बुधवार, दिसंबर 22, 2010

यारी-दोस्ती

दसवीं के बोर्ड की परीक्षायें थीं और परीक्षा केन्द्र मेरे घर से करीब पांच किलोमीटर दूर था। परीक्षा-केन्द्र पर छोड़कर आने की जिम्मेदारी मेरे छोटे मामाजी की लगाई गई, जो लगभग उसी समय अपनी दुकान पर जाया करते थे। अंग्रेजी का पेपर था,  थोड़ी सी टेंशन थी लेकिन जैसा हमारी सरकार हमेशा कहती है कि स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है, वैसे ही अपन भी नियंत्रण में थे। 

उस दिन घर से निकलते निकलते हम लोगों को कुछ देर हो गई, और परीक्षा केन्द्र तक पहुंचे तो शायद दस मिनट लेट तो हो ही गया था। जब मेन रोड से स्कूल की तरफ़ स्कूटर मुड़ा तो मैंने देखा सामने से धनंजय बाहर की तरफ़  आ रहा था। उसने मुझे नहीं देखा और समय की आपाधापी में मैं उसे आवाज भी नहीं लगा सका। स्कूटर से उतर कर लगभग दौड़ता हुआ मैं अपने रूम की तरफ़ भागा। ऐसे समय में वही दूरी मीलों की लग रही थी। तब नहीं समझा था लेकिन बाद में न्यूटन की, सॉरी आईंन्स्टीन(धन्यवाद गिरिजेश जी) की Law of Relaitivity वाली थ्योरी अच्छे से समझी और भुगत रखी है। उतनी ही दूरी, उतना ही समय कभी तो लगता है जैसे कितने ही युग और कितने ही मील और कभी लगता है कि दो कदम की दूरी और एक पल का साथ, होता है न? 

बहरहाल, एग्ज़ामिनेशन हाल में प्रवेश किया तो सांसें उखड़ रही थीं और ड्यूटी पर तैनात मैडम ने ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर भी देर से पहुंचने के लिये उखड़ते हुये ताल से ताल मिलाई। मैडमों के आगे शुरू से ही हम हत्थे से जुड़े  रहते थे, सो पूरी इज्जत बरतते हुये(और चारा भी क्या हो सकता था?) आंसर शीट ली और सीट पर बैठकर कागज काले करने शुरू कर ही रहा था कि अचानक ध्यान गया कि जब  एग्ज़ाम शुरू हो चुका है, उस समय धनंजय बाहर क्या करने गया है?  देखा तो अब भी उसकी सीट खाली थी, मुझे लगा कि लापरवाह सा है, हो सकता है पेन वगैरह घर भूल आया हो और इन साथ के लड़कों-लड़कियों से ऐसी उम्मीद करना कि स्पेयर पेन दे देंगे, वो भी बोर्ड के एग्ज़ाम में, ऐसे बुडबक हम भी नहीं थे।

लेकिन मेरा तो दोस्त था वो, सुख दुख का साथी। क्या मैं भी उसकी इतनी मदद नहीं कर सकता? कितने तो लम्हे हमने आपस में बांटे हैं और आज मेरा यार एक पेन के लिये पता नहीं कहां कहां भटक रहा होगा? मेरा दिमाग एकदम से सनक गया और मैं पेपर वहीं छोड़कर बाहर को लपक लिया। मैडम फ़िर से बहकती रही, दहकती रही “कैसा लापरवाह ल़ड़का है? पहले पन्द्रह मिनट देर से आया और अब फ़िर पता नहीं कहाँ……?” फ़ुर्सत किसे थी पूरी बात सुनने की? 

