मंगलवार, सितंबर 28, 2010

पोस्ट-इफ़ैक्ट्स ऑफ़ ’यादों के जंगल से’

’अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना’,  यह कथन आपने जरूर सुना होगा और इसका अर्थ भी जानते होंगे।  हम आपको जो बताने जा रहे हैं, वो उदाहरण है ’कुल्हाड़ी पर पैर मारने का।’  जैसे दुख तो अपना साथी है और मौत महबूबा है अपनी टाईप बातें होती हैं, इस तरह के  पंगे और अपना चोली दामन का साथ है।  जिन्दगी थोड़े दिन सीधे रास्ते पर चल दे तो अंदर से ही कुछ खटकना शुरू हो जाता है कि यार, बहुत दिन हो गये कोई नया पंगा नहीं हुआ। फ़िर जब कुछ हो जाता है तो तसल्ली होती है कि अभी ऊपर वाले ने हमें  नजरअंदाज नहीं किया है।
लेटेस्ट घटना जुड़ी है अपनी पोस्ट ’यादों के जंगल से’ के बाद हुई प्रगति(नकारात्मक प्रगति) से। बॉलीवुड वाले ऑफ़बीट फ़िल्में  बना दें तो कोई बात नहीं।  युवराज, भज्जी जैसे खेलना छोड़कर रियलटी शोज़ में या रैंप पर आ जायें तो कोई बात नहीं, एक और युवराज हैं वो जहाज से ट्रेन में और महलों से गरीब के झोंपड़े में आ जायें तो कोई बात नहीं लेकिन हमने  थोड़ा सा एक प्रयोग क्या किया, हमारे गले का हड्डा बन गया है।
बाजपेयी जी की सरकार ने जब परमाणु परीक्षण किया था तो अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये थे। हमने प्रेम परीक्षण किया तो हमपर हमारी सरकार ने जैविक, दैहिक और भौतिक सभी तरह के प्रतिबंध लगा दिये हैं। रफ़्तार भारत की भी नहीं रुकी, इस भारत कुमार की भी नहीं रुकेगी, अब और कितना धीरे चलें भाई? राजे महाराजे हमारी उम्र तक पहुंचते पहुंचते हरम के हरम खड़े कर लेते थे, हम से एकवचन से द्विवचन न सीखा गया अभी तक।  और धीरे चलते तो जो थोड़ी बहुत घास गिर रही है सामने, वो भी न गिरती।
ऊपर ही लिख दिया था (एक कहानी),
लेकिन उसने मेरी एक न मानी
मैंने दौड़ाये थे कल्पना के घोड़े,
वो इसको सच्चाई जानी।
मैंने दी भी बहुत सफ़ाई,
पर न मानी, तो न मानी।
ऊपर वाले के फ़ज़ल से रैपुटेशन में कोई कमी नहीं है अपनी। न देखी हो तो ’वैलकम’ फ़िल्म देखियेगा और नाना पाटेकर का डायलाग ’भगवान का दिया सब कुछ है, नाम, इज्जत, शोहरत….’ सुनियेगा। हमारा गॄह मंत्रालय हमारी काबिलियत पर इतना विश्वास करता है कि एक्दम स्थानीय बातों से लेकर गली, मोहल्ला, शहर, देश, महाद्वीप, पृथ्वी और यहाँ तक कि आकाशगंगा में होने वाली किसी भी गड़बड़ी का क्रेडिट हमें दे दिया जाता है। अफ़ज़ल गुरू, कसाब सरकारी जमाई बनकर सेवा करवा रहे हैं,  सरकार ने ’साध्वी प्रज्ञा और कैप्टेन पुरोहित’ को भी लपेट लिया कि अब कम से कम भेदभाव का आरोप तो नहीं लगेगा।  इसी नीति के तहत हमारा भी सर्वेलैंस चल रहा था पिछले कई दिन से। इधर उधर ताक-झांक कर रहे थे थुरूर साहब, तिवारी जी, शाहिद कपूर, जैसे  बड़के बड़के लोग, धर लिये गये हम ताकि भेदभाव का आरोप न लग जाये।  
जैसे चालाक से चालाक अपराधी कोई न कोई सुबूत छोड़ देता है, हमसे भी चूक ओ गई। ताव ताव में एक पोस्ट लिख मारी, ये दिखाने के लिये कि सिर्फ़ हल्की फ़ुल्की बातों का सत्यानाश नहीं कर सकते, हमें मौका मिले तो भारी भारी यादों का, आई मीन बातों का भी सवा सत्यानाश कर सकते हैं। इधर पोस्ट छपी, उधर बाहर अखबार वाला पैसे लेने आ गया। मैं भी उन दिनों छुट्टी पर चल रहा था, मगजमारी करने लगा उससे। अपना तर्क ये था कि ब्लॉगिंग में या नैट पर विज्ञापन देखने के पैसे मिलते हैं, हम पूरा महीना भर तुम्हारी अखबार देखते हैं, बिल तो हमें वसूल करना चाहिये तुमसे। जब अखबार वाले को ये पता चला कि हम भी ब्लॉग लिखते हैं तो उसने बड़ी तरस खाती नजर से देखा हमें। 
"अबे, क्या बुझते चिराग से दिख रहे हैं क्या हम, जो ऐसी करूणामयी दॄष्टि से देख रहा है?"
वो कहने लगा, "सरजी फ़िर त्वाडा कोई कसूर नहीं है। मैंनूं पहले ही लगदा सी कि कोई गड़बड़ है।"
