बुधवार, जुलाई 28, 2010

बियाबान-ए-मोहब्बत..................

इस दुनिया में क्या हर आदमी अपनी काबिलियत के मुताबिक मुकाम हासिल कर पाता है? सही मायने में देखें तो बहुत कम लोग ऐसे दिखेंगे जो अपनी प्रतिभा के अनुसार प्रसिद्धि, नाम और दाम कमा सके। जबकि बहुत से ऐसे भी दिखेंगे जो बहुत साधारण होते हुये भी शिखर पर पहुंचने में कामयाब रहे। तो क्या है जो इंसान को कामयाब या नाकामयाब बनाता है? प्रतिभा, मेहनत, दृढ़ निश्चय, जीतने की ज़िद, खुद को पेश करने की कला, मार्केटिंग स्किल्ज़, जुगाड़ करने का जुगाड़ या किस्मत? या शायद इनमें से कोई भी बात। अपने हिसाब से तो कोई ऐसा सर्वदा सफ़ल फ़ार्मूला है नहीं, शायद इसीलिये कृष्ण ने फ़ल की चिंता किये बिना कर्म करने की शिक्षा दी थी। सफ़लता और असफ़लता अपने हाथ की चीज़ नहीं है, इसलिये इनसे ज्यादा अपेक्षा भी नहीं रखनी चाहिये।
नौकरी के सिलसिले में लगभग दो साल पहले जब पंजाब आना हुआ, तो पहली बार मैंने मोहम्मद सिद्दीक को सुना।गानों के स्तर पर कोई बात नहीं कहता लेकिन ऐसी आवाज कम से कम मैंने पहले नहीं सुनी थी। और मजे की बात ये है कि इनका नाम भी यहीं आकर सुना। स्थानीय क्षेत्र में हालाँकि इनका काफ़ी नाम है, लेकिन बाहर शायद बहुत कम लोग होंगे जो इनके बारे में जानते होंगे।
इसी तरह एक बार मैंने अखबार में ’कृष्ण अदीब’ की एक गज़ल पढ़ी। मैंने एक पुरानी पोस्ट में शिव बटालवी की एक कालजयी रचना ’मैनूं तेरा शबाब लै बैठा’ का ज़िक्र करते हुये कहा था कि शिव की एक यह रचना पढ़ने के बाद मेरी हिम्मत उनकी लिखी किसी और चीज़ को पढ़ने की नहीं हो सकी। जब एक गीत, गज़ल इतना असर छोड़ सकती है तो और पढ़ लीं तो अपनी तो ऊपर की मंज़िल शायद हिल ही जाती। कितना दर्द, कितनी तड़प, फ़र्ज़ की जद्दोजहद और इस बेदर्द दुनिया से टकराने ने शराब में डुबो दिया शिव को। मैं इतना जानता हूं कि मैं अगर शराब पीने वाला होता, शिव को पढ़ने के बाद शायद और किसी काम का रहता ही नहीं। कुछ उसी टक्कर की लगी थी ’कृष्ण अदीब’ की वो गज़ल। बरसों पहले पढ़ी थी, अखबार में से काटकर अपने फ़ोल्डर में अपनी प्रिय रचनाओं के कलैक्शन में लगा रखी थी। लेकिन प्रिय चीज़ें शायद बिछड़ने के लिये ही होती हैं, मेरा वह फ़ोल्डर ही कहीं सामान शिफ़्ट करते समय इधर उधर हो गया। नैट पर ढूंढी थी वह गज़ल, नहीं मिली।  मैं जानता हूं कि इस लाईन में तो क्या किसी लाईन में भी मैं अथोरिटी नहीं हूं, लेकिन मेरी नज़र में प्यार को इतने अच्छे से अभिव्यक्त शायद बहुत कम ही लोग कर पाये होंगे और मुझे बहुत हैरानी होती है कि ’कृष्ण’ भी कोई बहुत पॉपुलर नहीं हैं। मेरी निगाह में यह हम लोगों का ही दुर्भाग्य है।
पता नहीं कहीं मेरे किसी कमेंट के कारण यह जाहिर हुआ था या कैसे हुआ यह, लेकिन मुझसे इतने अपनत्व से ’कृष्ण अदीब’ की कोई रचना पढ़्वाने के लिये कहा गया कि ’मो सम कौन कुटिल, खल, कामी’ भी मजबूर हो गया अपनी बहुत पसंदीदा गज़ल आपके साथ शेयर करने के लिये। कई साल पहले पढ़ी थी, न तो यह सोचा था तब कि कभी ऐसी भी नौबत आ सकती है और वैसे भी अब दिमाग पहले सा नहीं रहा है सो जितनी याद है, जैसी याद है, लिख देता हूं, किसी को पसंद आये तो कृष्ण अदीब की वाह वाह और न पसंद हो तो मेरी हाय-हाय।

मैं बियाबान-ए-मोहब्बत की सदा हो जाऊँ,
हाथ जो तुझको लगाऊँ तो फ़ना हो जाऊँ।
        या खलाओं से गिरूँ टूटते तारों की तरह,
        या किसी चाँद से चेहरे की ज़िया हो जाऊँ।
मैं सरे शाम भटकता हूँ फ़रिश्तों की तरह,
अब अगर थोड़ी सी पी लूँ तो खुदा हो जाऊँ।
        और कुछ देर मेरे साथ रहो हमसफ़रों,
         जाने किस वक्त, कहाँ तुमसे ज़ुदा हो जाऊं।

मुझे लगता है कि शायद बीच में एक शेर कहीं छूट गया है, लेकिन मुझे बहुत बहुत बहुत पसन्द है।
जब लोग हमें इतना चढ़ा देते हैं तो हमने भी खुद को जिम्मेदार मानते हुये एक अल्पज्ञात गायक को सान पर चढ़ा रखा है।  किसी दिन भी आपको सुनवा सकता हूँ ;शिव’ और ’कृष्ण’ की लिखी गज़लें।  वादा कोई नही, लेकिन कोशिश जारी रहेगी।

17 टिप्‍पणियां:

  1. शिव बटालवी की इक कुड़ी जिदा नाम मुहब्बत, गुम है ...गुम है..सुनियेगा....ओह!! आह!! करते रह जायेंगे. कृष्ण अदीब जी की रचना भी बेहतरीन पढ़वाई...

