शुक्रवार, अप्रैल 01, 2011

मौके की बात..


दूसरे शहर में रिश्तेदारी में एक मृत्यु हो गई थी और अंतिम संस्कार में जाने के लिये घर की तरफ़ से मेरी ड्यूटी लगा दी गई थी। अपने उम्र थी लगभग अठारह उन्नीस साल, दुनियादारी का अनुभव तब तक न के बराबर था। संयोग कुछ ऐसा बैठा कि गाड़ी में आठ सवारियाँ थी, छह महिलायें और दो पुरुष। बेमन से जाना पड़ रहा था।  चुपचाप जाकर सूमो की पिछली सीट पर बैठ गया। लगभग तीन घंटे का रास्ता था, सारे रास्ते चाचियाँ  दादियाँ आपस में हंसी मजाक, निंदा चुगली वगैरह वगैरह करती रहीं। अपन दार्शनिक मुद्रा में जीवन-मृत्यु के बारे में सोच रहे थे और उन सबकी जीवंतता पर गर्व महसूस कर रहे थे। म्रुत्यु वाले घर में जाकर गाड़ी रुकी, दरवाजा खुला और उन्हीं हँसती खिलखिलाती (अ)बलाओं का  रुदन वादन देखा तो मुझे एक बार तो लगा कि मैं सारे रास्ते सो रहा था और वो हँसी-ठट्ठे सब मैंने ख्वाब में ही देखे थे, नहीं तो ये जो दोहत्थड़ मार मारकर रो रही हैं ऐसा कैसे कर सकती थीं? कुछ देर बाद वापसी के लिये गाड़ी में बैठे और गाड़ी के चलते ही फ़िर वही हँसी मजाक शुरू, अब लगने लगा सच तो यही है जो अब देख रहा हूँ। बीच का एक घंटा शायद मैं सपना देख रहा था। एक हमारी चाची लगती थीं, जिनसे थोड़ा बहुत मजाक कर लेता था।  उनसे पूछा, “चाची, ये एकदम से हँसने से रोने का और रोने से हँसने वाला बटन कहाँ होता है?”  चाची ने झिड़क दिया, “चल्ल पागल, ऐहो ज्या कोई बटन नहीं हुंदा। ऐ सब तां मौका देखके करना ही पैंदा है। मौका देख्या जांदा है।”  चलो, कोई मरा सो मरा. अपने को  कुछ तो ज्ञान प्राप्ति हुई। अब हम कोई गौतम तो थे नहीं कि बुढ़ापा और मौत देखकर बुद्ध बनने निकल पड़ते। इतना ही बहुत है।

महीना भर पहले की बात है, ओफ़िस से लौटकर घर गया तो गोल्डी (छोटा बालक) कहने लगा, “पापा, अर्शी की मम्मी कह रही थी कि जब तुम लोग दिल्ली जाओगे तो अपना बैड हमें बेच देना।” मैंने कहा, “अच्छा, इसीलिये तुझे कभी कभी मैगी खिलाती थी वो? ताकि मौका आने पर औने-पौने दाम पर बैड वगैरह मिल जाये।” अपना बालक नाराज हो गया, उसके दोस्त की मम्मी की निष्ठा पर शक जो किया था मैंने।

उसके बाद पता चला कि ज्यूँ ज्यूँ बच्चों के एग्ज़ाम खत्म होने की और बढ़ रहे हैं,  कई आंटियों ने फ़्रिज, अलमारी, टी.वी. वगैरह पर अपना दावा दायर करना शुरू कर दिया है, अगर बेचना हो तो हमें दे देना। अपन भी बालकों को यही कहते रहे कि बेटा आतिथ्य का आनंद उठाते रहो और कहते रहो कि अगर बेचना पड़ा  तो आप को ही बेच देंगे:))