"चल यार, तू ये ले पैसे और जा अब।"
वो चला गया और मैं अंदर आ गया। आ क्या गया जी, अंगारों पर आ गिरा सीधा।  कारवां गुजर गया था और गुबार हम अब तक देख रहे हैं।
वैसे हमारी इस शानदार छवि बनाने में आप सबका योगदान भी कम नहीं है। किसी ने मजाक में तो किसी ने सीरियस होकर इस अफ़वाह को बढ़ाबा दिया है कि सारी दाल काली है। एक ने भी झूठे से नहीं कहा कि लिखा बहुत अच्छा है। किसी ने कहा भी तो ऐसे कहा कि आप कहते हैं कि कहानी है तो मान लेते हैं। ना, और कैसे जताओगे कि वैसे नहीं मानने वाले थे कि कहानी है। ले लो मजे, आयेगा हमारा भी टाईम।  फ़िलहाल तो हमारे ऊपर सेंसरशिप चालू आहे…।  उस पोस्ट को कहानी न मानकर संसमरण माने जाने का नोटिस जारी हो चुका है। इसे हमारा इकबाले जुर्म मान लिया गया है। अब तो खुश हो सारे?  जिस तरह से अफ़ज़ल गुरू और कसाब जैसों की खातिरदारी में कमी नहीं होती और हिसाब बराबर करने के लिये सरकार ने ’भगवा आतंकवाद’ का मुद्दा बना दिया है ताकि यह दिखाया जा सके कि आतंकवादी किसी एक धर्म, मजहब के नहीं या वो अकेले कसूरवार नहीं हैं, हमारे कंट्रोल मंत्री ने भी अपनी वक्र दॄष्टि हम पर डाल दी है। नारको, मारको सभी प्रकार के टैस्ट्स से होकर गुजरना पड़ रहा है। सवाल पर सवाल दागे जा रहे हैं, 
"कौन है?"
हम बोले,  "कोई नहीं है।"
"अच्छा है नहीं,  इसका मतलब थी तो जरूर?"
"अब होने को क्या दुनिया से लड़कियां खत्म हो गई थीं क्या? होगी कोई हमें क्या?"
"अच्छा, अब पकड़े गये तो हमें क्या, नहीं तो बड़े गिफ़्ट दिये जा रहे थे? हमें तो कभी हैप्पी बर्थ डे भी नहीं कहा।"
"अरे, उस समय तुम्हें ही सामने रखकर रचना के बारे में सोचा था।"
"अच्छा, तो रचना था नाम?  अब समझ आई कि कल क्यों बालों में कलर लगवाकर आये हो। आजकल हर दूसरे दिन शेव भी हो रही है।"
"अरे भागवान, जब ऐसे रहता था तो कहती थी कि शक न करे कोई इसलिये ऐसे फ़कीरों की तरह रहते हो।"
"तो ठीक कहते थे हम तब भी। और अब हम क्या झूठ कह रहे हैं, ये देखो पढ़ो जरा कमेंट्स, पार्ट टू और पार्ट थ्री, और यहीं क्यों रुको, गिनती तो और भी आती ही होगी।"
अब ज्यादा लिखूं तो एक इलज़ाम और आयेगा कि मेरी कीमत तुम्हारी एक पोस्ट जितनी ही है। कैसे यकीन दिलाऊँ उसे कि उसकी कीमत क्या है और कितनी है?  जानता हूँ ज्यादा समय तक नाराज नहीं रहा जायेगा उससे, लेकिन जो समय बीत गया नाराजगी में, वो लम्हे लौट आयेंगे क्या? और फ़िर रानी रूठेगी तो अपना सुहाग लेगी। ले ले,  देखी जायेगी…….
:) मुश्किल समय में फ़त्तू ने एक नये नये धनवान बने सेठ के यहाँ नौकरी शुरू की। सेठ के मुछ मेहमान आ रहे थे, इम्प्रेशन जमाने के किये फ़त्तू को अग्रिम प्रशिक्षण दिया गया। 
मेहमान आये, सेठ जी ने फ़त्तू को आवाज लगाई, :अरे भाई, कुछ पीने के लिये ले आ।” 
फ़त्तू, “क्या लाऊँ जी, जूस ले आऊँ, पैप्सी ले आऊँ या फ़िर बियर, व्हिस्की वगैरह कुछ लाऊँ?” 
सेठ जी, “यार, प्यास तो पानी से ही बुझेगी, पानी ले आ।” 
कुछ देर बाद चाय की फ़रमाईश हुई। अबकी बार सीखे सिखाये फ़त्तू ने पूछा, “चायपत्ती कौन सी चलेगी जी, आसाम वाली, दार्जिलिंग वाली या श्रीलंका वाली।” सही रंग जम रहा था।  
कुछ देर के बाद मेहमानों की इच्छा पर सेठ जी ने फ़िर से आवाज लगाई, “यार, जरा पिताजी को तो ला जरा।” 
फ़त्तू,”जी, कौन से वाले पिताजी को लाऊँ, बगल वाले गुप्ता जी को ले आऊँ, सामने वाले सिंह साहब को ले आऊँ, २९ नंबर वाले शर्मा जी को लाऊँ या जो बुड्डा सारे दिन खों खों करता रहता है घर में, उसे लाऊँ?”
अब ऐसा है जी, बदनाम तो हो ही गये हैं अपनी ओ जी के सामने(जैसे पहले तो बड़े पदमश्री, भारत रत्न से नवाजे जाते थे), आज थोड़ा सा  नया गाना सुन लो, रोमांटिक सा।  अच्छा लगे तो अपना लो, बुरा लगे तो जाने दो…

