सोमवार, नवंबर 15, 2010

हार की जीत

शाम ऑफ़िस से घर के लिये निकला तो छिटपुट अंधेरा शुरू हो गया था। वैसे तो बाईक पर हम दो साथी इकट्ठे जाते हैं, लेकिन उस दिन मैं अकेला था। कुलीग का घर  मेरे मकान के पास ही है। इकट्ठे जाने के और फ़ायदों के साथ एक फ़ायदा यह भी हो जाता है कि रास्ते में कुछ प्लानिंग कर लेते हैं कि आज फ़लां काम को निबटाना है या आज डाक की पेंडेंसी देखनी है। मेरे यह कुलीग मेरे से हर लिहाज में सीनियर हैं। न सिर्फ़ उम्र के लिहाज से,  बल्कि ज्ञान, दुनियादारी वगैरह हर मामले में मुझसे इक्कीस नहीं, इकतीस बल्कि इकतालीस हैं। आजकल उन्हें शाम को  किसी काम से दूसरी तरफ़ जाना होता है, सो हम दोनों अपनी अपनी बाईक से जाते हैं।
थोड़ी दूर ही आया था कि दो सज्जन खड़े दिखाई दिये और मुझे रुकने का इशारा किया। चलने के लिये तो फ़िर भी हमें प्रेरित करना पड़ता है, लेकिन रुकने का तो जी बहाना चाहिये होता है। रुक गया तो एक महाशय आकर पीछे बैठ गये और कहने लगे. “चलो जी।” चल दिये जी हम। असल में सीधा सा ही रास्ता है तो सबको मालूम है कि कोई इस तरफ़ जा रहा है तो कम से कम मेन रोड तक तो जायेगा ही। इसलिये कोई औपचारिकता नहीं, ऐसा नहीं कि दिल्ली की तरह अँगूठे दिखा दिखाकर लिफ़्ट मांगी जाये। यहाँ तो सामने वाला रुक भर जाये, फ़िर तो खुद ही बैठ जाते हैं भाई लोग।
मेन रोड पर आकर मैंने बाईक रोकी और उनसे कहा कि मैं इधर गांव वाले रास्ते से जाऊँगा। वो उतर गये। रोड पार ही की थी कि प्रौढ़ उम्र के आदमी औरत खड़े थे, अब उन्होंने रोक लिया। महिला आकर बैठ गईं और हम चल दिये। आगे गाँव में जाकर उन्हें उतारा और मन भर आशीर्वाद अपने सर पर चढ़ाकर मैं आगे निकल पड़ा।
बहुत समय हो गया है जब मैं किसी के साथ होता हूँ,  तब मैं खो जाता हूँ कहीं। हैरान होकर, चकित होकर लोगों को बातें करता देखता रहता हूँ। यार, कैसे ये लोग इतनी बातें और इतनी अच्छी तरह से कर लेते हैं? अपने से तो एक वाक्य बोलना पड़े तो तेरह व्याकरण की गलती, पन्द्रह उच्चारण की गलती हो जाती हैं। हाँ, जब अकेला होता हूँ, तब बहुत बोलता हूँ। सोचता रहता हूँ, खुद से ही सवाल जवाब करता रहता हूँ।
ख्याल भी बहुत बेतरतीब से और अजीब से आते हैं। एक दिन सोच रहा था, एक महानगर में पैदा होकर वहीं डिग्री विग्री ली(पढ़ा लिखा कुछ नहीं और न ही उसका मोल है कुछ – शिक्षा म्यान है और डिग्री तलवार जो बेरोजगारी रूपी कैद को काटने के काम आती है),  नौकरी के सिलसिले में एक जिला केन्द्र   पर पहुंचा। अगला कदम एक कस्बे में रखा और फ़िलहाल एक गांव में हूँ। लोग अपना विस्तार करते हैं ऊपर उठते हैं, मैं वृहत से लघु की ओर जा रहा हूँ। अब अगला पड़ाव क्या होगा?   ट्रेंड के हिसाब से तो अगला मुकाम कोई रेगिस्तान या पहाड़ लगता है, जहाँ चारों तरफ़ वीराना पसरा हो। न कोई आने वाला हो, न कोई जाने वाला। मिलने की खुशी न मिलने का गम, खत्म ये झगड़े हो जायें – देखें क्या होता है। लेकिन ऐसा हो तो शायद मेरे मन को सुकून ही मिलेगा। लोगबाग जहाँ इंच-इंच जगह के लिये लड़ रहे हैं, मैं अकेला मीलों सरजमीन का उपयोगकर्ता।  क्या कहा जाये, हाऊ रोमांटिक या पागलपन?
खैर, उन महिला को उतार कर चला तो दिमाग में ये आ रहा था कि मैंने ऐसा क्या विशेष कर दिया कि वो बेचारी अपनी तरफ़ से इतने आशीर्वाद दे गई। ’जुग जुग जी मेरे पुत्तर, ज्यूंदा रह ते तरक्की कर और ये और वो’। मेरा दिमाग बहुत जल्दी सनक जाता है जब कोई मुझे ऐसी बातें बोलता है। मैं क्या उसे अपने कंधे पर बिठाकर लाया या मुझे उसके कारण कोई ज्यादा सफ़र करना पड़ा? मैं बाईक पर इस तरफ़ ही आ रहा था तो उनके कहने पर उन्हें भी साथ ले आया, इसमें क्या बड़ी बात हुई?
