गुरुवार, मार्च 25, 2010

डुबोया मुझको होने ने(४) बस इस बार और झेल लो, प्लीज़्ज़्ज़

तो सज्जनों और सज……, जाने दो जी, कहीं कोई नया पंगा न खड़ा हो जाये हमारी जान को। वैसे ही अपराध बोध से हम जी नहीं पाते हैं। तो साहब लोगों, हमारा मनवा बैरी वहां से भी बेजार हो गया। फ़िर हम तैयार हो गये, नई मंजिलों की तलाश में। दिल्ली तो डूब चुकी थी, हमने अब रूख किया हरियाणा की तरफ़। देसां में देस हरियाणा, जित दूध दही का खाना। चारों तरफ़ मस्ती, अक्खड़पने का माहौल। शुरू में तो यूं लगता कि हर आदमी लड़ने पर उतारू, किसी से आगे बढ़्कर राम राम भी बोल दो तो अगला आंख तरेरकर पूछता, “के सै, काम बता सीधे सीधे”।

बात आगे बढ़ाने से पहले आपका मूड़ थोड़ा सा बदल देते हैं। एक था गादड़(अब हम हरियाणा में हैं तो हमारी भाषा थोड़ी सी ज्यादा ही सुधरी हुई है)। अपनी बिरादरी में कद, तंदरुस्ती,डील-डौल वगैरह में बाकी सब गादड़ों से इक्कीस। अब खुदा जब हुस्न देता है तो नजाकत आ ही जाती है, इस अंदाज में वो भी थोड़ा शरारती हो गया। दूसरे गादड़ों को बात बेबात तंग करना उसका शौक बन गया। उसका सबसे प्रिय शगल था दूसरों को टंगड़ी मार कर गिराना। बिरादरी में उसका रुतबा हो गया और नाम ही टंगड़ पड़ गया। जहां कहीं कोई आंतरिक या बाह्य समस्या आती, उसे आवाज लगाई जाती, ओ टंगड़, जल्दी आ। और उसके मैदान में उतरते ही चारों तरफ़ से नारे लगते, “टंगड़, टंगड़ी मार"।” अब वो आ जाता जोश में और लगाता अपना मास्टर स्ट्रोक यानि टंगड़ी और दुश्मन चित्त। तो जी उसकी शोहरत बढ़ती जा रही थी और साथ में उसका गुमान भी। अब हुआ ये कि एक बार उस इलाके में एक ऊंट कहीं से आ गया। अब बिरादरी वालों ने पहली बार ऐसा अजूबा देखा कि जिसकी सारी की सारी कल टेढ़ी और कद भी इतना ऊंचा। फ़ौरन संकटमोचक को आवाज लगाई गई, ओ टंगड़, जल्दी आ। बहादुर टंगड़ फ़ौरन पहुंचा और मामला समझकर, कौम के सम्मान और अपने गुमान में डूबा हुआ ऊंट से भिड़ गया। अब साहब ऊंट ने खोला अपना जबाड़ा, पकड़ी टंगड़ की गर्दन और उठा दिया जमीन से पांच छ: फ़ुट ऊपर। नीचे से बिरादरी वालों ने नारे लगाने शुरू किये, “टंगड़, टंगड़ी मार”, टंगड़, टंगड़ी मार।” अब टंगड़ बोला, “"बेटी……, टंगड़ी तो तब मारूं जद ये सुसरा पांव धरती पे टिकन दे।”