43 टिप्‍पणियां:

  1. ई फत्तुआ अपने बाप को भी नहीं छोड़ता..!

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  2. Shayad aapki 'wo' wali post nahi padhi jiska reference aapne diya hai..kahani wali...isliye kayi baate OHP ho gayin!
    Haan,lekhan shaili kamalki hai aapki..padhne lagte hain to rok nahi sakte!

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. बॉस रायता बहुत फ़ैल गया था - समेटने की कोशिश हो रही है. दिल कि तडप तो वो जाने - जिसने दिल लगाया हो. अब काहे खामख्वाह दिल्ली से बेंगलोर नाप रहे हो. ऐलान कर दो - सरेआम- हाँ मैंने मोहबत कि थी. और हाँ "थी" शब्द पर बहुत जोर देना - आगे का सोचना है भाई.

    नहीं तो इत्ता थोड़े लिखा जाता है- एक राव साहिब हैं - खींचे जा रहे है - ताजुब होता है अभी भी अधूरा है.


    भाई फत्तू को गलत जगह काम पर लगा दिया.

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  5. धत तेरे कि, सारा सत्यानाश कर दिया ना,,,,,,,,,,,,,, क्या जरुरत थी अखबारवाले से अड़ने कि .................. ना काम खुला छोड़ते ना पोल खुलती.................अब देलो चाहे जितने एस्क्यूज़.................... हमारी और चोपट हो गयी कैसे चटखारेदार संस्मरण :) थे आपके....................बाकी नारको तो ठीक है पर मारको कि मार ज्यादा पड़ती दीखे तो माफ़ी मांग लीज्यो खी खी खी खी :) :) :) :)

