शुक्रवार, मई 28, 2010

झेलो अब फ़िर से, नहीं मानते तो...........

डिस्क्लेमर:- अगर ये सोच कर इधर पधार रहे हैं कि कोई बड़ी साहित्यिक रचना पढ़ने को मिलेगी, तो हुज़ूर हमें बस यही कहना है कि ’हमारे भरोसे न रहना कोई।’ 
पिछले शनिवार से ही  अपने कम्प्यूटर पर ब्लॉगस्पॉट वाले ब्लॉग नहीं खुल रहे थे।  हम तो तभी समझ गये थे कि हमारी बढ़ती लोकप्रियता से घबरा कर हमारे दुश्मनों ने कोई वू डू कर दिया है।  नहीं तो ऐसा थोड़े ही होता है कि याहू मेल, ईमेल, जीमेल और यहां तक कि फ़ी मेल भी काम कर रही थी(फ़ी मेल को कृपया रेडिफ़ मेल पढ़ लें, हमारी है बिना बैक गेयर वाली गाड़ी, नहीं तो बैक जाकर गलती खुद ही सुधार लेते) और जिस गाड़ी पर हम सवार थे वही पंचर हुई पड़ी है।  शुरू के दो दिन तो बहुत परेशानी हुई, फ़िर तीसरा दिन आते आते परेशानी की आदत पड गई। हमने भी हिन्दुस्तानी जुगाड़ का इस्तेमाल करते हुये एक पोस्ट के माध्यम से अपना दुखड़ा रो दिया, लोगों की तो जैसी आदत है हमारा दुखड़ा सुनकर हंस पड़े।  लेकिन हमारी शिद्दत के आगे कायनात को आखिर झुकना ही पड़ा और कल से समस्या दूर हो गई है। अब हम धन्यवाद तो किसी का करने से रहे, इन्सान हैं आखिर, रवि रतलामी साहब और अनुराग शर्मा जी जैसे भले आदमियों की नेकी को दरिया में डाल कर यही कहेंगे कि “झेलो अब फ़िर से, नहीं मानते तो।”
तो साहब लोगों, आज आपको लिये चलते हैं आज से लगभग बीस साल पहले की एक गर्मियों की रात में।  आजकल जैसी ही गर्मी पड रही थी, समय लगभग रात के नौ दस का होगा।  मैं ऐसे ही बाहर टहल रहा था कि एक परिचित की दुकान पर कुछ हलचल सी देखकर वहां पहुंच गया।   देखा कि हमारे पड़ौस की गली में रहने वाला एक व्यक्ति दुकानदार से कोल्ड ड्रिंक की बोतल मांग रहा था और वो देने में टालमटोल कर रहा था।  अब उस व्यक्ति का व्यक्तित्व कुछ अलग सा था, तो हमें तो शुरू से ही थोड़ा खिंचाव सा होता था उअसे।  बाल बड़े बड़े, कमीज के साथ हमेशा पायजामा पहने हुये तेज गति से इधर उधर आते हुये कई बार देखा था।  लोग तो उसे हिला हुआ मानते थे, लेकिन मैंने कभी भी उसे किसी से बात करते हुये नहीं देखा था।  ऐसी वेशभूषा के बावजूद हमेशा साफ़ सुथरा दिखाई देता, लेकिन आंखों में कुछ जरूर था उसकी। या तो किसी से आंख मिलाता नहीं था कभी, और नजर मिल जाये तो ऐसी गहरी नजर थी कि सामने वाला नजर बचाता।  अब मैं समझ गया कि दुकानदार भी उसे सामान्य पागल ही समझता है और किसी नुकसान के अन्देशे से उसे बोतल देने से बच रहा है।  खैर, मैंने जाकर उससे एक कोल्ड ड्रिंक मांगा।  मुझे तो उसने देना ही था, मेरे बाल ठीक ठाक थे और मैंने कमीज के साथ पायजामा नहीं पहना था, मेरा मतलब है कि मैंने तो कुरते के साथ पायजामा पहन रखा था।  आप भी न पता नहीं क्या क्या सोचने लगते हो….।  अब मेरे हाथ में बोतल आई और मैने आगे पेश कर दी, सोचा देखते हैं कि क्या होता है।  उसने आराम से बोतल पी, जेब से पैसे निकाले और दुकानदार को दिये।  जाने से पहले मुझसे कहने लगा कि गरमी बहुत है और आसपास के इलाके में सिर्फ़ इसी के पास असली कोल्ड ड्रिंक मिलता है, इसीलिये मैं जिद कर रहा था।  लो जी, माल मालिकों का और मशहूरी कंपनी की, हमारा कुछ गया नहीं, उधर गिव एंड टेक वाली डील बढ़िया से हो गई।  आगे जाकर नतीजा ये निकला कि जब भी हमारा आमना सामना हो जाता, वो हाथ जोड़कर नमस्ते करने लगा और कुछ उसकी उम्र को देखते हुये और कुछ अपने दिल की सुनते हुये मैं भी हाथ जोड़कर पहले ही नमस्ते कर देता।  लोगों का क्या है, पहले ही हमें देखकर हंसते थे, अब और भी ज्यादा हंसने लगे।  मुझे समझाया करते कि यार ये पागल है और तू उसे नमस्ते करता है।  अब मैं हंस देता और जवाब देता कि बड़ा है मुझसे, इसीलिये नमस्ते कर देता हूं।
