सोमवार, दिसंबर 13, 2010

नाम से क्या लेना, काम देखो यारों...

नाम में क्या रखा है, इस बारे में अलग अलग पोस्ट आ चुके हैं। इस विषय पर हमने यह अनुभव किया है कि  नाम में कुछ रखा है या नहीं, ये सब निर्भर करता है उस समय के हमारे ऑन-मोड पर। विद्युत सप्लाई के जैसे ए.सी\डी.सी. दो मोड होते हैं, हमारे इसी तरह के दस बीस पचास मोड हैं। जो स्विच चालू है, हमारे फ़ैसले उसी आधार पर होते हैं। जब अपना देशी मोड चालू होता है, उस समय हम काका हाथरसी से सहमत होते हैं और  जिस समय ग्लोबल मोड काम कर रहा हो,  उस समय शेक्सपीयर जी को ऑब्लाईज कर देते हैं। लो जी, तुसी हो जाओ खुश, साड्डा की है?   यू सैड इट वैरी रैटली – वाट्स देयर इन अ नेम।

शीला-मुन्नी  से शुरू हुई बातों पर   तर्क वगैरह तो बहुत देख लिये, हम तो आपको एक दो वाकये बताते हैं, नाम से संबंधित। एक हमारे अधिकारी हुआ करते थे – सिंघल साहब, निहायत ही शरीफ़, ईमानदार, कर्मठ अलाना फ़लाना। अब भाई लोगों, ये अलाना फ़लाना को लेकर इशू मत बना देना, ये पता नहीं कैसे आजकल हमारा तकिया कलाम बन गया है, हर जगह अपने नाम के साथ चेप देते हैं कि हम बड़े अलाना फ़लाना हैं।  तो हमारे सिंघल साहब सब मानवीय गुणों से भरपूर थे, लेकिन कुछ घटनायें उनके साथ ऐसी घट जाती थीं कि पूछिये मत।  ये तो भगवान भला करे,  प्रियदर्शन जैसों ने सिच्युएशनल कामेडी की थोड़ी सी आदत डाल दी, न तो हमारी बातें बिल्कुल ही  बेसिरपैर की मान ली जातीं।

एक दिन एक बुजुर्ग बैंक में आये, साथ में एक महिला थी जो उनकी पुत्री थी। आकर बोले कि इसका खाता खोलना है। हमारे सीनियर बोले, “हां  बोल, नाम के सै बेबे का(हरियाणा में बेबे = बहन\बेटी के लिये आदरसूचक शब्द)।
बाबा,    :     ”जी, नाम सै इसका गदरो।”
सिंघल जी: “आयं, गदरो? यो के नाम होया भला?”
बाबा,    :   “जी, जद गदर होया था तब होई थी ये, इस खातिर नाम गदरो सै।”
सिंघल जी:  “ओ बाबा, गदर कद होया था?”
बाबा,    :     “जी, जद यो होई थी, तब होया था।”
और उसका खाता इसी नाम से खोला गया।

ऐसे ही एक बार एक और बंदा आया। साहब ने उससे पूछा, “हां, नाम बता।”
वो बोला,          “जी, बाणिया।”
सिंघल जी:       “आयं, बाणिया? भाई बाणिया क्यूंकर लिखावे सै?”
वो बोला,          “जी, बाणिया ही सूं मैं।”
सिंघल जी:       “रै, बाणिया तो मैं भी सूँ। नाम बता।”
वो बोला,          “जी,  मन्नै तो सारे बाणिया ही कहके बुलावे सैं।”
सिंघल जी:      “अचछा, जिस नाम से नहीं बुलावे हैं, वा बता।”
वो बोला,         “जी, सुरेश।”
सिंघल जी:     “हां, इब ठीक सै।” और फ़िर मेरी तरफ़ देखकर कहने लगे, “देख्या, पूछ लिया न सही नाम?”

