बेटे के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग थी और उस दिन मैंने कहा, “चलो, आज मैं चलता हूँ।” पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ, फ़िर थोड़ा खुश और थोड़ा सहमा सा दिखा कि पापा पहली बार उसकी टीचर से मिलेंगे तो हो सकता है शिकायत वगैरह सुनकर गुस्सा न करें। खैर, गये तो रिपोर्ट बहुत अच्छी तो नहीं थी लेकिन लेट एडमीशन, नया माहौल वगैरह के चलते कुछ संदेह लाभ मिले और साहबजादे की आईसक्रीम वगैरह की आशायें बलवती रहीं।
बस उठने ही वाला था कि पीछे खड़े बेटे की आवाज सुनाई दी, “ओये सुमंत आ गया? अंकल नमस्ते।” सुमंत, ये अकेला नाम था जो अब तक मैंने उसके मुँह से उसकी क्लास के सहपाठियों के रूप में सुना था। जितना सुना था, उस हिसाब से सुमंत एक सीधा सादा, कुछ दब्बू सा लड़का था जिसे क्लास में पढ़ाई और दूसरी सभी गतिविधियों में बाकी बच्चों के साथ बराबरी करने में कठिनाई आ रही थी। लड़का हद दर्जे का शरीफ़ था, व्यवहार में शालीन था और दूसरे बच्चे उसका खूब मजाक उड़ाया करते थे यहाँ तक कि कई बार हल्की फ़ुल्की मारपीट भी कर लेते थे और वो झेला जाता तो हँसकर झेल लेता, नहीं तो रोकर अपना दर्द जाहिर कर देता।
मैं अंदाजा लगा चुका था कि उसका आत्मविश्वास लगभग खत्म हो चुका होगा। कभी किसी टीचर से शिकायत न करना उसका स्वभाव बन चुका था, शायद शुरू में शिकायत की भी हो लेकिन आजकल टीचर हों या नियोक्ता, यहाँ तक कि परिवार के लोग भी, सबको नतीजा चाहिये होता है। बेटा बता चुका था कि कोई उसे अपने पास नहीं बिठाना चाहता। हर कोई अच्छे मार्क्स लानेवालों के ही साथ बैठना चाहते हैं और लेट एडमीशन के कारण बेटे का और सुमंत का साथ हो गया था। मैंने सोच रखा था कि अभी तो वीकेंड में ही घर आना होता है, ट्रांसफ़र हो गया तो बहाने से एक दिन उसके पेरेंट्स से मिलेंगे और लगा कि कहने सुनने का कुछ फ़ायदा है तो उन्हें समझा देखूँगा कि ये समय बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिये कितना जरूरी है। किसी को प्रेरणा देने के लिये ’निकुंभ सर’ ही होना जरूरी तो नहीं, एक आमजन भी कोशिश तो कर ही सकता है।
सही में तो मेरा ध्यान अब टीचर की बातों में था ही नहीं, बीच में मुड़कर एक बार तो सुमंत की तरफ़ देख लिया लेकिन बार बार उधर देखना असभ्यता ही लगती सो मिसेज़ अरोड़ा से नमस्ते करके बाहर जाने के लिये चल दिया। अब सुमंत ने मुझे नमस्ते बोली और उसके पापा आगे आकर कुर्सी पर बैठ गये। उसके पापा ने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं और मैं भी गौर से उन्हें नहीं देख पाया, लेकिन चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लगा। होगा कोई, जब बचपन से लेकर जवानी तक इस शहर में बिताई है तो कभी देखा होगा जरूर।मैंने सुमंत के सिर पर हाथ फ़ेरा और हम बाप बेटा बाहर आ गये और स्टाफ़ रूम के बाहर बिछे बेंच पर मैं बैठ गया। अब मौका मिल ही गया है तो दस मिनट इनसे बात कर ही लेंगे, इस बहाने परिचय भी हो जायेगा।
अंदर मिसेज़ अरोड़ा की शिकायत पुस्तिका खुली हुई थी, ये लड़का ऐसा करता है, वैसा नहीं करता, किसी चीज़ में रुचि नहीं दिखाता वगैरह वगैरह वही स्टीरियोटाईप शिकायतें। कम से कम पन्द्रह मिनट तक उनका भाषण चलता रहा और आखिर में जब उन्होंने यह कहा कि सिर्फ़ सुमंत के कारण उनकी क्लास का रिज़ल्ट खराब होने का अंदेशा है तो सुमंत के पापा की आवाज सुनाई दी, “मिसेज़ अरोड़ा, मैं जानता हूँ कि मेरा बच्चा आपकी उम्मीदों पर पूरा नहीं उतर पा रहा। मेरी कोशिश तो ये रही है कि किसी तरह आसपास के बच्चों की देखादेखी ये भी कुछ चुस्त हो जाये, इसीलिये अपने घर से इतनी दूर इसे यहाँ पढ़ने को भेजता हूँ। लेकिन आपको लगता है कि इसके कारण आपकी क्लास का रिज़ल्ट खराब होता है या आपके स्कूल की छवि बिगड़ती है तो मैं इसे यहाँ से हटा लूँगा। दूसरों का नुकसान हो, ये मुझे भी नहीं चाहिये।” ये शब्द मेरे कानों में उतर रहे थे और चीख चीखकर कह रहे थे कि ये सुशील है, मेरे कालेज के समय का दोस्त सुशील। वही ठसक, वही गुरूर। हमारे ग्रुप का सबसे चहेता लड़का था सुशील, हम सबके बीच का लड़का लेकिन सबसे अलग। मिसेज़ अरोड़ा अब कुछ नरम पड़ गईं थीं और कुछ समय तक और सुमंत को उस स्कूल में पढ़ते रहने की इजाजत मिल गई थी।
