बुधवार, सितंबर 22, 2010

यादों के जंगल से----------

                                                              (एक कहानी)

तुम्हारा वास्ता पड़ा है कभी यादों के जंगल से? नहीं न? अच्छा है। गुम जाने के हजार रास्ते हैं इसमें और बाहर निकलने का कोई नहीं। हर बात गुम होने का नया जरिया, नई पगडंडी।  आज भी अस्पताल गया था, रिपोर्ट लेने का इंतज़ार कर रहा था कि एक और मरीज अपना फ़ीडबैक दे रहा था। जब उसने अपनी जन्मतिथि बताई,  एक और बीहड़ राह खुल गई मुझे भटकाने को। याद आया  तुम्हारे जन्मदिन पर मेरा पहली बार फ़ोन करना, उस दिन मुझे छुट्टी रहना पड़ गया था अचानक और मैंने ऑफ़िस में करमबीर से कहा था कि तुम आओगी तो मेरी बात कराना। तुम्हारा नंबर था मेरे पास, लेकिन जुआ खेला था। अगर तुम्हारा आना हुआ तो विश कर दूंगा नहीं तो जैसे और बहुत बार चुप रह गया उस बार भी चुप रह जाता। लेकिन यकीन था कि बात होगी। और जब तुम्हारे फ़ोन आने पर मैंने हैप्पी बर्थ डे कहा था, तुम्हारी आवाज बंद हो गई थी। "सर, आपको कैसे मालूम?"  आवाज थरथराई हुई थी, खुशी से, इतना तो मैं सुन लेता था तब। मैंने फ़िर कहा था, "हैप्पी बर्थ डे" और तुम खुशी से जैसे नाच उठी थी। मेरी हिम्मत बढ़ गई और मैंने पार्टी भी मांगी और तुम्हारे गिफ़्ट की बात भी की थी। तुमने सिर्फ़ इतना कहा था कि आप आईये तो सही। 
और फ़िर, मैं आया तो तुम नहीं आई महीना भर। तुम्हारा गिफ़्ट रखे रखे धूल खा रहा था और मेरे दिमाग पर बोझ बढ़ता जा रहा था। महीने भर बाद तुम आईं लेकिन वो आना तो नहीं था, जाने की शुरूआत थी। उसी दिन से मुझे अवायड करना शुरू किया था तुमने। कितने जमाने बीत गये उसके बाद, तुम आती भी तो गैरों की तरह। फ़िर उस दिन किसी जरूरी काम से मैंने फ़ोन किया और बात करने के बाद कहा भी था कि बेहद जरूरी काम था, इसीलिये तुम्हें परेशान किया है। मेरे ’सॉरी फ़ॉर डिस्टर्बेंस’, कहने पर तुम रोने लगी थीं। मैं बदनाम हूँ हर्ट करने के लिये, हा हा हा, शराफ़त भी हर्ट करती है। उसके बाद तुमने  खुद ही सब वजहात बताये मुझसे दूर रहने के और सब जायज थे। ये समाज, ये रस्मो-रिवाज, ये रवायतें। हमसे तो आदिवासी अच्छे हैं। मैंने पूछा  था, "क्या तुम्हें मुझपर भरोसा नहीं रहा कि मैं तुमसे कुछ नाजायज न माँग बैठूँ।" कुछ सोचकर तुमने कहा था, "सर, मुझे खुदपर भरोसा नहीं है।"  और फ़िर ये भी बताया था, "मैं सोच रही हूँ कि मैं यहाँ से रिज़ाईन करके कहीं और ज्वॉयन कर लूँ।" तुम्हें पहली बार और आखिरी बार डाँटकर मैंने फ़ोन काट दिया था। उसी एक पल में मेरा भविष्य तय हो गया था। मेरे कारण तुम चली जाओगी?
