सोमवार, जनवरी 31, 2011

इंतज़ार.......समापन कड़ी



ऑफ़िस में आज सारा दिन सुबीर का मन उखड़ा-उखड़ा सा रहा। रह रह कर आँखों के सामने एक चेहरा नाच उठता था, एक अजीब सा अहसास छोड़ जाता हर झलक में, एक अनूठी महक। पता नहीं क्या हाल होगा शुभ्रा का? आराम आया कि नहीं? आज वैसे भी ऑफ़िस पतझड़ के बगीचे सा लग रहा था, करवाचौथ का दिन जो ठहरा। महिला सहकर्मी कोई भी नहीं थी, और पुरुष कर्मचारी आज मौके का पूरा फ़ायदा उठा रहे थे। सुबीर हमेशा की तरह वहाँ होकर भी नहीं था, लेकिन आज तो जैसे उसे खुद भी अपने होने न होने का फ़र्क नहीं मालूम चल रहा था। दोपहर में उसने शुभ्रा के घर फ़ोन किया, आंटी ने बताया कि सो रही है। सुबह से बिस्तर पर पड़ी है,  दवा तक नहीं ली। बुखार तो नहीं है, लेकिन कमजोरी बहुत है। सुबीर ने कहा कि ऑफ़िस से लौटते समय मिलकर ही जायेगा।

सुबीर शाम को समय से ही ऑफ़िस से निकल लिया था। शुभ्रा अपने कमरे की खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी थी, देख रही थी बाहर क्यारियों की तरफ़।  कमरे में नीम अंधेरा पसरा था, बीमार लोग शायद रोशनी से आँख बचाते हैं।     अकेली  रोशनी वही हुई,  जब  सुबीर को देखा और शुभ्रा के चेहरे पर चमक सी आ गई थी।

“आ गये तुम, मुझे मालूम था कि आज बिना बुलाये भी आओगे”  हँसते हुये शुभ्रा बोली।

“मैंने दोपहर में फ़ोन किया था, सो रही थी तुम। कैसी तबियत है अब?”

“ठीक  हो गई हूँ मैं। जब तुम्हारा फ़ोन आया,   मैं बिस्तर में थी. लेकिन सो नहीं रही थी। जानबूझकर बात नहीं की थी मैंने।”

“क्यों, बुरा लगा क्या मेरा फ़ोन करना?”

“तुम न करते फ़ोन तो बहुत बुरा लगता। बात कर लेती तो फ़िर तुम कहाँ आते मिलने। काश, ये मियादी बुखार होता और बिना बुलाये तुम रोज ऐसे ही मुझे मिलने आते।” आवाज कुछ बदल गई थी शुभ्रा की।

“पागल हो तुम, दिनभर हम ऑफ़िस में साथ रहते है फ़िर ये कुछ देर  के लिये मिलने आना क्या मायने रखता है?”

“तुम नहीं समझोगे और समझाने से तुम्हारे दिमाग में बात बैठेगी नहीं, बात का मज़ा भी तो नहीं रहेगा।”

“मत समझाओ फ़िर, वैसे भी मेरे दिमाग में ज्यादा अहम चीजें हैं आजकल। जो हैं,  मैं उसीमें बहुत खुश हूँ।”

आंटी उनके लिये चाय-नाश्ता ले आईं। सुबीर ने  चरण-स्पर्श किये और औपचारिकता के लिये मना किया तो शुभ्रा हँस दी, “माँ, पूछ लेती न  चाय बनाने से पहले, कहीं आज ये  भी व्रत पर हों? ऋषिवर का व्रत भंग न हो जाये कहीं।”

माँ ने लाईट जला दी थी और बेटी को हँसते देखकर उनके चिंतित चेहरे पर इत्मीनान आ गया। पास आकर सुबीर के सर पर हाथ फ़ेरने लगीं। उम्र के अनुभव ने बता दिया होगा कि बीमार बेटी को कौन सी दवा आराम दे रही है।

सुबीर ने फ़ौरन नाश्ते की प्लेट पकड़ी और बोला, “व्रत भंग हो ही चुका है तो खा-पीकर क्यूँ न मरा जाये?”