मैं फ़िर से भागता हुआ मेन रोड की तरफ़ आया। बाहर बस-स्टैंड पर देखा तो धनंजय खड़ा हुआ जैसे बस का इंतजार कर रहा था। मैंने दूर से ही उसे आवाज लगाई और वो कमर पर हाथ रखे हुये मुझे अजीब नजरों से देख रहा था। पास जाकर  मैंने पूछा, “यहाँ क्या कर रहा है, पेपर शुरू हुये बीस मिनट हो गये हैं?”  वो कहने लगा, “बस का इंतजार कर रहा था, पेपर शुरू हो गया था और आंसर शीट्स बंट चुके थे और तू अभी तक आया नहीं था। मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है, इसलिये मैं अब तेरे घर जा रहा था। दस मिनट हो गये, तेरी तरफ़ जाने वाली बस ही नहीं आई है। क्यों लेट हो गया आज इतना?”  ऐसे समय में ऐसे सवालों का जवाब औरों को बेशक सूझ जाये, मैं तो अवाक ही था। उस समय तक शायद रो-धो भी लिया करता था, आंखें गीली भी जरूर हुई होंगी। 

खुशी, अफ़सोस, गर्व, संतुष्टि जाने क्या-क्या मेरे ऊपर से गुजर रहा था। खुश था कि मुझे कुछ देर से ही सही, धनंजय को ढूंढ लाने की सूझी तो सही। पछता रहा था कि मैं कैसे पांच मिनट तक बैठा रहा एग्ज़ामिनेशन हाल में? गर्व हो रहा था कि मेरा ऐसा दोस्त है और संतुष्ट था कि शायद पेपर में नंबर कुछ कट जायेंगे लेकिन अपनी आंखों में कद नहीं गिरा मेरा। बोला कुछ नहीं मैं, बस गले लग गया था अपने यार के और फ़िर एक दूसरे का  हाथ पकड़कर फ़िर से वही  हम दौड़ते हुये उखड़ी सांसे लेकर  उन्हीं सिरे से  उखड़ी मैडम की शरण में। पहले तो प्रिंसीपल के आगे हमारी शिकायत लगाने की और परीक्षा में न बैठने देने की धमकी, फ़िर धनंजय के द्वारा स्पष्टीकरण दिये जाने पर हम दोनों को एक से बढ़कर एक पागल की उपाधि देने में मैडम ने दरियादिली खूब दिखाई। इस सब में आधा घंटा नष्ट हो गया।   मेरे अंग्रेजी में बाकी सब विषयों से कम नंबर आये लेकिन फ़िर भी मुझे वो नंबर बहुत ज्यादा लगते रहे।  इस बात पर हम दोनों में बाद में बहुत झगड़ा हुआ और दोनों एक दूसरे पर एक ही आरोप लगाते थे और एक ही स्पष्टीकरण देते थे। बड़ा लुत्फ़ था जब…..।

दसवीं के बाद स्कूल बदला, राहें बदलीं और देखते देखते हम दोनों भी एक दूसरे से बहुत दूर हो गये। मोबाईल बहुत दूर की बात है, तब तो लैंडलाईन फ़ोन भी कहाँ इतने सुलभ थे?  तीन चार साल पहले एक दिन किसी झोंक में आकर उसके घर चला गया मिलने, मुलाकात ही नहीं हो पाई। उसकी पत्नी थीं, पूछने लगी कि क्या बताऊँ?   मुझे जवाब नहीं सूझा, पता नहीं उसे मेरी याद है भी या नहीं? कह दिया कि फ़िर दोबारा आऊँगा मैं खुद, और लौट आया था।  और सोच रखा है, एक बार  फ़िर से मिलने जरूर जाऊँगा, किसी मतलब से नहीं, सिर्फ़ पुराना वक्त याद करने।   कोई बड़ी बात नहीं कि उसे मेरी या उस बात की याद भी न हो, लेकिन मैं नहीं भूल पाया।  वो तो ऐसा ही था, ये कोई बड़ी बात नहीं थी उसके लिये। जब भी मैं याद दिलाता तो कहता, यार, दोस्ती की है तो ये कोई बात है ही नहीं।  मैं इसके बाद शायद इसीलिये दोस्ती से डर गया, कि यार ये दोस्ती तो बहुत खतरनाक चीज है:)   तीसरी कसम के गाड़ीवान की तरह कसम खा ली कि  किसी से दोस्ती नहीं करनी अब, लेकिन पुराने शराबी की खाई कसमों की तरह कितनी ही बार ये कसम टूटी, अब तो याद भी नहीं। दोस्त  आते ही रहे, छाते ही रहे जीवन में।