तो हुजूर किस्सा कोताह ये है कि हमारा भी पाला किसी ऊंट से पड़ गया और न धरती पर हमारे पांव टिके और टंगड़ी मारने की हसरत दिल में ही रह गई। अब मुझे लगता है कि ये किस्सा भी सुनाना ही पड़ेगा। हुआ यूं कि ’ईस्ट इंडिया कंपनी’ की तर्ज पर एक और कंपनी थी ’वैस्ट यू.पी. कंपनी’। इस कंपनी द्वारा किये गये अत्याचारों और शोषण की कहानी भी कोई कम दुखदाई नहीं है, पर अफ़सोस ये है कि वह कहानी शेष लोगों के लिये अनजानी ही रह गई। ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को अपने अधीन किया था तो वैस्ट यू.पी> कंपनी ने भी स्वर्णिम संभावनाओं से युक्त एक उदीयमान व्यवस्था\सभ्यता और पता नहीं क्या-क्या यानि हम पर नजर गड़ाई और अपने अधीन करने के लिये साम, दाम, दंड, विधि सभी माध्यम अपनाये और सफ़ल भी हुये। समझौते के तौर पर एक रेजिडेंट कमिश्नर स्थाई रूप से नियुक्त कर दिया गया। बाकी तो जी आप सब समझदार हैं, अब कोई कितने भी नारे लगाये पर इतना तो समझ लेना चाहिये कि टंगड़ी तो हम तभी मार पायेंगे जब हमारे पांव धरती पर टिक जायेंगे। बस जी फ़िर आपका ये प्रिय टंगड़ खुद ही डूब गया और ऐसा डूबा कि मोती, मानुस और चून की तरह दुबारा नहीं उबरा। ये जो थोड़ी-थोड़ी सी आवाज कभी कभार आती है न, ये तो वैसी ही है जैसे कोई गहरे पानी में डूबता हुआ “बचाओ, बचाओ” की आवाज लगाता है। और ये कतई जरूरी नहीं कि उसे बचा ही लिया जायेगा। वैसे एक दोस्त ने भरोसा दे तो रखा है बचा लेने का और हमें उस भरोसे पर पूरा ऐतबार भी है।

अब आप ही बताओ कि ये डूबना-डुबोना हमारे होने से ही तो हुआ, न हम होते और न ये सब होता। इसीलिये चचा गालिब की लिखी इन पंक्तियों को हमने अपनी प्रोफ़ाईल में लिख डाला था। किसी को कोई गलत बात लगी हो तो सूचित कर दे, माफ़ी मांग लेंगे(पर हटायेंगे नहीं)।

पुछल्ला:- अपना नीरज एक बार ताऊ धोरे जाकर कहने लगा कि ताऊ, इन बनियों और पंजाबियों ने सारे व्योपार पे कब्ज़ा कर राख्या सै। हम हाड़ तोड़कर पीसे कमावां सां और यो गद्दी पे बैठे बैठे सारी माया ने खींच ले सैं। किमे करना चाहिये। इब दोनां ने रुपईये का जुगाड़ करके कपड़े की एक दुकान खोल ली। पहले ही दिन एक महिला पहले तो कुछ देर दुकान के बाहर खड़ी रही और फ़िर नीरज के निमंत्रण पर दुकान में घुस आई। उसके आते ही नीरज फ़ट से पूछने लगा कि बताओ जी क्या देखना पसंद करोगी आप, सूट या साड़ी? जवाब में साड़ी सुनकर नीरज बड़े जोश में आकर एक के बाद एक साड़ी दिखाता गया, वो देखती गईं। जद घणी देर हो गई इस सूखी देखा दिखाई में तो ताऊ गल्ले से उठकर उसके पास गया और पूछण लग्या, “ठीक ठीक बता, तन्नै के चाहिये? महिला बोली, “जी, दर असल मैं तो अपने पति को देख रही थी।” ताऊ नीरज से बोल्या, “छोरे, दुकान में दो साड़ी और रह रही हैं, वो भी खोल के दिखा दे इसने, कदे इसका खसम उनमें न लिपट रह्य हो”।

है न बेमौसम की बरसात वाली बात?

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17 टिप्‍पणियां:

  1. किस्सा-ए-जिंदगानी बहुत सही जा रही है आपकी...आपकी शैली बहुत रोचक है..घटनाक्रम का प्रस्तुतिकरण भी नायब है....और सबसे बड़ी बात रचनाओं में व्यंग का पुट होंठों पर मुस्कान ले आता है....
    आज आपकी पसंद का गीत भी अच्छा लगा...
    आपका आभार..

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  2. ये नीरज के काम ही इस्सेई सैं. सारी दूकान का भट्टा बैठा दिये इसने. वो भाटिया जी उधार लेके दूकान खोली थी. भाटिया जी ने अलग पोस्ट लगा दी कि यार लोग मेरे से उधार लिये हुये पिस्से ना लौटारे सैं.

    रामराम.

    -ताऊ मदारी एंड कंपनी

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  3. बहुत मजेदार रहा ये डूबने-डुबाने का किस्सा. टंगड़ आप चोखे हैं....:-)
    नीरज और ताऊ की जय हो!!!

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  4. Oh...ye to pahli baar padha...Hariyanvi tadka! Bada maza aa gaya!

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  5. @ सुमन जी
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    It is so nice of you, sir, for your 'nice comment.
    Thanx.