“ऐ सुबीर, सोच समझकर बोला करो। कुछ भी बक दिया, वो भी आज के दिन। कहीं कोई तुम्हारे लंबे जीवन की कामना करती होगी और तुम ऐसा उल्टा-सीधा बोल रहे हो।” तमतमा उठी थी शुभ्रा।

“अरे, इतना सीरियस क्यों हो रही हो? ये तो एक आम वाक्य है जो मैंने तुम्हारी बात के जवाब में कहा। खैर सॉरी,  लो तुम भी चाय लो।”

“मुझसे नहीं पी जायेगी। वैसे अब मैं ठीक हूँ, अब खाना ही खाऊँगी। माँ, सुबीर भी हम लोगों के साथ ही खाना खायेगा। नहीं तो खाना बनाने के नाम पर इसे भागने का मौका मिल जायेगा,  बीमार से दूर।  और मैं फ़िर अकेली बैठी बोर होऊँगी।”  ऒफ़िस से बाहर थी, लेकिन किसी किसी को ऒर्डर देने में जगह से ज्यादा सामने वाले इंसान से ज्यादा फ़र्क पड़ता है।

माँ बर्तन लेकर चली गईं रसोई में, पूजा की तैयारी भी करनी थी और रात के खाने की भी।

“रेडियो सुनना था न, बोर होने से बच जातीं। वैसे भी मैं तुम्हारी तरह पढ़ने लगा हूँ, तुम्हें मेरी तरह रेडियो सुनना चाहिये। न आँखों पर जोर और न दिमाग पर बोझ।”

“आज सारा दिन मैंने और किया क्या है?  उठकर तो अभी ही बैठी हूँ।” कहते कहते शुभ्रा उठ खड़ी हुई और खिड़की के बाहर देखने लगी। पेड़ों पर पक्षी भी अपने अपने बसेरों में लौट चुके थे, शायद रात के चूल्हे-चौके की तैयारी चल रही हों। सुबीर ने अब देखा, शुभ्रा ने आज साड़ी पहन रखी थी। पहली बार साड़ी में देखा था उसे।

चलती रही बातें, बातों में से बातें और सुबीर खुद भी हैरन था कि कैसे इतना बोलने लगा है वो। इतनी बातें मालूम भी थीं क्या उसे अब से तीन चार महीने पहले तक? अंकल आ चुके थे और फ़्रेश होकर रोज की तरह  पूजा पाठ में व्यस्त थे। 

बाहर कुछ चहल-पहल की आवाजें सुनाई दीं, चाँद का विशेष इंतजार था आज जैसे सबको।   शुभ्रा ने खिड़की से बाहर देखा, पेड़ की फ़ुनगी के ऊपर चाँद चमक रहा था। उत्साहित होकर उसने माँ को आवाज लगाई और पूजा की थाली हाथ में लेकर आंटी-अंकल छत पर चले गये थे।

“ऐ सुबीर, देखो न चाँद निकल आया।” बच्चों की सी उल्लासित थी शुभ्रा।

“देख रहा हूँ”  खिड़की के पास आ चुके सुबीर ने कहा, शुभ्रा की तरफ़ ही देखते हुये। “पहली   बार देखा है तुम्हें साड़ी में,  बहुत जम रही है तुमपर। कब खरीदी?”

शुभ्रा ने उसकी तरफ़ देखा, झुककर उसके पैर छू लिये और सुबीर हड़बड़ा उठा एकदम से, “ये क्या कर रही हो?”

“जाने  या अनजाने में,  मेरा व्रत हो गया।  जब भी  तुम्हें जन्मदिन पर या किसी और मौके पर अपनी खुशी के लिये कोई गिफ़्ट दिया है तो तुम कितने नखरे दिखाते हो मुझे।   ये साड़ी मैंने खरीदी है अपने लिये, तुम्हारी तरफ़ से। इसके पैसे तुम दोगे, मैं खुद माँग रही हूँ।”

नजरों की भाषा नजरें पढ़ ही लेती हैं, बहुत विद्वान होना कोई लाजिमी नहीं इस भाषा को जानने या समझने के लिये, कोई लिपि नहीं, कोई ककहरा नहीं।  आंखें बोलती हैं, दिल देखता है, कान महसूस करते हैं और ज्ञान-विज्ञान के सब स्थापित नियम उलट पुलट जाते हैं। कुटिल सरल हो जाते हैं और जो सरल हैं, वो हो जाते हैं चंचल। समझ लेना चाहिये उस समय कि वक्त आ गया है एक नई कहानी के जन्म लेने का।

मुश्किल से सुबीर के मुंह से कोई बोल फ़ूटा, “ऐ शुभ्रा, क्या करके मानोगी तुम?”