अब थोड़ी सी ड्रिबलिंग कर लें?  समय बदल गया है, हवा पानी बदल गये, जीवन के मूल्य बदल गये। आज के टाईम में अपन दोस्ती भी करते हैं तो ये सोचकर कि ये मेरे किस काम आ सकता है? मैंने इसके लिये ये काम किया तो अब कहाँ और कैसे इस अहसान का बदला ले सकता हूँ? नये जमाने के दोस्ती के पैमाने भी बाकी सब चीजों की तरह बदल गये हैं। अपन हमेशा की तरह वही असमंजस  में, मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ? आदमी पुराने जमाने के, रहना नये जमाने में, वास्ता नये पुरानों सब के साथ तो क्या नीति निर्धारण किया जाये। फ़िलवक्त तो पिछले कई साल से अपनी पालिसी यही रही है कि अपनी तरफ़ से न दोस्ती की शुरुआत न दुश्मनी की शुरुआत। न हम भगवान और न शैतान, कोशिश इंसान बनने की है, जितने हैं कम से कम उतने तो रह ही सकें।   जो आये उसका स्वागत और जो जाये उसे गुडलक। कभी लौटो तो वहीं खड़े मिलेंगे जहाँ छोड़ा था।

आज की पोस्ट कुछ ज्यादा ही आत्मकेंद्रित लग रही होगी।    हाँ, आत्मकेंद्रित ही है, वो कहते हैं न safe driving is sane driving:)   किसी और को लपेटूँ तो मुझे बचाने यहाँ धनंजय भी नहीं है:)  हा हा हा। हिंदी ब्लॉगिंग तो जैसे  बारूद का ढेर बनी हुए है।  खुद पर कुछ ध्यान देने की बात का श्रेय akaltara.blogspot.com  वाले श्री राहुल सिंह जी को, कुछ टिप्स दिये थे उन्होंने, याद है न राहुल सर? मुझपर स्नेह रखते हैं और मैं सही तरीके से आभार भी नहीं कर पाता। पहले से ही बहुतों का  कर्ज है मुझपर, किस किस का नाम लूँ मैं, मुझे बहुत सारे मित्रों ने संवारा। 

:) फ़त्तू  को सेठ ने ईसी तीसी वाली घटना के बाद निकाल बाहर किया। फ़त्तू को नई नौकरी मिली एक डिपार्टमेंटल स्टोर में। पहले ही ग्राहक ने सिबाका पेस्ट मांगी।  स्टॉक में नहीं थी तो फ़त्तू ने मना कर दिया। फ़्लोर मैनेजर ने समझाया कि ऐसे मना नहीं करना चाहिये था। उसे कह्ते कि सिबाका तो नहीं है  लेकिन कालगेट है, पेप्सोडेंट है, मेसवाक है। कहिये कौन सी दे दूँ?  डिमांड बनाई जाती है, पैदा की जाती है।      फ़त्तू ने सिर हिला दिया।     कुछ देर में एक हाई प्रोफ़ईल ग्राहक वहाँ पहुंची और  टिश्यू पेपर माँगा। फ़त्तू ने इधर उधर देखा, ओफ़्फ़, टिश्यू पेपर भी नहीं है। बड़े अदब से पूछा, “सॉरी मैडम, टिश्यू पेपर तो नहीं है, रेगमार है – कहिये, कौन से नंबर का दे दूँ।”

ब्लॉगजगत भी बहुत कुछ फ़्लोर मैनेजर के कहे के हिसाब से चलता है, डिमांड पैदा की जाती है, बनाई जाती है। या मेरा आईडिया गलत है, हमेशा की तरह?  एग्रीगेटर का पता नहीं क्या हुआ?

37 टिप्‍पणियां:

  1. bachpan ki dosti to pachpan par pahuch kar aur gahari ho jati hai .
    phir ek baar flash back main pahuch gaye .
    A WONDER FUL THANKS.

