रविवार, अक्तूबर 24, 2010

अब मेरी बारी.....

वो गोल्डन कव्वाली तो सबने सुन ही रखी होगी,
“नाजो अंदाज़ से कहते हैं कि जीना होगा
जहर भी देते हैं तो कहते हैं कि पीना होगा
जब मैं पीता हूँ तो कहते हैं कि मरता भी नहीं
जब मैं मरता हूँ तो कहते हैं कि जीना होगा"
इस दुनिया ने मेरी रेल बना रखी है। किसी जमाने में मैं चीख चीखकर कहता था कि मैं बहुत शरीफ़ हूँ, तब सब कहते थे,  नहीं बदमाश हो। फ़िर मैंने दुनिया की मान ली और जब ब्लॉग बनाया तो ब्लॉग के नाम के माध्यम से कहना चाहा कि मुझसे बुरा कोई नहीं, अब लोग कहने लगे कि नहीं, आप बुरे नहीं हो। लोग तो मो सम को मौसम से कन्फ़्यूज़ करने लगे थे। सदा का कन्फ़्यूज़्ड मैं और ज्यादा कन्फ़्यूज़ हो गया कि मैं हूँ क्या?  अकेले में बैठकर जब सोचता हूँ तो पाता हूँ कि लोगों की टाईमिंग अच्छी होती है, मेरी मिसटाईमिंग(मिसेज़टाईमिंग भी कह सकते हैं, आबाद आदमी हैं आखिर) बहुत अच्छी है। लोग दीपक राग गा रहे होते हैं, मुझे उस समय राग मल्हार याद आता है। लोग हँस रहे होते हैं तो मुझपर उदासी छा जाती है और जब लोग बाग उदास होते हैं उस समय मुझे ठिठोली सूझती है। बाकी सबकुछ सामान्य है, आदमी अच्छा ही हूँ मैं। वैसे भी आदमी बुरा नहीं होता, बुरी तो आदतें होती हैं। अब आठ दस बुरी आदतों के चलते खुद को बुरा तो नहीं मानना चाहिये ना? तो जी इस गलतफ़हमी का ठीकरा न हम पर और न दुनिया पर, मिसेज़ टाईमिंग पर फ़ोड़ते हैं।  हा हा हा..
मेरे एक एक्स-बॉस हुआ करते थे, बड़ी अच्छी ट्यूनिंग(मिस) थी हमारी। शुरू में मुझसे कहा करते, “ कुछ बोला करो।” मैं कहता, “क्या बोला करूं?” उन्होंने कहा, “कुछ भी।”  मैंने कहा, “मैं शुरू हुआ तो आप कहेंगे कि आप बोला मत करो।” ये वाकया एक बार अकेले में हुआ, मैंने अपने मित्रों को बताया तो कोई नहीं माना। इतने धाकड़ एग्ज़िक्यूटिव के सामने ऐसा बोल दिया? हो ही नहीं सकता।  दो दिन बाद सबके सामने अक्षरश: ये बात हुई, तब माने मेरी बात। खैर, मैं शुरू हो गया और फ़िर मेरे बॉस आमतौर पर कहा करते, “जब मैं किसी स्टाफ़ से कुछ कह रहा होऊँ, उस समय आप बीच में आ जाते हो, मत बोला करो।” मैं हँसता और वो भी हँस देते। पीठ पीछे कहता हूँ, मुझे प्रैक्टिकल बनाने के लिये उन्होंने मुझे बहुत समझाया, हानि लाभ समझाया लेकिन  कितनी भी बरसात हो, औंधे बरतन में  एक बूँद पानी भी नहीं टिकता। सामने रहा तो मैंने हमेशा उनका विरोध किया और उन्होंने फ़िर भी बड़प्पन ही दिखाया और मैंने सब जानबूझकर भी उनके सामने कभी आभार प्रकट नहीं किया। इसे ही मिसटाईमिंग कहते हैं। सामने झुकता तो फ़ायदा बहुत होता  बस अपनी क्लास से कटने का थोड़ा सा दर्द दिल को सालता। मैं इस दर्द से डर गया।       हा हा….
कल का दिन कुछ ऐसा था कि सब गड़बड़ ही हो रही थी। सुबह सुबह एक ब्लॉग देखा,  यहाँ जो कुछ हुआ आप चैक कर लें। इसके बाद देखा सतीश सक्सैना जी की पोस्ट  - ब्लॉग पाठकों से अनुरोध -  हम भी चले गये।  पढ़ा भी और देखा भी।  पिछले कई दिन से ब्लॉग जगत पर एक सस्पेंस सा छाया दिखता है मुझे। दूसरे आधारों के अलावा  यहाँ भी एलीट और नॉन एलीट ब्लॉगर्स के आधार पर बंटवारे झलकते हैं।  एलीट  ब्लॉगर्स पोस्ट लिखते हैं और पाठकों से राय, मत, अभिमत, दुआ, सलाह बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन असली बात गोल कर जाते हैं। किस बारे में बात कर रहे हैं, कौन, किसके साथ, क्या  कर गया, इसका कोई जिक्र नहीं,  बस्स ये बताओ कि मैं ब्लॉग बंद कर दूँ, ब्लॉगिंग बंद कर दूँ,  अपनों ने ही ये किया और भी बहुत कुछ।  मुझे तो सक्सेना साहब की पोस्ट भी उसी लय की लगी,  पुराने ब्लॉगर्स से तो नहीं लेकिन नये ब्लॉगर्स से दुख हुआ था उन्हें।
अब अपनी अल्प बुद्धि के हिसाब से हम भी नये और युवाओं में ही आते हैं। बाल उड़ने लगे हैं, सफ़ेदी झलकने लगी है तो क्या हम युवा नहीं रहे? जिन्होंने कभी हाकी या फ़ुटबाल खेली हो, वो जानते होंगे कि प्रैक्टिस को अलग रख दीजिये और एक-डेढ़ घंटे के खेल में भी जो पसीने आ जाते हैं वो बहुत से बहुपापुलर खेलों में पूरे दिन में नहीं आ सकते। जब तिरासी वर्षीया विद्या स्टोक्स को हाकी संघ का अध्यक्ष बनाया जा सकता है तो हम चालीस साल की उम्र में खुद को बूढ़े कैसे मान लें? फ़िर अभी साल भर भी नहीं हुआ ब्लॉगिंग में आये, आज तक किसी ब्लॉगर से मुलाकात नहीं हुई, तो कह सकते हैं कि हम युवा भी हैं और नये भी। वैसे भी पड़ी कुल्हाड़ी में जाकर पैर मारने की आदत के चलते और ऊपरी पैरे में वर्णित बातों के चलते और ’बाई  वर्च्यू ऑफ़ बीईंग ए प्राऊड नॉन-एलीट ब्लॉगर’  एक कमेंट मार दिया कि लो  भाईसाहब, तुम अपनी ये एलीट मानसिकता अपने पास रखो। ये गोलमोल बातें अगर आम ब्लॉगर नहीं पचा सकते तो क्यों नहीं ऐसी पोस्ट्स  केवल आमंत्रित ब्लॉगर्स के लिये नियत ब्लॉग पर ही डालते?   हम भले और हमारी पिछड़ी मानसिकता भली।