कई साल पहले सिख धर्म के एक प्रकांड विद्वान का एक लेख पढ़ा था, जिसमें उन्होंने दशम गुरू श्री गोबिंद सिंह जी का तत्कालीन समाज पर प्रभाव का जिक्र करते हुये एक तथ्य बताया था कि उस काल में  फ़कीरा, घसीटा, गरीबा जैसे नाम बहुत प्रचलन में थे और देश, कौम में जिन्दादिली भरने के लिये उन्होंने अपने अनुयाईयों को दिलेर सिंह, नाहर सिंह, बलवान सिंह जैसे ओजपूर्ण नाम देने शुरू कर दिये थे। उनका अपना व्यक्तित्व, करनी, उद्देश्य बिना शक प्रेरणा के सबसे बड़े कारक थे, लेकिन इस नाम परिवर्तन की मुहिम का भी लोगों में उत्साहवर्धन करने में, आत्मबल बढ़ाने में बहुत योगदान था। इतिहास गवाह है कि मुट्ठी भर खालसाओं की फ़ौज क्या कुछ कर गुजरी थी।

उदय प्रकाश जी की कहानी ’वारेन हेस्टिंग्ज़ का सांड’ में वारेन बहुत हैरानी से अपनी डायरी में लिखते हैं, “कितनी हैरानी की बात है कि भारत में गाय भैंस तक का एक प्रॉपर नाऊन होता है और जब उनका मालिक या चरवाहा गौरी, श्यामा या कजरी या ऐसे ही किसी नाम से किसी गाय को बुलाता है तो झुंड में से वही गाय निकलकर बाहर आ जाती है।

समय बदलता गया और आज के समय में नाम में ही नहीं, स्पेलिंग में भी बहुत कुछ रखा है। कितने ही प्रात:स्मरणीय\रात्रिस्मरणीय प्रोड्यूसर\प्रोड्यूसराओं को अपनी क्रियेशन्स का नाम कितना ही तोड़ना मरोड़ना पड़े, लेकिन आरंभ करते हैं किसी खास अक्षर से। तो जी अंत में तय यह हुआ कि धरती गोल है, हम जहाँ से चले थे अभी भी वहीं के वहीं हैं। जिसे जैसा लगे, वैसा माने – हमारे भरोसे न रहे कोई कि हम कोई हल बतायेंगे। हम तो खुद ही कन्फ़यूज़्ड हैं।

छेड़ाखानी करने वाले तो सही मायने में धुन के पक्के होते हैं।  आज  शीला मुन्नी जैसे नामों को लेकर छेड़ाखानी कर रहे हैं,  ये सब न होता तो भी उन्होंने किसी और बहाने से यही काम करना था। सबके अपने अपने संस्कार हैं। अपने हाथ में अगर कुछ है तो, खुद को नियंत्रण में रखने की कोशिश करना। हम खुद को और अपने आसपास वालों को समझा सकें कि आजादी और उच्छृंखलता में अंतर है,  तो उससे अच्छा समाधान कोई नहीं।

:) फ़त्तू ऑन जॉब -
कंगाली के दौरान फ़त्तू एक सेठ के यहाँ नौकरी पर लगा। पहला ही दिन था। जाड़ा जोरों पर था, ग्राहक घरों के भीतर दुबके बैठे थे । ऐसे में  कोई पेमेंट लेने वाला आया तो सेठजी बोले, “भाई, फ़िर ले जाईयो, आज तो मौसम ने ईसी-तीसी करवा राखी सै।” दूसरा बंदा आया तो उसे भी यही जवाब, ठीकरा मौसम के सर। अब फ़त्तू को बहुत बुरा लग रहा था, बेकार में दूसरे को क्यों बदनाम कर रहा है सेठ, लेकिन बेचारा करता भी क्या?  फ़िर से कोई व्यापारी अपने पैसे लेने आया तो सेठजी ने वही डायलाग दोहराते हुये अबकी बार फ़त्तू से कहा, “रे, बाहर चक्कर तो काट के आ जरा, देख तो बाकियों का के हाल सै? आड़े तो मौसम ने ईसी तीसी करवा राखी सै।”  फ़त्तू के मौका थ्या गया, भागकर बाहर गया और दौड़ता हुआ वापिस आया, चमकते दमकते मुख से बोला, “सेठ जी, मौसम ने  एकल्ले  आप की ही नहीं, सारी मार्किट की ईसी-तीसी कर राखी सै।”