शनिवार को रिलीव होकर चला आया था दूसरे ऑफ़िस में, और उस दिन भी तुम्हारा जन्मदिन ही था। सोमवार को तुम्हारी कम से कम पाँच साथी  मुझसे मिलने आईं थीं और कितना गुस्सा किया था उन सबने कि बताया नहीं उन्हें। कैसे ट्रांसफ़र होता, वो देख लेतीं। उनके गुस्से में प्यार था, कैसे कहता उन सबसे कि मैंने खुद कहकर ट्रांसफ़र करवाया था उस जन्नत से जहाँ तुम सरीखी अप्सरा थी। मुश्किल से समझाया कि जब जरूरत होगी मैं खुद बता दूंगा। मुझे ........ ने बता दिया था कि आज तुम स्टाफ़ रूम में बहुत रोती रही हो। पागल लड़की!  मैं रुलाने में एक्सपर्ट हूँ, रुला देता हूँ न चाहते हुये भी।  तुम मिली फ़िर मुझे दो दिन बाद, मैं स्टेशन से अपने ऑफ़िस  जा रहा था और तुम अचानक सामने से रिक्शा में बैठकर आ रही थी अपनी ड्यूटी पर जाने के लिये। अचानक देखकर जैसे तुमने हाथ के इशारे से पूछा था कि चले गये हो? नहीं भूलती तुम्हारी वो भंगिमा, और ये भी नहीं भूल पाता मैं कि तुम्हारा चेहरा सबसे ज्यादा खुश उसी दिन देखा था मैंने। जो रिश्ते तुम्हारे दुख के कारण बन सकते हों, उन्हें तोड़ देने का मेरा फ़ैसला भारी बहुत था मुझपर, आज तक बोझ उठा रहा हूँ उनका लेकिन खुशी है कि तुम्हें भी अहसास हो गया कि तुम दुनिया से अलग हो तो इस दुनिया का मैं भी नहीं हूँ। तुम्हारा जन्मदिन अब भी फ़ोन में सेव है, याद तो मैं ही करवाता रहता हूँ फ़ोन को कि भूल न जाना मुझे याद करवाना। फ़ोन नहीं किया कभी तुम्हें, लेकिन तुम्हारा हर  जन्मदिन  मैं अकेला ही सैलीब्रेट करता हूँ - हैप्पी बर्थडे टू यू।  रात को सोने से पहले तुम्हें रोज जो हिचकी आती है न, उसका सबब शायद तुम न जानो, मैं जानता हूँ। रोज रात को सोने से पहले भगवान को याद करता हूँ और उसके बाद तुम्हारे खुश रहने की दुआ मांगता हूँ। भटकना मेरा मुकद्दर है तो रहे, तुम जहां रहो हर खुशी तुम्हारे कदमों में बिछी रहे। और तो कुछ लिया नहीं तुमने मुझसे, इसे कैसे मना करोगी? तुम्हें तो ये भी नहीं मालूम कि मैं लिखता हूँ थोड़ा बहुत और फ़िर पता चल भी गया तो क्या,  इससे ज्यादा अब और क्या होना है? 
वैसे  कैक्टस फ़ूल होता है या पौधा? बॉटनी ही था न सब्जैक्ट तुम्हारा?
:) फ़त्तू फ़िर से पकड़ा गया एक और चोरी के चक्कर में। पिछले अनुभव से सबक सीखकर थानेदार साहब ने हुकम दिया, "इसनै गरम तवे पर बैठाओ, आप कबूलैगा चोरी।" जब सिपाही उसे लेकर बड़े से तवे के पास गया तो फ़त्तू ने कहा, "भाई, डट जा एक मिनट।" और अपनी धोती उतार कर एक और रख दी। "अब चल।"
थानेदार ने पूछा, "यो के फ़ंड सै रै? धोती क्यूँ उतार दी?" 
फ़त्तू बोला, "बात नूँ सै जी, चाम जल गई तो फ़ेर आ जाओगी पर यो धोती जल गई तो यो दोबारा नईं आन की।"
थानेदार साहब ने फ़त्तू  को वापिस भेज दिया और आगे के लिये दस नंबरियों में से उसका नाम काट दिया। आप भी अपनी अपनी लिस्ट में से फ़त्तू का नाम काट दो जी।