मेरे जिन कुलीग की बात मैंने पहले की है,  वो किसी के रोकने पर अपनी बाईक नहीं रोकते। पहले दो तीन बार ऐसा हो चुका है, और मुझे भी हर बार यही समझाया उन्होंने कि मैं भी एवायड किया करूँ। उनके अपने अनुभव रहे होंगे, और मैं उनकी अधिकतर बातें आँख बन्द करके मान लेता हूँ क्योंकि उनके अनुभव का मैं प्रशंसक हूँ। लेकिन इस बात पर मुझसे उनकी बात नहीं मानी जाती। अभी कुछ दिन पहले ऐसी ही एक घटना हुई कि हम दोनों अपनी अपनी बाईक पर लौट रहे थे, वो आगे थे और मैं पीछे। एक मोड़ पार करने पर एक बीस बाईस साल का लड़का था, उसने हाथ देकर शहर तक छोड़ने की रिक्वेस्ट की, मैंने मान ली। बताने लगा कि ट्रेन पकड़नी थी, टैम्पो वगैरह कोई आया नहीं, लेट हो गया तो ट्रेन मिस हो जायेगी।
अगले दिन ऑफ़िस में लंच के बाद बैठे हुये थे कि वही बात उन्होंने छेड़ दी, “कल मैंने तो उस लड़के को मना कर दिया था लेकिन आपने उसे लिफ़्ट दे दी। आजकल जमाना खराब है, जिसे आप जानते नहीं उसके साथ भलाई करने का भी जमाना नहीं है। बाई चान्स, आगे चैकिंग हो और उस लड़के के पास कोई हथियार या कोई नशीला पदार्थ निकल आये तो आप साथ में नप जायेंगे”      सबने उनकी हाँ में हाँ मिलाई, बात गलत थी भी नहीं। मैं भी उन्हें मेरा शुभचिंतक ही मानता हूँ लेकिन मैं कन्विंस नहीं हो पाता,  मैंने सुदर्शन पंडित की लिखी कहानी ’हार की जीत’ सुनाई, जो हमारे गार्ड साहब को बहुत पसंद आई।
लेकिन सच ये है कि आज के समय में बाबा भारती कोई आदर्श नहीं।  आदर्श है ’बंटी और बबली’  जैसे या ’धूम’ के हाई प्रोफ़ाईल बाईकर लुटेरे। नई पीढ़ी को दोष नहीं देता मैं, उन्हें ये सब देखने पढ़ने को ही मिल रहा  है। लेकिन हम  जैसे क्या करें? 
बड़े शहरों में मुझे भी मालूम है कि लिफ़्ट लेने देने के खेल में बहुत कुछ होता है, सौदे से लेकर ब्लैक्मेलिंग तक, रिश्तों के कई आयाम हैं इस लिफ़्ट लेने-देने में जिसकी परिणति कई बार पैसे के लेनदेन से लेकर हत्या जैसे जघन्य अपराध तक में देखने को मिलती है।
कितना बदल गये हैं हम लोग कि आज से बीस तीस साल पहले जो बातें  हमें सिखाई जाती थीं कि औरों की मदद करो, दयालु बनो, मित्रवत व्यवहार करो आदि, आज इससे उलट शिक्षा हमें दी जा रही है।मेट्रो में और रेलवे स्टेशनों पर बाकायदा घोषणा की जाती है कि अजनबियों से सावधान रहें। और तो  और, अखबारों में ऐसी वारदातें पढ़ी हैं कि पानी पीने के बहाने घर में घुसकर  लूटपाट हो गई।  
ओबामा क्या दे गया और क्या ले गया, इससे ज्यादा मेरे लिये ये जानना जरूरी है कि हमें अविश्वासी होकर जीना चाहिये ताकि किसी मुसीबत में न फ़ंस जायें     या      सहज विश्वास करना चाहिये दूसरों पर कि हो सकता है वाकई इसे मदद की जरूरत है? आखिर हम जो करेंगे वही तो हमारे बच्चे सीखेंगे।  मैं तो अभी तक विश्वास करता रहा हूँ, हाँ, थोड़ा सा सावधान रहने में कोई हर्ज नहीं।  अविश्वास किसी पर नहीं करता लेकिन अंधविश्वास भी हर किसी पर नहीं करता। 
है किसी के पास ऐसा पैमाना जो बता सके कि सामने वाला सच बोल रहा है या झूठ?  
आज ढाई साल पूरे हो गये हैं जी हमें घर छोड़े।  अब जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं,  ये जगह, यहाँ के लोग और अच्छे लगने लगे हैं। ऐसा शायद सबके साथ ही होता होगा  कि जिस से जुदा होने का समय करीब आये, उसमें अच्छाईयां दिखने लगती हैं  या फ़िर मुझे ही ऐसा लगता है?
सवाल बहुत हैं, ऐसा जवाब कोई नहीं मिलता जो सवालों को संतुष्ट कर दे। और कुछ न सही, सवालों के ढेर तो इकट्ठे हो ही रहे हैं।
छोड़ो जी, आज बस इतना ही, गाना सुनो, एक कम पॉपुलर गीत लेकिन मेरा पसंदीदा, बहुत ज्यादा,  पता नहीं क्यों? ये     ’पता नहीं’    भी स्साला लाल रंग की तरह कब मुझे छोड़ेगा। खैर, देखी जायेगी.....