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  6. अर वो तो सेठजी बच गए नहीं तो सेठानी को बुलाने के लिए कहा होता तो ना जाने किस किस कि लुगाइयों के नाम गिना कर पूछ लेता कौनसी वाली लाऊं

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  7. च च च... अफ़सोस... दुआ है सब ठीक हो जाए.. वैसे ये गाना भी उसी टाइम का है ना जब वो दास्ताँ शुरू हुई थी??? ह्म्म्म उस समय से जुड़ा हर गाना सारी जिन्दगी तड़पाता है.. :P

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  8. हा हा हा हा....
    कुछ लोगों को अपना पैर कुल्हाड़ी पर मारने का शौक़ होता है...हा हा हा हा...
    मेरी हँसी ही नहीं रुक रही आज की पोस्ट पढ़ कर...
    बस एक ही बात याद आ रही है...
    अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे...
    हाँ नहीं तो..!!

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  9. और ये "मौ सम कुटिल खल कामी" वर्तमान मारकेश से घबराकर धरा है क्या ..................... क्या सूझी मौसम का मौसम ही बदल गया

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  10. @ देवेन्द्र पाण्डेय:
    एकदम नमक हराम है जी ये फ़त्तू, जिसका गुलाम है उसीका अपमान कर देता है।

    @ Kshama ji:
    अच्छा हुआ मैडम, आपने वो लिंक नहीं पढ़ा। आपके प्रोत्साहन का वैसे ही बहुत भार है मुझपर।

    @ गजेन्द्र सिंह:
    अब क्या कहूं यार..?

    @ बड़ी पते की सलाह दी है बाबाजी, थी न होती तो है भी कहाँ से होती।

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  11. कोई कुछ भी कहे हम तो अपनी गवाही में इतना ही कहेंगे कि "लिखा बहुत अच्छा है"।

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  12. @ अमित शर्मा:
    प्यारे, टैम खोटा चल रया हो तो ऊंट पे बैठे ने भी कुत्ते पाड़ ज्यै सैं। हो गई गलती। बताया इसीलिये है कि थम कोई सा मत कर जाईयो ऐसी गलती।
    अच्छा, चटाखेदार संस्मरण,,!! कोई ना भाई, देख लूंगा।
    वैसे इतनी नहीं पड़ी है मार कि माफ़ी मांगी जाये।
    सेठजी का क्यूँ मारको करवाओ हो यार, उसनै क्या बिगाड़ा है?
    ये नाम बदलना आत्मसमर्पण की कई शर्तों में से एक है।
    एक बार आने दो प्यारे जयपुर, गिन गिनके.......।

    @ दीपक मशाल:
    तुम्हारी दुआओं का बड़ा शुक्र्गुजार हूँ। हाँ-हाँ उसी टाईम का है ये गाना, और हर ऐसा गाना सारी उम्र तड़पायेगा।
    तुम्हें मैं क्या समझता था, तुम क्या निकले? आ जाओ तुम भी एक बार इंडिया, फ़िर देखता हूँ(खाप वाली बात मेरे को भी नहीं भूली है प्यारे) फ़िर मैं यही सवाल पूछूंगा तुमसे।

    @ अदा जी:
    होते हैं जी लोगों को अजीब अजीब शौक, क्या कर सकता है कोई? आपको हंसी आनी चाहिये, हमारा क्या है? ये न होता तो कोई दूसरा गम होना था।
    और जी, वो नया संभावित सुपरहिट जुमला, तेरी तो....., वो भी कह देतीं तो पहाड़ी के नीचे वाले ऊंट को और मजा आ जाता, हां नहीं तो..!!

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  13. "लिखा बहुत अच्छा है"
    मज़ा आ गया। एक पैरोडी अर्ज है:

    वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम लिखे चलो !

    हाथ में कलम रहे नेट खुशफहम रहे
    फत्तू कभी रुके नहीं सत्तू कभी मुके नहीं
    वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम लिखे चलो !

    सामने पहाड़ हो शेरनी दहाड़ हो
    तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
    वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम लिखे चलो !

    प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
    सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो
    वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम लिखे चलो !

    एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए
    ब्लॉगभूमि के लिये प्रेमज़मीं के लिये
    वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम लिखे चलो !

    अन्न गृह में भरा वारि नल में भरा
    बरतन खुद निकाल लो खाना खुद बना लो
    वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम लिखे चलो!
    :)

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  14. नया मोड़ ले लिए हो क्या??