कई महीने और कई साल तक ये नमस्ते सदा वत्सले चलती रही जी हमारी, और बहुत बढ़िया तरीके से।  अब हुआ कुछ ऐसा कि, हमारे घर वालों ने हमारा बयाना ले लिया, समझ गये न?  और नीलामी की तारीख से पहले ही ये फ़ैसला लिया गया कि मकान में कुछ नव निर्माण किया जाना है तो दो तीन महीने के लिये आसपास कहीं किराये पर रहा जायेगा। अब साहब, पडौस की गली में एक फ़्लैट पसंद करने के लिये हम गये और अभी बाहर खड़े मकान मालिक से बात कर रहे थे कि हमारे कोल्ड ड्रिंक वाले मित्र ने पीछे से आकर नमस्ते मारी।  हमें कोई मारे और हम चुप रह जायें, ऐसे कुम्हड़बतिया नहीं थे तब, हमने भी मार दी। उन्होंने पूछा कि आज यहां कैसे, मैंने बताया कि अब आपकी गली में ही रहने का विचार है। वो चले गये हजरत अपनी स्वाभाविक तेज चाल में अपने घर की तरफ़ और हम मश्गूल हो गये बातचीत में।
उसके कुछ मिनट के बाद एकदम ऐसा लगा कि जैसे बम फ़टा हो, और हमारी आंख खुली तीन दिन के बाद अस्पताल में।  चश्मदीद गवाहों ने बयान दिये कि हजरत ने घर से लट्ठ लाकर मेरे सिर में मारा था और सिर्फ़ इतना कह रहे थे कि “एक गली में एक ही रहेगा।” लोगों ने पहली बार उसे इतने गुस्से में देखा था और बाद में भागते हुये भी देखा था।  हमें डाक्टर साहब कहते थे कि हमारी वायरिंग वगैरह सब एकदम चौकस कर दी है, पर खोपड़ी पर वो निशान रह गया बाकी, जिससे प्रेरणा लेकर पहले हालीवुड वालों ने शायद ’मोमेंटो’ नाम की फ़िल्म बनाई और फ़िर हमारे मि. परफ़ेक्शनिस्ट ने भी चांदी कूटी बालीवुड में।  अब लोग बाग को तो आप जानते ही हैं, जो मिले वही हमसे सर झुकाने को कह्ता, निशान देखने के लिये, कहानी सुनने के लिये और फ़िर हम पर  हंस देने के लिये!!
जिस किसी को शक हो रहा हो हमारी बात पर, अपना पता नोट करवा दे।  पांच सात साल के बाद हमने सब छोड़ छाड़कर घुमक्कड़ी करनी है, और हमारे यार बाद्शाह भी ये जानते हैं।  ये नीरज छोरा खुद तो आबाद हो जायेगा तब तक, हमें इतनी बढ़िया बढ़िया पोस्ट दिखाकर घर से बेघर करने पर तुला हुआ है।  तो हमारी घुमक्कड़ी की शुरूआत शक्की लोगों के घर जाकर अपना सर झुकाकर उनका शक दूर करने से होगी।  बस एक लोचा और है, एक डाक्टर साहब से बात चल रही है।  वो कह रहे हैं कि इलास्टिक सर्जरी से गर्दन इतनी ऊंची कर देंगे कि किसी के सामने झुकाने की सोच भी नहीं पायेंगे।  अब ये इलास्टिक सर्जरी शब्द से कन्फ़्यूज़ मत हो जाना जी, ये हमारा ईजाद किया हुआ शब्द है और इसका रजिस्ट्रेशन करवाने के लिये वर्ल्ड ईंटेलैक्चुअल प्रापर्टी राईट्स के पास आवेदन भेजने ही वाले हैं।  वैसे तो ये सर्जरी वाला आईडिया बुरा नहीं है, थोड़ा महंगा जरूर है।  पूछ देखते हैं डाक्टर साहब से कि इलास्टिक अपना लायें तो कितना डिस्काऊंट मिलेगा?
अब आप को सिर्फ़ इतना बताना है कि ऊपर के पांच पैराग्राफ़ में से सबसे सच्चा कौन सा है और सबसे झूठा कौन सा है। नहीं बताओगे तो कुछ नहीं होगा और बताओगे तो वेताल फ़िर से पेड़ पर लटक जायेगा
:)  फ़त्तू की शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन अभी संतान सुख नहीं प्राप्त हुआ था।  पास में ही एक नया नया आश्रम स्थापित हुआ था, जहां के बाबाजी एक रिटायर्ड बायोलोजी अध्यापक थे। फ़त्तू अपनी पत्नी के साथ उनकी शरण में गया और गुहार लगाई।   बाबाजी ने उससे बातचीत करके उसकी समझ और समस्या का अंदाजा लगाया।  एक भभूति की पुडि़या उसे दी, और अपनी फ़ीस लेकर आशीर्वाद भी दे दिया।  फ़त्तू खुशी खुशी कूदता हुआ जब अपनी पत्नी के साथ लौट रहा था तो बाबाजी ने आचाज लगाई, “ओ बावली बूच, अपने कर्तव्य में ढील मत करियो, कहीं निरी पुड़िया के ही भरोसे रह जाये।”
सबक:  यही बात हमारे ब्लाग गुरू ने कही थी हमें, कि तुम्हारा कर्तव्य है अपनी भड़ास निकालना।  टिप्पणी वो भभूति है जो फ़ल प्राप्ति में सहायक जरूर है, लेकिन कर्तव्य का स्थान नहीं ले सकती।   हमने तो अपना कर्तव्य निभाना ही है जी, सो निभा रहे हैं।




