गुरुवार, फ़रवरी 11, 2010

एक दिन या पूरा एक जीवन? भाग ४

सौम्या को वहीं बेंच पर बैठने के लिये कहकर राजीव प्लेट्फ़ार्म पर ही बने केटरिंग स्टाल पर गया और अपने लिये एक काफ़ी, सौम्या के लिये चाय व बिस्कुट लेकर लौट आया। दोनों अपने-अपने कप से चुस्की लेते हुये बातें करते रहे। चाय खत्म करके सौम्या ने अनायास ही पूछ लिया, “सर, क्या आप मुझे युनिवर्सिटी तक ड्राप कर देंगे, मुझे कुछ काम है और संयोग से समय भी है?” राजीव को तो जैसे बिन मांगे अपार दौलत मिल गई हो, फ़ौरन कह उठा, “सौम्या, तुम्हारे कुछ काम आ सकूं तो यह मेरे लिये सौभाग्य की बात होगी। मैं तुम्हें युनिवर्सिटी भी पहुंचा दूंगा और उसके बाद जहां तुम्हारी अपायंट्मेंट है, वहां तक समझो कि मैं तुम्हारा ड्राईवर हूं।” दोनों स्टेशन से बाहर चल दिये।

बाहर पार्किंग से कार निकालकर राजीव ने कार युनिवर्सिटी की तरफ़ मोड ली। दोनों के बीच अब खामोशी ही थी, गूंज रही थी तो बस किशोर कुमार की आवाज, ’किसी बात पर मैं किसी से खफ़ा हूं, मैं जिंदा हूं पर जिंदगी से खफ़ा हूं।’ सौम्या ने चुप्पी खत्म करते हुये पूछा, “अभी भी यही गाना आपका फ़ेवरेट है?” राजीव ने हंसते हुये इतना ही कहा, “पसंदीदा चीजें बदलना मेरे लिये कभी भी आसान नहीं रहा, जो मुझे पहले पसंद था वो सब हमेशा पसंद रहेगा, लेकिन इतनी छोटी सी बात तुम्हें याद है, मैं हैरान हूं।” सौम्या बोली, “सर, मुझे तो शायद छोटी बातें ही ज्यादा याद रहती हैं। इस गाने को मैने पहली बार आपके फ़ोन पर ही सुना था और एक दो लाईनें ही इतना असर डाल गईं थीं कि मैंने उसी दिन नेट पर ये गाना सर्च किया और मुझे भी यह गाना बहुत पसंद आने लगा। आप अपनी फ़ैमिली के बारे में कुछ बताईये न, बच्चे कौन सी क्लास में हैं?”

राजीव ने तब तक कार युनिवर्सिटी के गेट के अंदर मोड ली थी और कार रोकते हुये सौम्या से पूछा, “पहले तुम बताओ कि तुम्हारा यहां कितनी देर का काम है? मैं साथ चलूं या यहीं इंतजार करूं?” सौम्या ने कहा, “आप यहां अकेले कहां बोर होंगे, आपको कोई काम हो तो बेशक आप चले जाईये, मुझे जरूरत होगी तो आपको काल कर लूंगी। आपने मुझे यहां तक पहुंचा दिया, नहीं तो शायद मुझे कुछ परेशानी होती। मेरे कारण आपको तकलीफ़ हुई, थैंक्स कहूं या सारी?” राजीव कह उठा, “आज तो मैं वैसे भी बिना मकसद के भटकने के मूड में था, ऐसे में मेरा तो दिन तुम्हारे साथ सफ़ल हो गया। और मैं तुम्हें सही जगह पर पहुंचाकर ही आज तुम्हारा पीछा छोडूंगा, इसलिये तुम मेरी तरफ़ से निश्चिंत रहो।” उसकी बात अभी खत्म भी नहीं हो पाई थी कि सौम्या का मोबाईल बज उठा। देखा तो निशा का ही फ़ोन था। निशा ने बताया कि मीटिग कैंसिल हो गई है और सौम्या उनकी तरफ़ से फ़्री है। अब सौम्या असमंजस में आ गई। उसकी रिजर्वेशन शाम की शताब्दी से थी और अभी छ: घंटे से ज्यादा का समय उसके पास था। अब उसे लगने लगा कि इस कम जाने पहचाने शहर में अकेले समय बिताने की सोचना भी मुश्किल काम है। चूंकि राजीव ने उसकी और निशा की बातचीत से स्थिति का अंदाजा लगा लिया था, उसने सोचा कि कुछ समय सौम्या को अपना कार्यक्रम तय करने के लिये मिलना चाहिये। सौम्या को दुविधा से निकालते हुये उसने कहा कि सौम्या अंदर जाकर अपनी मार्कशीट वाला काम निपटाये और वह कार में ही उसका इंतजार करेगा। सौम्या भी यह सोचकर अंदर चली गई कि इस बीच किसी निर्णय पर तो पहुंच ही जायेगी।

