शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

एक दिन या पूरा एक जीवन? अंतिम किस्त..

एक दिन या पूरा एक जीवन?

                                                          समापन कड़ी
समय जैसे भाग रहा था, सौम्या अपने मन की एक एक गांठ खोलकर राजीव के सामने रखती रही और राजीव गौर से सब सुन रहा था। कोई सुझाव नहीं, कोई मशविरा नहीं फ़िलहाल सिर्फ़ सुन रहा था। बीच बीच में कभी सौम्या कहीं अटक जाती तो राजीव उसकी अनकही बात को पूरी करता और सौम्या हैरान हो रही थी कि कैसे एक ऐसा इंसान जिससे कोई रिश्ता नहीं,  वो उसके मन की एक एक बात को समझता है, जानता है।

बात करते करते सौम्या एकदम चुप हो गई। राजीव भी देख रहा था, उसके चेहरे की तरफ़। कुछ देर के बाद राजीव ने घड़ी की तरफ़ देखा, गाड़ी के समय में लगभग दो घंटे बचे थे। आधा घंटा स्टेशन तक पहुंचने में, यानि डेढ़ घंटा और था उनके पास। राजीव ने उसे बुलाया, “एई सौम्या, कितना कुछ छुपा रखा है तुमने अपने मन में? सब कुछ बता दिया, एक बात नहीं कही। मेरे विचार में एक कमी है जो तुम्हें अंदर ही अंदर खा रही है। एक तुम्हारी वो कमी पूरी हो चुकी होती तो इन सब बातों को तुम शायद आराम से मैनेज कर लेती। अगर मैं गलत कहूँ तो वहीं टोक देना। तुमसे कोई रिश्ता नहीं, पता नहीं मुझे हक है ये सब पूछने का या कहने का, लेकिन तुम्हें खुश देखना चाहता हूँ। तुम्हारी शादी को पांच छ साल हो चुके हैं, परिवार सीमित होने के पीछे कोई मैडिकल कारण है या प्लानिंग?”  सौम्या का चेहरा झुक चुका था। राजीव उसे एकटक देखे जा रहा था। पानी की बोतल सौम्या को थमाते हुये राजीव ने कहा, “पानी पी लो, धूप है।” सौम्या ने बोतल पकड़ी, “सर, धूप है लेकिन बचने के लिये सायबान भी है। शुरू में कैरियर के चक्कर में हम  सतर्क रहे, फ़िर बस्स यूं ही समय निकलता गया।  कुछ मैडिकल कॉम्प्लिकेशंस भी रहे, वैसे  तीन महीने में ये सैशन खत्म होने वाला है और उसके बाद मुझे लांग लीव पर जाना है, जाना ही पड़ेगा।” और सौम्या दूसरी तरफ़ देखने लगी। दिल से मनों भार उतर गया हो जैसे, और राजीव भी बिल्कुल ऐसा ही महसूस कर रहा था।

“अब तुम कुछ देर मेरी बात सुनो। जब तुम पूछ रही थी, मैं बात टाल देता था। अब तुम्हें खुद बताता हूँ। मैं खुद ऐसे दौर से गुजरा हूँ, लेकिन जब मुश्किल समय कट गया तो सब ठीक हो गया। शायद ये हालात इसीलिये आते हैं कि   हम कुछ अनमोल चीजों की  कद्र कर सकें।  नहीं तो आसानी से जो हासिल हो जाये, हम लोग  उसका महत्व नहीं समझते, समझ ही नहीं पाते।

