शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

एक दिन या पूरा एक जीवन? भाग ५

गाड़ी पार्किंग में लगाकर दोनों प्रवेश द्वार की और बढ़े| राजीव ने दो टिकट खरीदे और सौम्या से वहीं इन्तजार करने के लिए कहकर एक ओर गया और थोड़ी देर में जब वापिस लौट कर आया तो उसके हाथ में कुछ खाने का सामान और सोफ्ट ड्रिंक्स की पेट बोतलें थीं| सौम्या हँस पड़ी और कहने लगी क़ि आज तो पूरी पिकनिक की तैयारी है| दोनों रॉक -गार्डेन में प्रविष्ट हुए| धीमे-धीमे चहलकदमी करते हुए और हर कलाकृति का ध्यान से अवलोकन करते हुए आगे बढ़ते रहे| राजीव का तो जैसे वहां एक-एक कदम जाना पहचाना था| हर कलाकृति के बारे में सौम्या को जानकारी देते हुए अब तक वह एक गाईड की भूमिका में आ चुका था और सौम्या भी इन क्षणों को पूरे आनंद से भोग रही थी| कैसे एक साधारण से सरकारी कर्मचारी ने अपने जुनून में शहर भर से कबाड़ इकट्ठा किया और एक ऐसी दुनिया रच डाली जो देखने वालों को सम्मोहित कर देती थी| उन्हें इस तरह से घूमते हुए काफी देर हो गयी थी| राजीव ने कुछ देर आराम करने का सुझाव दिया जो सौम्य को बहुत पसंद आया| वहीं एक साफ़ सी जगह पर दोनों बैठ गए और साथ लाये खाने का पैकेट खोल लिया|
सौम्या ने चुप्पी तोड़ते हुए राजीव से फिर उसके परिवार की जानकारी लेनी चाही| राजीव ने उसकी बात ख़त्म होने से पहले ही पूछ डाला, "ये सामने खिला फूल कितना सुंदर लग रहा है, सच कहना तुम्हें इसे देखकर कैसा लग रहा है?" सौम्या का ध्यान सामने खिले गुलाब के फूल पर गया और देखकर उसे अफ़सोस हुआ की उसने पहले यह क्यों नहीं देखा| वो बोली, "सर, फूल तो वाकई बहुत खूबसूरत लग रहा है| वैसे फूल तो प्यारे ही होते हैं, नहीं क्या?" "फूल तो प्यारे होते ही हैं, बात उसे देखने वाले की नजर की और भावना की है| देखो न, इसी गुलाब को देखकर कोई इसे तोड़कर व्यक्तिगत सज्जा के लिए अपने किसी प्रिय को भेंट करना चाह रहा होगा तो कोई इसे भगवान् को अर्पित भी करना चाह रहा होगा| किसी के मन में तो इसे इसकी डाली से अलग करने की इच्छा हो रही होगी और कोई मेरे जैसा यह सोच रहा होगा कि इस गुलाब की सुन्दरता इसी तरह बरकरार रहे ताकि देखने वालों को भी सुख मिले और यह भी अपनी जगह से विस्थापित न हो|" राजीव जैसे एक सांस में ही सारी बात बोल गया| दो पल चुप रहकर वह सौम्या से पूछने लगा, "सौम्या, तुम्हें मैं कई साल से जानता हूँ, परिचय बेशक बहुत प्रगाढ़ ना रहा हो, पर मैं तुमसे बहुत प्रभावित रहा हूँ| मेरा तुमसे इस बारे में बात करने में वही अभिप्राय है जो इस गुलाब के बारे में मेरे विचार है| तुम खुश क्यों नहीं दिखाई देती हो? साफ़ दिखाई देता है क़ि तुम बहुत गंभीर सी होती जा रही हो| जिस सौम्या को मैं जानता था वह एक खुशमिजाज और हंसमुख लडकी थी, बल्कि तुम्हारी शादी के फ़ौरन बाद से ही तुम एकदम बदल गयी हो| बदलाव तो हरेक में आता है लेकिन एक हंसता-खेलता इंसान एकदम संजीदा हो जाए तो हैरानी होती है| मेरा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है, आज के बाद शायद हमारी मुलाकात भी न हो, आज तुम इन दो तीन घंटों में मुझसे अपना दुःख-दर्द बाँट सको तो शायद अच्छा रहेगा| मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ, अगर भरोसा कर सको तो मुझे बताओ क़ि क्या है जो तुम्हें अन्दर ही अन्दर साल रहा है?"
सौम्या को यह अंदाजा नहीं था कि राजीव सीधे उससे ऐसे सवाल करेगा लेकिन आज का दिन ही उसके लिए अप्रत्याशित था, सुबह से ही घटनाएं एक के बाद ऐसा रूप ले रही थीं कि वह कुछ तय ही नहीं कर पा रही थी कि क्या करे ओर क्या न करे| फिर राजीव पर उसे इतने भरोसा तो था ही कि उसके हाथों किसी प्रकार का अनिष्ट नहीं हो सकता| थोड़ा सोच कर सौम्या ने अपनी जीवन गाथा कहनी शुरू की|
बचपन बीतने के कुछ बाद ही पापा की मृत्यु ने उसे अपने रिश्तेदारों पर आश्रित कर दिया था, जहां सिर्फ पढाई का खर्च देकर उससे सारा दिन घर के काम करवाये जाते थे ओर फिर बात बात पर इस बात का अहसान जताया जाता था कि वह एक अवांछित बोझ थी| पढाई का शौक उसे जरूर था और यही शौक उसे जिन्दगी में सहायक हुआ| मेधावी छात्रा होने का लाभ यह हुआ कि हाई स्कूल के बाद से ही छात्रवृत्ती जो मिलनी शुरू हुई मानो उसके जीवन को एक लक्ष्य मिल गया| एम.एस.सी. में तो उसने गोल्ड मेडल प्राप्त किया और तब तक उसके पालकों को भी उसमें कुछ गुण दिखने लगे थे| उज्जवल भविष्य को देखते हुए शादी भी अच्छी जगह हो गयी| शादी के बाद तक अनुज भी उसी की तरह ऐड-हाक प्रवक्ता के रूप में एक प्राईवेट कालेज में नियुक्त था और सरकारी नौकरी के लिए प्रयासरत था| शादी के फ़ौरन बाद ही सौम्या को नौकरी के साथ घर-परिवार की पूरी जिम्मेदारी उठानी पड़ गयी ताकि अनुज निश्चिन्त होकर प्रतियोगिता की तैयारी कर सके| घर संभालने में तो खैर सौम्या को कोई परेशानी नहीं आई और अनुज का स्वभाव भी अच्छा ही था लेकिन सौम्या का बोझ बढ़ता ही गया और नौबत यहाँ तक आई कि अनुज ने नौकरी छोड़ दी और घर, समाज और यहाँ तक कि अपनी नव विवाहिता पत्नी की तरफ ध्यान देना भी बंद कर दिया| उसपर सिर्फ एक ही धुन सवार थी, कैरियर बनाना है और यहाँ तक सौम्या को कुछ गलत भी नहीं लगा क्योंकि उम्र के अनुसार यह समय कैरियर बनाने का था| अनुज के लिए आवेदन-पत्र लाना, ड्राफ्ट बनवाना और उन्हें पोस्ट करना, ये सब काम भी सौम्या ही कर रही थी| अनुज की मेहनत और सौम्या का समर्पण रंग लाया और अनुज केंद्र सरकार की ग्रेड १ की परीक्षा में सफल हुआ| इस सफलता का श्रेय मिला अनुज की जीतोड़ मेहनत को और ईश्वर व माता-पिता के आशीर्वाद को| कद्र नहीं हुई तो सौम्या के त्याग की, अनदेखा किया गया तो सौम्या द्वारा दिए गए सहयोग को और उपेक्षा हुई तो सौम्या की इच्छाओं की| अनुज अपनी नई नौकरी में ऐसा व्यस्त हुआ कि भूल ही गया कि सौम्या भी उसीके समकक्ष प्रतिभा रखती है और अपने उस वादे को जो शायद उसने बिना किसी इरादे के ही शादी के फ़ौरन बाद सौम्या से किया था कि एक बार मैं सफल हो गया तो तुम अपनी यह अस्थाई नौकरी छोड़ देना और पूरी तरह अपने कैरियर को स्थाई रूप देना| अब एक राजपत्रित अधिकारी के रूप में उसका वेतन इतना तो था ही कि इन दो जनों का गुजारा अच्छे से चल जाता लेकिन कुछ तो नई नौकरी की जिम्मेदारियां और कुछ प्रेक्टिकल जीवन से वास्ता पड़ा तो जो जिम्मेदारियां सौम्या अब तक संभाल रही थी, उनमें हाथ बंटाना तो दूर वो उनसे एकदम निरपेक्ष हो चुका था| हालांकि सौम्या के साथ उसका बर्ताव कहीं से भी गलत नहीं था लेकिन सौम्या का जो शिक्षा क्षेत्र में कैरियर बनाने का स्वप्न था वह उसे अब व्यर्थ लगने लगा था| एकाध बार सौम्या ने इस बारे में बात करनी भी चाही तो अनुज ने कोई रेस्पोंस नहीं दिखाया| उसके अनुसार जो जॉब सौम्या कर रही थी, वह काफी थी| जिन सुविधाओं की आदत एक बार पड़ जाए, उनसे पीछा छुडाना आसान नहीं होता, शायद अनुज के अवचेतन में ऐसा ही कुछ ख्याल था कि अब यदि सौम्या भी उसके समकक्ष नौकरी पा गयी तो घर की कुछ जिम्मेदारियां उसके सर आ सकती हैं|
सौम्या के सभी बातें राजीव ध्यान से सुन रहा था और उसे याद आ रहा था वो गाना, "कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता"..............
जारी........