50 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी15/11/2010, 7:36:00 pm

    इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. संजय जी,
    विश्वास का प्रत्युत्तर प्रायः विश्वास ही होता है.
    अपवाद भी होते हैं, जो अख़बारों में छपते हैं.
    अपवादों की संख्या निश्चय ही कम होती है. मुझे तो लगता है थोडा नुकसान उठा कर भी विश्वास करना एक बेहतर विकल्प है जो अपने बच्चों को दिया जा सकता है.

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  3. अभी कुछ दिनों पहले ही तुकबंदी करी थी, कल शायद ब्लॉग में यही चिपकाने वाले है ;)

    खाँमखाँ ताउम्र फिकर की,
    'जो हो गया, तो फिर क्या' ?!

    हमें तो लगता है आदमी की फितरत ही कमबख्त चीज़ों को फेंटेसासईज़ करने की होती है, नहीं तो जिंदगी में तो गिना चुना ही बुरा हुआ है.

    लिखते रहिये ...

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  4. अपन ने तो रोड [मूवी] में जो एक्सपीरियंस देखा वो खतरनाक था :)

    @सवाल बहुत हैं, ऐसा जवाब कोई नहीं मिलता जो सवालों को संतुष्ट कर दे

    सवाल ज्यादा हो जाये तो वत्स जी या सुज्ञ जी पूछ लिया कीजिये :)

    वैसे बात सही है ... बड़े बड़े महा[अविश्वास]नगरों में सच में सावधान ही रहना चाहिए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता

    .. ये जान कर अच्छा लगा की आपके आसपास आपके शुभचिंतक मौजूद हैं

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  5. आप जैसे हैं वैसे ही रहें...कम से कम जो अच्छाइयां हैं आप में उनको कभी न बदलें...
    इन्सान जब तक अपनी नज़र में बना रहता है...जीवन सरल होता है....

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  6. संजय बाउजी..लौट आये तो हमरी भी राम राम... अब तो लगता है कि ये बात ब्लॉग दुनिया में भी कई बार चिपका चुका हूँ और शायद जितनी मर्तबा ये सवाल पूछा जायेगा मैं यही जवाब दूंगा..
    मेरी ट्रेनिंग के दौरान (चूँकि बड़ा पेचीदा काम था, एक ग़लत फैसला और लाखों का नुक्सान)जो पहला सबक सिखाया गया था वो ये था कि आगे के दिनों में सिखाये जाने वाले सारे सबक बेकार हैं.. जब कभी फैसला करने में दिक्कत आये,अपने दिल पर हाथ रखकर दिल की सुनो और उसी का कहा मानो.
    संजय भाई आज तक दिल फ़ैल नहीं हुआ.. कभी हो गया तो दिल नहीं हार्ट फ़ैल ही हुआ समझना.. दिल को छू गई चंद बातें.. पागलपन मुबारक और सलामत भी रहे!!