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13 टिप्‍पणियां:

  1. Welcome back!
    बेफिक्र होके लगे रहो भाई. जिन्होंने अब तलक झेला है वे आगे भी झेल्लेंगे. अब इत्ता इन्सिस्ट कर रहे हो तो बता रहे हैं [वरना तो चुप ही रहते हैं] झूठ तो बस लट्ठ में दीक्खे है. वो भला आदमी तो उस दिन कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतल वापस करने आया था [सर आँखों पे]

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  2. ओए..मन्ने लिफ़ाफा बैरंग वापिस दीखे है.... :)
    ऐसा है एक म्यान में दो तलवार नाही रह सकत हैं, और नाही एक गली में दो पागल रह सकत हैं जी....हा हा हा हा ...
    और सच्ची बात ये सै....आप तो जी बस लगे रहो राम कथा बांचे में...बाकी हम झेल लेवेंगे....बहुते झकास है जी.....
    हाँ नहीं तो..!!!

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  3. क्या लट्ठ और क्या बिनलट्ठ......अपने को सब चलता है। आप लिखे जाओ....मुझे भी यही लग रहा है कि वह भला आदमी केवल कोल्ड्रिंक की बोतल वापस करने आया था।

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  4. बहुत बढ़िया किस्सा है ... मज़ा आ गया ...