अपने को भी घर से बाहर निकलते ही मिलने वाली नमस्ते, सत श्री अकाल की मात्रा बढ़ती हुई लग रही थी। बराबरी का समय है, भाई लोग कैसे पीछे रहते? दो जनों ने हमारी मोटर साईकिल के खरीदार होने की पुष्टि की और उनमें से एक ने तो बाकायदा दूसरी स्टेट के नंबर से पेश आने वाली दुश्वारियों का पूरा नखशिख वर्णन करते हुये सलाह दी कि दूसरी स्टेट के वाहन लेकर जाने की बजाय तो बेशक तौल के हिसाब से बेचनी पड़े, मोटर साईकिल बेचकर ही जाना। घर जाकर नई मोटर साईकिल बल्कि कार ले लेना, आपको तो बैंक से आसानी से लोन मिल ही जायेगा। सतवचन भाईसाहब, आप का कसूर नहीं है,  मुझ बावली बूच की शक्ल ही ऐसी है कि ..।

बच्चों के जाने का दिन आ गया, जाने से पहले वो लोग अपनी मम्मी के साथ जाकर अडौस-पड़ौस की सब आंटियों से मिल आये। लौटे तो बताया कि कई आंटियाँ तो सच में रो पड़ी थीं। मैंने समझाया कि बेटा, मौका ही ऐसा है वो बेचारी क्या करतीं?  ट्रक में सामान लाद रहे थे  तो तीन चार भाभियाँ(मेरी आंटी थोड़े ही हैं?:)  बाहर गली में निकल आईं, “वीर जी, जा रहे हो?”  तीन साल हो गये एक ही मकान में रहते हुये, किसी ने बात नहीं कि और आज जब जाने का समय आया तो कैसे उदास हो गईं हैं बेचारियाँ? मैं कह देता कि मैं तो आ रहा हूँ लौटकर, ये लोग अब नहीं आयेंगे। बच्चों का नाम लेकर रुआँसी हो गईं सारी,  हमारा तो इतना दिल लगा हुआ था आपके बच्चों के साथ वगैरह वगैरह।  यही कहा कि खुशकिस्मत हैं बालक, जो आप लोग इतना प्यार करती हैं।

बच्चों को छोड़ आया हूँ (मय उनकी मम्मी) उनके दादा दादी और चाचा चाची के पास और अपन हो गये हैं बैक टु पैविलियन। चार पांच दिन उसी भरे भरे मकान में बिताये, जो अब बिल्कुल सूना हो गया था और आज  मेट्रो से जिला मुख्यालय, वहाँ से शहर वाले अपने सफ़र को आगे बढ़ाते हुये आज अपना बोरिया बिस्तर लेकर गाँव में पहुंच गया हूँ। देखते हैं ये सफ़र अब और कहाँ तक पहुंचता है।

आज जब फ़ाईनली अपना सामान लेने गया तो एक भाभीजी फ़िर मिल गईं। उनका  फ़िर वही सवाल, आज मेरा जवाब बदला हुआ था, “हाँ जी, आज मैं भी जा रहा हूँ। दो तीन महीने गाँव में ही रहूँगा।”  भाभीजी आँखों में आँसू भर लाईं, “गोल्डी को मैं दिन में कई बार याद करती हूँ। मेरी तरफ़ से बहुत बहुत प्यार देना उसे, और उसे कहना आज मुझसे फ़ोन पर बात करेगा। मेरे भतीजों जैसा लगता है मुझे।” मैंने कहा, “भतीजों जैसा क्या, भतीजा ही तो है आपका।” हँसकर आगे बढ़ दिया। उन्होंने फ़िर पीछे से आवाज लगाई, “वीरजी, अगर कम्प्यूटर वाला टेबल आपने न रखना हो तो….”

ऐसे मौके पर मैं कन्फ़्यूज़ हो जाता हूँ, ख्वाब कौन सा है – हँसते खिलखिलाते चेहरे या आँसू भरी आँखें? किसी से नेह-प्रेम मौका देखकर बढ़ाना चाहिये या इन संबंधों में भी मौके की तलाश में रहना चाहिये?   उन्हें तो कह दिया कि मुझे खुद के अलावा कुछ नहीं बेचना है, और अपने मन को बहलाया कि इतना बाचली बूच नहीं हुआ कि औने पौने दाम में अपना सामान ऐसे बेच दूँगा। जाओ न किसी ऐंटीक शाप में अकबर का हुक्का, माईकल जैक्सन की पेंट, एल्विस प्रैस्ले का गिटार खरीदने तो पता चल जायेगा तुम्हे। भाव सुनकर गश खा जाओगे और लोग चले हैं मेरा बैड, मोटर साईकिल, कम्प्यूटर टेबल वगैरह खरीदने:)) लोगों को कदर ही नहीं है, हा हा हा।