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  2. धनञ्जय वाली बात पर कुछ नहीं कह रहा. बस इतना सा: गजब की दोस्ती ! ... परीक्षाओं में लेट होने की घटना तो कम हुई अपने साथ लेकिन सपने में आके अभी तक परेशान करती है ये बात. कुछ सपने हैं जो अब तक आते हैं और नींद खुलती है चहरे पर हवाई लिए हुए :)
    वैसे एक बार लेट हम भी हुए थे आधे घंटे. जब होस्टल में कोई दिखा नहीं तो लगा कुछ गड़बड़ है... भाग के गया. अब्सट्रैक्ट अलजेब्रा का पेपर था. और बचे आधे घंटे में हमने हनाहन सवाल लगाए. आखिर के आधे घंटे बच गए. अब जो ना हिलने थे वो चार घंटे में भी ना हिलते. मैं आंसर शीट जमा कर के आ गया. नंबर आ गए औसत से उपर. कोई पूछता कितने आये तो कहता ३० मिनट में पेपर दिया था यार क्या एक्स्पेक्ट करते हो. वैसे ठीक ठाक ही आ गए :) बिन पढ़े और आधे घंटे में नंबर कम भी आयें तो पास हो जाने कि ख़ुशी ही बहुत होती है. फिर आपके साथ तो दोस्ती का अद्भुत उदाहरण भी था.

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  3. अरे साहब हम तो पत्थर से पोछने वाले इन्सान हैं अपने को तो रेग्मार्क भी चलेगा.

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  4. और हाँ दोस्ती जैसे विषय पर अभी फ़िलहाल तो कुछ नहीं कहूँगा. इस विषय पर तो एक पूरी की पूरी पोस्ट लिखनी पढेगी.

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  5. बचपन की दोस्ती ऐसी ही होती है। हम बूढ़े हो रहे हैं लेकिन बच्चे आज भी ऐसी दोस्ती निभाते होंगे । संस्मरण आत्मकेंद्रित ही होते हैं। संस्मरण प्रेरक हों या पाठक को सुख पहुंचाने वाले हों तो इसे जरूर बांटना चाहिए।
    ...अच्छी पोस्ट के लिए बधाई।

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  6. संजय बाउजी!
    दोस्ती की बात तो आपने अच्छी याद दिलाई. मेरी बातें, लगता है खत्म होने लगी हैं या लोग ऐसी बातें लिख जाते हैं कि मुझे दोहराना पडता है. मैंने जिंदगी में जितने पैसे कमाए, उससे ज़्यादा दोस्ती कमाई.. हिन्दुस्तान से लेकर पाकिस्तान तक दोस्त भरे हैं... बंगाल से गुजरात तक और पंजाब से केरल तक. जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए...कंधा कम नहीं पड़ना चाहिए.
    कई दोस्तों ने निराश किया, कई दिल में बस गए.. और मेरा तो ब्लॉग भी दोस्ती कि मिसाल है!
    फत्तू नॉटी होता जा रहा है! गाना बहुत अच्छा, मधुर..मगर इसके पीछे का सच बहुत भयानक...कभी फुर्सत में!!

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  7. @ न्यूटन की Law of Relaitivity
    Relativity - न्यूटन की कब से हो गई?

    @ आत्मकेन्द्रित
    हम्म! गली किनारे बैठ कर बाँचो अपनी पीर।

    जाने क्यों आज बहुत भीग रहा हूँ :)
    जीवन की छोटी छोटी बातें
    'सनलाइट चमकार' भी याद आई दोस्त!

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  8. Post aatm kendrit hee sahee,lekin padhne me bahut mazaa aaya! Laga,padhee hee chalee jaun!

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  9. मित्रता के मानक बदल गये हैं इस मार्केटवादी व्यवस्था में।

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  10. मो सम... ने मो सम का उल्‍लेख किया है, धनंजय जी आप भी शामिल हैं, इस तरह अनपेक्षित श्रेय का सुख अब कोई मुझसे पूछे.