“मैं तुम्हारे आँगन में ठुमक कर मानूँगी, जान लो सिर्फ़ इतना। समय तुम तय करोगे, इंतज़ार मैं करूँगी।”

तब से सुबीर  और उसका आँगन भी उस पल का, उस लम्हे का, उस ठुमक का और उस रात की रानी के महकने का  इंतज़ार कर रहे हैं।

p.s. -   मुझे  भी कुछ इंतज़ार है। ताजा जानकारी मिलने तक आने वाली तीस फ़रवरी को दोनों विवाहसूत्र में बंधने वाले हैं, मैं भी निमंत्रण-पत्र का इंतज़ार कर रहा हूँ। मैं गया तो आप सब भी चलेंगे ही। वैसे भी अब तो सब को खुश होना चाहिये कि हैप्पी एंडिंग दे दी है कहानी को:)  छवि खराब हो तो सुधारने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, पत्थर रखने पड़ते हैं दिल पर। तो आप भी फ़िलहाल इंतज़ार कीजिये, इस ब्ल्यू लाईन का अपनी पटरी पर लौटने का, हैंगओवर है लेकिन  जल्दी ही खत्म हो जायेगा। हा हा हा

नाहक सा एक ख्याल आया था दिमाग में, कि प्यार का मासूम रुख भी होता था कभी। लिख देखें, शायद आज के  दिखावटी दौर में भी ये अंदाज  पसंद आ जाये, और लिखना शुरू किया तो खुद को भी अच्छा लगा और आपके कमेंट्स से मान लेता हूँ सीधी सादी कहानी भी पसंद आ सकती है। अब लिखा है तो झेले कौन? हैं न आप सब, झेलो और झेलो...:)) 

34 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर सहज कहानी - दादागिरी (अब दीदीगिरी या दादीगिरी जैसे शब्द तो होते नहीं हैं) पसन्द आयी।

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  2. सच कहूँ तो हैप्पी एंडिंग हो जाने पर प्रेम कहानी सच्ची नहीं लगती ! पता नहीं क्यों :)

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  3. simple, good, beautifully written with flow, very few characters, day-to-day realistic conversation dialogs, happy ending.
    it was enjoyable and affable reading.

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  4. हैप्पी एंडिँग तो दे दी आपने मगर इस चक्कर में कहानी का गला घोँट दिया। जिस बिंदु पर आपने कहानी खत्म की है मेरे विचार से सही नहीं है। ऐसी कौन सी जल्दबाजी और दबाव थे आप पर समाप्त करने के लिए?

    खूबसूरत मोड़ देकर उन अफ़सानोँ को छोड़ा जाता है जिन्हे अंजाम तक लाना मुमकिन न हो। यहाँ तो ऐसी कोई समस्या नहीं थी। और ये करवा चौथ का कंसेप्ट जमा नहीं। एक झटके में आपने नायिका को खांटी परंपरावादी बना दिया।

    माफी चाहता हूँ पर इस समापन कड़ी ने थोड़ा निराश किया मुझे।

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  5. "तीस फ़रवरी को दोनों विवाहसूत्र में बंधने वाले हैं"

    [ :)0 ]

    मुहब्बत पे इत्ता ज़ुल्म करने वाला 'किस्सा-गो' कभी ना देखा :)

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  6. सरलता से पिरोयी सुन्दर कहानी, गीत ने रही सही कसर पूरी कर दी।

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  7. accha jiiii......30 farvari.......very smart ;)
    chalo ji, mubarkaan...jab bhi ho....

    aur happy ending hai acchi baat hai....poori kahani ka mood happy happy sa tha.....vaise sad ending bhi kabhi likhna chaho to padhne ham baithe hain...dont worry... ;)

    amazing sirji.....nayi kahani ke intezaar mein :)

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  8. @आने वाली तीस फ़रवरी को दोनों विवाहसूत्र में बंधने वाले हैं |

    ई कौन सा हैप्पी इंडिंग है भाई ????