कुछ देर बाद देखा तो सक्सेना साहब ने शहद से ही मारने का जुगाड़ कर दिया है। जब हम खुद ही अपनी कमियाँ मानने को तैयार हैं तो हमें समझदार और हमीं से उम्मीद बता गये। बाद में सादर भी लिख दिया। ले बेटा संजय, अब पढ़ो वो कव्वाली। बाद में दीपक मशाल के कमेंट्स, अंशुमाला जी के कमेंट्स, दूसरे बड़े धुरंधरों  के कमेंट्स  और उन पर सक्सेना साहब के जवाब से फ़िर अपनी नासमझी उजागर हो गई। अमिताभ बच्चन की कोई फ़िल्म थी, शायद ’ईमान धरम’, जिसमें अदालत में गवाही देते समय हाथ के इशारे से मकतूल का कद बताते हैं बिग बी, और ये पता चलने पर कि मकतूल एक मुर्गा है उल्टे वकील साहब को ही कह्ते हैं कि आप जल्दी बहुत करते हैं, दूसरा हाथ तो अभी देखा ही नहीं आपने। हम भी बहुत बार यहाँ मुँह बाये दूसरा हाथ देखते ही रहते हैं
जानता हूँ कि मेरे कहे पर यकीन नहीं करेंगे आप लोग, लेकिन इस डिप्लोमैटिक भाषा के हम हैं तो फ़ैन,  किसी  बात को इस अंदाज में कहना कि अलग अलग समय पर अलग अलग लोगों के सामने उसके अलग अलग मतलब निकल सकें। लेकिन हमारे फ़ैन होने के बावजूद जहाँ हमारा वास्ता हो, ये फ़िट नहीं  लगती। हमें तो सीधे से कुछ कह दो, चाहे उम्र कैद ही दे दे कोई, लेकिन कहे सीधी भाषा में। नहीं तो हमें छूट है कि हम किसी भी बात को अपने ऊपर ओढ़ें या बिछायें।  एक मजे की बात ये है कि मेरा एक दोस्त भी मुझ पर ऐसी भाषा बोलने का आरोप लगा चुका है। आदमी को कहता है, आदमी जो सुनता है,  हा हा हा।  मैच्योर होने में मुझे बहुत समय लगेगा फ़िर भी कोई गारंटी नहीं क्योंकि मैं खुद मैच्योर नहीं होना चाहता।  इतने समय के बाद तो नासमझी दिखाने का मौका मिला है, अब भी चूक जाऊँ?
सक्सेना साहब, आपका  सम्मान करता हूँ, किसी बात पर अपनी राय देने का यह अर्थ मत निकालियेगा कि मेरे मन में आपके लिये या किसी के लिये भी कुछ वैमनस्य है। अगर आप यह पढ़ें तो इतना अनुरोध अवश्य मानियेगा कि छोटा हूँ आपसे, अपने से ज्यादा समझदार और सादर जैसे शब्दों से मत मारियेगा। पत्थरों से डर नहीं लगता, फ़ूल ज्यादा चोट दे जाते हैं।
लेकिन अपना सवाल अब भी वही है, अगर कोई बात किसी को उद्वेलित कर रही है, वो ब्लॉगजगत को अपना परिवार भी मानता है तो फ़िर अंदर की बात बताने में दिक्कत क्या है? और अगर ऐसा लगता है कि सब नहीं पचा पायेंगे तो फ़िर पब्लिक स्पेस और प्लेस पर इन बातों का हाईप क्यों क्रियेट किया जाये? अपने अपने सैलेक्टेड गुट या ग्रुप बनायें सब, खुलकर विचार विमर्श करें आपस में,  ताकि हमारे जैसे अवांछित तत्व उत्पात न कर सकें और किसी के भावुक हृदय को हमारे कारण ठेस न लगे।(आखिरी पांच पैराग्राफ़ के लिये सिर्फ़ हा…)    हा हा हा…
वैसे हो सकता है कि ये पोस्ट कुछ लोगों को नागवार लगे,  कोई बात नहीं।  वैसे भी अपन यहाँ नामी होने के लिये नहीं आये थे न ये स्थायी मुकाम है जितना कुछ पा लिया यहाँ से, अगर उसी का मान रख सके तो बहुत होगा। जिस किसी को हमारे साथ खड़े होने के कारण शर्मिंदगी लगे, उस भाई बन्धु को मन  मसोसने की कोई जरूरत नहीं। अपने को किसी से कोई गिला नहीं रहता। निभेगी तो ठीक, न निभेगी तो भी ठीक - देखी जायेगी.....!!
हमेशा की तरह मेरी लास्ट की पंचलाईन बहुत निराश करने वाली ही है, है न?
:) एक छोटा सा चंचल सा खरगोश कड़ी धूप में इधर उधर डोल रहा था। एक हाथी सोया हुआ था। खरगोश को तो वह एक बड़ा महल सा ही लगा।  जिज्ञासु खरगोश ने उस विशालकाय महल के पिछले दरवाजे में सिर घुसाया और धूप और गर्मी के चलते प्रवेश  भी पा गया। अंदर नमी और ठंडक के चलते उसे नींद आ गई। उधर शाम हुई तो हाथी उठा और चल दिया। अब खरगोश की हालत खराब, कभी इधर गिरे कभी उधर। कैसी कैसी तो आवाजें आ रही थीं। मौसम ठंडा होने के कारण रास्ते भी सिकुड़ गये थे। कयामत की रात की तरह वह रात उस पर बहुत भारी पड़ी। अगले दिन लगभग वही दिन का समय था और वही मुद्रा, खरगोश को  सिमसिम खुला मिला और वो जान छुड़ाकर बाहर कूदा। संयोग से फ़त्तू वहीं से गुजर रहा था, उसने ये करिश्मा देखा तो भागकर उस आलौकिक खरगोश के पांव पकड़ लिये। अब खरगोश पैर छुड़वाये और फ़त्तू कहे कि उपदेश दो कोई, फ़िर जाने दूँगा। तंग आकर खरगोश ने कहा, “बालक, यही है हमारा उपदेश और यही है हमारा संदेश कि  बड़ों के भीतर घुसना तो बहुत आसान है लेकिन बाहर निकलना बहुत मुश्किल।”
फ़त्तू  अभी भी रिसीविंग ऐंड पर चल रहा है, लेकिन वक्त बदलेगा जरूर। उस ने यह संदेश मुझ तक पास-ऑन किया, मैं आप तक कर रहा हूँ।
कल रात को जो कुछ चिट्ठाजगत पर देखा, उसके बाद इस ब्लॉगजगत का हिस्सा होने पर शर्म भी आ रही है  लेकिन फ़त्तू के अश्लील होने का  अपराधबोध बिल्कुल खत्म हो गया है। यहाँ जो लिखा जा रहा है, कम से कम उसकी जिम्मेदारी से तो मैं पीछे नहीं हट रहा। पंजाबी की एक कहावत है, "किसी नूँ माह(उड़द) स्वादी ते किसी नूँ माह बादी(वात रोग करने वाली),  लेकिन जिस गंदी भाषा का इस्तेमाल देखा, बहुत बुरा लगा।
गाना सुनो यारों, भाषण तो बहुत हो गया। किशोर दा भी ना बस्स.. -