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  11. कहते है की जब हम छोटे होते है तो हमारा दिल बहुत बड़ा होता है और दिमाग बहुत छोटा पर जैसे जैसे हम बड़े होते जाते है दिमाग बड़ा होता जाता है और दिल छोटा और दोस्ती तो खालिस दिल का मामला है इसलिए पचपन के साथ दोस्ती को वो रिश्ता भी जीवन से बिदा हो जाता है | बचपन की या पुरानी दोस्ती ही निभा ले जाये यही बड़ी बात है | जब बनारस छोड़ा तो दोस्ती का रिश्ता भी वही छोड़ दिया उसके बाद कोई नया दोस्त बना ही नहीं वजह कोई मिला नहीं या ये कहु की हम सब बड़े जो हो गये थे |

    और ब्लॉग जगत की तो मत ही पूछिये अब तो लोग टिप्पणिया भी देने से पहले चुरा लेते है बोलिये जो मैंने लिखने की सोची वो तो पहले ही दीप जी ने लिख दी "इस विषय पर तो एक पूरी की पूरी पोस्ट लिखनी पढेगी " ये तो हद ही है :))))

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  12. सब तो ओके है ........मगर फत्तू भैया को समझा दो की ये हाजिर जबाबी कहीं किसी सुंदर औरत के हाथ में सैंडिल ना पकड़ा दे, उनके लिए ....................

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  13. dhananjay se milkar apna bachpan bhee yaad aa gaya.........
    fir milne gaye ya nahee.........jaroor milna.........aisee dostee anmol hotee hai.......

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  14. @ Poorviya:
    बहुत बहुत धन्यवाद, कौशल जी।

    @ अभिषेक ओझा:
    हम आपको ऐसे ही तो जीनियस नहीं समझते..!!

    @ विचारशून्य:
    रेग्मार्क तक पहुंचने से पहले हाई-प्रोफ़ाईल होना होगा, बंधु। आपकी पोस्ट का बेसब्री से इंतजार रहेगा।

    @ देवेन्द्र पाण्डेय:
    देवेन्द्र जी, बच्चों और उनकी दोस्ती पर आपकी आशा के लिये आमीन। शुक्रिया।

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  15. @ सम्वेदना के स्वर:
    आपके कंधों की मजबूती का अंदाजा है हमें। और सलिल भैया, ऐसे सच जानने के लिये फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है। स्वागत है आपका, मुझे भी जिज्ञासा हो रही है।

    @ गिरिजेश राव:
    न्यूटन की अभी हुई थी जी, तीन घंटे पहले। अब सही जगह पहुंचा दी है। वैसे निशाना इतना भी गलत नहीं, हम कामर्स के छात्र रहे हैं, गनीमत है हेनरी फ़ेयोल की नहीं कर दी थी हमने ये थ्योरी। आपको बुलाने का फ़ार्मूला पता चल गया है अब, गलती कर दो तो आप न चाहते हुये भी आयेंगे:) शुक्रिया नहीं कह रहा आपको, ये आपका फ़र्ज ही था।

    @ kshama ji:
    बहुत आभारी हूँ आपका, प्रोत्साहन मिलता रहता है आपसे।

    @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    ऊपर देवेन्द्र पाण्डेय जी की आशा को आमीन इसीलिये कहा है क्योंकि वह आशा है, आप यथार्थ की बात कर रहे हैं।

    @ राहुल सिंह जी:
    अनासक्ति सूत्र:)

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  16. अच्छा संस्मरण है जी...
    लेकिन लगता है आप किसी दूसरे युग के हैं...और आपकी यही बात तो प्रभावित करती है...
    वर्ना लोग तो आज कल गाते हैं..
    दोस्त दोस्त न रहा प्यार प्यार ना रहा
    या फिर..
    मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे...:)
    ई छोटू फत्तू से कहिये सुधर जाए अगर कहीं किसी ईसी-तीसी के हाथ लग गया तो पिट जाएगा...
    हाँ नहीं तो..!.

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  17. किस्मत वाले हो भाई कि धनंजय जैसे दोस्त मिले!

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  18. वाकई ऐसी मित्रता दुर्लभ है !

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  19. दोस्ती तो दोस्ती है.... कर ली सो कर ली ....दोस्त हो इसलिए कह रही हूँ ...