    १४ फ़रवरी होता तब तो हैप्पी इंडिंग होता ना,
    @तब से सुबीर और उसका आँगन भी उस पल का, उस लम्हे का, उस ठुमक का और उस रात की रानी के महकने का इंतज़ार कर रहे हैं।

    हा चेहरे पर मुस्कान तो है वो भी पूरे ३६ इंच की वो इस लिए की ये तो वही वाली बात हो गई ना तेरी ना मेरी बीच वाला रास्ता चुन लेते है थोडा हैप्पी थोडा सैड यहाँ तो अब भी इंतजार ही है इजहार तो बस एक तरफ़ा ही है |

    हा एक बात तो मुझे भी खटक रही है ऐसा लगा की कहानी जल्दबाजी में इस कड़ी में ख़त्म कर दी एक कड़ी और हो सकती थी या शायद कहानी इतनी अच्छी लगी की एक कड़ी और पढ़ने की इच्छा हो रही थी जल्दी ख़त्म होने के अफसोस हो रहा है |

    देखा दुनिया में सबको खुश करना कितना मुश्किल है लंबी खिचो तो भी जल्दी ख़त्म करो तो भी सुनना पड़ता है बेचारा लेखक :)))

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  9. भाई साहब प्रणाम,
    30 फरवरी को शादी करा कर क्यो हमारे पेट पर लात मार रहे हो, साल की पहली दावत आने वाली और भी उस दिन, जिस दिन मै चाँद पर घूमने जा रहा हूँ। हा हा हा
    कहानी मे व्रत करने का बहाना दिल को छू गया और किसी की याद दिला गया।
    शुभकामनाये

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  10. feb-30......khoobsurat dhokha.......sahi hai....aisi bhi kya jaldi thi....... yse agle
    post ka waqt aap tay karen......intzar hum kar
    lenge...............

    pranam.

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  11. तीस फरवरी रविवार ही है न, दरअसल और किसी दिन-वार की शादी में हम शामिल नहीं होते, पक्‍का सिद्धांत है अपना. अब अगर हमारा शरीक होना जरूरी मानें तो ...

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  12. लक्की31/01/2011, 1:55:00 pm

    मुबालग़े ही सही, सब कहानियां हीं सही
    अगर वो ख़्वाब है तो ताबीर कर के देखते हैं

    बचपन के सारे बचपने याद आ गये... सच कहूं तो आपने कथा का अत्यंत सरलीकरण कर दिया है... ख़ैर ये भी होना चाहिये कभी कभी...

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  13. अब २९ फरवरी रहती तो एक साल बाद आ भी जाती मगर अब ३० फरवरी तो कभी आने से रही............ वैसे कहानी अच्छी रही और अंत तक बांधे रखने में सफल रही.

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  14. एक अच्छी कहानी के लिये बधाई|

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  15. हा हा हा....
    ३० फरौरी :)
    न तो नौ मन तेल होगा न आपकी शुभ्रा ठुमकेगी...:)
    अब तेरा का होगा रे शुभ्रा...!!
    ई तो हम किये मजाक...बुरा न मानो ब्लॉग्गिंग है...
    बाकी कहानी बहुत ही अच्छी लगी...लास्ट लाइन शुभ्रा जो बोलती है... ऊ तो बस्स....:)
    निर्मल, सहज और सरल कहानी...दिमाग पर कोई जोर नहीं डालना पड़ा है...
    लिखते रहिएगा..
    आभार..

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  16. @ स्मार्ट इंडियन:
    हा हा हा, दीदीगिरी खारिज, दादीगिरी एक्सेप्टेबल। पहले ध्यान नहीं गया नहीं तो गुंडीगर्दी लिख देता, फ़िर सही जब दोबारा बहकने का मौसम आया तो:))

    @ भारतीय नागरिक:
    धन्यवाद सर।

    @ अभिषेक ओझा:
    एकदन सहमत, लेकिन कहानी ही तो है। तकदीर अपने बस में नहीं होती, यहाँ वश चला तो चला दिये।

    @ नीरज बसलियाल:
    thanx Neeraj. at many times simplicity amazes, isn't it?