लगभग २० मिनट के बाद जब सौम्या बाहर आई तो राजीव की कार वहां नहीं थी। हैरानी से वो इधर-उधर देखने लगी, तभी राजीव की कार सामने से आती दिखाई दी। कार रोककर राजीव बाहर निकला और उसने सौम्या से कहा, “मैंने सोचा कि तुम्हारे आने तक पेट्रोल डलवा लूं, काम हो गया क्या?” “कहां सर, लगता है कि आज के दिन तो कोई काम पूरा नहीं होगा। आज डीलिंग क्लर्क छुट्टी पर है, आवेदन जमा करवा दिया है। कह तो रहे हैं कि डुप्लिकेट मार्कशीट डाक द्वारा भेज देंगे।” सौम्या का चेहरा उदास देखकर राजीव से रहा नहीं गया और वह उसे समझाने लगा,"सौम्या, तुम इस बात की चिंता मत करो। तुम्हारा यह काम मैं खुद करवा दूंगा। आओ चलें।” सौम्या को अपनी जगह से न हिलते देखकर उसकी कशमकश को देखते हुये राजीव ने पूछा, “एक बात एक बार ही पूछ रहा हूं, क्या तुम ऐसा सोच सकती हो कि मैं तुम्हें किसी उलझन वाली स्थिति में डाल सकता हूं?” सौम्या ने दो पल उसकी आंखों में देखा, इंसान झूठ बोल सकता है मगर इतनी स्वच्छ आंखें झूठ नहीं बोला करतीं। वह बोली, “सर, आपके बारे में ऐसा मैने कब कहा और वैसे भी जिंदगी ने इतना अनुभव तो मुझे दे ही दिया है कि मुश्किल परिस्थितिओं में मुझे संभलना कैसे है।” सौम्या कार का दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गई।

राजीव ने ड्राईविंग सीट संभालते हुये सौम्या से कहा, “बेशक हमारे दिल साफ़ हैं, लेकिन मैं तुम्हें अपने फ़्लैट पर नहीं लेकर जा रहा हूं। दरअसल मैं इन दिनों यहां अकेला हूं और इसलिये तुम्हें अपना मेहमान बनाकर खातिरदारी नहीं कर सकता। उम्मीद है तुम मेरे फ़ैसले को सही समझोगी। आज मैं तुम्हारा गाईड बनकर तुम्हें इस शहर की मेरी पसंदीदा जगह ’राक गार्डन’ लेकर चल रहा हूं। मेरी तुमसे एक रिक्वेस्ट है, आज मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना-सुनना है, फ़िर शायद हमारी मुलाकात हो या न हो। तुम पर कोई दबाव नहीं है, जिन सवालों के जवाब तुम न देना चाहो बेशक मत देना, बस मन में कोई मलाल मत रखना। ट्रीट मी लाइक योर फ़्रेंड फ़ोर टुडे एटलीस्ट, जस्ट फ़ील युअरसेल्फ़ फ़्री लाईक अ बर्ड एंड टेल मी युअर विश इफ़ यू हैप्पन टु डिफ़र विद मी ओन एनी पाईंट।” राजीव ने कार स्टार्ट कर दी और अचानक ही सौम्या जैसे सचमुच एक फ़ाख्ता की तरह हल्की हो गई थी।

जारी…..

4 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक कहानी. अगली कड़ी का इंतज़ार है.

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  2. अब तक की सारी कड़ियाँ पढ़ गया। प्रवाह पर मुग्ध हूँ। अगली कड़ी की प्रतीक्षा है।
    सरदार जी वाले लेख में वर्तनी की त्रुटियाँ हैं। ठीक कर लीजिए।

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  3. kahani mein baandh kar rakhne ki kshmata hai paathkon ko..parwah bahut pasand aayi hai aur bhav bhi..aagi ki kadi ka intezaar hai..

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  4. रॉक गार्डेन में झूला तो हम भी झूले हैं...देखें ये लोग क्या करते हैं!

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