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  20. अपन तो उस समय भी खुश होते कि चलो अच्छा हुआ वो नहीं आया, कम से कम अपने मित्र से तो ज्यादा नम्बर आ जायेंगें और अब भी यही मानसिकता है जी :) हा-हा-हा

    फत्तू से क्या सचमुच टिश्यू पेपर ही मांगा गया था या "ट" से शुरु होने वाला दूसरा पेपर :)

    प्रणाम

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  21. वाह इसे कहते हैं दोस्ती, क्या बात है ! और मैं तो इस पोस्ट को अत्म्केंद्रिक बिलकुल नहीं कहूँगा ... बहुत रोचक रहा ये संस्मरण ! by the way ... रेगमार से काम चल जायेगा क्या ?

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  22. अभी कुछ देर पहले एक ख़ास खिलाड़ी Fanie de Villiers के बारे में पढ़ रहा था. और वो अपनी आत्मकथा में कहता है, "I am a negative, jealous and miserable." :)

    आईन्स्टीन साहब गुणग्राही हैं, एक दिन माफ़ कर देंगे. आज Chester Carlson साहब की मदद ले रहा हूँ, खुद से कभी कुछ होने से रहा.

    Fanie de Villiers वाले आर्टिकल से लेखक के शब्द Xerox कर रहा हूँ.
    "I will know him as a cricketer who went through a lot in his life but never forgot his prime job was to entertain the people who paid good money to come to the grounds."

    आपके लिए भी शब्द वही हैं सर जी.
    आभार!

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  23. काश अपने को भी एक धनंजय मयस्सर होता ! उसकी मित्रता हर कीमत पर सहेज के रखियेगा !

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  24. @ Anshumala ji:
    दिल व दिमाग का सही संबंध बताया है आपने।
    अब आप दीप जो पोस्ट लिखना चाहते हैं, वह लिख डालिये उनसे पहले - ईंट का जवाब पत्थर से दीजिये।

    @ उपेन्द्र जी:
    फ़त्तू भैया का मानना है कि इन मामलों में सैंडिल भी मैडल से कम नहीं होते।

    @ अपनत्व:
    सरिता जी, एक बार गया था, नहीं मिला। एक बार और जाऊँगा जरूर।

    @ भारतीय नागरिक:
    जो आज्ञा, सरकार।

    @ अदा जी:
    आपके कमेंट करने से और अब के बीच काफ़ी कुछ घट गया। बाबा को मेरी तरफ़ से विनम्र श्रद्धांजलि, और आपसे अनुरोध कि हिम्मत बनाये रखियेगा।

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  25. @ Smart Indian:
    अनुराग सर, बेशक किस्मत वाला हूँ। ऐसे ऐसे दोस्त ही नहीं, आप सरीखे दिग्गजों का आशीर्वाद, स्नेह भी मिला है मुझे।

    @ धीरू सिंह जी:
    सही कहा धीरू भैया।

    @ वाणी गीत:
    कहीं दुर्लभ नहीं है जी, सबके पास ऐसे मित्र हैं। आपके पास नहीं हैं क्या?

    @ अर्चना जी:
    हाँ जी, जन्मजात दोस्त हूँ।

    @ अन्तर सोहिल:
    हैं तो हम भी ऐसे ही यार, वो तो थोड़ा छवि सुधारने के लिये झूठ-सच बोलना पड़ता है।
    ’ट’ से....... - जाकि रही भावना जैसी, वैसा ही समझ ले।

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  26. दोस्त, आज की पोस्ट आत्मकेंद्रित नहीं है........ आपने दसवीं के एक्साम की बात कर की हमारे जैसों के भी दिमाग ८५-८६ की तरफ घुमा दिए........ ये Law of Relaitivity काहे जिक्र करते हो.... खामखा दिमाग खराब हो जाता है........ उस समय भी समझ नहीं आया...... अब भी समझ नहीं आते.

    किसी और को लपेटूँ तो मुझे बचाने यहाँ धनंजय भी नहीं है:) ........... ८५-८६ में तो नहीं था पर अब बाबा जरूर है...... चिंता मत कीजिए...........

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  27. @ Indranil Bhattacharjee:
    सैल साहब, शुक्रिया। काम चलेगा।

    @ नीरज बसलियाल:
    सच्चा दोस्त? राम जाने..