    @ सोमेश सक्सेना:
    साफ़गोई अच्छी लगी सोमेश। सहमत हूँ कि कहानी जल्दबाजी में खत्म हो गई, असल में ये मेरी प्रेफ़र्ड लाईन है भी नहीं। फ़िर कोशिश करेंगे शिकायत दूर करने की:)
    बहुत सी अत्याधुनिकायें भी बहुत शौक से ऐसे व्रत वगैरह रखती हैं, और सिर्फ़ पहनावा या बोल्ड एंड वर्किंग वुमैन होना किसी के कट्टरपंथी होने न होने का अकेला पैमाना नहीं। निराश किया तुम्हें, उसके लिये खेद लेकिन मैं आशान्वित हुआ कि गौर से भी पढ़ा जाता है मुझे। फ़िर से शुक्रिया।

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  17. इसको खत्म काहे कर दिये हुकुम ! हम तो ता-कयामत पढने के लिये तैयार थे। खैर…… अब कर दिये तो कर दिये पर एक मिठास छोड़ गये मन में। और रही माडर्न बनाम व्रत-परंपरा की बात तो ये कह सकते हैं कि मुहब्बत आस्थायें और भावनायें बदलने का ही नाम है… "अहम ब्रह्म अस्मि" को पालने वाला भी समर्पित हो जाता है इष्ट के आगे। तो जो कुछ भी करने से इष्ट के मंगल होने की सम्भावना हो प्रेमी मन वह करता ही है :)

    ===============================================

    Scientific facts के अनुसार उफ़क फ़ैल रहा है हुकुम ! मतलब ये कि ग्रहों की कक्षा और घूर्णन की गति भी बदल रही है… क्या पता जैसे अभी 4 साल में एक दिन बढ जाता है वर्ष में, कुछ समय बाद 2 दिन बढ जायें । मैं तो आशावादी हूँ शुभ्रा को सुबीर के आँगन में ठुमकता देखने के प्रति :)

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  18. तो ये है हैप्पी एण्डिंग!! मतलब हम सबको बेवक़ूफ़ बना रहे हैं या ख़ुद को मुग़ालते में रखा है!! कहा था न, मैं मिल चुका हूँ इस कहानी के किरदारों से!! बहरहाल, आज एक गाना मेरी तरफ सेः
    तुम आए तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला,
    जाने कितने दिनों के बाद,गली में आज चाँद निकला.

    (सलिल)

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  19. @ अली साहब:
    मज़लूम को जालिम करार दे दिया, अली साहब? यहाँ तक तो फ़िर ठीक है, आप भी हमें किस्सागो कहते हैं?:))

    @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    सच में गीत पोस्ट की सेंटीमेंट्स को ईको करता है, शुक्रिया सर।

    @ saanjh:
    आप पढ़ने को तैयार हैं तो सैड एंडिंग भी जरूर लिखेंगे जी, वो तो वैसे भी हमारी फ़ेवरिट हैं। धन्यवाद।

    @ anshumala ji:
    कहानी तो हैप्पी एंडिंग ही है जी, p.s. को कहानी का हिस्सा न मानकर चलते-चलते मानिए न:) छत्तीस का आंकड़ा सही नहीं, चालीस या फ़िर अड़तीस तो कर ही लीजिये, हा हा हा। और हम तो इसमें खुश हैं कि इस लायक तो हुये कि अब लोग बाग सुनाते तो हैं, वरना जंगल में मोर नाचा किसने देखा? धनबाद रखे रखियेगा:))

    @ दीपक सैनी:
    पार्टी कर देंगे यार, सहारनपुर आकर। चक्कर लगता रहता है अपना, सच में। और हैप्पी जर्नी, चाँद को सलाम-नमस्ते कहना हमारी भी:) याद आ ही गई है किसी की तो फ़िर हो जाये एक पोस्ट? अग्रिम शुभकामनायें।

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  20. @ sanjay jha:
    भैया नामराशि, ये प्रणाम मत किया करो यार:) इससे तो अपने ब्लाग का लिंक दो, हमें उत्सुकता हो रही है:) शुक्रिया।