51 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत लिख गए "मौ सम कौन" जी .....
    भाई इत्ता दिम्माग तो है नहीं - कि इत्ता पढ़ें ... अगर पढ़ भी लें तो समझ नहीं आता ......... क्या कहा जा सकता है...
    बाकि लिखो तो खुल कर लिखो........

    जैसे की ये कवाली हैं.....

    @जहर भी देते हैं तो कहते हैं कि पीना होगा
    जब मैं पीता हूँ तो कहते हैं कि मरता भी नहीं
    जब मैं मरता हूँ तो कहते हैं कि जीना होगा"

    पर यहाँ भी एक डिप्लोमेसी है की नाम नहीं है - न जहर देने वाले और न पीने वाले का.

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  2. निभेगी तो ठीक, न निभेगी तो भी ठीक - देखी जायेगी.....!!
    गल्त बात है! (बेहद उम्दा) गल्त बात है जी। आप तो हमारी आदतें खराब करके निकल्लेंगे - और हमें अकेले उस्तादों को झेलने को छड्ड देंगे - गल्त बात है जी।

    ब्लॉग-जगत का एक बडा पॉपुलर प्रोग्रम है "गोल-मोल के बोल" - हमें-आपको समझ न आये तो कमी हमारी-आपकी। अपन तो वैसे ही समझदारी और फाल्तू समय के मामले में काफी गरीब रहे हैं सो बोधवाक्यों से वंचित ही रह जाते हैं। वैसे भी बिगडे रईसों के बेनामी हरकारे, फव्वारे और उस्ताद जी लोग लगे हुए हैं काम पर 24*7*365

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  3. बंद करके अड़ी में जा रहा था कि ..अब मेरी बारी..पर नज़र गई..सोचा टिपिया कर झटक लुंगा ! यहाँ भी लिंक..! धत्त तेरे की..! सुबह से तो पढ़ रहा हूँ अब कितना पढ़ूंगा..सफेद घर ..घूमा हूँ..दूसरी जगह अभी नहीं गया..जाऊंगा तो पलटकर आऊंगा..
    ..ई फत्तुआ गजबै ज्ञान बटोर रिआ है ! ओके धन्यवाद कह दीजिएगा तो..