34 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया लेख लिखा है ........

    यहाँ भी आये एवं कुछ कहे :-
    समझे गायत्री मन्त्र का सही अर्थ

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  2. संजय भाई, बहुत गहरी चोट खाई है आपने. इत्ता ही कह सकते हैं. और ये प्यार-व्यार हम जैसे भावुक लोग नहीं कर पाते - जहाँ भी करते हैं - तो एकतरफा होता है - क्योंकि सामने वाला कभी दिल के ज़ज्बात कि इज्ज़त नहीं करता.

    स्पीकर खराब है - इसलिए गाना नहीं सुन प् रहा ..... पर महसूस कर रहा हूँ.

    दूसरी बात - कहानी कि भावुकता में मैं कुछ ज्यादा ही डूब गया अत फत्तू को पढ़ना भूल गया और टिपण्णी लिखने बैठ गया.



    "शराफ़त भी हर्ट करती है"
    सोलह आने सची बात.

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  3. भाई नू नाम न कटा करे .........

    ओडर कर दिया
    "आप भी अपनी अपनी लिस्ट में से फ़त्तू का नाम काट दो जी।"

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  4. संवेदनात्मक पहलू जीवन के।

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  5. ह्म्म्म.... भाई का तो इस तरह का कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, तो identify तो नहीं कर पा रहा हूँ, पर सुना है बहुत लोगों के साथ ऐसे हादसे होतें है, तो कुछ न कुछ कमबख्त चीज़ तो जरूर होता होगा ये प्यार.....

    पार्ट २ भी हुआ की नहीं या उसके बाद कोई पसंद नहीं आई ? अगर हुआ है तो हम तो चाहेंगे आप एक कहानी और लिखे, नहीं हुआ तो भी लिखे क्योकि जिंदगी में हो न हो, कहानी में तो सकारात्मक अंत अपने हाथ में होता है ...! भाई भी इसीलिए कॉमेडी टाइप लिखता है.. कमबख्त कहीं तो हंसीं आये !

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  6. क्या कहूं...लेकिन लिखा अच्छा है

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  7. @ ओशो रजनीश:
    धन्यवाद, हम आते रहते हैं जी आपके यहाँ, पर हाई लैवल चीजों पर कुछ कहने समझने में सक्षम नहीं हैं, इसलिये हमारी प्राक्सी हाजिरी मान लिया कीजिये।

    @ दीपक जी:
    भाई जी, आपके प्यार-अपनेपन से सरोबार हो रहे हैं, लेकिन कहानी को कहानी की तरह ही लेना चाहिये जी। बाकी हरेक के अपने अनुभव होते हैं, अपने अनुभव दुनिया से हटकर रहे हैं। आजतक कहीं कोई धोखा, बेवफ़ाई जैसी चीजों से वास्ता नहीं पड़ा। किया भी नहीं और लिया भी नहीं। आपने इतनी गंभीरता से लिया, मैं अभिभूत हूँ, लेकिन लाईट लो यार। और अगले साल का नीलकंठ का प्रोग्राम पक्का। हा हा हा।
    दूसरे कमेंट में और भी मजा आया, ’ओडर कर दिया’ - ओडर ना था, यो डिस्कलेमर था, चेतावनी थी, रिक्वेस्ट थी, निवेदन था, आवेदन था और सब कुछ था पर ओडर नहीं था। नहीं मानते तो न सही, रहन दयो फ़त्तू ने लिस्ट(दस नंबरियों की) में, देखी जायेगी।

    @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    शुक्रिया जी आपका।

    @ मज़ाल साहब:
    इस भाई का भी ’कोरा जीवन कोरा कागज ही रह गया ह’ जी। हाँ, दूसरों के अनुभव से इतना जरूर जानते हैं कि ’कुछ न कु’ नहीं बल्कि ’बहुत कमबख्त’ चीज होता है इश्क। हमरी न मानो तो बॉलीवुड वालों से पूछो, जिन्होंने बाकायदा करोड़ों खर्च करके फ़िल्म भी बनाई थी ’कमबख्त इश्क।’ है न पक्का सुबूत हमारी बात का?
    और स्साला पार्ट १ ही नहीं हुआ तो पार्ट २ कहाँ से होता? फ़िर भी राय है आपकी तो लिखेंगे जरूर पार्ट २ भी पार्ट ३ भी। पार्ट ३ जरूर लिखेंगे। हा हा हा।
    हमें तो आपकी लिखी ’बिना मात्रा’ और ’खुजाल’ और ’अंड बंड’ वाली रचनायें बहुत मजेदार लगीं, आपकी बात को समझ रहा हूँ थोड़ा थोड़ा। ’हंसो आज इतना कि इस शोर में सदा इन दिलों की सुनाई न दे’
    शुक्रिया।

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  8. जो सब ने कहा है वही मै भी कह रही हु ये कहानी आप की तो नहीं पार्ट-२ का इंतजार तो मुझे भी है | अभी तक कोई पार्ट -२ नहीं है तो बना डालिए |

    @"आप भी अपनी अपनी लिस्ट में से फ़त्तू का नाम काट दो जी।

    अरे ये क्या कह रहे है वो तो लिस्ट में जोड़े जाने वाली चीज है कटाने वाली नहीं |

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  9. यादो के जंगल में कुछ अपने भी खो गये है ....... और साल दर साल जन्मदिन आते रहते है ........
    .
    .
    और फ़त्तू का नाम भी लिस्ट से काटना आसान नही

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  10. ओ दाता सबको देनें के चक्कर में खुद रीते रह जाते हो ! शराफत हर्ट करें या ना करें ,प्रेम कथाओं में सोग के स्वर हर्ट करते हैं !