    @ राहुल सिंह जी:
    आप तो शरीक रहेंगे ही, आप ये बतायें आपकी फ़ीडबैक के आधार पर प्रयोग कैसा रहा? प्रयास किया तो है कि हर पोस्ट अपने आप में एक ईंडिविजुअल कहानी भी लग सके।

    @ लक्की:
    धन्यवाद, इस खूबसूरत शेर और कमेंट के लिये। सरलीकरण का स्पष्टीकरण कहानी के बाद लिखा ही है।

    @ उपेन्द्र ’उपेन’:
    तीस फ़रवरी भी आयेगी उपेन्द्र जी, निश्चिंत रहें।

    @ Patali-The-Village:
    धन्यवाद।

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  21. संजय जी,
    हम अपनी जिंदगी में इतने उलझावों का सामना करते हैं कि सीधी- सपाट कहानी अप्रत्याशित लगती है. 'इंतज़ार' का सीधा अंत इसीलिए कुछ लोगों को निराश करता है.
    'करवा चौथ' अब 'हसबेंड डे' होने ही वाला है.
    यह भी जान लीजिए कि हसबेंड का मूल अर्थ अब केवल 'एनिमल हसबेंडरी' में ही सुरक्षित बचा है. :)

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  22. भाग एक से लेकर अभी तक कि पूरी कहानी पढ़ी. सच कहूँ तो कहानी एकदम सीधी सधी सरल है पर मुझे ज्यादा मजा कहानी के प्रत्येक भाग पर मिली टिप्पणिया पढ़ कर आया. ब्लॉग्गिंग का यही मजा है. सभी टिप्पणी कर्ता ब्लोग्गेर्स को मेरा प्रणाम.

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  23. @ अदा जी:
    ऐसा जरूर होगा। शुभ्रा सुबीर के आँगन में ठुमक कर ही मानेगी।
    लास्ट लाईन तो मुझे खुद को ऐसी अच्छी लगी कि यहीं समेटना पड़ा सब कुछ।
    आभार तो आपका है जी।

    @ रवि शंकर:
    लो कल्लो बात। जिनके चक्कर में ड्रामा किया, वही फ़िर गिला कर गये।
    अनुज, आज तुम्हारा कमेंट कुछ पहले आया होता तो मुझे ये थोथी दलीलें न देनी होतीं। मैंने तीस फ़रवरी की बात मजे के लिये ही लिखी थी लेकिन कहीं एक आशा थी कि यहाँ कुछ भी असंभव नहीं। मेरी सोच को(व्रत वाली भी) एक सारगर्भित आधार देने के लिये, सैल्यूट बहुत होगा? सैल्यूट, रवि।

    @ सम्वेदना के स्वर:
    सलिल भैया, है तो हैप्पी एंडिंग ही(p.s. को अलहदा ही रहने दीजिये, वो तो हमारा हस्ताक्षर इश्टाईल है), बाकी आप जो फ़ैसला सुनाये:) आपकी शैली में कभी पात्र या घटना विवरण जानने को मिला तो बहुत मजा आयेगा। गाना बहुत-बहुत प्यारा है, थैंक्स।

    @ prkant:
    प्रोफ़ैसर साहब, निराशा में भी तो आशा, प्यार ही देख रहा हूँ।
    बाद में जो लिखा है आपने, सो तो जान भुगत ही रहे है:))

    @ विचारशून्य:
    मेरी पोस्ट पर कमेंट्स पोस्ट की फ़ेस वैल्यू बढ़ाते हैं, तुम्हारी ताल से ताल मिलाता हूँ दोस्त। तुम भी तो प्रणाम के हकदार हो।

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  24. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  25. पहली बार आप के ब्लॉग पर आया हूँ आकर बहुत अच्छा लगा , आपकी कहानी भी बहुत सुंदर लगी
    कभी समय मिले तो हमारे ब्लॉग//shiva12877.blogspot.com पर भी अपने एक नज़र डालें ..

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  26. @mo-sum-aap.....kaasekahoon/blogspot.com

    address to de raha hoon.....lekin aap ye na samjhna ke maine aap ki baat man li.....hum nahi
    parnewale is pher me......ek post likhne ke chakkar me to sari padhai choot jayegi.......

    apne gen...me sabse chotta hoon.....adat bani hue hai......jinke prati man me adar aa jaye...
    unneh pranam karne me kya sankoch............

    pranam.