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  4. मुझे लगता है "सक्सेना साहब " के लिए बहुत समय दिया आपने संजय साहब !
    शुक्रिया आपका

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  5. मिसटाइम की परवाह न करें, बोल दें जो मन को कचोटे। उपयुक्त समय की प्रतीक्षा करेंगे तो समय आपको कहाँ डुबो जायेगा, पता नहीं चलेगा।

    प्रवाह बनाईये
    और
    मन में
    जो आये,
    कह जाईये।

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  6. मैंने देखा था पोस्ट लिखने पर खूब टिप्पणी आती है..पर टिप्पणी लिखने पर भी खूब पोस्ट मार दी जा रही है..घोर कलियुग है..

    लोग हँस रहे होते हैं तो मुझपर उदासी छा जाती है और जब लोग बाग उदास होते हैं उस समय मुझे ठिठोली सूझती है।
    अच्छी लगी..

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  7. @ कल रात को जो कुछ चिट्ठाजगत पर देखा,

    इस पर लिंक देना शायद भूल गए। दे दीजिए तो यह भी समझ में आ जाए। बाकी पोस्ट तो ढंकचिक मस्त है ही!

    प्रोफेसर को मैं बस 'हा हा' समझता था। आप ने 'हास्य' बतला कर हमारा ज्ञानवर्धन कर दिया है। सादर ;) आभार ;)

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  8. बस यूँ ही गौरव बाबू विशुद्ध जवान की आज की पोस्ट का लिंक देने को मन कर रहा है। दे ही देता हूँ:

    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/10/blog-post_24.html

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  9. जो टिप्पणी सक्सेना जी की पोस्ट पर की थी, वही यहां चिपका रहा हूं.
    "मुझे तो अभी तक न कोई घाघ मिला न महाघाघ और न ही कोई गुट. कभी कभी चार बर्तन आपस में खड़खड़ा जाते है. बस, फिर अपनी जगह पहुंचते ही शान्त हो जाते हैं."
    बस प्रवीन जी के शब्दों में प्रवाहित रहें.

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  10. अमां उपरसे निकलने वाली बातें ज्यादा हो रही है जी. जी ही उचाट रहा है धीरे धीरे ब्लोगिंग से जबकि अब्भी तो सत्मास्या ही हुआ हूँ ब्लोगिंग में. धन्य है यह धुरंदर जो इत्ते बरसों से टिके हुए है.......................... कोई सींगडा-पूँछडा ही किसी बात का समझ में नहीं आवे....................... अर सारे के सारे ऐसे मूंड हलावे कि सारी कि सारी बात मगज में धंस गयी, अर ये सब पढ़ देख हम शर्मावे कि बेटा शर्मा अपने तो कुछ पल्ले ही कोन पड्या........................ भाईजी आपके कुछ पल्ले पड्या हो तो एक मेल धकेल दीजियेगा :)

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  11. @ Poorviya:
    अमां मिश्रा जी, हम तक आई थी ये डिप्लोमेसी, हमने आगे सरका दी तुम सबके सामने। तुम भी ऐसे ही सरका दो कहीं।

    @ Smart Indian:
    जायेंगे तो अपनी वजह से ही जायेंगे। इस मामले में जानी से कम नहीं हैं हम।
    एक धर्मसंकट और आ खड़ा हुआ है। आप को उस्तादजी कहने की आज्ञा मांगी थी शायद महीना दो महीने पहले, मिल भी गई थी। अब सोचना पड़ता है। आज एक और असली वाले पटियाले वाले भी दिख रहे हैं। उस्ताद जी न हुये सद्दाम हुसैन हो गये, डमी भी आ गये। हा हा हा।

    @ देवेन्द्र पाण्डेय:
    सफ़ेद घर पर आपके कमेंट से कुछ चुरा लिये थे जी, आपने टोका नहीं तो हम खुद ही मान लेते हैं। नहीं तो मुकरने में तो हम भी उस्ताद हैं।

    @ सतीश सक्सेना जी:
    आप डिज़र्व करते हैं, सक्सेना साहब। I mean it.


    @ प्रवीण पाण्डेय:
    प्रवीण जी, जो कचोट रहा था वो ही बोला है।

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  12. @ साकेत शर्मा:
    घोर कलयुग तो है। both are complimentary & suplementary.

    @ गिरिजेश राव जी:
    भूला नहीं जी। पहली बात तो कमेंट्स डिलीट हो गये हैं और दूसरी बात ये है कि रहने पर भी लिंक नहीं देना था। आपके दिये लिंक पर घूम आये।

    @ भारतीय नागरिक:
    बह ही रहे हैं जी, अब आपने भी सलाह दी तो सिर माथे पर।

    @ अमित शर्मा:
    हो तो महाराज तुम भी ज्ञानी, लेकिन इस नाव में हम इकट्ठे ही सवार हैं। अपने ही समझ आ जाती ये बातें तो क्यों बात उठाते? हां, पल्ले पड़्या कुछ तो पक्का वादा है ’मेल’ तुम्हें ठेल देंगे। अब और कुछ मत मांगना, मेल मांगा है तुमने, भेज देंगे:)