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  7. इतना ज्यादा समझदार तो नही हूँ कि बता सँकू क्या सही है और गलत, किस पर विश्वास करना चाहिए किस पर नही। बस इतना है कि यदि रास्ते मे कोई मिल जाये तो बैठा लेता हूँ। आज तक तो कुछ गलत हुआ नही, उम्मीद है कि आगे भी नही होगा। यदि हुआ भी तो देखा जायेगा। कम से कम अपनी तरफ से तो कोई कोशिश उठा कर ना रखो ।

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  8. पढ़ा लिखा कुछ नहीं और न ही उसका मोल है कुछ – शिक्षा म्यान है और डिग्री तलवार जो बेरोजगारी रूपी कैद को काटने के काम आती है

    सोलह आने सच है यह ......

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  9. @ मेरे लिये ये जानना जरूरी है कि हमें अविश्वासी होकर जीना चाहिये ताकि किसी मुसीबत में न फ़ंस जायें या सहज विश्वास करना चाहिये दूसरों पर कि हो सकता है वाकई इसे मदद की जरूरत है?

    # इसी गलफ़त में कई मुसीबत के मारे वाकई में मारे जाते है और विश्वासघाती मौज उड़ा जाते है

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  10. दिन में तो फिर भी किसी को लिफ्ट दे देता हूँ , पर शाम ढले बाद ..................तौबा तौबा ........................एक बार चोट खाया हुआ हूँ ............

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  11. हाऊ रोमांटिक सर जी!!

    अपने छोटे से (बहुत छोटे से) अनुभव से कहता हूँ...हाऊ रोमांटिक सर जी!

    और ये जो लाल रंग है, मुझे भी बहुत पसंद है. जब तक है, नेकी कायम रहेगी..सावधानी बहुत जरुरी है पर फिर भी अंतरात्मा कोई चीज है जो किसी law of business behavior में नहीं आती.
    ऐसा लिखने के लिए शुक्रिया कह लूँ आज?

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  12. संजय जी एक बात गांठ बांध लीजिये की आप का जीवन केवल आप का नहीं है आप के साथ आप के पत्नी और बच्चे का जीवन भी जुड़ा है इंसानियत के चक्कर में किया गया एक गलत फैसला ना केवल आप का जीवन पर संकट ला सकता है बल्कि उससे ज्यादा भयंकर परिणाम आप के परिवार को जीवित रह कर भुगतना पड़ सकता है | फिर ना आयेगा कोई आप के पास या आप के परिवार के पास इंसानियत दिखाने के लिए | चाहे इंसानियत की बात हो या जीवन का कोई भी इस तरह का फैसला हमेसा अपने छओ इन्द्रयो का प्रयोग करके करना चाहिए | गावो में किसी को लिफ्ट देना तो ठीक है जहा पर इस तरह की बात नहीं सुनी जाती पर वहा भी इतना सहज नहीं होना चाहिए और ना ही ये रोज का क्रिया कलाप बनाना चाहिए पता चला की आप किसी के लिए पहला और आसान शिकार बन गये आप का आसानी से सभी पर विश्वास करना ही किसी को आप से विश्वास घात करने के लिए उकसा ना दे |

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  13. जिंदगी की मोटर सायकिल में आपकी सवारी एकाकी ही बढ़ी जा रही है, लगता है. खैर, हमारे इलाके में तब फटफटी यानि मोटर सायकिल कम ही होती थी. हमारे एक परिचित से कोई लिफ्ट मांगता तो कहते- ले तो चलता, लेकिन पेट्रोल एक ही सवारी के लायक है.

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  14. आपका लेख आप के विचारों और आपके मन का दर्पण है जिस से लगता है आप बहुत कोमल हृदय और शीघ्र ही दूसरों पर विश्वास करने वाले इंसान है.

    सच में ऐसा ही होता है की हम तो साफ़ दिल से किसी की मदद करना चाहते हैं...अनुभवी लोगो के समझाने पर भी हम अपना व्यवहार नहीं बदल पाते और इसी वजह से कई बार धोका भी खा जाते हैं.

    सुंदर प्रस्तुति.

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  15. या दिल की सुनो दुनिया वालो
    या मुझको अभी चुप रहने दो
    मैं घाम को खुशी कैसे कह दूं
    जो कहते हैं उनको कहने दो...
    हमारे एक दोस्त मोर्निंग वाक पर जाते थे..गांधी मैदान के कई चक्कर लगाते थे. एक रोज गड्ढे में एक बच्ची पड़ी मिली.. क्या करें न करें के असमंजस में वो नज़रंदाज़ करके निकल गए.जब चक्कर पूरा करके लौटे तो वो मर चुकी थी.. सदमा ऐसा लगा कि आज भी बैंक से लौटते समय सड़क के किनारे खुले सारे मैन होल झांककर देखते हैं. लोग उनको सनकी कहते हैं. मगर जो जानते हैं वो उनका दरद समझते हैं. संजय बाउजी... या दिल कि सुनो या जग की... कमबख्त दोनों साथ क्यों नहीं चलते!!