    बस इतनी सी दुआ है कि खुदा आपको सुखांत प्रेम कथाओं से मलामाल करें :)

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  11. अरे संजय जी आज तो कुछ और ही मो सम है पोस्ट का...:):)
    आप तो सिर्फ हास्य-व्यंग के सम्राट नहीं...ट्रेजेडी किंग भी हैं....
    आपका संस्मरण बहुत ही अच्छा लगा...
    हम तो कहते हैं जी आप एक ज़बरदस्त पोस्ट लिख ही डालिए..अपनी 'उनके' नाम से और लिंक भेज दीजिये...हम भी देखते हैं वो कैसे नहीं पढ़ती हैं भला ...और फिर देखिये कैसी खींची चली आएँगी...हाँ नहीं तो..!!
    गाना एकदम परफेक्ट लगाया है...मुझे भी बहुत पसंद है ये गीत..
    शुभकामनाएं...

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  12. भाई फ़त्तू का नाम काट दिया तो यो सारा खेल ही चौपट हो ज्येगा.

    रामराम

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  13. भई वाह ! शानदार, भावपूर्ण प्रस्तुति.

    अगर मैं बिना पढ़े ही कमेन्ट देता तो शायद कुछ ऐसा ही होता. पर पूरी कथा को ध्यान से पढ़ा है तो भी मन यही कहता है कि शानदार भावपूर्ण प्रस्तुति. हर ईमानदार कि तरह अपना फत्तू भी अग्निपरीक्षा में पास हो गया.

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  14. @ वीना जी:
    आने का धन्यवाद।

    @ anshumala ji:
    पार्ट २ के लिये पार्ट १ होना जरूरी होता है जी, ये कहानी का प्रयास था, पता नहीं सफ़ल रहा या असफ़ल रहा। लेकिन फ़त्तू सफ़ल है, है न?

    @ dhiru singh ji:
    शुक्रिया जी(फ़त्तू की तरफ़ से)

    @ ali saahab:
    क्या अली साहब, आप भी! मेरे हिसाब से ऐसी कहानी का हीरो रीता कहाँ रहता है, उसके अक्षय पात्र में जितना दिया फ़िर उससे ज्यादा आ जाता है, तभी तो दे पाता है। प्रेम कथायें हों या गीत, सोग या दर्द न हो तो कौन जानेगा?
    आप जैसों की दुआयें खाली जा सकती हैं क्या? अपनी लाईफ़ में मस्त है सब हमेशा से। बहुत शुक्रगुज़ार हूँ आपका।

    @ अदा जी:
    हमारी कहानी लिखने के प्रयास को संस्मरण बताया है जी आपने। ये बहुत नाईंसाफ़ी है आपकी।
    अब हम आऊटसोर्सिंग करवाकर किसी से लिखवा भी लें एक जबरदस्त पोस्ट, लेकिन फ़िर समस्या ये है कि भेजेंगे किसे और खिंची चली आयेगी कौन? कोई हो तभी तो आयेगी न। हां नहीं तो..!!
    गाना आपकी भी पसंद का है, फ़िर तो हम पास हो गये जी गीत-श्रवण परीक्षा में।
    आपका आभारी हूँ।

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  15. तुझसे वादा है किया....(गीत के बोल भी हैं--- मेरी लिस्ट के )..

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  16. २ घंटे पहले सिर्फ शीर्षक पढ़ा, तो शंका हुई थी की ये यादों के जंगल होंगे तो वैसे ही..
    सतपुड़ा वाले..मतलब, मेरु वाले शेष वाले, शम्भू और सुरेश वाले...
    अभी वक़्त मिला तो पूरा पढ़ा.
    "शराफ़त भी हर्ट करती है"... शायद ज्यादा, या शायद सिर्फ "वही" हर्ट करती है.
    पहले सवाल का जवाब यूँ तो पता है...पर यादों के जंगल के जवाब भी वहीँ से गूंजने चाहिए..
    बॉटनी ही था न सब्जैक्ट तुम्हारा?.......... अन्नुत्तरित प्रश्नों का अपना चार्म है...अपनी मिठास... :)
    बहुत ही बढ़िया लगे ये धागे जो किसी रबड़ के पत्ते से रिसे होंगे...जंगल में रोने वाले सिर्फ यूकेलिप्टस तो नहीं होते....