अब वो लोग बाहर आ रहे थे और मैं सुशील को गले लगाने के लिये जैसे उतावला हो रहा था, कम से कम पन्द्रह सालों के बाद आज मिल रहा है। मैंने आगे बढ़कर उनका रास्ता रोका और देखकर हैरान रह गया, क्या ये वही सुशील था जिसे मैं और मेरे दोस्त जानते थे? ये झुके कंधे, खिचड़ी बाल, निस्तेज चेहरा उसी शख्स के हैं जो हमारे ग्रुप की जान हुआ करत था। जोश और मस्ती से भरा हुआ एक जिंदादिल इंसान, जिसके संपर्क में आने मात्र से बोरियत खत्म हो जाती थी। मुझे याद आया कि कैसे कालेज में उसकी गर्लफ़्रैंड उसके इरादों को लेकर कनफ़्यूज़्ड रहती थी और हमारे कहने पर एक बार हिम्मत करके उसने सुशील से पूछ ही लिया, “डू यू लव मी?” और सबके बीच में जब सुशील के जवाब के बारे में पूछा तो वो हँसकर बोली, “हाँ तो कहा उसने, लेकिन हाँ भी इस स्टाईल में बोला जैसे ना कह रहा हो” :) और वो बदमाश जानबूझकर ऐसे करता था, सबको उलझाये रखने के लिये।
आज जब मैं गले मिला उससे, देखकर वो मुस्कुरा तो दिया लेकिन…। न गले मिलने में कोई ऊष्मा, और न हाथ मिलाने में वो जोश, और तो और नजर मिलाना भी जैसे अवायड कर रहा था। अब मुझे लग रहा था कि मैं सुशील से नहीं, किसी अजनबी से जबरन मिलने की कोशिश कर रहा हूँ। कहाँ खो गया था मेरा दोस्त?
जारी……….
p.s. – कितनी भी कोशिश करता हूँ, संक्षेप में लिख नहीं पाता। अपराध यहीं खत्म नहीं होते, अनदेखे लेकिन बहुत बार सुने अपने गाने भी शेयर करता हूँ, कुछ न कुछ तो पसंद आयेगा ही:) अब कल रात से ये गाना बार बार हांट कर रहा है तो अकेला क्यों झेलूं? बांटो मेरे संग….मेरे संग संग...
कई दफा कुछ परिस्थितियां व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल कर रख देती हैं. हो सकता आपके मित्र के साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ हो.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबड़ा भयंकर रंग संयोजन है. माना, मैं अपने ब्राउजर में इसे अपने हिसाब से बदल सकता हूँ, मगर नहीं. ये झंझट क्यों पालूं? तो जब तक आप इसे सामान्य श्वेत पृष्ठभूमि पर काला अक्षर नहीं करेंगे, मैं पोस्ट पढ़ने से इंकार करता हूं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंदरअसल ऐसे रंग संयोजन पढ़ने में बाधा उत्पन्न करते हैं,विशेष रूप रे हम जैसे उम्रदराजों में, अतः हमारी मजबूरियाँ समझेंगे.
संजय बाउजी!
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज चुप... मेरा एक दोस्त,जिसका मैं इकलौता दोस्त हूँ और जानता हूँ जिस दौर से वो गुजर रहा है, उसे मेरी ज़रूरत है.. वो मेरी मजबूरी भी जानता है..फोन पर हर हफ्ते बात होती है.. लेकिन मेरी माँ से भी ज़्यादा वो मुझसे जिद करता है,प्लीज़ यार! अब लौट आओ. इतने सालों में तो राम भी लौट आये थे!!
मित्र की वर्तमान हालत तो यही कहती है की तारे जमीं पर और जमीन..... पैरों के नीचे से गायब.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबिलकुल संक्षेप में मत लीखिये..यही अंदाज सही है। वो क्या है कि बड़े-बड़े टीवी सीरियल में भी क्लाइमेक्स के साथ ब्रेक करते हैं!
प्रत्युत्तर देंहटाएं..दूसरी किश्त की प्रतीक्षा में।
कुछ स्वभाव और कुछ परिस्थितियां. सुमंत (और सुशील जी) के कम बैक का इंतजार रहेगा. रंग संयोजन के लिए रवि जी की बात पर कृपया गौर फरमाइए.