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  16. संजय जी हमें तो लगता है आप ठीक ही कर रहे हैं। अब कोई बुरी नीयत से लिफ्ट मांगेगा तो नहीं देने पर आपको किसी तरह रोक ही लेगा। तो यह तो समय समय की बात है।

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  17. we are living in unknown.. jis zamin pe hum kadam rakhte hain thik ussi par fir kadam nahi rakhte.. parivartan har pal hota rahta hai..fir bhi hume hamesha security ki talash rahti hai... aur iss talash mein hum dimaag zyada aur dil kam lagate hain.. koi nahi janta kab , kahan kya hoga..aap jaise hain vaise hi bane rahe.. achche logon ki duniya mein zarurat hai.. mushkile to aati hain... lekin asaan rasta to koi bhi chun leta hai... agar kisi galat aadmi ko vishwas kar ke lift de dete to kya hota.. jeb ke kuch paise chale jaate..zyada hota to motorcycle chali jaati...lekin agar kisi zaruart mand ki madad nahi ki to shayad wo aatma ko hamesha dhitkarta rahega... apni aatma ki suno..aatma aapko dhokha nahi degi...

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  18. @ prkant:
    प्रोफ़ैसर साहब, एकदम सही कह रहे हैं आप। जो हम देते हैं, वही लौट कर हम तक आता है।

    @ Majaal:
    उसी गिने चुने को हम मैग्नीफ़ाई करके देखते हैं, है न भाई?

    @ Gourav Agrawal:
    हाँ, गौरव, खुशकिस्मत हूँ मैं इस मामले में, मेरे शुभचिंतक हमेशा मौजूद रहे हैं। वैसे किसके नहीं होते शुभचिंतक? कभी कभी पहचान नहीं पाते हैं लोग बस्स।

    @

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  19. @ अदा जी:
    कोशिश तो यही रही है जी अभी तक कि बने रहें अपनी नजर में।

    @ सलिल जी:
    वैलकम बैक सलिल साहब। अपने तो फ़ैसले दिल की सुनकर ही होते हैं जी,और आज तक फ़ेल नहीं हुआ।

    @ दीपक सैनी:
    मिलाओ हाथ। देखी जायेगी वाले हमें तुम मिले हो देखा जायेगा वाले:)

    @ धीरू सिंह जी:
    सच है जी, इसी की बदौलत कैद कटती है बेरोजगारी की।

    @ अमित शर्मा:
    अमित, तुम्हारा अनुभव भी जानना चाहेंगे कभी, फ़िर अपनी राय देंगे।

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  20. @ गिरिजेश राव जी:
    अगली बार फ़िर वही हम होंगे जी, नॉन सीरियस टाईप:)

    @ अविनाश चन्द्र:
    ना राज्जा, शुक्रिया तो हम कहेंगे तुम्हें, सालिडेरिटी दिखाने के लिये।

    @ Anshumala ji:
    आप एकदम प्रैक्टिकल बात कहती हैं। शुक्रिया, आगाह करने के लिये। लेकिन सिक्स्थ सेंस मेरी नजर में बाकी पांचों इन्द्रियों से कहीं ज्यादा सेंसिटिव है सिग्नल्स पकड़ने में।

    @ Rahul Singh:
    हा हा हा, आपके मित्र भोपाल में मंत्री रहे हैं न सर?
    पेट्रोल तो यहाँ भी एक ही सवारी के लायक है वैसे:)

    @ अनामिका की सदायें:
    जो हमारा काम है, हम तो वही करते हैं। अभी तक तो धोखे दिये ही हैं जी, खाये नहीं।

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  21. संजय जी,

    असमन्जस में क्युं रहें हम,अपने व्यक्तित्व को पहचानें हम,यदि वह हर कीमत पर भलाई करने को ही तत्पर है तो जब जैसा अवसर आयेगा देखा जायेगा। पर सावधानी भी जरूरी है। और यदि हर कीमत पर सुरक्षित रहना ही हमारा व्यक्तित्व है,तो पूर्ण सावधान रहे। खाली-पीली लफ़डे में कायकू पडना।

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  22. "पहाड़ या रेगिस्तान"----लघु? "हाऊ रोमांटिक"
    "देखें क्या होता है"----देखी जायेगी।
    "वो बेचारी"----इसीलिये दे गई।
    "साथ ले आया"----बड़ी बात हुई।
    "लेकिन हम जैसे क्या करे?"---वही जो अब तक करते आये हैं।
    "सहज विश्वास करना चाहिये"---अंध विश्वास नहीं,आखिर हम जो करेंगे वही तो हमारे बच्चे सीखेंगे।
    "सामने वाला सच बोल रहा है या झूठ?"---खुद के पैमाने से ही नापना/मापना पड़ता है,दूसरे का काम नहीं आता।
    "जिस से जुदा होने का समय करीब आये, उसमें अच्छाईयां दिखने लगती हैं "--कभी-कभी तो जुदा होने के बाद...
    सवालों का ढेर---थोड़ा कम करने की कोशिश की है...छोड़ दिया...
    ...खैर देखी जायेगी...