46 टिप्‍पणियां:

  1. हे हे हे हे……… खूब कही सर जी। और फ़त्तू तो फिर फ़त्तू ही है…… हमेशा की तरह लाजवाब।


    गीत के लिये विशेष नमन… मेरे दिल के कुछ बेहद करीबी गीतों में है ये… :)

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  2. अजी एसी बात कोन्नी है...नाम को बहुत असर होवे है...
    अब जैसे थारा नाम थारे को मलूम है जी ...संजय ...अब देखन वाली बात ई है कि समूचे ब्लाग-जगत मा कोई है ऐसा...आँख को चोखो....आप तो जी अपने नाम को चरितार्थ करे हो और एसी एसी बात बतावे हो कि म्हारी सात पुस्त तक याद रखेगी अब...जाने कोन-कोन चीज़ और कहाँ-कहाँ देख के आवे हो और म्हारे जैसे धृतराष्ट्रों को बाइस्कोप दिखावे हो...आँखों देखा हाल अपनी लेखनी से बतावे हो...है न जी नाम का असर...और वो जो गदरो थी, कितना ग़दर मचावे होवेगी...ई तो उसके घरवाले ही बता सकवे हैं जी....
    बाक़ी गाना तो जी मन्ने ना भाया ..ई रोवन-पीटन वाले गीत हमसे हज़म ना होवे हैं जी...
    बस अब फत्तू मियाँ को जी एक दिन फटकार लगानी ही होवेगी...हाथ से निकला जा रहवे है...:):)
    मन्ने माफ़ करना जी, अगर कोई भूल-चूक हो गई होवे तो...
    हाँ नहीं तो..!!

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  3. @अदा जी, की टिप्पणी देने की "अदा" भा गई...
    वैसे नाम में कुछ नहीं रखा..काम से ही सब जाने जाते हैं...
    अब "संजय" और "धॄतराष्ट्र" को ही ले ले>---कुछ काम करा तभी तो....हा हा हा
    सालों बाद ये गीत फ़िर सुना...शुक्रिया ..याद दिलाने का....

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  4. चाहे नाम गदरो रख लिया जाये तो भी गदर नहीं होने वाली। सीधे साधे नामों पर गदर मची है।

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  5. ईसी तीसी, चार सौ बीसी, बेताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी... - काफी मैथमैटिकल भासा लग रही है।

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  6. मज़ा आ गया हरियाणवी नामों की महिमा जानकार ...बानिया और गदरो दोनों ही मन पर छा गए हैं , आज इनको साथ लेकर जाऊंगा !..

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  7. आप की गदारो की तरह मुंबई में २६/११ को घटना वाले अस्पताल में जन्म लेने वाली बच्ची का नाम गोली रख दिया गया | कुछ और वास्तविक नाम सुनिये छेदी, पनरुवा ( हमारे यहाँ नाली को पनारा भी कहते है ) घिसु ,लल्लू नाम सुन कर ही आदमी की इमेज पहले ही मन में बन जाती है लगता है घरवालो ने क्या सोच कर नाम रखा है | पंडित जी लोगों का असर तो आज कल पूछिये नहीं मेरे कजन को अविप्रभात से अविनाश बना दिया गया माँ बाप के आगे बेचारा कुछ कर नहीं सका | नाम के पीछे यदि अम्बानी ,टाटा .गाँधी है तो नाम में भी कुछ है नहीं तो कालिदास ने ठीक ही लिखा है की नाम में क्या रखा है |

    फत्तू इस बार तो मौसमे ने मुंबई में भी सबकी ईसी-तीसी कर राखी सै।”

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  8. इस नव्य नवेली दुलहन के घुघट उठ गये,जेठ और ससुर घर से बाहर चले गये है या अब उनका डर नहीं रहा :))))

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  9. naam to aise hi pad jaate hain ji...ek baccha jo shayad srilanka mein, us waqt paida hua tha jab wahan tsunami aaya tha...uska naam bhi to Tsunami hi rakh diya tha...