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  13. संजय जी
    @अकेले में बैठकर जब सोचता हूँ तो पाता हूँ कि लोगों की टाईमिंग अच्छी होती है, मेरी मिसटाईमिंग(मिसेज़टाईमिंग भी कह सकते हैं, आबाद आदमी हैं आखिर) बहुत अच्छी है।

    मेरे लिए तो आप की यह पोस्ट ठंडी हवा का झोखा है जिसने चहरे पर मुस्कराहट लाई है जो की हमेसा करती है | मेरा नाम पोस्ट पर क्यों लिखा है मैंने उस पर ज्यादा दिमाग नहीं लगाया | मुस्कराहट देने के लिए धन्यवाद |

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  14. हमारे समाज में सर्वनाम और अन्य पुरुष में सम्वाद की एक लम्बी परम्परा रही है. यह सम्वाद रहस्य की एक ऐसी चादर लपेटे घूमता है जैसी किसी ज़माने में मलयाळ्म से डब की हुई हिंदी फिल्मों की “सी” ग्रेड नायिका. अपने ऑफिस में ही ले लें न, आप खाने की टेबल पर लंच टाइम में बैठे हैं और बगल से शुरू हुआ सम्वाद,
    “ हाँ भाई! आज कल तो कुछ लोगों को सीएम के केबिन में ही काम रहता है, हर दूसरे मिनट फाइल लिए भागते नज़र आएंगे.”
    “अरे यार! हमें कौन सा सीएमडी बनना है जो काम के पीछे लगे रहें, ये तो वो करते हैं जिनको प्रोमोशन चाहिये.”
    अब यही रहस्यवाद ब्लॉग समाज में भी फैला हुआ है.
    “मैंने तो टिप्पणि बॉक्स बंद करने का मन बना लिया है. क्योंकि कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि मैं टिप्पणियों का भूखा हूँ.” “अब तो चुप रहने में ही भलाई है.”
    भाई मेरे तो फिर इतना क्यों बोले जा रहा है, चुपचाप चुप लगा जा! …या फिर पोस्ट की ओपेनिंग लाइंस,
    मन बड़ा व्यथित है मेरा इन दिनों, ब्लॉग जगत के चरित्र पर.” ..
    क्यों भाई,जब तुम्हारा बेटा तीसरी बार फ़ेल हुआ था तब तो व्यथित नहींहुए थे तुम!
    इसलिए संजय बाबू, क़बल इसके कि मेरी टिप्पणी पोस्ट की शकल अख़्तियार कर ले.. आप नॉर्मल हो जाओ! (वैसे ज़रूरत है ऐसे ऐबनॉर्मल लोगों की)...

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  15. “बालक, यही है हमारा उपदेश और यही है हमारा संदेश कि बड़ों के भीतर घुसना तो बहुत आसान है लेकिन बाहर निकलना बहुत मुश्किल।”
    फ़त्तू के इस उपदेश से आज जीवन धन्य हो गया,
    गाँठ बाँधकर रख लिया

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  16. संजय जी मैं आपसे सहमत हूँ. बड़े लोग बड़ी बातें. भीतर घुसना आसान पर बाहर निकलना मुश्किल.

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  17. hmm....बढिया झोंके हो संजय जी, एकदम टनाटन्न।

    नया जमाना वाले महराज की तो पोलपट्टी कल सुबह ही पता चल गई थी जब बंदे ने कमेंट डिलिट करना शुरू कर दिया था। यूं लग रहा था मानों बाकि लोग पागल हैं बस वही एक सचेत हैं :)

    वैसे भी आजकल चलन है लोगों का कि - मेरा मन बहुत उदास है .....कम्बख्त उदासी न हुई लघुशंका हो गई जो जब तब लग जाती है :)

    बाकी तो यह सब लगा ही रहना है :)

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  18. @ anshumala ji:
    धनबाद छोड़िये, पटना भी आप रख लीजिये। बस्स मेरा ध्यान रखियेगा, पता चला है कि आप भी राजनीति में उतर रही है। कुछ वोट बैंक वगैरह..........। ध्यान रखेंगी न मेरा? आखिर कई बार मेरे कारण आपके चेहरे पर मुस्कुराहट आई है:)

    @ सम्वेदना के स्वर:
    अजी आपकी टिप्पणी पर हमारी सारी पोस्ट कुर्बान। अब होना क्या है मुझे, नार्मल या ऐबनार्मल?

    @ deepak saini:
    दीपक, उपदेश तो काम का है(लेकिन है नाकाम लोगों के लिये)। हा हा हा।

    @ VICHAAR SHOONYA;
    बन्धु, तुम पर तो बहुत मान है मुझे। मेरे गाढ़े वक्त के साथी हो यहाँ।

    @ बेनामी जी:
    मेरा हाजमा कमजोर है जी इस मामले में। फ़िर भी धन्यवाद।

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. क्या भाई जी.. 'अभी तो ये अंगडाई है.. आगे और लड़ाई है..' :)
    ''अभी तो ये पहली मुश्किल(मंजिल नहीं) है, तुम(सॉरी आप) तो अभी से घबरा गए.. मेरा क्या होगाssssssssssssssssssss
    सोचो तो जराsssssssssssssssssss''

    आज फत्तू जी ने बड़ी बात सीख ली बड़े हो गए.. ये भी ब्लोगोपदेश ही हुआ.. कब्बाली पढ़ा कर गाना सुना दिया.. अब कब्बाली ढूंढ रहा हूँ यूट्यूब पर.. :)

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  21. @ सतीश पंचम:
    भाई जी, सही पकड़े हो एकदम।
    लघुशंका दीर्घशंका आशंका, ये सब चलना ही है।

    @ चला बिहारी...:
    तो साहब जी, फ़त्तू सर्टिफ़ाईड .... हो गया ना अब?