किराये के नये मकान में आने में कौन सा कम ड्रामा हुआ? कहीं मालिकों को हम पसंद नहीं आये और कहीं मालिक वगैरह हमें पसंद नहीं आये। कहीं एकदम रेगिस्तान सा माहौल और कहीं एक्दम गार्डन गार्डन। अब जाते जाते हाई कमान से हुकम मिला था  कि हाथ पाँव समेट कर रहना। तो सिमटा हुआ हूँ फ़िलहाल।  देख लो पोस्ट भी बारह दिन के बाद लिखी है। जाने से पहले कुछ न कहा होता तो देखनी थी मेरी चाल:)

गुस्सा तो बहुत आ रहा है और बहुतों पर आ रहा है। अपने ऊपर ऐसी बीत रही है कि चाय तक मिलनी मुहाल हुई पड़ी हैं और हमारे ही यार हैं कि सलाह दे रहे हैं कि हफ़्ते में कम से कम दो दिन अर्थ-ऑवर मनाना चाहिये।  भैये, हम तो तैयार हैं पर करें क्या?  मौके की बात है:)

आज से नई जगह सैटल हुआ हूँ, अब यहाँ के अनुभव कैसे रहते हैं, जानेंगे आप लोग..


43 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो दुनियादारी है... बहुत तो नहीं लेकिन थोड़ा नुकसान उठाने के बाद भी दुनियादारी नहीं सीख सका.... और सच बात यह है कि मैं सीखना भी नहीं चाहता, अलबत्ता बच्चों को दुनियादार बनाने का प्रयत्न अवश्य करूंगा...

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  2. रोचक शैली में प्रस्तुति अच्छी लगी।

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  3. कमाल की शैली। प्रेरक संस्मरण।
    ..चलिए टीन एज में देखी महीन दुनियादारी से कम से कम इतना लाभ तो हुआ कि ठगे जाने से बच गये। मगर ये तो बताया ही नहीं कि कहाँ से चले कहाँ पहुँचे ?

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  4. अर्थ-ऑवर मनाना तो, सौ चूहे खा कर हज को जाने का सा लगता है

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  5. sach hai dada.. 'ye dunia agar mil bhi jaaye to kya hai' yoon hi nahin likha-gaya gaya. badhiya chuteele andaaz me likha gaya prasang. sath me pata bhi chala ki aap ab bedil shahar me pahunch gaye.. :)

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  6. तो ये बात थी ....तभी कहूं कि आजकल वो संजय टाईप का बंदा किधर को गुम हो गया है :)

    नई जगह हाथ पैर ही नहीं बहुत कुछ संभाल कर रखना नहीं तो सचमुच में गुत कट्टण दे वेला आ जाणगी :)

    मस्त लिखा है....एकदम राप्चिक।

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  7. जिस ज़माने में हम डायरी लिखा करते थे, लोगों की कही बात के साथ अक्सर अनकहा "सेंट्रल आइडिया" भी लिख लेते थे। आज भी कुछ "बेहद मज़ेदार" पढना हो तो पुरानी डायरियाँ लेकर बैठ जाते हैं।

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  8. मौका देखकर चलना पड़ता है, क्या करेंगे।

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  9. इतने (गुण) ग्राहक मिल रहे हैं आपके सामानों के, बधाई.

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  10. संजय जी कुछ समय पहले तक मैं सोचता था की सारी जिंदगी एक ही जगह पर काट देना बड़ा बोरिंग होता है अतः साल दो साल में एक शहर से दुसरे शहर तबादला होते रहना चाहिए. बहुत बार मन में ये विचार आया तो ऊपर वाले ने सुन ली और एक सरकारी फरमान आया जिसमे देश के ३८ शहरों में प्रोमोशन ले जाने की बात है. पर अब जब मौका मिल रहा है तो पता नहीं कौन सी चीज फट के हाथ में आ गयी. पत्नी और बच्चे कालापानी तक जाने को तैयार हैं पर मुझे हिम्मत ही नहीं हो रही. दिल बार बार कह रहा है कौन जाय पांडू मंडावली की ये गलियां छोड़ कर.......