हमारे पास बहुत कुछ होता है, लेकिन जो नहीं होता वो मालूम नहीं कैसे इस सब को ढंक लेता है। नतीजतन प्राप्त का सुख ठुकराकर हम अप्राप्य के दुख को सीने से लगाये फ़िरते हैं। जो शिकायतें तुम्हें अनुज और अनुज को तुमसे रही हैं, ऐसी या मिलती जुलती बहुत सी शिकायतें  पति पत्नी को एक दूसरे से रहती होंगी। कुछ लोग समझदार होकर एडजस्ट कर लेते हैं, कुछ नहीं कर पाते। अपनी तरफ़ से पहल न करने के बावजूद सामने वाले के सामने किसी भी हाल में न झुकने की जिद के चलते   दोनों एक दूसरे को, अपनी अपनी जिन्दगी को सलीब की तरह ढोते  रहते हैं। बेहतर है कि ऐसे ही जीना सीख लिया जाये।  कई बार तो समय गुजरने के साथ ऐसे हालात में पहुंच जाते हैं कि रिश्तों को सुधारने की, संवारने की, और तो और नये रिश्ते बनाने की कोई चाह, इच्छा बाकी ही नहीं रहती।  ये सब  तुमसे बताया है तो इसलिये कि पता नहीं क्यों तुम्हें दुखी नहीं देखना चाहता। हो सके तो तुम कोई ऐसी गलती मत करना कि परिवार में बिखराव हो। उम्र में बड़ा हूँ तुमसे, दिल से आशीर्वाद दे रहा हूँ कि हमेशा खुश रहो। कुछ समय बाद परिवार में नया सदस्य आयेगा, बहुत प्यार करना उसे। जब मुश्किल समय खत्म होगा, सब अच्छा ही अच्छा होगा। इंसान पहचानने की थोड़ी सी समझ है मुझमें, तुम कर सकती हो। चाहे परिवार हो या कैरियर, थोड़ा सा अधूरापन हमेशा रहेगा। उसे पूरा करने की कोशिश में जिन्दगी कट जाये, बहुत है।”

 सौम्या की आंखें गीली देखकर राजीव हंसने लगा, “पगली लड़की, चलो समय हो गया है।”

गाड़ी आ चुकी थी। अपने कोच में चढ़कर सौम्या गेट में खड़े रहकर ही राजीव से बात कर रही थी। सिग्नल मिल गया, गाड़ी प्लेटफ़ार्म से रेंगने लगी। सौम्या  ने राजीव से हाथ मिलाया और पूछा, “आप वापिस कब आ रहे हैं अपने शहर?”     राजीव ने हँसकर जवाब दिया, “कभी नहीं  सौम्या, कभी नहीं। मेरे रोडमैप में अब वापिस आने के नहीं, और दूर जाने के आसार हैं। खुश रहना, एक बार तुम्हारे घर काफ़ी पीने जरूर आऊँगा, पिलाओगी न?”    ट्रेन स्पीड पकड़ चुकी थी, हाथ हिलाता राजीव दूर,  और दूर दिख रहा था।    

शायद सौम्या की आँख में कुछ गिर गया था, लाल हो रही थीं उसकी आँखें। कोई देखता तो सोचता शायद रोकर हटी है वो…..

उधर प्लेटफ़ार्म पर राजीव पूनम को  फ़ोन कर रहा था, याद दिलाने के लिये कि अदालत    ने उसे महीने में एक दिन बच्चों के साथ बिताने की इजाजत दे रखी है और कल सुबह आठ बजे वह बच्चों को लेने आ रहा है।  ठीक आठ बजे बच्चे उसे फ़्लैट के गेट पर तैयार मिलने चाहियें। पूरा महीना जिन बारह घंटों की वो बाट देखता रहता है, उनमें से एक लम्हा भी इंतज़ार जैसी वहियात चीजों में जाया हो,   अब नहीं चाहता।        (समाप्त)
                                                                             -----

एक दम शुरू में  कहानी जैसा कुछ लिखने की कोशिश की थी,  जब समापन कड़ी तक पहुंचा तो अनुराग शर्मा जी के ब्लॉग पर पहले से ही लिखी एक कहानी पढ़कर लगा कि अपनी लिखी चीज  तो उसी प्लाट की चोरी लग रही है, वहीं ब्रेक लगा दिये। अपने नियमित पाठक भी उस समय तक संख्या में न के बराबर थे, अपूर्णता पर किसी का ध्यान भी नहीं गया। खुद अनुराग सर ने ये कहानी पूरी न करने पर टोका तो उनसे अपनी आशंका, अपना अपराधबोध  बताया कि क्या उन्हें खुद ये नहीं लगा कि उनका प्लॉट चुराया है मैंने?  खुद के  उदाहरण देकर उन्होंने यही जताया कि  उन्हें ऐसा नहीं लगा।   अभयदान व आश्वासन पा लिया लेकिन स्मार्ट उस्ताद जी के बड़प्पन और सदाशयता के हाथों बिक गये। सही मौका लग रहा है कि साल  भी खत्म हो रहा है तो एक अधूरा चैप्टर भी खत्म कर दिया जाये।