    @ दीपक मशाल:
    तुम क्यों घबराते हो छोटे भाई? मस्त रहो, मूवी देखो ..जो पसंद आये।

    @ PADMSINGH;
    हा हा हा(वही तीन बार)

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  22. सतीश जी की पोस्ट देखी ...कुछ समझ नहीं आया ...
    आपकी पोस्ट ने भी कुछ नहीं समझाया ...
    ब्लौगजगत की भारीभरकम बातें समझ कम ही आती है ...क्या करें ...!
    फत्तू को सीख अच्छी मिली और गीत भी अच्छा है ...!

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  23. 'पहले' में कोई टिकता नहीं और 'दूसरे' में जाते ही 'पहला' मिसिंग फील होने लगता है...तो क्या ? यही अंतर्विरोध कमोबेश हम सब में मौजूद है !

    हर कोई अगर साफगो हो पाता तो ब्लागजगत में बेनामी / अनामी /सुनामी / उस्ताद जी / अम्मा जी वगैरह वगैरह की बाढ सी क्यों आती ? ...तो सच यह कि ये सारे के सारे भी हम ही हैं !

    बहरहाल फत्तू और खरगोश पर एक ख्याल हमारा भी..."बड़ों के भीतर घुसना तो बहुत आसान है लेकिन बाहर निकलना बहुत मुश्किल"... और जब तक भीतर जीवन दूभर :)

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  24. अभी हाल ही में वर्धा सम्मलेन में एक कवि ने कहा कि ब्लागिंग सबसे कम पाखण्ड वाली विधा है.

    उन्होंने अपनी यह बात ब्लागिंग के लिए कही थी और उनकी बात को लेकर हिंदी ब्लॉगर के बीच काफी उत्साह था. मेरे विचार में उन्होंने हिंदी ब्लागिंग और ब्लॉगर को ठीक से नहीं देखा है. पाखण्ड का क्या? कोई कहीं भी कर सकता है. और ब्लॉग पर करने में तो और भी मज़ा है. कुछ महाब्लागर ऐसे भी हैं जिनके ब्लॉग पर अगर आप कुछ ऐसा कमेन्ट करें जिसकी वजह से उनकी ईमेज बिगड़ने का चांस रहता है (यह ईमेज बिगड़ने वाली बात बात उनकी समझ में है. मेरा मानना है कि किसी की बढ़िया ईमेज एक कमेन्ट से ध्वस्त नहीं हो सकती) तो वे उस कमेन्ट को छापेंगे ही नहीं. वहीँ पर अगर उसी पोस्ट पर बेनामी कमेन्ट देकर उन्हें महामानव, महात्मा, महापुरुष, महादानी बता दिया जाय तो फिर देखिये कि उस कमेन्ट को छापने में जरा भी समय नहीं लगेगा.

    कुछ ब्लॉगर जो धरा के विपरीत बहना चाहते हैं, वे अगर तर्कों वाले कमेन्ट को डिलीट ही कर देंगे तो फिर धारा के विरुद्ध कैसे बहेंगे? चतुर्वेदी ज़ी एक पूरी संस्कृति, धर्म और आस्था के खिलाफ लिखते हैं. अगर कोई वहाँ जाकर तर्कपूर्ण कमेन्ट देता है तो उन्हें तो और तर्कपूर्ण कमेन्ट देने चाहिए. वे अगर दूसरों का कमेन्ट डिलीट ही कर देंगे तो फिर धारा के विरुद्ध कैसा बहना? फिर तो उन्हें अपने लेख छापने के लिए बंगाल के कम्यूनिस्टों को कहकर हिंदी में एक गणशक्ति शुरू करवा देना चाहिए. या फिर अपने ब्लॉग पर कमेन्ट बंद ही कर देना चाहिए.

    पाखंड से निकलने की ज़रुरत महसूस कीजिये महानुभावों क्योंकि निकलने से पहले निकलने की ज़रुरत महसूस होनी चाहिए.

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  25. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  26. भाई साहब,
    हमे भी हमारे बडे़ मियाँ “नाकाम“, “नाकारा“, “कामचोर“, “ठाल्ली“
    आदि आभूषणो से नवाजते है

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  27. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  28. संजय जी, एवं सवेदना के स्वर में स्वयं को सम्मलित कर यहाँ उपस्थित समस्त टिप्पणीकार .......
    मन से वेदना का हटा कर..........
    ब्लॉग जगत को मिथ्या मान कर...
    टिप्पणी को पोस्ट का फल समझ कर ....
    सारा दिन अपने कार्य में मनन कर ....
    बीवी-बच्चो की खिटपिट निपटा कर..
    जब आप ब्लॉग जगत पर आते हैं....
    तो मात्र इसलिए की ज्ञान वर्धन हों......
    कविता के रूप में भावनाएं पुष्ट हो...
    विचारों के मिलन से मानसिकता पुष्ट हों.....

    बस.....
    और अपनी जो थोड़ी बहुत पूंजी भावनाओ, सवेदनाओ और किसी ज्ञान के रूप में संचित है....... यहाँ लुटाओ.....
    न की मकान मालिक-किरायेदार और सास बहु कि तरह कीच कीच शुरू करे....