    मौ सम कुटिल खल कामी

    सब ठीक ठाक तो है कि फत्तु की संगत में???? :)

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  15. aapke blog par aa aapke yado ke jangal me kho jane ka anand alag hee hai....aur Fattu to hasaa hasaa ke pet me dard hee kar deta hai........
    kahanee kahanee hee thee to khush hai poora blog jagat.......

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  16. देखिये जनाब आपकी कथा थी ही इतनी सच्ची कि सभी उसे आपकी आप बीती मान लिए. आप इतना बढ़िया लिखते ही काहे हैं. और लिख ही देते हैं तो बतियाते काहे हैं. राव साहब कि नक़ल मारते हुए अपनी हेसियत के हिसाब से आपकी नजर एक कमजोर शेर पेश कर रहा हूँ.



    आप लिखे जाइये बेधड़क.

    खड़क.. खड़क ..खड़क. .....



    ऊपर बेलेंस के लिए एक और 'खड़क' लगा लेना वर्ना मेरा शेर गिर जायेगा.

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  17. अरे आज के लेख पर अपने कमेंट्स देना तो भूल ही गया.....वो कमेन्ट बॉक्स पर आपका सुझाव पढ़कर याद आया अब लो.....

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  18. ये पोस्ट-इफ़ैक्ट्स तो है ही जब सच्चाई सामने आ गई तो अब हर तरह की सफाई दी जा रही है सच्चाई को स्वीकार कर लीजिये सफाई काम नहीं आएगी जानते है ना हम भारतीय साफ सफाई में ज्यादा विश्वास नहीं रखते है विश्वास ना हो तो खेल गाव देखा आये | वैसे पार्ट -२ कब आ रहा है हा हाहा

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  19. विषय फैलता गया और हमारी समझ सिमटती गयी। अन्त में यही कहेंगे कि पढ़कर अच्छा लगा।

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  20. शांत गधाधारी भीम शांत,
    कभी कभी थोडा मिर्च खाना पड़ता है,
    सर्दी हो तो झंडूबाम लगाना पड़ता है,
    थोड़ी सी तोहमत लगे बन जाता है काम ,
    तेंदुलकर को फॉर्म में आना पड़ता है ...
    तुकबंदी करूंगा तो कमबख्त सोच रुकने का नाम नहीं लेगी, इसलिए बेहतर है की sudden end कर दिया जाए ...

    लिखते रहिये ...

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  21. तभी मैं सोच रहा था कि ये फ़त्तू को नौकर रखने की औकात कौन से सेठ में आगयी?:)

    रामराम

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  22. @ थम कोई सा मत कर जाईयो ऐसी गलती।

    # महाराज हम तो घर पे नेट को हाथ ही नहीं लगाते :)

    @ कोई ना भाई, देख लूंगा।

    # मन्ने तो नीकाँ देख रहे हो कभी खुद भी तो परगट होवो तो हम भी देख लेवें :)

    @ ये नाम बदलना आत्मसमर्पण की कई शर्तों में से एक है।

    # इसकी भी असल राम कहानी बता दीज्यो, किसको किया आतमसमर्पण :)

    @ एक बार आने दो प्यारे जयपुर, गिन गिनके.......।

    # अरे म्हारे हिवडे रा पावणा एक बार आवो तो सही...................गिनती में सहायता के लिए कम्पूटर साथ मेल दूंगा :)

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  23. @ अनुराग शर्मा जी:
    मेरे एक चीफ़ मैनेजर हुआ करते थे, हमेशा ही उनकी और मेरी ’ये कहानी है दीये की और तूफ़ान की’ चलती रही, मैं निर्बल और वे बलवान थे। कहते वो भी यही थे, मेरे पीछे - "नहीं, वैसे वर्कर अच्छा है।" नहीं और वैसे पर स्ट्रेस कुछ ज्यादा ही देते थे। मुझे जब दूसरे स्टाफ़ आकर बताते थे कि साहब ये कह रहे थे, तो मैं उनकी बात पूरी करता था, वे कह रहे हैं "है तो एकदम बेकार, बदतमीज। नहीं(लेकिन) वैसे वर्कर अच्छा है।" आपकी बात पर पता नहीं क्यों याद आ गई उन साहब की। हा हा हा।