ओ दुस्मन, कहानी ही है-तुम्हारी कसम।
संयोग ऐसे बने कि तीन पोस्ट बहुत जल्दी-जल्दी आ गये, बैंक वालों की एक बार में एक से ज्यादा छुट्टी होनी ही नहीं चाहिये, दुआ करो  सब मिलके और इस कहानी को पढ़ने के बाद एक बार लेखन शैली पर हँसना जरूर है सब ने,  नहीं तो पुराने पीपल वाली चुडैल……..:)


फ़त्तू फ़ैमिली बोनांजा, माल मालिकों का और मशहूरी कंपनी की:)

सभी मित्रों को, उनके मित्रों को, परिवार को नववर्ष की शुभकामनायें।






36 टिप्‍पणियां:

  1. अभी एक लाइन भी नहीं पढ़ी क्योकि ये पोस्ट पढ़ने से पहले पिछली पांच पोस्ट और पढ़नी पड़ेगी अभी ये पढ़ लुंगी तो पिछला पढ़ने में अच्छा नहीं लगेगा क्योकि कहानी का अंत पता होगा सो ये कहानी चार दिन की छुट्टी के बाद |

    फ़िलहाल के लिए आप को भी नया वाला साल हैप्पी हो |

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  2. और हा गाना बहुत अच्छा है बहुत ही पसंद है मुझे लेकिन हैप्पी हैप्पी वाले दिन ये सैड सैड वाला गाना ???

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  3. हमने भी ये पोस्ट नहीं पढ़ी। कारण वही जो अंशूमाला जी ने बताया। पूरी कहानी पढ़कर ही टिप्पणी देंगे।

    नववर्ष की शुभकामनाएँ आपको भी... :-)

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  4. नव वर्ष की बहुत शुभकामनायें।

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  5. कहानी मिसकर गया पहले हिस्से फ़िर पढूंगा! अभी तो फ़त्तू को राम राम और हैप्पी बर्डे! अरे नये साल की हैप्पी बर्थडे!!!

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  6. एक ही झटके मे सारी कहानी पढ गया हूँ शैली की परख नही है पर कहानी अच्छी लगी
    मेरा नेट चल गया है अब बराबर हाजरी लगेगी
    नव वर्ष की शुभकामनाये

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  7. चलिए, अब नहीं आयेंगे 'इस साल' आपके ब्‍लॉग पर.

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  8. सर जी,
    पहला लिंक खोला ही था जब आपसे बात हुई, और सच में उम्मीद कर रहा था कि बाकी सारे लिंक बहुत बड़े ना हों। ऐसा इसलिए कि आज ही पूरा पढना चाहता था।
    मुझे पुराना जो भी छूटा है सब पढना पड़ेगा।
    आज कि पोस्ट (या पूरी कहानी) पर आयें तो...no comments!
    कहते हैं, "If a man can spin cotton well, he can very well spin a cricket ball. He often choose not to, that is his choice."
    मैं कहने लायक ही नहीं, पढ़ लूँ, अचंभित सा। और क्या..
    इस साल का बहुत शुक्रिया, आपके लिए।

    आपका क्या है, आप तो जरा बधाई से ही खुश हो जाएँगे। :))

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  9. अभी तो आप हाज़िरी लगा लो!! समापन वर्ष (इस दशाब्दि का)में सिर्फ समापन किश्त पढकर टीप दूँ.. भाई साहब हम टिप्पणी देखकर टिप्पणी करने वालों में से नहीं हैं...
    गाना एक बार फिर मेरा फ़ेवरिट...ज़िंदगी से जुड़ा हुआ..
    नए साल की मंगलकामना पूरे परिवार के लिये!!
    सलिल
    चैतन्य

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  10. संजय भाई, सही बताएं तो कहानी के पहले के भाग भूल चुके हैं, अत इमानदारी से कह रहा हूँ कि अब ये भी नहीं पढ़ी... पहले के भाग पढ़ इसको पढूंगा...अगर आनंद (मज़ा नहीं कहूँगा - तुम्हारा डाइलोग ध्यान आ गया.) लेना है तो,

    कहानी की अरदास पर बधाई.