    ab apne fattu ko hi le leejiye, kitna badhiya naam rakha hai, par mera hindi font kaam nahin kar raha, aur angrezi mein ye naam likne se pehle sochna padta hai...use kehna maaf kare :)

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  10. पहले कभी एक गाना शालू के नाम पर आया था। अब वो बडा अच्छा लगता है।

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  11. आप सही कह रहे हैं कि आपका जैसा मूड होता है, वैसी ही रचना पढने का मन करता है। नाम में वाकयी में बहुत कुछ रखा है, जैसा नाम होता है व्‍यक्ति में वैसे गुण भी आ जाते हैं। अच्‍छी पोस्‍ट। मौसम ने तो यहाँ भी ऐसी की तैसी कर रखी है।

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  12. सही कही फत्तू की भी. जब मौसम ऐसी-तैसी करता है तो सबकी एकसाथ ही करता है.

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  13. @ संजय जी , विचारणीय पोस्ट। वैसे देखा जाय तो नाम की शान रखने के लिये तलवारेँ भी खिच जाती हैँ। फत्तू का जबाब हमेशा काबिले तारीफ रहता हैँ।
    .
    मेरे ब्लाग पर " हम सबके नाम एक शहीद की कविता "

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  14. सिंघल साहब ने गदरो का पता भी तो पूछा था, बाबा ने बताया टॉकीज के सामने, साहब ने पूछा- और टॉकीज, जवाब मिला- घर के सामने, ये दोनों कहां, आमने-सामने.(जोक तो पुराना है, लेकिन मौजूं हो रहा है, इसलिए याद दिलाया)

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  15. नाम पुराण का अपना ही एक इतिहास और महत्व है। सरल शब्दों मे हंसी मे पुरान रोचक लगा। धन्यवाद।

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  16. मियां आपने बात छेड़ी है इसलिए बता रिया हूं कि मैंने भी अपने नाम पुराण पर एक पोस्‍ट गुल्‍लक में लिखी थी। लिंक नहीं दे रहा हूं। इच्‍छा हो तो ढूंढकर पढ़ लेना।
    *
    बस सब नाम का ही तो चर्चा है। बाकी सब तो केवल खर्चा है।

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  17. भाई हमारे गुरु काका हाथरसी ने भी एक कविता लिखी थी
    " नाम बड़े और दर्शन छोटे" भोत मजे की कविता थी जिसमें नाम और उसका खूब मजाक बनाया गया था...जैसे एक पंक्ति थी " ज्ञान चंद छै बार फेल हो गए टेंथ में" एक थी " नल पे नहाती गोमती गोदावरी गंगा" एक और याद आगि " ठाकुर शेर सिंह पे कुत्ते भौंक रहे हैं".

    पोस्ट पढते पढते हँसते हँसते दोहरा हो गया ....


    नीरज

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  18. के नाम सै थारो
    जी, शेर सिंह,

    बाप को नाम
    जी, शमशेर सिंह,

    किद रव्हे सै
    शेरां वाली गली में,

    इधर क्यूंकर खड़ा सै
    जी, सामने कुत्ता दीखता .... जाने की हिम्मत न पड़ रही.......

    वाकई, नाम की महिमा...

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  19. वाह, मजा आ गया| गदरो और जिस नाम नहीं बुलाते वाली बात खूब जमी|
    घुघूती बासूती

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  20. @"हम खुद को और अपने आसपास वालों को समझा सकें कि आजादी और उच्छृंखलता में अंतर है, तो उससे अच्छा समाधान कोई नहीं।"

    एक छोटा सा जुमला है अंग्रेज़ी में, किसकी ईज़ाद है ये नहीं पता, पर इस बात के लिए वही इस्तेमाल करूँगा... "That was awesomely awesome and happily there is no charge for awesomeness" :)

    इसके अलावा 'बाणिया', 'गदरो', 'सिंघल जी', 'फत्तू', 'अलाना-फलाना बन्धु' सब एकल्ले भी और साथ में भी पसंद आए.

    आभार.