    @ Avinash Chandra:
    ’दाग अच्छे हैं’ याद है न?
    कितना पढ़ते हो यार अविनाश तुम? हमें तो सब विदेशियों के नाम एक से लगते हैं - (ऐलीबाई - न्यूटन\आईंस्टीन)

    @ अली साहब:
    ये सहेज के रखना, हमारे व्यक्तित्व की कमजोर कड़ी है साहब। नहीं रख पाते, पता नहीं क्यों?
    वैसे धनंजय जैसा दोस्त मयस्सर होने की हसरत की बजाय खुद वैसा बन जाने की हसरत भी कम दिलफ़रेब नहीं, क्या ख्याल है?


    @ दीपक बाबा:
    यानि कि बिंदास होकर लपेट लें न किसी को? वादा तेरा वादा ...

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  28. गजब की दोस्ती थी आपकी, शायद जिन्दगी में हर किसी को मिलतें है ऐसे दोस्त ................. लेकिन क्या पता हम ही उन्हें पहचाने ना पहचाने !!!!

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  29. जानबूझकर किसी आकांक्षा में बने संबंध दीर्घजीवी नहीं होते। परस्पर निर्भरता में कुछ भी बुरा नहीं। मुझे किसी की ज़रूरत नहीं या मैंने किसी से रिश्ता बगैर किसी स्वार्थ के जोड़ा,यह भाव उपजना भी एक प्रकार का अहंकार ही है। समय आने पर किसी से अगर अपेक्षा पूरी न हो,तो अपने भीतर ही कोई कमी मानकर संतोष करना चाहिए।

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  30. @ अमित शर्मा:
    सही कहा अमित, सबको मिलते हैं ऐसे दोस्त। लोगों की प्राथमिकतायें ही तय करती हैं किसे किस रूप में पहचाना जाये।

    @ कुमार राधारमण जी:
    एकदम सही राय है आपकी। अहंकार तो अपने में है, मानता हूँ, कोई सीधा सादा उपचार(गोली अंदर अहंकार बाहर टाईप का) है भी तो नही:) शुक्रिया स्पष्ट और सुलझी टिप्पणी के लिये,सच में बहुत अच्छा लगा।

    @ आशीष:
    :))

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  31. सुदूर खूबसूरत लालिमा ने आकाशगंगा को ढक लिया है,
    यह हमारी आकाशगंगा है,
    सारे सितारे हैरत से पूछ रहे हैं,
    कहां से आ रही है आखिर यह खूबसूरत रोशनी,
    आकाशगंगा में हर कोई पूछ रहा है,
    किसने बिखरी ये रोशनी, कौन है वह,
    मेरे मित्रो, मैं जानता हूं उसे,
    आकाशगंगा के मेरे मित्रो, मैं सूर्य हूं,
    मेरी परिधि में आठ ग्रह लगा रहे हैं चक्कर,
    उनमें से एक है पृथ्वी,
    जिसमें रहते हैं छह अरब मनुष्य सैकड़ों देशों में,
    इन्हीं में एक है महान सभ्यता,
    भारत 2020 की ओर बढ़ते हुए,
    मना रहा है एक महान राष्ट्र के उदय का उत्सव,
    भारत से आकाशगंगा तक पहुंच रहा है रोशनी का उत्सव,
    एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें नहीं होगा प्रदूषण,
    नहीं होगी गरीबी, होगा समृद्धि का विस्तार,
    शांति होगी, नहीं होगा युद्ध का कोई भय,
    यही वह जगह है, जहां बरसेंगी खुशियां...
    -डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

    नववर्ष आपको बहुत बहुत शुभ हो...

    जय हिंद...

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  32. ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. साथ ही धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
    इस सामुदायिक ब्लॉग का लेखक बनने के लिए ब्लोगर को स्वाभिमानी व देशभक्त होना आवश्यक है, नियम पढने के बाद ही निर्णय ले.
    समय मिले तो इस ब्लॉग को देखकर अपने विचार अवश्य दे
    .
    जानिए क्या है धर्मनिरपेक्षता
    हल्ला बोल के नियम व् शर्तें

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