    @ मनु जी
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    सर जी,पधारने का शुक्रिया।


    @ अदा जी
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    जिंदगानी कैसे भी जा रही हो, पर किस्सा पसंद आया तो आभार आपका।

    @ ताऊजी
    -------
    रामराम, आपसे तो मुझे क्षमा मांगनी थी पर आप तो पहेली हो, कोई संपर्क सूत्र नहीं है आपके प्रोफ़ाईल पर। नीरज तो खैर छोटा भाई सा है, नाराज होगा तो मना लेंगे पर आपका डर था(वैसे तो आपके लट्ठ का डर था), पर लगता है कि बच गए। बाकी भाटिया जी के पैसे जब पराये मार सकते हैं तो अपनों ने कुण सा गधी के हाथ लगा राख्या सै। चिंता नहीं करनी है, बस मन्ने अपणी मदारी पार्टी में शामिल कर ले, डुगडुगी वादक के रूप में।
    रामराम

    @ शिव कुमार मिश्रा जी
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    शिव भैया, आपका आभारी हूं और ये बढ़िया किया आपने इन दोनों की "जय हो" बोल दी न तो हमारी "भय हो" कर देते ये दोनों।

    @ क्षमा जी
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    आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आप समय समय पर मेरा उत्साह बढ़ाती रही हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. @ manu ji:
    --------
    सर जी, कुछ तो बोलना ही पड़ेगा, आप तो माशाल्लाह गज़लें भी बोल सकते हैं, कवितायें भी पढ़ सकते हैं। काश, हम भी आप जैसा कुछ कह सकते, तो यकीन मानिये ये ऊलजलूल तो नहीं ही लिखते।
    पुन: आभार।



    @ PN Subramaniam Ji:
    ------------------
    सर, अभिभूत हूं, अनुग्रहीत हूं।
    धन्यवाद

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  7. बहुत कम बोलता है 'बे-तखल्लुस' आजकल यारो
    रदीफ़-और-काफिये बे-बह्र हो जाएँ तो क्या कीजै...?

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  8. "रदीफ़-और-काफिये बे-बह्र हो जाएँ तो क्या कीजै...?"
    ...
    हुज़ूर, ’बे-तखल्लुस’ हैं, बेमुरव्वत नहीं है,
    बस इतना याद कर लीजै।

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  9. sanjay jee
    neeraj to aapakaa chhotaa bhaaee saa hee hai.
    lekin wo aajkal offline chal raha hai.
    pichhale hafte ye do posts daal dee thi. ab agalee post pata nahee kab chhapegi.
    aapka mel padha, likha thaa ki meree post me aapakaa naam hai. bhai, isame maafee maangane kee kyaa baat hai?

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  10. संजय जी

    बातें खूब बना लेते हो। पुछल्ला ने प्रभावित किया। तरह-तरह की बातों में बतरस बरकरार रहता है। अनुरोध है बातों को तीन-चार लाइन बाद पेराग्राफ में तोड़-तोड़ कर लिखा करें और ज़्यादा पठनीय हो जाओगे। वैसे आप अपना मस्तमौलापन यूँ ही रखें।

    एक बात विशेष...

    आपकी धर्म के विषय में बनी सोच भिन्न है। फिर भी कभी-कभी ना वह बदलेगी। लगता है धर्म में पाखण्ड अधिक देखकर ही यह खिन्नता आयी होगी।

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  11. @PRATUL:-
    --------
    प्रतुल जी, आप आये और अपने विचार रखे। धन्यवाद।
    आपके सुझाव पर अमल करने की कोशिश करूंगा, आशा है धीरे धीरे कुछ सुधार आ जायेगा। धर्म के बारे में इस पोस्ट में कुछ भी नहीं लिखा है, शायद दूसरी किसी पोस्ट से आपने मेरी खिन्नता का अंदाज लगा लिया। आपका आईडिया ठीक है, पाखंड देखकर मैं खिन्न हो जाता हूं, चाहे वो धर्म से संबंधित हो, समाज से, राजनीति से या हमारे किसी और व्यवहार से। और अपनी बात दूसरों पर थोपने वाली बात मुझे सबसे ज्यादा खिन्न करती है, फ़िर वो किसी की तरफ़ से भी क्यों न हो। लेकिन खुद को बदलने के लिये मैं तैयार रहने की कोशिश करता हूं। अगर मेरी सोच अभी गलत है, तो आपके द्वारा अपेक्षित ’कभी-न-कभी’ का इंतजार रहेगा। और, सच में बहुत अच्छा लगा कि आपने मुझ पर समय खर्च किया।
    धन्यवाद।

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