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  21. @ भारतीय नागरिक:
    :)

    @ रवि शंकर:
    शुक्रिया रवि, फ़त्तू पसंद आया और गाना भी - यानि कि तुम भी दिमाग की जगह दिल की ज्यादा सुनते हो।

    @ अदा जी:
    काहे जुलुम करती हैं जी? आप भूल-चूक नहीं कर सकतीं और हम कहाँ से माफ़ी देने लायक हो गये? हाँ नहीं तो..!!
    हम तो आभार दे सकते हैं, कुबूल कर लीजिये।

    @ अर्चना जी:
    मैं जानता हूँ कि मेरी पोस्ट से अच्छी मुझे मिली टिप्पणियाँ होती हैं, आपकी टिप्पणी खुद इस बात की तसदीक करती है। आभार।

    @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    प्रवीण जी, सच है कि सीधे ही गदर झेलते हैं।

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  22. @ स्मार्ट इंडियन सरजी:
    जब आसा-निरासा में डोल रहे हों तो हमारी भासा का तमासा बन ही जाता है जी। आप तो साबास कह दिया करो, फ़िर देखी जायेगी।

    @ सतीश सक्सेना जी:
    बड़े भाई, आपके दिल-ओ-दिमाग पर वैसे ही बहुत जोर है आजकल, देखियेगा कहीं ये और परेशान न करें आपको।

    @ अंशुमाला जी:
    ये बहुत बड़ा सब्जैक्ट है, आपने और समृद्ध कर दिया, धन्यवाद।
    घूंघट पर अकबर एलाहाबादी साहब का शेर याद कर लीजिये - बेपर्दा नज़र आईं जो चंद बीबियाँ......। हम मर्द मरदुओं की अक्ल पर घूंघट पड़ गया है जी।

    @ saanjh:
    फ़त्तू तो आपका आभार मान रहा है, आप माफ़ी की बात करती हैं:)

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  23. @ नीरज जाट:
    तो प्यारे, घुमक्कड़ी अब सैकंड प्रायोरिटी होने वाली है, ये शालू(वाले गाने) के चक्कर में:)

    @ अजीत गुप्ता जी:
    अपने साथ मैडम इसका उलट भी होता है, जैसा पढ़ते हैं कभी कभी मूड वैसा हो जाता है।

    @ काजल कुमार जी:
    काजल भाई, आप पिछली बार फ़त्तू के हाल पर अफ़सोस कर रहे थे, और मैंने कहा था कि कमबैक करेगा। सबको एक नजर से देखता है वो बदमाश।

    @ उपेन्द्र:
    उपेन्द्र जी, किसी बात पर तलवारें खिंचना भी अच्छा ही लगता है, वरना तो सिर्फ़ नूरा कुश्ती का ही जमाना है।
    आपके कमेंट से पहले ही आपके ब्लॉग पर हाजिरी लगा दी है, बहुत सही विषय पर मार्मिक कविता लेखी है आपने, आभार।

    @ राहुल सिंह जी:
    राहुल सर, याद दिलाने के लिये शुक्रिया। पुराना तो ज्यादा पुख्ता होता है जी, मौजू भी - हम तो पहले से मानते हैं।

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  24. @ निर्मला कपिला जी:
    मैडम, आपका शुक्रिया।

    @ राजेश उत्साही:
    राजेश जी, जरूर इच्छा है और जरूर खींचेंगे गुल्लक में से:)

    @ नीरज गोस्वामी जी:
    मैरिज एनीवर्सरी वाले दिन भी हँस रहे हो, बहुत हिम्मत वाले हो नीरज साहब:)
    आज पामोलिव दा जवाब नहीं वाला डायलाग आपके और भाभीजी के लिये। पुन: बधाई और शुभकामनायें।

    @ दीपक बाबा:
    वाह, ये मारा दहला(अट्ठे पर):)

    @ Mired Mirage:
    अभयदान के लिये शुक्रिया घुघूति मैडम - मैं तो डर रहा था कि एक सीरियस मुद्दे को ऐसे बचकाने अंदाज में पेश करने पर प्रताड़ना मिलेगी:)

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  25. संजय बाउजी!
    पोस्ट के बारे में कुछ नहीं कहने वाला..क्योंकि इसपर दो पोस्ट लिख चूका हूँ और दोनों पर (अभी कनफर्म कर लिया) आपके कमेन्ट दर्ज हैं..इसलिए याद दिलाने की भी ज़रूरत नहीं..ख्याल टकराने लगे हैं आजकल!
    हाँ बहुत बढ़िया लगा तो कहना ही होगा, जब इतने लोगों ने कहा है तो हम क्यों न कहें.
    फत्तु का पहला दिन बहुत अच्छा रहा, जल्दी सीख गया गुर... और गाना मीठा!!!