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  23. पिताजी ने हमेशा कहा, "सच्चे को कैसा डर?" पिछले हफ्ते मैने ज़िन्दगी में हारे मुकदमों की बात याद दिलायी तो कहने लगे, "हम क्यों शिकवा करें जब हम सही थे, गलती तो जज की थी।" पहली बार नौकरी करने निकला। प्रबन्धक महोदय ने बिठा लिया और लगे साक्षात्कार करने। उनकी एक सलाह हमेशा याद रहती है - बैंकिंग ऐसा व्यवसाय है जो भरोसे के बिना नहीं चल सकता मगर जिसमें किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। बीस साल बाद अपने से 15 साल बडे एक मित्र बने, उन्होने कहा भला होना उन्हीं के बस की बात है जिनमें चोट खाकर खडे होने की ताकत हो। कुछ बातें अपने अनुभव से भी सीखीं मगर सौ बात की एक बात कि -
    कोई हर रोज़ मरता है शहादत कोई पाता है

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  24. ... अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम दोनों विकल्पों में से क्या चुनते हैं।

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  25. @ सम्वेदना के स्वर:
    आपकी बात पर मुझे भी याद आया, मेरा एक कुलीग दिल्ली में सड़क पार करते समय बहुत दिक्कत महसूस करता था और स्टाफ़ के लोग इस बात के लिये बहुत मजाक उड़ाते थे उसका, लेकिन वजह? बताता हूँ कभी सारी बात।
    ये गाना लगा चुका हूँ,पसंद है और यकीन भी है दिल की आवाज पर।

    @ राजेश उत्साही जी:
    सही कहा राजेश जी, धन्यवाद।

    @ Anand Rathore:
    quite positive thinking, just as one can expect from a person like you. Thanx.

    @ सुज्ञ ही:
    स्वागत है श्रीमान, यही पहचान का तो असमंजस है। राय देने का शुक्रिया।

    @ अर्चना जी:
    कहानी है जी बाबा भारती और डाकू खड्ग सिंह की, Awaaj पर शायद उपलब्ध भी है।

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  26. सहायता करना हृदय का मूल गुण है, जब तक धोखे की चोट नहीं पड़ती है। बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  27. सुंदर आलेख।
    ..राह चलते किसा को बाईक रोक कर खुद ही बिठा लेना चाहिए..कोई रोके ते सोच-समझ कर रूकना चाहिए।

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  28. सुज्ञ जी और देवेन्द्र पाण्डेय जी की बात भी क़ाबिले-ग़ौर हैं।

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  29. @ मो सम कौन ? जी ,
    शिष्टाचार और ज़ोखिम की सहयात्रा का अनुमान सही है पर मैं एक शिष्टाचार के लिये सौ ज़ोखिम उठाना पसन्द करूंगा ! क्या पता लिफ्ट मांगने वाले को फौरी मदद ज़रुरी हो ?
    और ज़ोखिम का क्या ? वो तो सीना तान कर भी आ सकता है फिर लिफ्ट देने ना देने की आपकी इच्छा से क्या फर्क पडता है :)

    @ राहुल सिंह जी,

    :)

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  30. बधाई हो संजय जी आप की पोस्ट चिट्ठा जगत के पहले पायदान पर है अब ये ना कहियेगा की कोई फर्क नहीं पड़ता है :-)

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  31. @अब ये ना कहियेगा की कोई फर्क नहीं पड़ता है :-)
    फर्क़ दिखना शुरू हो गया है, बधाई!

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  32. इंसान को अपना कर्म करते रहना चहिये. यकीनन अक्ल के इस्तेमाल के साथ.

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  33. भाई जी, आज तो हमारे मन की उड़ेल दी. .... बस यही बात...

    दूसरी जो याद आ गयी....
    पिछले महीने की बात है.... प्रेस में रात के बारह बज गए. मैंने अपने फिल्ड बॉय को बोला की स्टाफ के २ लड़कों को घर छोड़ आये.... और मैं बहार मैं रोड पर उसका इन्तेज़ार करने लगा... पता नहीं जो कार सामने से आ रही थी उसके ड्राइवर से नज़र मिल गई... और मेरे बिना किसी इशारे के वो थोडा आगे जा रुक गया... २-३ मिनट के बाद गाडी बेक लाया और मुझे बोला "बोस लिफ्ट चाहिए तो...."
    मैंने बहुत आभार से उसे बोला की अपने बंदे की वेट कर रहा था.. अत आप जाईये और हाँ, कोई आगे मुसीबत का मारा मिले तो उसे लिफ्ट जरूर दे देना..."