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  27. घर पर हूँ इस हफ्ते, तो देर से आया। वैसे भी कोई समय पर तो आया करता नहीं हूँ।
    ईमानदारी से कल पढ़ लिया था, पर ऐन वक़्त पर कनेक्शन कट गया, वरना रवि भाई की बात चोरी कर लेता :)
    खैर, मुद्दा ये है कि मुझे सुखद कहानियाँ पसंद हैं। मीठी हों तो और भी पसंद। तीस फरवरी, पैंतीस मार्च का इन्तजार भी कर सकता हूँ, गौथम शहर बैटमैन का इन्तजार कर सकता है तो मैं भी तीस फरवरी का इन्तजार कर सकता हूँ।

    कहानी अच्छी लगी, पेचीदा नहीं है, पर सरल होना खासियत नहीं है, ऐसा भी तो नहीं।
    रोटी-चावल तो रोज का नॉर्मल मेनू ही होता है न? :)

    P.S.: "If this is a reality I got to win, and if this is a dream, I don't like nightmares. Stay assured, I'll be back." Neo said this to Morpheus. -MATRIX

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  28. @ अदा जी:
    क्या हुआ जी? कोई गलती?

    @ शिवकुमार(शिवा):
    धन्यवाद शिवाकुमार जी, अध्यापक हैं आप। आशा है त्रुटियों पर ध्यान दिलाते रहेंगे।

    @ sanjay kumar jha:
    बहुत चालू निकले यार, लिंक पर क्लिक किया तो मेरे ही डैशबोर्ड पर पहुंच गया:))
    प्रणाम का लोजिक इतना शानदार दिया है कि मना नहीं कर सकता अब।
    पढ़ाई पहली प्राथमिकता होनी ही चाहिये, शुभकामनायें।

    @ अविनाश चन्द्र:
    better late than never, और घर पर हो तो और भी लेट हो जाते कोई दिक्कत नहीं थी। पेरेंट्स को मेरी तरफ़ से चरण-स्पर्श और आभार पहुंचाना।
    अवि और रवि मुझे बहुत कुछ एक से दिखते हैं, इंतज़ार को तैयार हो जानकर अच्छा लगा(वैसे ये मालूम था), तीस फ़रवरी आयेगी:)
    पेट नार्मल मीनू से ही भरता है, ये अलग बात है कि आज नार्मल चीजें ही अबनार्मल लगती हैं। थैंक्स अगेन, अवि, मेरे भाई।

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  29. बाऊ जी,
    नमस्ते!
    सारी किश्तें अभी सुबह ही पढ़ी हैं. ये जो 'कहानी' है, मुझे यकीन है के आपकी किसी हकीक़त का नाटकीय रूपांतरण है... हां, बीच-बीच में आपने राईटर वाली फीलिंग भी ले ली है. अच्छी लगी.
    कुछ-न-कुछ तो है जो पात्रों को आपसे जोड़ता है.... पूरी तरह काल्पनिक....? शायद नहीं.


    ख़ाकसार अब जे ए आई आई बी है. कल ही रिज़ल्ट आया है.
    आशीष

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  30. @ आशीष:
    आज मेरी बात नहीं, सिर्फ़ तुम्हारी बात। JAIIB एक छोटा सा पड़ाव है तुम्हारे लिये, ये तो मैं भी हो गया था:) जब तक हैप्पिली अनमैरिड हो, CAIIB भी हो जाओ और और और भी, उसके बाद का कुछ तय नहीं होता:))
    बधाई हो, बहुत बहुत लेकिन याद रहे ये मंजिल नहीं है।

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  31. aaj pooree kahanee ek sath padee koi intzar nahee karna pada......badee pyaree lagee......kitnee sahjata se jindgee utar lete ho lekhan me.......sab kuch samne ghatta sa nazar aata hai......

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  32. आज इस कहानी के सभी एपिसोड एक साथ पढ डाले. कुछ सेड सेड भी हो सकता था. बहरहाल गुदगुदी तो हुई.

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  33. कथ्य अक्सर पढ़ा और देखा हुआ है लेकिन कहने का तरीका बहुत सुन्दर है .सहज स्वाभाविक ,जो किसी भी कथ्य को विश्वसनीय और पठनीय बनाता है .

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