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  11. संजय जी, आलसी राव साहब की पोस्ट "अधेड़ी" पढ़ी. मन में बहुत कुछ उमड़ आया पर बाद में पता चला की राव साहब बड़े शरारती हैं जो जुलाब देकर अपने टोइलेट का दरवाजा बंद कर लेते हैं. अब कुछ उमड़ ही आया है तो कहाँ जाऊ . मेरी मंडावली में जब चारों तरफ खेत ही खेत थे तो हमें लोग ससम्मान अपने खेत पर बुलाया करते थे. अपने मित्र का खेत समझ इधर चला आया हूँ. आशा है आप बुरा नहीं मानेगे.



    तो राव साहब के लिए संदेसा इस प्रकार है......



    राव साहब,

    अधेड़ावस्था तो एक ठहराव है. ये वो वक्त है जब जीवन नदिया का प्रवाह गंभीरता की चादर ओढ़ लेता है. लोग भीतर के प्रवाह को नहीं देख पाते और ऊपर की शांति देख इस पर बांध बना सारा प्रवाह ही रोक लेने की कोशिश करते हैं. अरे बांध बनाया है तो कोई भूमिगत सुरंग बना कर इसकी अथाह शक्ति का उपयोग करते रहो वर्ना नदी का पानी तट तोड़ कर बहने लगेगा. मेरे एक मित्र ने एक बार कहा था की युवावस्था तो बियर की बोतल है एक बार ढक्कन खुला नहीं की सब कुछ बिखर कर बहार ही फ़ैल जाता है वहीँ अधेड़ावस्था सोस की बोतल है जहाँ ढक्कन बंद हो या खुला कोई फर्क नहीं पड़ता.

    साहब बियर के अपने मजे हैं सोस के अपने मजे. दोनों का लुत्फ़ जरुर उठाना चाहिए.

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  12. आप को महिलाओ की तारीफ करनी चाहिए की वो माहौल के हिसाब से खुद को तुरंत ढाल लेती है एक जगह का माहौल दूसरी जगह नहीं ले कर जाती है पुरुषो की तरह, मार्च आया नहीं की उनके साथ पुरे घर को या कहू रिश्तेदारों दोस्तों को भी पता चल जाता हा की मार्च आ गया है इस समय उन्हें तो मरने की भी फुरसत नहीं है आफिस में मुड ख़राब हुआ तो वो घर पर भी दिखाई देगा | सोचिये की यदि महिलाए खुद को माहौल के अनुसार तुरंत नहीं ढालती तो आप की श्रीमती जी हर नई जगह जाने के बाद ढेरो शिकायते करती रहती की ये ठीक नहीं है वो ठीक नहीं है और सब का ठीकरा आप पर फूटता |
    सोच रही हूँ की अर्थ-ऑवर से जुड़े लोग जब इसका ये हाल देखेंगे तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी :))))

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  13. अच्छा जी तो ये बात थी,
    अब कंक्रीट के जंगल से निकल कर पेडो की छाँव मे पहुंच गये हो।
    अब नयी जगह जरा संभल कर, भाभी जी के कहना (हाथ पाँव समेटकर)मानकर चलोगे तो फायेदे मे रहोगें।
    मौके पर बात कहना तो कौई आपसे सीखे।

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  14. hillerious post......poora ka poora amod-pramod-vinod se ata-pata .... rapchik post............

    'adheri' me ate-ate.....vina haath pair hilate...
    sare jaroorat poore hote rahne ki adat......aur
    yakayak 'ek cup chai....ka na milna'.....upar se
    turra ye ke khas apne parosi 'earth awar mana-ne'
    ki nasihat de.........wallah...banda kaise-kar kya kare......

    balak bare bhai ke saath poori sanubhuti rakhte hue ek cup adrak wali chai bhejta hai.....

    pranam.

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  15. 1.मौका देख्या जांदा है।”
    2.जब तुम लोग दिल्ली जाओगे तो अपना बैड हमें बेच देना.
    3. लोग चले हैं मेरा बैड, मोटर साईकिल, कम्प्यूटर टेबल वगैरह खरीदने:)) लोगों को कदर ही नहीं है, हा हा हा।.....
    jai baba banaras....