    इंसानियत आज भी जिन्दा है.......
    कुछ बही हो जाए.... हमें नहीं बदलना...

    माफ करना... पोस्ट से हट कर काफी बक गया.

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  34. दो-तीन बार ऐसे ही अजनबियों पर विश्वास करके धोखे खाये जी, अब सावधान रहता हूँ।
    हालांकि पिताजी कहते है कि बेटा इस दुनिया में विश्वास नाम की कोई चीज नही है, ये शब्द भ्रम है।

    प्रणाम

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  35. सर जी आप तो जरूरत से ज्यादा ही शरीफ आदमी लगते हो।
    (माफ करना मजाक करने की आदत है)

    मेरे ख्याल से किसी पर ऐसे ही विश्वास नही किया सकता और खासकर
    हमारे इलाके मे तो बाईस लूटने की वारदात रोज का काम है

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  36. "शिक्षा म्यान है और डिग्री तलवार जो बेरोजगारी रूपी कैद को काटने के काम आती है..."
    वाह क्या कमाल की बात कह दी है आपने...गज़ब.
    आपको मोटर साईकिल के पीछे बिठाने के लिए लोग मना करते हैं, हमारे साथ कर में बैठने से लोग डरा करते थे...दिल्ली से जयपुर हर हफ्ते अकेले अपनी कार से घर जाया करता था...रास्ते में जयपुर की बस की इन्तेज़ार में खड़े लोगों से विनती करता था के कोई मेरे साथ चल पड़े सिर्फ कंपनी के लिए बिलकुल मुफ्त तो भी कोई हिम्मत करके कोई आगे नहीं आता था और मैं भुनभुनाता हुआ अकेल ही चल पड़ता था...लोगों को एक दूसरे पर से एतबार उठ गया है...सब अकेले हो गए हैं...डरे हुए लोग...

    नीरज

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  37. जो कर रहे है अच्छा कर रहे है तो जो होगा वो भी अच्छा ही होगा।

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  38. कई बार गुजरते हैं हम लोंग ऐसी स्थितियों में जहाँ पुराने गुरुओं के सिखाये आदर्श और आज के समय को लेकर असमंजस की स्थिति हो जाती है ...आजकल के गुरु स्मार्ट हैं बच्चों को ऐसी शिक्षा देते ही नहीं कि वे कंफ्यूज रहे :)

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  39. पैण्ड पैण्ड बटमार
    हर भोले के लिये बचना कठिन है
    1. ब्लाग4वार्ता :83 लिंक्स
    2. मिसफ़िट पर बेडरूम
    3. प्रेम दिवस पर सबसे ज़रूरी बात प्रेम ही संसार की नींव है
    लिंक न खुलें तो सूचना पर अंकित ब्लाग के नाम पर क्लिक कीजिये

    उत्तर देंहटाएं
  40. @ स्मार्ट इंडियन:
    सरजी, नजरिया बड़ी बात है। सही विकल्प का भी कोई विकल्प होता है क्या? पढ़ा था कहीं एक बार कि 'ships are safe in harbour, but that is not they are made for'.

    @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    धन्यवाद, अभी तक धोखे का अनुभव नहीं है। जब होगा, देखी जायेगी।

    @ देवेन्द्र पाण्डेय:
    सबसे प्रैक्टिकल बात, भेड़ को तो बाल उतरवाने ही हैं तो क्यों न अपनी च्वाएस की जगह उतरवा ले।

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  41. @ अली साहब:
    आपके दोनों @ से सहमत हूँ जी।

    @ Anshumala ji & Smart Indian Ji:
    बहुत पहले टीवी पर एक सरकारी विज्ञापन आया करता था, सड़क सुरक्षा पर। अलग अलग रोल में आये एक व्यक्ति को हैलमेट पहनने के लिये प्रेरित किया जाता था, और वो हर बार अलग अंदाज में कहता था, "की फ़रक पैंदा है?" लास्ट में दीवार में उसकी तस्वीर टंगी रहती है फ़ूलमाला वाली, और बड़ी मायूसी से वो कहता है "फ़रक तां पैंदा है जी।"
    फ़रक पड़ता है जी, जब आपपर विश्वास करने वालों का विश्वास आप सही साबित कर पायें।
    वैसे क्या फ़र्क पड़ा है जी, बतायेंगे? नोबेल, बुकर नहीं तो ज्ञानपीठ के लिये तो नामित हो ही जाऊँगा, है न?:))
    कोई फ़रक नहीं पैंदा जी।


