्तुति' जैसी टिप्पणी यहाँ पेस्ट करेंगे उतना समय किसी और गुणग्राहक पर लुटायें, आपकी साईट पर विज़िट्स और कमेंट्स बढ़ने के ज्यादा चांस होंगे।