    शायद स्किल, मार्केटिंग, लक, प्रेजेन्टेशन, पुश (जुगाड़), टाईमिंग आदि का कॉम्बिनेशन है सफलता.

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  2. ये सुनिये:

    http://home.comcast.net/~kb.singh/shiv/ikkuri.mp3

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  3. सुनवाने की कोशिश करना वादा कभी ना करना... वादा तो टूट जाता है... :) इन्तेज़ार रहेगा इन गुमनाम हीरों की ग़ज़लों का.. आजकल वीडिओ के लिंक नहीं मिल रहे सर क्या बात है?
    मोहम्मद सिद्दीक के बारे में सुनकर तकलीफ हुई... मेरी भी एक करीबी दोस्त हैं जिनकी आवाज़ कहीं से भी श्रेया घोषाल से कम नहीं.. लेकिन यही है कि बस मौका नहीं मिला जबकि उनके ही एक जानने वाले जो हमेशा हर प्रतियोगिता में उनसे दोयम रहे 'इन्डियन आइडल-५' के टॉप-१० तक पहुंचे.. अरे हाँ याद आया आपने कृष्ण अदीब जी के नाम का उल्लेख कर वो कमेन्ट अमरेन्द्र की पोस्ट पर किया था..

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  4. जानकारी का शुक्रिया! सांग, सेरू, सायरी, रागणी वगैरा के मामले में तो जी हम निपट अग्यानी हैंगे। अदीब जी और बटालवी जी का नाम सुना है परंतु मोहम्मद सिद्दीक के बारे में कुछ भी पता नहीं है - कुछ सुनाइये जी कभी मौका लगे तो।

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  5. बहुत सुन्दर रचना पढवाई आपने ... शुक्रिया !
    ये तो सच है कि सफलता मिलना न मिलना बहुत सी बातों पर निर्भर करता है ...

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  6. निसंदेह बेहतरीन किन्तु अधूरी रचना !

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  7. मेरे मन कि ही बात कही है आपने. मैं इस बात पर पुर्णतः विश्वास करता हूँ कि सफलता उत्तमता या गुणवत्ता कि मोहताज नहीं होती. दुनिया में जाने कितने लोग है जिनमे प्रतिभा भरी पड़ी है पर सफलता या प्रसिद्धि उनसे कोसों दूर रहती है. जाने क्यों भीड़, धुल प्रदुषण से भरी सडकों के किनारे मिल रहे टिक्की गोल गप्पों का स्वाद घर में बने उन्ही व्यंजनों से ज्यादा अच्छा लगता है. विषय तो ऐसा है कि लिखे जाओ पर ऑफिस भी जाना है....हाँ कविताये या शेरो शायरी समझना मुझे दुष्कर कार्य लगता है.

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  8. बहुत सुन्दर रचना। कवित्व में प्रभाव होता है। प्रभाव व सफलता का सम्बन्ध परिभाषित करना दुरूह है।

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  9. आपने तो निःशब्द कर दिया...

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  10. ज़रूर इंतज़ार रहेगा ,पंजाबियत से अपने इश्क के बारे में हमने एक पोस्ट भी लिखी थी भाई ,शायद काफी वक़्त हो गया !

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  11. आज की आपकी पोस्ट अच्छी तो है...लेकिन लगता है आप १००% मौज़ूद नहीं थे, लिखते वक्त...कुछ कमी है...
    अगली १००% पोस्ट की प्रतीक्षा है..
    सदैव आभारी...!!

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  12. kuch shavdo se aabhar vyakt kar paaoo itnee samardhy mereshavdo me nahee..........

    ek aadh sher chahe choota ho par poornata ka aabhas hai..........

    paarakhee nazar bhee to honee chahiye.........useeka nateeza hai ki aapke madhyam se ek bemisaal rachana padne ko milee .

    paristhitiya bhee aapkp nahee lagata jeevan samvarne me paryapt yogdaan karatee hai.

    sharab me apane ko duba dena to meree nazaro me palayan hee hai......
    paristhitiyo se joojhana jyada behttar hai........

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  13. bhavishy me bhee aisa kch nayab post kare please suchit kariyega...........

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  14. 'कृष्ण अदीब'जी कुछ गज़लें हमने भी पढ़ी है ,,,पर याद नहीं आ रहा कहाँ...? ...आप लाइयें ...हमें इंतज़ार है ,,,,,/ @लेकिन प्रिय चीज़ें शायद बिछड़ने के लिये ही होती हैं,' सही कहा आपने ,, कुछ ऐसा ही संग्रह हमारे पास था ,,,परन्तु १५-२० दिन पहले हार्डडिस्क खराब हो गयी , डाटा मैं पहले ही dvd में write करके रखता हूँ ,,,पर दुर्भाग्य उनमे से आधी dvd रीड नहीं हो पा रही ,,,कुछ data तो ऐसा था जो लाइव रेकॉर्डिंग थी ,,,चलो कोई बात नहीं ,,,जो बचा है वो भी पर्याप्त है ,,,,,

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  15. गज़ब की अभिव्यक्ति!"अदीब" साहब का कलाम just divine!पढवाने के लिये आप का अहसानमंद रहूंगा!

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