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  26. नाम में कुछ नहीं रखा .. फिर भी नाम से बहुत कुछ होता है .. बढिया !!

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  27. अलाना फ़लाना की जगह हमारे यहा फ़लाना ढकाना चलता है . मै तो गदरो को गदराया हुआ समझ रहा था यहा तो गदर निकला

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  28. @ Avinash Chandra:
    बहुत बड़ा रिस्क ले रहे हो कविवर, ऐसे किस्से पसंद आते हैं तो पका दूंगा सुनाकर और पढ़वाकर:) @ awesome - I agree in toto, the evidence of this saying is your blog, we have been enopying your awesome blog without any charge. Thankx dearest.

    @ चला बिहारी......:
    आपकी पोस्ट और उसपर कमेंट - पता नहीं कौन सा मोड ऑन था जी उस समय?
    ख्याल टकराने लगे हैं, कंप्टलेंट है सरजी या काम्प्लीमेंट?
    लगता है आपके गुरुदेव तक गुहार लगानी ही पड़ेगी हमें:)
    ये जरूर छ्पेगा।

    @ संगीता पुरी जी:
    आभार संगीता मैडम आपका।

    @ धीरू सिंह जी:
    शब्दों पे मत जाओ बरेली नरेश, भाव देखो।
    गदरो, गदराया और गदर - जाकी रही भावना जैसी...:)

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  29. नाम में बहुत कुछ रखा है इस बात से तो मैं भी सहमत हूँ पर शीला और मुन्नी को लेकर जो शिकायतें सामने आयीं हैं वो भी तिल का ताड़ बनाने वाली बातें लगती हैं. खैर जो भी हो, आपने दो अजीब से नाम बताये तो मैं आपको दो एकदम नयी और विचित्र सी जातियां यानि की surnames जो मैंने सुने हैं, बताता हूँ. क्या आप किसी Mr & Mrs Bhoot से मिले हैं या कभी आपने डॉ. Chutia से अपना इलाज कराया है. शायद नहीं पर मैं इस प्रकार के surnames रखने वाले लोगों से मिला हूँ. क्यों हैं ना अजीब जातियां.. और ये सच में हैं.

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  30. संजय जी ,
    छेदा लाल अपने नाम के छेद से परेशान होकर मुसलमान बन गए. वहाँ नाम मिला- सुराख़ अली ! जब पता चला कि सुराख़ का अर्थ भी छेद है तो नाराज़ होकर सरदार बन गए. नाम मिला-- मोरी सिंह !
    थोड़े दिनों में किसी ने बताया मोरी का मतलब भी छेद ही होता है तो क्रिश्चियन हो गए . वहाँ भी छेद ने पीछा नहीं छोड़ा , पादरी ने नाम धरा- विलियम होल.
    इस पर भी आप कहते हो नाम में क्या धरा है! किसी छेदालाल से पूछ कर देखो.

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  31. sach hai naam me sab kuchh nahin to bahut kuchh to hai hi... hamesha ki si rochak post laage sai.

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  32. आपकी पोस्ट की रचनात्मक सौम्यता को देखते हुए इसे आज के चर्चा मंमच पर सजाया गया है!
    http://charchamanch.uchcharan.com/2010/12/369.html

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  33. वाह...आनंद आ गया...

    लाजवाब पोस्ट और गीत तो... वाह... वाह... वाह !!!!

    ढेर ढेर थैंक्स जी...