    गुरु गिरिजेश राव* के शब्दों में
    "भगवत गीता का पाठ करें आर्य...."

    (*गुरु कि उपाधि इनको इसलिए दी है की मुझे मेरी गलतियों का अहसास टिप्पणी के रूप में करवा रहे हैं.)

    जय राम जी की.

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  29. लगता है ब्लॉग जगत में अचार संहिता अपरिहार्य हो गया है -जिसमें ऐसे विचारपूर्ण अमूर्त लेखों पर भी पाबंदी होगी !

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  30. कव्वाली बेहतरीन है सर जी,
    और टाईमिंग/ट्यूनिंग तो अब एक प्रजाति हो गयी है सर, आप तो मिस/मिसेज़ जा के gender ratio बराबर कर रहे हैं...पुण्य कार्य है ये भी..
    Nature loves symmetry and balance.
    नहीं क्या? :) :)
    Web Browser में blogspot.com के अलावा 'ब्लॉग', 'ब्लॉगपरिवार', 'ब्लॉगजगत' ये सब भारी शब्द ना तो समझ आत़े हैं, न मैं समझना चाहता हूँ.
    तो आपकी पंचलाईन के पहले तक का सब कुछ RSA-ZIM क्रिकेट सिरीज़ रहा इस लड़के के लिए. किधर बिठाना है, ये कोई भी तय कर सकता है...ऐतराज़ नहीं दर्ज होगा :)
    बकौल जगमोहन डालमिया...नो कमेंट्स!!!.........But not out of diplomacy, its out of no-interest.

    फत्तू साहब का संदेश सच है और मीठा भी...नीम के दातून से दांत माजने का हुनर हो गोया.
    किशोर साहब कुछ भी गा दें वो चंगा, ये तो है ही बढ़िया...

    वैसे सर जी.........
    "पत्थरों से डर नहीं लगता, फ़ूल ज्यादा चोट दे जाते हैं।"
    :)

    दबंग देख ली आपने??..... वैसे मुझे आपका लिखा ज्यादा अच्छा लगा :)

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  31. हमारे ब्लॉग जगत मे सबको बड़ा भी कहलाने का शौक हैं इस लिये ऐसी " ना समझने वाली " पोस्ट लिखी जाती हैं । सक्सेना जी ने सब को खुश करना चाहा , चित्र डाल कर लेकिन क्या किसी के लिये लिखा ???? आप को पहले क्यूँ नहीं पढ़ा अफ़सोस ही कर सकती हूँ । इंसानी इच्छा हैं मेरी पोस्ट कभी पढते हैं ???? !!!!!!!

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  32. पहले तो जी भर कर हंस लूँ आज कोई हंसने वाली पोस्ट नही मिली थी सुबह से मुँह लटकाये बैठी हूँ----- लाजवाब

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  33. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  34. मौसम (मो-सम) वाले तेरा जवाब नहीं...कोई तुझसा नहीं हजारों (ब्लोगरों) में...सच्ची...अपने दिल की बात इतनी खूबसूरती से कहन बहुत बड़ा हुनर है और आप वाकई हुनर मंद हैं...
    ये एलीट और नान एलीट ब्लोगर क्या होते हैं भाई...ब्लोगर ब्लोगर होता है बस इतना ही ध्यान रखें...बाकी की बातें जाने दें...अंत में: बाउजी सच्ची त्वाडा जवाब नहीं...

    नीरज

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  35. @ Udan Tashtari:
    क्या बात करते हैं, समीर सर? आप तो क्या, किसी को भी कटघरे में खड़ा करने वाले अपन कौन होते हैं? हाँ, अगर सिर्फ़ हाँ जी, हाँ जी करना ही दस्तूर है तो अलग बात है।

    @ वाणी गीत:
    जब लिखने वाले(हमें) ही नहीं समझ आया तो आपको कहाँ से आ जाता? जाने दीजिये - जो अच्छा लगे उसे अपना लो जो बुरा लगे(समझ ना आये) उसे जाने दो....

    @ अली साहब:
    बजा फ़रमाते हैं आप, सभी हम हैं:) @ फ़त्तू ऐंड हेयर: ख्याल नेक है।

    @ zeal:
    thanks I hope this is real zeal & not the fake one.

    @ Shiv:
    शिव भैया, मजा इस बात का है कि freedom of expression जैसे जुमले सिर्फ़ अपना मकसद सिद्ध करने के लिये है। जब खुद पर कोई बात आये तो फ़िर सब भुला देते हैं। दोबारा वाला मेरा कमेंट डिलीट नहीं किया, क्योंकि कह दिया था कि सेव कर लिया है।
    वैसे आप आक्रोश में भी उसी तरफ़ जमते हैं जैसे व्यंग्य में। हा हा हा। आपसे इतना बड़ा कमेंट पाना बहुत बड़ी बात है अपने लिये। अब आपसे एक पोस्ट की फ़रमाईश, आपके स्टाईल में।

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  36. बहुत पढना पड़ता है आपकी पोस्ट पर आने से. लिंक-से-लिंक निकलता जाता है.
    खैर... कॉमरेड साब की तो एक और पोस्ट कहीं मिली थी हाल ही में. अमेरिका पर. बड़े ज्ञानी लगते हैं. और जैसे कुछ एक्शन फिलिम को कॉमेडी मान कर देख लेने में मजा आ जाता है वैसे ही हम उनके ज्ञानी पोस्टों को भी कॉमेडी समझ के निकल लेते हैं. वैसे हैं ही समझना क्या है.