    @ गिरिजेश राव जी:
    राव साहब, बड़ी प्रेरक पैरोडी पेश की है जी, कुछ ज्यादा ही बढ़ने का मन करने लगा है।

    @ Udan Tashtari:
    समीर सर, असली मोड़ और असली मोड तो यही है।
    फ़त्तू तो हमारी संगति में सुधर रहा है जी, हम पहले के बिगड़े हुये हैं, उस बेचारे का कोई कसूर नहीं है जी।

    @ Apnatva:
    सरिता मैडम, आपका आभारी हूँ।

    @ विचार शून्य:
    बन्धु, शेर कहाँ से कमजोर है, हमें तो फ़िट लगा यार एक्दम। वैसे हो चालू, जब भेज ही रहे थे शेरनी भेज देते।

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  24. आगे से इस तरह की कहानियो से बचना नही तो खुद कहानी बन जाओगे . वैसे उसका नाम क्या था जिसे तुम गिफ़्ट देते थे .
    और फ़त्तू है ही साला बदमाश

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  25. @ शाहनवाज़ जी:
    शुक्रिया भाई।

    @ अरविन्द जी:
    अरविन्द जी, धन्यवाद आपका। मस्त तो आपका लिखा हुआ है, ससुर जी वाला वाकया।

    @ अन्शुमाला जी:
    महोदया, सफ़ाई देने का हक तो घोषित अपराधी को भी होता है, हम तो तथाकथित हैं।
    खेल गांव तक जब जायेंगे, तब जायेंगे अभी तो अपना गांव उजड़ रहा है। पार्ट टू आयेगा जी जरूर आयेगा, पार्ट थ्री से पहले आयेगा।

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  26. हा हा हा फ़त्तू से हमारा परिचय तो ताजा ताजा हुआ है ...ससुरे ने तो मूड फ़्रैश कर डाला कसम से

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  27. @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    ये विषय ही अपने आप में बहुत भारी विषय है, सर। ओर न छोर।

    @ मज़ाल जी:
    हम तो खुश हैं कि इस बहाने आपकी तुकबंदी पढ़ने को मिल जाती है। हर टॉपिक पर मुफ़ीद तुकबंदी, वाह साहब वाह।

    @ ताऊ रामपुरिया:
    ताऊ, फ़त्तू तो किसी का भी नौकर हो सकता है, मालिक काबिल होना चाहिये बस।
    राम राम।

    @ अमित शर्मा:
    और अमित हम, घर पर सिर्फ़ नेट को ही हाथ लगाते हैं, मेरा मतलब सिर्फ़ घर पर ही नेट को हाथ लगाते हैं।
    ऐसा हसीन थोबड़ा होता तो, हम खुद ही फ़ोटो लटकाये फ़िरते हर जगह, जैसे कई भाई लोग लिंक उठाये फ़िरते हैं।
    अभी राम कहानी कह रहे हो, फ़िर तुम भी संस्मरण बताकर हमारा तर्पण करवाओगे।
    देख लेंगे तुम्हारे प्यार को भी, गिन गिन के....। पिंक सिटी में अब एक और चार्म की वजह है हमारे लिये, हाजिर होते हैं किसी दिन ज्ञान गंगा में डुबकी मारने, दरवाजा खुला रखना।

    @ उसका नाम था फ़ूफ़ी, हद हो गई यार। मेरा हैप्पी बड्डे करवाकर ही मानना सारे दोस्त मेरे। एक लाईन मतलब की कहते हैं, दूसरी में फ़िर टौंचा मार जाते हैं। हा हा हा।

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  28. भाई जान ,
    शक के साथ गुज़ारा करने की आदत डाल लीजिए ! दो चार नए किस्से लिखिये शायद कन्फ्यूजन से कुछ काम बनें...ज़्यादा से ज्यादा क्या होगा ? रानी रूठेंगी अपना सुहाग लेंगी :)

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  29. ओफ्फोह! अपनी परेशानियों ने यह भी भुला दिया कि भई संजय उवाच चुके हैं और अब हमारी बारी है. कल जब पोस्ट पर आधा कमेंट लिख चुका था तभी क बहुत ही पुराने परिचित आ गए ऑनलाईन और जवाब धरा का धरा रह गया… सोचा भी नहीं कि भिक्षु आवाज़ नहीं लगाते, वर्ना भिक्षुऔर भिक्षुक में अंतर क्या रहेगा. क्षमा तथागत! बस एक प्रश्न इस पोस्ट पर विचलित कर रहा है... रानी को मात्र रचना के ही विषय में बताया है न? फिर चिंता का कोई कारण नहीं. यह कमेंट पढकर डिलीट कर देना!!