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  16. नये शहर में फोन भी नया खरीदना चाहिये जी
    पुराना मेरे जैसे खरीद सकते हैं :)

    प्रणाम

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  17. “चल्ल पागल, ऐहो ज्या कोई बटन नहीं हुंदा। ऐ सब तां मौका देखके करना ही पैंदा है। मौका देख्या जांदा है।

    संजय कई गल्ला ते मेरे मन विचओ कड लेना हैं........ बोत वधिया.....

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  18. हम भी वो बटन अब तक ढूंढ रहे हैं।

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  19. @ भारतीय नागरिक:
    सिखाईये साहब, बच्चों को सिखाईये दुनियादारी। शुभकामनायें।

    @ मनोज कुमार जी:
    स्वागत है सर। अपने पसंद किया, शुक्रिया।

    @ देवेन्द्र पाण्डेय:
    कहाँ बचे देवेन्द्र भाई, अब जानबूझकर ठगे जाते हैं बस्स:))पहुंचना कहाँ हैं, असली बात तो चलते रहने की है।

    @ काजल कुमार जी:
    यही कमेंट मैंने ’अर्थ-ऑवर’ से संबंधित एक पोस्ट पर किया था।

    @ दीपक 'मशाल':
    अभी नहीं पहुँचे भाई, पायलट गार्डस जरूर पहुँच गये हैं उस शहर-ए-बेदिल में जिसे लोग दिल्ली कहते हैं:)

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  20. @ सतीश पंचम:
    वेला कुवेला की तो देखी जायेगी, कुछ ब्योंत तो बने पहले:))

    @ Smart Indian - स्मार्ट इंडियन:
    अनकहा "सेंट्रल आइडिया" बोले तो ’बिटवीन द लाईंस?’ जले पर नमक छिड़क रहे हो भैया:))

    @ प्रवीण पाण्डेय:
    हम भी करेंगे जी कोशिश।

    @ राहुल सिंह:
    जो बिकने को तैयार है(मैं खुद), उसका ग्राहक एक भी नहीं:)

    @ विचार शून्य:
    गुरू नानक देवजी की एक साखी है ’उजड़ जाओ बस जाओ’ वाली। पढ़ कर विचार कर लेना, उजड़ना है या बसना है:)

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  21. @ विचार शून्य:
    राव साहब के बारे में सही आकलन किया है, सच में बहुत शरारती हैं। लेकिन वो कहते हैं न कि ’जबरा मारे और रोने न दे, खाट छीन ले सोने न दे’ बर्दाश्त करना ही होगा उन्हें:)) वैसे कुछ कुसूर तुम्हारा भी है, होली वाली पोस्ट पर तुम्हारा नाम उन्होंने डेफ़िनेट आगंतुकों में लिखा था, तुम गये ही नहीं, सो ये शिकायत खारिज। और वैसे भी अब उन्होंने अपने दरवाजे खोल दिये हैं, अगर उनके खेत को भी सुरभित करना हो तो अब कर सकते हो। ये सिर्फ़ जानकारी के लिये बताया है, वरना यहाँ तो किवाड़ खुले ही हैं

    @ anshumala ji:
    हम तो महिलाओं की तारीफ़ ही करते हैं हमेशा, बल्कि इस वजह से बहुत से आक्षेप भी पाते रहते हैं। ये सही कहा आपने कि श्रीमतीजी से कभी शिकायत भी नहीं सुनने को मिली और आज तक कोई ठीकरा भी हमारे सर नहीं फ़ूटा:)
    अर्थ-ऑवर से जुड़े लोगों का इधर क्या काम और हमें ही क्या फ़िक्र उनकी प्रतिक्रियाओं की।

    @ Deepak Saini:
    कहना तो माना ही जायेगा, लेकिन फ़ायदे का सौदा अपने को जमता नहीं कभी भी। हम घाटे वाली कंपनी हैं और उसमें ही मस्त भी हैं:)

    @ सञ्जय झा:
    देख लो नामराशि, कैसे कैसे दोस्त हैं हमारे:) अदरक वाली चाय में आनंद आ गया, तुम्हारे प्रेम से अभिभूत। लेकिन, ’ये दिल मांगे मोर’ :))

    @ Poorviya:
    jai baba banaras....