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  37. @ Deepak Saini:
    दीपक, किस्मत वाले हो। बड़े मियाँ भला ही चाहते हैं तुम्हारा।
    वैसे ऐसे विशेषण एक बार चिप जायें तो फ़ायदा बहुत देते हैं, कुछ कर लो, छूट मिली रहती है:)

    @ दीपक बाबा:
    अमां, हमारी ही पोस्ट पर हमें ही उपदेश? अभी करता हूँ डिलीट, हा हा हा।
    सॉरी यार, भूल गये थे कि सब हमारी तरह से खाली नहीं और हमें बीबी बच्चों की गिटपिट भी नहीं सुननी पड़ती औरों को सुननी पड़ती हैं। लेकिन भाई, हमारे पास तो ये किचकिच ही है, यही सुना सकते हैं। जब कभी ज्ञान से अफ़ारा हो जाये, कभी कभी झाँक लेना थोड़ा टेस्ट बदल जायेगा। सबको बिगाड़ देना है, हा हा हा।

    @ Arvind Mishra ji:
    जब होगी मिश्रा जी, देखी जायेगी। तब तक तो न्यूंऐ चाल्लेगी।

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  38. @ Avinash Chandra:
    कहीं नहीं बैठाना है यार इस लड़के को, ये लड़का तो अपनी कलम चलाता रहे बस। यहाँ कोई धर्मयुद्ध थोड़े ही चल रहा है, अपने विचार रखे हैं सबने। तुम जैसों का इन बातों में no-interest सुखकर ही है।
    . @ दबंग देख ली आपने? रोज देख रहा हूँ यार, फ़िर भी मन . नहीं भरता, और जिस दिन भी नहीं दिखती है, दिन बेकार . जाता है स्साला:)

    @ क्रांतिदूत:
    धन्यवाद, अरविन्द जी।

    @ निर्मला कपिला जी:
    शुक्रिया जी।

    @ अदा जी:
    हे वर्ष की सर्वश्रेष्ठ(बाल वृद्ध)ब्लॉगरा - फ़त्तू तक आपका उपदेश\संदेश पहुंचा दिया है। धन्यवाद स्वीकार कर लीजिये।

    @ नीरज गोस्वामी जी:
    नीरज भाई साहब, इतना हुनरमंद बता दिया है आपने तो जाने ही देते हैं ओल्ड स्पाईस को।आपके कमेंट मिलने के बाद से हमने अपनी शेविंग क्रीम ही बदल दी है, फ़िर से पामोलिव पर आ गये हैं। हा हा हा।

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  39. @ रचना जी:
    एक पोस्ट पर आपके soulmate वाले कमेंट्स पढ़े थे। पोस्ट से बेहतर कमेंट्स थे। आपकी पोस्ट्स अब नहीं पढ़ता, ये सच है। बहरहाल, आपके कमेंट के लिये शुक्रिया।

    @ अभिषेक ओझा:
    इस बात से तो मैं भी दुखी हूँ अभिषेक जी,लेकिन मजबूर हूँ - either absolute no or no limit - अपना फ़ार्मूला यही है।

    और कामरेड और ज्ञानी पर्यायवाची ही होते हैं। इन्हीं साहब का एक बार स्टेटमेंट पढ़ा था आंकड़ों सहित कि विश्व के पता नहीं कितने देशों में उनका ब्लॉग पढ़ा जाता है। हमारा ब्लॉग तो हमारी घरवाली भी नहीं पढ़ती। पता नहीं क्या क्या टैक्टिक्स अपनानी पड़ती है,तब पसीजती है, वो भी कभी कभी।
    एक्शन @ कामेडी, मजा आ गया।

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  40. हे सर्वाधिक अंक धारी...
    नामों से हमरी मति गयी मारी...
    इस हेतु हमने
    पहली टिप्पणी कूएं में दे डारी...

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  41. सोचती हूँ पढ़ लूँ..शुरू करती हूँ....जितनी समझ आती है.(गाना हर बार सुन लेती हूँ....)..फ़िर चली जाती हूँ आगे का फ़िर आकर पढ़ने के लिए..(टाईमिंग ही नहीं जम रही है ).जब दुबारा आती हूँ पोस्ट और लम्बी हो जाती है...कोई उपाय..पहले इसे पढ़ने का फ़िर समझने का...या...रहने ही दूँ...

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  42. हम भी ४० साल के बच्चो की श्रेणी मे आते है . कुछ चांदी हमारे बालो की भी शोभा बढा रही है . ............. कब्बाली मस्त है और फ़त्तु को मिली शिक्षा भी

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  43. ...पहली बार आया ...कई जगह कमेन्ट पढ़ते हुए .....और आप तो बड़े जवान निकले माशाअल्लाह ?...जय जय !

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  44. अंशुमाला जी के ब्‍लाग से भटकते हुए पहुंचा। यहां आकर समझ आया कि सचमुच आप जैसा कोई नहीं। लेख तो लेख टिप्‍पणियों में भी नहीं चूकते हैं। बधाई।

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  45. @ Archana ji:
    रहने ही दीजिये जी...।

    @ प्रवीण त्रिवेदी:
    हाँ जी, मास्टर जी - ’अभी तो मैं जवान हूँ’ - धन्यवाद आपका(डबल)।

    @ राजेश उत्साही जी:
    सर, अपन तो उत्साहित हैं आपको दूसरी बार यहाँ देखकर।(ऐसी बातें मैं नहीं भूलता)। आभार आपका।

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