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  30. मंद मंद मुस्कुरा रहा हूँ.... क्या प्रेजेंटेशन है आपका.... और फत्तू .....!........ फत्तू के तो क्या कहने ..............कुछ ज्यादा ही ट्रेंड हो गया....

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  31. बाकी बात त पहिलहीं लिख चुके हैं..फत्तुआ का खिस्सा भी बेजोड़ है भाई.. ई त प्रताप फौजदार से भी आगे निकल गया, उनका बेटा त पूरा निबंध याद कर लिया था अंगरेजी में.. I have many fathers, but Pratap is my best father.
    ब्लॉग का नाम तनी एक्स्टेंडेड बुझाता है.

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  32. Dil ka sara dard nikal aaya. Par jab peshi ho gaee tab pata chala. so samhalke. Likkha jabrdast hai.

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  33. @ अजय कुमार झा:
    अरे वाह, हमारे वकील साहब को भी पसंद आया। बहुत धन्यवाद झा साहब।

    @ अली साहब:
    आज मिली है सही सलाह, बैस्टैस्ट। दो चार झूठे सच्चे किस्से और सुना मारते हैं, कर देत हैं कन्फ़यूज़। आपका बहुत सहारा है अली साहब, अनुभव खुद तक ही नहीं रखा आपने। शुक्रिया।

    @ सम्वेदना के स्वर:
    कमेंट की छोडि़ये भगवन, अपनी परेशानी से पहले निबटना जरूरी है। अब आप तो फ़िर कर लेंगे लेखा जोखा।
    रानी, रचना - कौन हैं जी ये सब? दीजिये तो इमेल एड्रेस जरा। पिट तो रहे ही हैं, पिटते के चार जूते और लग जायेंगे तो क्या?

    @ महफ़ूज़ अली:
    भाई, वो मेल डिलीट कर देना जिसमें कमेंट करने के लिये कहा था मैंने।
    @
    @

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  34. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! उम्दा प्रस्तुती!

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  35. मुझे पता था इस तरह की पोस्ट से एक दिन यही इफेक्ट होना है :)
    एक दिन विचारी जी का भी नंबर लगेगा देख लेना :))

    @अब समझ आई कि कल क्यों बालों में कलर लगवाकर आये हो। आजकल हर दूसरे दिन शेव भी हो रही है

    हा हा हा और कहते हैं पुरुष स्वतंत्र है .. इसको कहते हैं असली दोयम दर्जा :))

    और जान जलाने के लिए ये देखें :)

    http://www.youtube.com/watch?v=z44vMNZwPeA

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  36. विडियो देखने के बाद उपजी कविता

    आज तक कौनसी "फन" मिली हमें
    कभी कोई ये तो बताये
    सारी की सारी "फन"
    उनके पास ही रही आजीवन
    दुनिया ने सारे प्रश्न हम पर उठाये

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  37. अच्छा है ...!
    आप और गिरिजेशजी एक ही कश्ती में सवार है ..एक दूसरे के आंसूं पोंछते रहें ...सफ़र कट जाएगा ..पोस्ट पूरी लिख जायेगी ...:):)

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  38. "युवराज, भज्जी जैसे खेलना छोड़कर रियलटी शोज़ में या रैंप पर आ जायें तो कोई बात नहीं" .... अब उलट हो तो कोई अजूबा है, रैम्प के तो ये धुरंधर हैं :)
    "हम से एकवचन से द्विवचन न सीखा गया" sheer excellence है सर जी...इस एक लाइन पर कुर्बान..
    हम तो मतलब ऐसे ही हाँ में हाँ मिला रहे थे आपकी... :)
    वैसे बात ठीक ही है, गोया जंगले बचे ही कितने हैं...जो हैं उनकी पड़ताल तो लोग करेंगे ही यूँ :)
    बाकी फत्तू साहब को कॉमनवेल्थ में भेजना था, खेलते शूटिंग और मेडल डिस्कस थ्रो के भी ले आत़े.

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