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  11. @ anshumala ji:
    तो आप पोस्ट पढ़कर कमेंट करती हैं:))
    चार दिन की छुट्टी.?? क्या ठाठ हैं जी आपके।
    हैप्पी हैप्पी के साथ सैड सैड का कंट्रास्ट जमता है बहुत। बी.पी., शूगर वगैरह का लैवल ठीक रहता है, ये भी एक थेरैपी है।
    आने वाले सभी साल आपके लिये व आपके परिवार के लिये शुभ हों।

    @ ललित शर्मा जी, सोमेश भाई, प्रवीण पाण्डेय जी:
    नये साल की ढेर सारी बधाईयाँ आपको भी।

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  12. @ ktheLeo:
    फ़त्तू भी बधाई भेज रहा है जी, एनिवर्सरी की:)) शुक्रिया।

    @ धीरू सिंह जी:
    शुभ न्यू ईयर।

    @ दीपक सैनी:
    नेट चल गया, थाम के रखिये भाई इब।
    आपको व आपके परिवार, मित्रों को भी नये साल की शुभकामनायें।

    @ राहुल सिंह जी:
    आप नहीं आयेंगे तो हमारा भी प्रण सुन लें, इस साल कोई पोस्ट नहीं लिखेंगे हम भी:)

    @ अविनाश:
    क्रिकेट संबंधी ऐसे जुमले इस से पहले सिद्धू जी के मुंह पर ही फ़बते थे।
    तुम जैसा पढ़ भर ले तो अपना लिखा वसूल हो जाता है, सच में।
    और जरा सी बधाई क्या होती है? जैसे बैकुंठ का एक पल धरती के हजार साल के बराबर बताते हैं, जरा सी बधाई अपने लिये हिमालय से कम नहीं। बेशक कहे कोई, ’कि आपका क्या है’ :))

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  13. नूतन वर्ष २०११ की हार्दिक शुभकामनाएं ..

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  14. Abhi pooree kahani nahee padhi...jigyasa jag gayi hai.
    Nutan warsh kee anekanek shubhkamnayen!

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  15. भाई मैंने तो सारे पिछ्ले खंड पहले ही पढ़ रखे थे। फिर भी दुबारा पढ़ा।
    ब्लॉग जगत में नए नए आए 'मो सम कौन' से मिलना अच्छा लगा। ... उस तत्त्व के भी दर्शन हुए जो फत्तू के अलावा भी बहुत कुछ रच सकता है। इस वर्ष यही कामना है कि आप की लेखनी से उम्दा कहानियाँ भी पढ़ने को मिलें।

    किसी ने इस कहानी को संस्मरण कहा है। ऐसा मैं नहीं सोचता। भोगे हुए यथार्थ पर कल्पना की परत न हो तो 'कहानी केक' बन ही नहीं सकता।
    @ राजीव उम्र में सौम्या से लगभग बारह साल ज्यादा था। देखने में अति साधारण, लेकिन अपने साधारण व्यक्तित्व को उसका सभ्य व्यवहार ढक लेता था और वह खुद सौम्या से बहुत प्रभावित था।
    ...देखे सुने हमने भी बहुत हैं सर! समझते हैं। :)

    @कभी नहीं सौम्या, कभी नहीं। मेरे रोडमैप में अब वापिस आने के नहीं, और दूर जाने के आसार हैं। ...ये क्या हुआ, कैसे हुआ...छोड़ो ये न सोचो।

    दे दिए नसीहतें हजार, चुप भी रहे और तुम सुनते रहे
    तुम्हारी आँखों से जो टपका,पहले मेरे दिल में धड़का था।

    @

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  16. आप के लिए, आप के पूरे परिवार के लिए और आप के पाठकों के लिए नववर्ष मंगलमय हो।