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  22. जो बन्दा उन्नीस साल की उम्र से दुनियादारी को गंभीरता से समझने लगा तो फिर कैसे ना इत्ते पावरफुल झटकों की असलियत ना समझेगा :)

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  23. वैसे खुश तो बहुत होंगे आप ................................. कुछ घंटो के लिए ....................... फिर तो चुहला-चोकी ने पाटे बिठा दिया होगा

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  24. @ अन्तर सोहिल:
    शाबाश ढब्बी, मेरी गैल न खड़े होईयो। दूसरी पार्टी के साथ हो थम भी:)

    @ दीपक बाबा:
    सबकी सांझी बात है भाई मेरे, तेरी क्या और मेरी क्या। हिम्मत बढ़ाने का शुक्रिया।

    @ राजेश उत्साही जी:
    ढूंढते रह जाओगे भाई साहब:)

    @ अमित शर्मा:
    तभी से देख झेल रहा हूँ यार ये मौका बेमौका:)
    और खुश मैं नहीं तुम सब हो, मुझे अकेला देखकर। सोच रहे हो कि हाथ जलेंगे इसके तो मजा आयेगा। देख लूंगा तुम्हें भी:))

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  25. संजय जी,

    आप बटन ढूंढ रहे थे, लोगों के सम्वेदकों के फ़िल्टर कचरे से जाम हुए पडे है।

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  26. दुनियादारी तो कोई महिलाओं से सीखे!दुनियादारी खुद भी इनसे पनाह मांगे !

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  27. "अपने को भी घर से बाहर निकलते ही मिलने वाली नमस्ते, सत श्री अकाल की मात्रा बढ़ती हुई लग रही थी।"
    व्यंग्य नहीं यथार्थ है !


    "अब जाते जाते हाई कमान से हुकम मिला था कि हाथ पाँव समेट कर रहना। तो सिमटा हुआ हूँ फ़िलहाल। देख लो पोस्ट भी बारह दिन के बाद लिखी है। जाने से पहले कुछ न कहा होता तो देखनी थी मेरी चाल:)"

    बेचारे संजय :) :)

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  28. तो हुए मुझे युगों इधर (असल में इधर उधर किधर भी) आए हुए। :)
    सचमुच, नेह की कौन सी रेख किस सोते से निकली है, ये जानना बहुत कठिन है।
    वैसे पाँच से सीधा बारह दिन!! बहुत ज्यादा इन्क्रीमेंट नहीं हो गया एक ही बार में? :)

    उम्मीद है सही से सेटल हो गए होंगे।

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  29. तो क्या अर्थआवर घरवाली के साथ ही मनाने हैं ?

    खूबसूरत पोस्ट :)

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  30. @ सुज्ञ जी:
    ऋषिवर, अपने सौम्य लेकिन अकाट्य तर्कों से आप जुटे तो हैं जाम खोलने पर, उन प्रयासों के लिये शुभकामनायें और इधर झाँकने का शुक्रिया।

    @ Arvind Mishra ji:
    डा.साहब, नारी और नारी संबंधी विषयों पर आपकी जानकारी अथाह,असीम,अगम,अपार,अतुलनीय हैं:))
    यह मेरी अज्ञानता ही है जो समझ नहीं पा रहा हूँ ये महिलाओं की तारीफ़ है या कटाक्ष है। तारीफ़ ही समझ लेता हूँ(मेरी नहीं महिलाओं की दुनियादारी की समझ की) :))

    @ पी.सी.गोदियाल "परचेत":
    व्यंग्य नहीं यथार्थ है !
    बेचारे संजय :) :)
    गोदियाल जी, आपने सही पकड़ी है नब्ज़।

    @ Avinash Chandra:
    पांच से बारह हो गया, पर कश्मीर तो अपना है। कर देंगे कसर कभी पूरी। छोटे, नेह के संबंध हों या इसके विपरीत, जाने कबके और किस जन्म के संबंध होते हैं जो समय आने पर फ़लते फ़ूलते हैं, यही दुनिया है।
    सही से तो अनसैटल होना होता है, सैटल हो गये बोले तो रुक जाना, जड़ होना। हँस दो यार:)