6 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया चल रहा है. पहले यहाँ तक जान्ने की उत्सुकता थी, अब आगे का हाल जान्ने की उत्सुकता है.

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  2. बहुत बढिया, आगे की कडी का इंतजार है.

    रामराम.

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  3. Aage padhne kee utsuktaa jaag gayee hai! Bada sahaj lekhan hai aapka!

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  4. सभी कहानियाँ समाज का दर्पण होती हैं...
    और ऐसे कई उदाहरण अपने आस पास हैं जब पत्नियों ने घर का सब कुछ सम्हाल लिया..पति कि प्रगति के लिए ...लेकिन कोई श्रेय नहीं मिला उनको..
    बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति...कहानी में रोमांस भी है...
    अच्छा लगा पढना..
    और अब आगे का इंतज़ार है...

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  5. ऐसी कई सौम्याएं मैने भी देखी है जिनका कैरियर बस अपने बच्चों और रसोई तक ही सिमट कर रह गया। इस सौम्या को तो कम से कम नौकरी करने की छूट तो मिली है वर्ना और लड़कियों को तो इतनी छूट भी नहीं होती।
    मेरे ब्लॉग पर एक टिप्प्णी से आपके इस सुंदर ब्लॉग का पता चला। बस फिर ये कहानी पढ़नी शुरु की और बिना रुके पाँचों अंक पढ़ लिये। अब तो बस अगली कड़ी का इंतजार है।

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