    @ मासूम जी:
    सही कहा मासूम जी।

    @ दीपक बाबा:
    ऐसी बकबक ही मांगता है बाबाजी अपुन को।

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  42. @ अन्तर सोहिल:
    अमित, एक बार बाईक पर(as pilliorider), दो बार कार में सवारी के दौरान और एक बार ट्रेन से धोखा खाया है लेकिन दोस्त अब भी इनपर सवारी करता हूँ मैं तो। सजीव निर्जीव की बात करोगे तो गलती हर बार सजीव हिस्से की थी।

    @ ज्योति:
    स्वागत है आपका। सही पहचाना है आपने। मेरी शराफ़त के झंडे गड़े हुये हैं जी यहाँ पर। आने वाले समय में लोग बाग कसमें खाया करेंगे मेरी शराफ़त की। आदत है न आपकी मजाक करने की, इसलिये माफ़ कर दिया।

    @ नीरज गोस्वामी जी:
    ओ नीरज बाऊजी,लोगों का कसूर नहीं है जी। किसी कवि, शायर से तो हम भी लिफ़्ट न लें कभी। डरते हैं सारे रास्ते दाद देनी पड़ेगी, हा हा हा।
    @ वन्दना जी:
    धन्यवाद आपका।

    @ गिरीश बिल्लोरे जी:
    स्वागत है फ़िटफ़िट भैया, तो क्या चौरासी से बच गये हम?:)

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  43. "हार की जीत" ये कहानी हमारी हिंदी की किताब में थी. जब पढ़ी थी तब भी और आज भी मुझे बाबा भारती के चरित्र से हमदर्दी रही और मैंने उस कथा और दूसरी सामयिक घटनाओं से ये सीख ली की सीधा और सच्चा होने का ये अर्थ कतई नहीं की आप किसी भी राह चलते पर विश्वास कर लें.

    दूसरों की तो मैं नहीं कहता पर जब भी कोई अनजाना व्यक्ति मुझसे सहायता की गुहार लगता है तो मैं उसकी जगह पर खुद को रख कर ये सोचता हूँ की उसकी जगह मैं खुद होता तो क्या मैं भी किसी भी अनजान से ऐसी ही सहायता मांगता और अगर मुझे उसकी पुकार सच्ची लगती है तभी उस अनजान की सहायता करता हूँ.

    हाँ हो सकता है की इस कशमकश में कुछ जगहों पर मैं चूक जाऊ पर कहते हैं ना इलाज से परहेज अच्छा....

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  44. संजय जी

    यही सवाल आप ने तब मुझसे किया था जब मेरी पोस्ट पहले पायदान पर थी मैंने कुछ नहीं कहा था तब जानती थी की जल्द ही आप भी पहले पायदान पर आने वाले है तब खुद ब खुद आप को पता चल जायेगा की "की फरक पैंदा" है | फर्क उनको पड़ता होगा जो सिर्फ टिप्पणियों के लिए ही लिखते और पढ़ते है | "बहुत अच्छा लिखा ' वाली टिप्पणिया दे आते है और वैसी ही टिप्पणिया गिन कर पा जाते है | हम और आप जैसो को कोई फरक नहीं पैंदा जी | :-)

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  45. हम जैसे क्‍या करें? बस आजकल यही प्रश्‍न हमेशा छाया रहता है। दुनिया वास्‍तव में बदल गयी है। लोग कहते हैं कि किसी पर विश्‍वास मत करो और मन कहता है कि सभी पर विश्‍वास करो। हमने तो यह समझ लिया है कि हम बदल तो सकते नहीं इसलिए जैसे हम हैं बस वैसे ही चलेंगे, यदि धोका खा गए तो क्‍या कर सकते हैं? अच्‍छा आलेख है।

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  46. "ट्रेंड के हिसाब से तो अगला मुकाम कोई रेगिस्तान या पहाड़ लगता है, जहाँ चारों तरफ़ वीराना पसरा हो।"
    अजी हमसे पूछिए .. एक भू वैज्ञानिक को कहाँ कहाँ नहीं घूमना पड़ता है ...

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  47. बाबा भारती वाली कहानी बहुत पसंद है मुझे. खासकर वो लाइन... 'किसी से कहना मत'. बाकी आपका उल्टा सफ़र आगे कहाँ ले जाता है देखते हैं. :) कभी अगले सिग्नल से लौटकर लिफ्ट दीजिये बहुत मजा आएगा. कई बार निकलते हुए लोग छूट जाते हैं... वैसे आपके गाँव में सिग्नल तो होंगे नहीं.

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