    अब लिस्ट हमारी फत्तू साब की धोती में ही गाँठ बाँध रखी है हमने, इससे सेफ जगह क्या होगी?
    तो न धोती जायेगी, न लिस्ट...फत्तू साहब वहीँ हैं...तो आपका निर्देश/आदेश/सन्देश जो भी हो, खारिज होता है. :)

    कैलेंडर की तारीख बदलिए, जंगल जरा और पुराना हुआ...

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  18. अच्छा ये कहानी उन्ही के बारे में है ना जिनका नाम R या S से शुरू होता है???? रोचक प्रेम-प्रसंग भाई जी.. ;) फत्तू सिंह भी कमाली-धमाली हैं..और परीक्षित साहनी जी का ये दुखी चेहरा हमेशा याद रहता है इस गाने से..

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  19. @ ताऊ रामपुरिया:
    ताऊ, खेल तमाशे न्यूऐ चाले जायेंगे, चौपट क्यूंकर होयेगा!
    रामराम।

    @ विचारशून्य:
    तुम हो सही बंदे, सारी कथा को ध्यान से पढ़कर कमेंट देते हो। भई वाह, भी कह देते तो क्या चला जाता तुम्हारा? हा हा हा।

    @ अर्चना जी:
    आपकी लिस्ट में भी है तो मतलब अच्छा ही है गाना।

    @ अविनाश चन्द्र:
    धागे पसंद आये? वैरी गुड।
    बाकी तो सब ठीक है, तुम्हारा लॉकर वगैरह, पर ये कैलेंडर वाली बात समझाना कभी मौका लगे तो।

    @ दीपक मशाल:
    हाँ दीपक प्यारे, ये कहानी उन्हीं के बारे में है जिनका नाम R से भी शुरू होता है और S से भी, बल्कि A TO Z हर एलफ़ाबेट से शुरू होता है। तुम भी यार..!!
    फ़त्तू सिंह कमाली धमाली है तभी तो पसंद आ रहे हैं सबको, नहीं तो दुखी चेहरे और दुख की बातें गीतों में ही अच्छे लगते हैं।

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  20. फत्तु का नाम तो बाद में काटेंगे, पहले कहानी से तो उबरें..बहुत बेहतरीन स्पर्श है.

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  21. कहानी का एक क्रिटिकल हिस्सा तो आपने छिपा लिया मगर ये दुनिया वाले पूछेंगे ज़रूर। और ये हिंसा (काटने-पीटने) की बात हमें पसन्द नहीं आयी भले ही बात नाम काटने की हो।

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  22. बदनामी ओढ़ लेने का साहस लड़कियों में कम होता है क्योंकि जिंदगी उनकी ही बदलती है, लड़के साफ़ बच निकलते हैं ...
    कहानी अच्छी है ...कहानी को कहानी ही समझा है , संस्मरण नहीं और ये कमेन्ट भी कहानी पर ही है ...!

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  23. बहुत बढ़िया और शानदार लेख लिखा है आपने! भावपूर्ण एवं उम्दा प्रस्तुती!

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  24. बेहतरीन जी, काश इस अहसास से हम भी गुजरे होते............................बाकि फत्तू का अहित करने की मत सोच लेना आप नहीं तो देख लेंगे :#
    जब तक सूरज चाँद रहेगा....................... हर पोस्ट में फत्तू का जलाल रहेगा!!!!!!!!!!!

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  25. घणों "डीप" लेख छ यो तो !!
    दो बार पढवा रे बाद समझ आयो छ
    सही बात छ गरीब आदमी री धोती उके थाईं जाण सूं जादा प्यारी लागे छे
    भाई सा... ई बार तो सच्ची अलग ही "फिलेवर" म लिखी छे पोस्ट


    हिंदी अनुवाद :
    बहुत गहरा लेख है ये तो !!
    दो बार पढने के बाद समझ में आया है
    सही बात है गरीब आदमी की धोती उसे जान से अधिक प्रिय होती है
    भाई साहब .. इस बार तो सच में अलग ही फ्लेवर में लिखी है पोस्ट

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  26. नहीं, बस रात बारह बजे कमेन्ट किया न इसलिए लिखा, यूँ हर तारीख के साथ जंगल और गहराता जाता है..सो भी.