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  34. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति.........मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ जिस पर हर गुरुवार को रचना प्रकाशित साथ ही मेरी कविता हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" at www.hindisahityamanch.com पर प्रकाशित..........आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे..धन्यवाद

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  35. @ विचारशून्य:
    बन्धु, मुद्दा भी तो चाहिये न कुछ!
    भूत सरनेम बंगाल में बहुत अप्रचलित नहीं है।
    डा. साहेब का सरनेम भी जरूर ऐसा ही रहा होगा, मान लिया।

    @ prkant:
    कभी मुलाकात हुई तो छेदा लाल की कथा श्रवण-पाठन करेंगे, प्रोफ़ैसर साहब:)

    @ दीपक मशाल:
    बहुत दिनों के बाद पधारे प्रभु, सब सकुशल है ऐसी आशा करता हूं।

    @ डा. रूपचन्द्र शास्त्री ’मयंक’:
    शास्त्री जी, आभारी हूँ आपका।

    @ रंजना जी:
    कमेंट देखकर आपके ब्लॉग का चक्कर लगाकर आया हूँ। अगर आपको यह पोस्ट पढ़कर आनंद आया तो फ़िर मुझे आपकी ताजी पोस्ट पढ़कर जो आया, उसे महाआनंद तो कहते ही होंगे। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  36. आज शीला मुन्नी जैसे नामों को लेकर छेड़ाखानी कर रहे हैं, ये सब न होता तो भी उन्होंने किसी और बहाने से यही काम करना था। सबके अपने अपने संस्कार हैं।

    सटीक और सार्थक बात ..नाम में तो बहुत कुछ है ..पहचान है ...पर एक ही नाम बहुत लोगों के होते हैं ....गानों में आयेंगे तो क्या कर लीजियेगा ....बढ़िया पोस्ट .

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  37. halkee pulkee lagne walee post gahraee liye hai..........
    wah kya baat hai........
    aur Ada jee kee to comment dene kee ada bhee niralee haiaur ruchikar bhee.........

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  38. संजय जी
    वाह वाऽह वाऽऽह !

    मज़ा आ गया ।
    प्यारी पोस्ट … प्यारी बातें ।
    गीत भी प्यारा और लतीफ़ा भी …

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  39. भाई साहब प्रणाम,
    नाम का क्या है जी काम अच्छा होना चाहिए
    नाम के अनुरूप ही काम भी हो ये जरूरी नही
    जरूरी नही
    “शीतल“ का मिजाज ठण्डा हो
    “निर्मल“ के चेहरे पे न जमी हो धूल
    पाप करना तो आदत है
    भले की नाम उसका “गंगा“ हो

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  40. @ Er. सत्यम शिवम:
    दोस्त, अभी तो मुझे खुद तुम जैसों के मार्ग-दर्शन की जरूरत है। धन्यवाद एवम शुभकामनायें।

    @ संगीता स्वरूप(गीत) जी:
    बहुत आभार आपका संगीता मैडम।

    @ Apnatva:
    सरिता मैडम, शुक्रिया।

    @ राजेन्द्र स्वर्णकार जी:
    भाई साहब, आपका कमेंट भी आपके गीतों और आपकी आवाज जैसा ही प्यारा है। प्रोत्साहित करने के लिये शुक्रगुजार हूँ।

    @ दीपक सैनी:
    सही कहा दीपक, ये जरूरी नहीं लेकिन फ़िर भी हम कोशिश तो करते ही हैं कोई प्रेरणात्मक नाम रखने की, ताकि असर हो तो अच्छा ही हो।

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  41. सोच रहा हूं कि कहीं फत्तू ने अपने सेठ से ये बात आपके लिए तो नहीं कह डाली :)

    "मौसम ने एकल्ले आप की ही नहीं, सारी मार्किट की ईसी-तीसी कर राखी सै "

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  42. अली साहब,
    मैं मजलूम ही मिला क्या ऐसे मजाक करने को? कोई बात नहीं जी, ले लो मजे आप भी, हमारी तो देखी जायेगी:)

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  43. नाम में बहुत कुछ रखा है जी ... एक दम सही बात कही है आपने ... पर आजकल कुछ लोगों ने नाम की इसी-तीसी कर रखे हैं !

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  44. ये असली नाम पूछने का तरीका मस्त है :)

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