    @ Apanatva:
    सरिता मैडम,पडौसी हमेशा अच्छे मिलते रहे हैं, बताऊँगा कभी किस्सा कोई तो समझ लीजियेगा कि सिर्फ़ नमक मिर्च अपना है:))

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  31. अपन तो ठहरे कूपमडूप जहा पैदा हुये वही से चले जायेंगे .नये नये लोग नये नये शहर और पुराना सामान अच्छा तो लगता ही होगा

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  32. शहर का नाम बता देते तो हम भी कुछ खरीदने बेचने वालो को भिजवा देते. :)

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  33. apnee to pareshani aisi lagi hai ki kaha bhi nahin jaataa... airtel wale beewee ki party men aa gaye hain aur band kar rakhaa hai fir se connection..
    mazaa aayaa padhakar.. apne din yaad aaye. lekin aapke likhe ka jawaab nahin..paappe tussi great ho!! kahin aisaa n ho ki aap dilli aao aur ham CHAL UD JAA RE PANCHHI BOLTE UD JAAYEN!!

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  34. जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं का गहन अवलोकन-अन्वेषण किया है आपने।

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  35. 'तू कहाँ ये बता ,इस नशीली रात में,
    माने न मेरा दिल दीवाना..'
    मस्त कर दिया भाई रोचक संस्मरण और गाने ने'
    नवसंवत्सर की हार्दिक शुभ कामनाएँ.
    मेरी नई पोस्ट 'वन्दे वाणी विनयाकौ' पर आपका स्वागत है.

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  36. Greetings from USA! Your blog is really cool.
    Are you living in India?
    You are welcomed to visit me at:
    http://blog.sina.com.cn/usstamps
    Thanks!

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  37. @ अली साहब:
    हाँ जी बिल्कुल।

    @ dhiru singh {धीरू सिंह}:
    सही फ़रमाया हुज़ूर ने। वो फ़िर आप नहीं कोई और थे जो दिल्ली में उधम उठाए थे। हम शोर मचा देते हैं, आप चुप रहकर सब..।

    @ Abhishek Ojha:
    शहर का नाम है ....रांव....। भेज दो तुम भी, हमारी तो देखी जायेगी।

    @ चला बिहारी ब्लॉगर बनने...
    सलिल भाई, ये टैनिस एल्बो वगैरह बड़े लोगों के चोंचले हैं। अपन को आप फ़िटटमफ़िट चाहिये हो, एक हफ़्ते का टैम है। get well soon.

    @ mahendra verma ji:
    आने का धन्यवाद व्रा साहब।

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  38. बहुत रोचक ढंग से आपने दुनियादारी के बारे में बताई है ... वैसे मैं भी कई बार सोचता हूँ कि वह सूरत/मूड बदलने वाला बटन मिलता तो कितना अच्छा होता ...

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  39. संजयजी,मुझसे कोई खता हुई क्या ?

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  40. @ Rakesh Kumar ji:
    शुभकामनाओं के लिये आपका आभारी। आपके बाद वाले कमेंट के लिये विनीत होकर पूछता हूँ, ऐसा क्यों सोचा आपने? बतायेंगे तो अच्छा लगेगा।

    @ tongchen@seattle:
    oye balle balle:))

    @ Indranil Bhattacharjee:
    मिले वो बटन तो बताना दादा:)

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  41. अजी संजय जी,
    भलाई का अब ज़माना ही नहीं रहा का ?
    लोग-बाग़ आपका बोझ हल्का करना चाहते हैं और आप ऐसा सोचते हैं...:)
    हे राम, अब देखिये न आपकी पोस्ट्स कितनी अच्छी होती हैं...सारे लोग कितने खुश होते हैं पढ़कर...हम भी बहुत खुश होते हैं..
    वैसे अब आप दिल्ली कब जा रहे हैं....? और दो-चार पोस्ट्स जो आपने लिखी होगी उनका क्या करेंगे आप...अगर उनका कोई काम नहीं तो हम हूँ ना..:)
    हाँ नहीं तो..!!

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  42. @ अदा जी:
    ओह, तो आप भी तैयार हैं भलाई करने को? भैरी गुड।

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