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  17. अरे वाह....लो जी मैं सारी कहानी पढ़ने के बाद एक ही कमेंट देता रहूंगा क्या करुं। रोज रोज पढ़ने में हंसते दर्द का मजा कम मिलता है। एक दिन पढ़ने से सारे समय दर्द हंसता रहता है साथ ही बंदा भी।
    देखो एक अजीब संयोग भी है कि मैने भी कानपुर यात्रा का समापन कल रात में किया ऑफिस से आकर किया।

    और हां मियां हमें नव वर्ष की बधाई देने में देरी कर दी। हद है यार।

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  18. चलो हम दिए देते हैं पहले....नया साल मंगलसय हो....और सारे सुख मिले, हर वो जिसमें सुख मिलता है वो बातें हो और करें आप। भाभीजी का स्वास्थ्य कैसा है ये तो बताया ही नहीं आपने। वो भी स्वस्थय रहें और अक्सर मायके जाती रहें नहीं नहीं मेरा मतलब है कि ....अब क्या बोलूं......आप सुखी रहो..हीहहीहीहीी

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  19. @ सम्वेदना के स्वर:
    बन्धुओं, इत्ता भी टिप्पणी लोभी नहीं मैं। मंगलकामनायें सर माथे पर, आप को भी सपरिवार बधाई।

    @ दीपक बाबाजी:
    :))

    @ भारतीय नागरिक एवम उपेन्द्र जी:
    शुभकामनाओं के लिये शुक्रिया, आप के लिये भी नया वर्ष मंगलमय हो।

    @ kshama ji:
    आपका आभारी हूँ, नव वर्ष आप के लिये भी मंगलमय हो।

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  20. नए साल की हार्दिक शुभकामनायें

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  21. आपको नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें ...स्वीकार करें ....आशा है यह नव वर्ष आपके जीवन में .निय नहीं खुशियाँ लेकर आएगा ...शुक्रिया

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  22. @ गिरिजेश जी:
    ’कहानी केक’ की भली कही:)
    एकदम शुरू से ही आपका सान्निध्य मिला था, जो भला-बुरा करेंगे उसके आप भी जिम्मेदार हैं:))
    अब न टपके का डर है, न धड़के की आशंका। जो पाया बहुत पाया।
    शुभकामनाओं के लिये आभार, आपको भी सपरिवार शुभकामनायें।

    @ boletobindas:
    हँसते जख्म?:)) - ’खग समझे खग ही की भाषा’
    अभी आते हैं कानपुर यात्रा पर:)
    शिकायत अच्छी लगी। गलती सुधारने के लिये होली मुबारक कह देता हूँ, राईट?

    @ ज्योति:
    शुक्रिया ज्योति जी, आपको भी नये साल की बधाई।

    @ केवल राम:
    केवल भाई, शुक्रिया आपकी भावनाओं के लिये। आपको भी नया साल मुबारक।

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  23. कहानी पढ़ते-पढ़ते मैं सोच रहा था कि कुछ तिलिस्म हाथ लगेगा। राजीव निशा को फोन करेंगे और कहेंगे कि एक दिन जिंदगी से मिलाने के लिए के लिए शुक्रिया। यह एहसान मुझपर उधार रहा।...लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
    ..साफ सुथरी कहानी । बहुत अच्छा लगा पढ़कर। जिंदगी में बहुत बातें अच्छी भी होती हैं। सफर में अच्छे लोग भी मिलते हैं। लेकिन न जाने क्यों हम खराब को ही कहानी का हिस्सा बनाते हैं।
    ..आपने अच्छा उदाहरण पेश किया।
    ..बधाई।

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  24. केवल इस कड़ी को पढ़ा है। प्रवास से लौटकर सम्पूर्ण श्रृंखला पढ़ने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहूंगा। फिलहाल,नववर्ष की शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिए।

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  25. कोई छै दिन बाद वापसी हुई है , सोचा इतना ही बैकलाग होगा , निपटा दूं पर जनाब यहाँ तो पांच लिंक और भी बाकी हैं :)

    समापन किश्त से कहानी के प्रेम / त्याग / झगडे और बिछोह जैसे संकेत मिल रहे हैं ! सामान्यतः रिश्तों की बुनावट में इतने उलझाव तो होते ही हैं !...खैर सुन्दर समापन किश्त !