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  5. ’हमारे भरोसे न रहना कोई।’


    न इस भरोसे आये थे, न ऐसे जा रहे हैं मगर फिर भी जाने क्यूँ, कुछ तो बात है, उसे क्या कहते हैं???

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  6. सच्ची बात है जी...तो सम कौन.......

    अरे लट्ठ खाकर भी.......मतलब सर में लगवाकर...या मरवाकर जो भी यार.....

    वैसे हमारी नमस्ते दूर से ही....

    कुंवर जी,

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  7. पता लगा...नमस्ते-नमस्ते खेलते-खेलते ही........ हो गया जी काम ....

    कुंवर जी,

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  8. "डिस्क्लेमर:- अगर ये सोच कर इधर पधार रहे हैं कि कोई बड़ी साहित्यिक रचना पढ़ने को मिलेगी, तो हुज़ूर हमें बस यही कहना है कि ’हमारे भरोसे न रहना कोई।’ "

    Disclaimer revoked !! :)

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  9. एक गली में एक ही रहेगा ,,,बड़े भाई ,,हमें लट्ठ मत मार दियो ,,हम तो वैसे भी कभी-कभार {बिना बताये रोज़ } आपकी गली में आते है अब आ ही गए तो कुछ लिखे बिना जा नहीं सकते वरना पता लगा मोनिटर से निकड कर आपने हमारा माथा ,, फूटे तरबूज में बदल दिया ,,,,ज्यादा नहीं समझ पाए क्या कहना चाहते हो,,,पर जो भी पढ़ा ,,,तारीफ़ लायक था ,,बड़ा ही रोचक और आनंददायक ,,,ऐसी वकवास के तो हम कायल ही है ,,,हम भी वकवास खूब करते है ,,,,कभी हमें मिलो ,,कसम से ,,ऐसी दोस्ती होगी की ,,,,दोनों एक दुसरे की मिसाल देंगे ,,,,हिन्दी ब्लॉग के सभी धुरंदरो में आप हमें बहुत प्यारे हो ,,,,विचार भी बहुत मिलते है ,,,,कभी भूले भटके दोनों मिल गए तो ईमान से ' जोड़ी जमेगी दुनिया हँसेगी' ....बहुत दिलचस्प और वाक्शक्ति के धनी लगते हो

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  10. झेल लिया जी और आगे भी झेलते रहेंगें।
    मजा आ गया ना लट्ठ खाके, और पिलाओ कोल्ड ड्रिंक
    गजल के लिये धन्यवाद

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  11. हमें तो ये सारा किस्सा मनगडन्त लग रहा है..बिल्कुल झूठमझूठ..टौटली...सिर्फ टिप्पणियाँ बटोरने की खातिर.......विश्वास तभी कर पाएंगें जब वो सिर वाला निशान देख लेंगें..लेकिन उसके लिए पाँच सात साल का इन्तजार करना भी हमारे बस की बात नहीं....जगराओं और लुधियाना मे कित्ता फर्क है. कभी चैक करा जाईयेगा..घूमते घामते :-)

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  12. @ vats ji:
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    पंडित जी महाराज,
    क्यों हमारी नई नई दुकानदारी पर नजर लगा रहे हो जी? अब सारी सच्ची बातें पब्लिक में थोड़े ही कही जाती हैं। जगरांव और लुधियाना में दूरी कुछ भी नहीं है जी, आता हूं चैक करवाने किसी दिन(रामलाल का गाजर पाक मशहूर है, लेकर आता हूं आपकी फ़ीस के रूप में, बस सर्दियों तक रुक जाओ। गवाही तो मेरी हक में देनी ही है आपने।
    महाराज, आपके दर्शन जरूर करने हैं यहां से वापिस जाने से पहले।
    फ़ोन नम्बर बदलो तो जरूर प्रोफ़ाईल में अपडॆट कर लेना :))
    होता हूं प्रकट किसी दिन, पहचान तो लोगे?

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