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  27. वैसे कैक्टस फ़ूल होता है या पौधा? बॉटनी ही था न सब्जैक्ट तुम्हारा

    प्रेम की घुमावदार गलियों की सैर कराती आपकी कहानी गज़ब है...

    फत्तू तो लाजवाब है और रहेगा...उसकी तो बात ही क्या है...
    नीरज

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  28. चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों.. वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना हो मुमकिन, उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा... साहिर साहब की इस अमर नज़्म को आज गद्य के फॉर्म में पढने का मौक़ा दिया संजय भाई! आज तो अपुन भी शायर हो चले सोचा टिप्पणी लिखूँ, लेकिन यादों के जंगल के सफर के बाद सोचता हूँ हालेदिल यार को लिखूँ कैसे, हाथ दिल से जुदा नहीं होता.
    पहली बार फत्तूपर ग़ुस्सा आया, कम्बख़्त ने सारा मूड ख़राब कर दिया! (प्यारा है बेचारा, बुरा मान जाएगा, तो मना लेना आप :)!)

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  29. @ udan tashtari:
    सरजी, एक आप हैं जिनसे उम्मीद है इंसाफ़ की, बाकी तो सब हमें ही डांटते हैं।

    @ smart indian:
    अभी तो नॉन-क्रिटिकल ही भारी है जी। एल्लो, इतने अहिंसक हो गये आप कि नाम काटना भी हिंसा लगा?

    @ वाणी जी:
    आप बिल्कुल, सौ फ़ीसदी सही कह रही हैं जी।

    @ babli ji:
    धन्यवाद आपका।

    @ उदय जी:
    आप पधारे, आप का बहुत-बहुत शुक्रिया।

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  30. @ अमित शर्मा:
    काश, इस अहसास से हमीं न गुजरे होते। और प्यारे हमें ही ’देख लेंगे’ की धमकी? देखी जायेगी, वैसे देखने लायक और चीजें बहुत हैं दुनिया में यार, उन्हें देख लेते तो ज्यादा बढ़िया रहता।

    @ Gaurav Agrawal:
    भाई, पहले ही वार्निंग दे दी थी कि टाईम खोटी करना है तो आना। फ़िर भी खुशकिस्मत हो कि दो बार पढ़कर समझ आ गया, मैं खुद बत्तीस बार पढ़ चुका हूँ, मेरे ही समझ नहीं आया अब तक। हा हा हा।

    @ Avinash Chandra:
    ग्रेट एक्स्पलीह्सन, अविनाश। जीनियस हो तुम।

    @ नीरज गोस्वामी जी:
    मेहरबानी नीरज साहब।

    @ सम्वेदना के स्वर:
    सरजी, डोज़ कुछ ज्यादा ही स्ट्रांग कर दी आह। कहीं भूल से ये न समझ बैठूं,,,।
    फ़त्तू की चिंता मत करो जी, वो तो मान जाता है मेरी बात।
    शुक्रिया आपका।

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  31. कितनी पगडंडियों में घूम फिर कर आप फिर वहीं तो आ जाते हैं, जिसे आप भूल कर भी नही भुला पाते । सुंदर कहानी वैसे कैक्टस पौधा हता है कांटेदार,जैसे कुछ यादें ।

    फत्तू का नाम काटना ...मुश्किल है ।

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  32. bichdne ke liyen jo flsfaa he voh bhut khub he aapne mujhe bhi raastaa dikhaaya meri bhul sudhrvaayi iske liyen bhut bhut shukriyaa mehrbaani krke bhvishy men bhi aese hi margdrshn kr mujhe rusvaa hone se bchanae ki umid mujhe aapse rhegi. shukriyaa bhut bhut shukriyaa. akhtar khan akela kota rasjthan

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  33. मैं रुलाने में एक्सपर्ट हूँ, रुला देता हूँ न चाहते हुये भी।
    और उसके बाद फत्तू?
    रुला कर फिर हसाने की बुरी आदत है उसे
    मगर उसकी यही तो दिल्लगी अच्छी नही लगती
    हाँ ये संस्मरण या कहानी कुछ सोचने पर मजबूर जरूर कर देती है। दिल के करीब लोगों से मजबूरी मे दूर रहना पडता है जीवन का एक पहलू ये भी है। रोचक पोस्ट्। शुभकामनायें

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