    नए साल की शुभकामनाओं में छुट्टियों की बढोत्तरी के शुमार का ख्याल था पर छै किश्त वाली कहानी लिखने वालों को छुट्टियों की दुआएं देने की हिम्मत भी तो नहीं होती !

    तो फिर हैप्पी फैमिली एंड हैप्पी आफिस लाइफ की दुआओं तक ही महदूद कर रहे हैं अपनी शुभकामनाओं को!

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  26. @ देवेन्द्र पाण्डेय:
    धन्यवाद देवेन्द्र जी, कम से कम आप तो फ़ंसे झाँसे में,
    बाकी तो सब हमें ही हूल दे गये, डर गये पांच लिंक देखकर:)
    अच्छा बुरा सबके साथ होता है, अच्छा हम हजम कर लेते हैं और बुरे के लिये दोषारोपण करना शुरू कर देते हैं।
    फ़िर से शुक्रिया, झेलने के लिये:)

    @ कुमार राधारमण जी:
    सुखद प्रवास की शुभकामनायें। आपकी वापिसी का इंतजार रहेगा।

    @ अली साहब:
    छ: किश्त और साल भर का वक्त भी, दुआयें देने के लिये पात्र कुपात्र देखना भी चाहिये:)
    ये दुआयें ही बहुत हैं, शुक्रगुजार हूँ।

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  27. बहुत समय लगेगा जी
    पिछली सारी कडियां पढने के लिये
    लिंक सहेज लिया है

    प्रणाम

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  28. आज फुर्सत में पूरी कहानी पढ़ी...निशब्द हूँ...क्या कहूँ...थोडा संभल कर फिर आता हूँ...आप यूँ ही लिखते रहना...और हाँ नए साल की शुभ कामनाएं.

    नीरज

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  29. @ अन्तर सोहिल:
    तुम भी फ़ंसे झाँसे में:)

    @ नीरज गोस्वामी जी:
    कीमती समय देने के लिये शुक्रिया, नीरज साहब। दिल से। शुभकामनाओं के लिये शुक्रिया।

    ----

    आपके सेंस आफ़ ह्यूमर, समझदारी, साफ़गोई का पहले से कायल हूँ। आज आपके निशाने का भी हो गया। किसी का विश्वास न टूटे, प्रयास करना ही अपने हाथ में है। और आपके कारण कोई हानि होगी, ये आशंका भी निर्मूल है।
    रही बात संकेत की तो, चौबारे पे दिया जलाने का टैम किसके पास है और देखने की फ़ुर्सत किसे है? मैं गंभीर नहीं हूँ::)))

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  30. आपके लेखन में, शब्दों में एक आकर्षण है।

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  31. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    आपको और आपके पूरे परिवार को नववर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएँ
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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  32. पार साल की पूरी कहानी हमने इस साल पढी, अच्छा लगा। कहानी में जीवन के दो लगभग उलटे पहलुओं का सुन्दर चित्रण है। देवेन्द्र पाण्डेय की बात पर अपनी कहूँ तो शुरूआती दिनों में कहानी पूरी करने के बाद कभी ऐसा भी लगा कि अंत मीठा होता तो? लेकिन धीरे-धीरे सत्य का सौन्दर्य निखरता रहा और अब बकटाहट और चर्पराहट में भी उतना ही आनन्द दिखता है।

    नव वर्ष की मंगलकामनायें!

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  33. हम तो बहुते दिन बाद आयें हैं...पहिले का सब पढ़े तो थे..बाकी आपका प्रेम-प्रसंग एतना प्रकार का है और एतना भारी कि कौन याद रखे...ईहाँ तो जिसको देखो ई मामला में पी.एच.डी. बुझाता हैं...हमहीं रहे फिसड्डी...हाँ नहीं तो..!
    आप क्लियर तो किये हैं कि कहानी है ..बाकी मानेगा कौन ?
    अब ई भी क्लियर कर दीजिये की...ई दुसमन कौन है और चुड़ैल कौन ?
    :):)

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