प्रत्युत्तर देंहटाएंक्यों आती है ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियां?
प्रत्युत्तर देंहटाएंबचपन का उत्साह सारा जीवन चलता रहे, बस यही प्रार्थना है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंजीवन के थपेड़े आदमी को जाने क्या से क्या बना देते है, वो खुद को ही भूल जाता है आप तो फिर भी दोस्त है
प्रत्युत्तर देंहटाएंअगली कड़ी का इंतज़ार है
वक्त का हर शै गुलाम टाइप बात आने वाली है क्या?
प्रत्युत्तर देंहटाएंवैसे वो तो अगली कड़ी में क्लियर होगा फिलहाल ये बताइए कलर कम्बीनेशन अब भी यही रहेगा? मैं तो बस रविजी की बात का जवाब मांग रहा हूँ ;)
अरे, यार मिल गया यह क्या कम है। देर किये बिना मिलते रहोगे तो सब कुछ फिर वैसा ही हो जायेगा। और इसका सबसे बडा लाभ तो शायद भतीजे सुमंत (और अध्यापिका G) को ही हो।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआगे के बारे में जानने की इच्छा है ... शायद वक्त कुछ बुरा चला है ... आप छोटा सा मत लिखिए ... ऐसे ही लिखते रहिये ... आपमें और दूसरों में यह फर्क है कि ... आप लंबे भी लिखते हैं तो पढ़ने में बुरा नहीं लगता है ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंबिछुड़ा यार मिला यह बड़ी बात है.जिन्दा दिल मुर्दा दिलों को भी जिन्दा कर दिया करते हैं.आपसे तो मुझे ऐसी ही उम्मीद है.समय और परिस्थिति के थपेडों से लाचार है शायद आपका मित्र.उनको 'विषाद योग'की आवश्यकता लगती है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंश्रीमान जी आपका मेरे ब्लॉग पर इंतजार हो रहा है.आप मेरे ब्लॉग पर अपने मित्र को साथ ले 'सरयू' स्नान के लिए चले आईये.सब ठीक हो जायेगा.
PARIVARTAN KE LIYE TAHE DIL SE SHUKRIYA.
प्रत्युत्तर देंहटाएंAAPKO APNA COLLEGE DAYS WALA SUSHEEL WAPAS MIL JAE ISEE SHUBHKAMNA LIYE HOO .
कहानी अभी शुरू ही हुई थी कि समाप्त कर दी गयी। आखिर मित्र के ऐसे हाल क्योंकर हुए उसपर से भी तो पर्दा उठाना चाहिए था ना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसंजय जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंबुरा न मानें तो कहूँ, सुशील के साथ ऐसा ही होना था | एक बात और, वो इस में ही खुश है | जिसे हम ठसक , गुरूर समझते हैं, वो उनके जीने का अंदाज होता है | जिसके साथ कोई समझौता उन्हें बर्दाश्त नहीं होता | बल्कि मैं कहूँ तो सुशील पर हमदर्दी करने का हक किसी को नहीं है , आपको भी नहीं |
अगर ज्यादा बोल गया हूँ तो क्षमा |
कई बार ऐसा होता है..स्कूल-कॉलेज में एक खास छवि बन जाती है...कुछ लोगो की...पर जिंदगी,उनसे कुछ दूसरी तरह से पेश आती है...और वे बदले हुए से नज़र आने लगते हैं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंकुछ तो मजबूरियां रहीं होंगीं
प्रत्युत्तर देंहटाएंयूँ कोई बेवफा नहीं होता
सुशील जी न जाने किन रास्तों से गुज़रे होंगे जिस पर चलने की थकन उनके चेहरे पर चिपक गयी है...ये तो शायद अगली पोस्ट में ही मालूम पड़े...ऐसे न जाने कितने सुशील हैं जिनसे विकट परिस्थितियां उनका असली चेहरा छीन लेती हैं...
नीरज
आपने शब्दों में भावों को कुछ इस तरह संजोया है, कि आपके हर पाठक को अगले अंक कि प्रतीक्षा होगी.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआशा है आप अधिक प्रतीक्षा नहीं करवाएंगे :)
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प्रत्युत्तर देंहटाएंकहानी संवेदनापूर्ण लग रही है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुशील जी के साथ क्या गुजरा होगा, अभी इसकी अटकलें ही लगा सकते हैं। अगली कड़ी का इंतजार है।
रंगों की शोखी कम हुई.. मगर पोस्ट की संजीदगी और आपका पसंदीदा "जारी" देखकर मन उदास हुआ... अब बंद मुट्ठी पर क्या शर्त लगाएं.. अंत तो आपने बता ही दिया, बीच में क्या हुआ होगा..देखेंगे तब जब आप लिखेंगे "गतांक से जारी"..
प्रत्युत्तर देंहटाएंसंजय जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंबड़े बड़े दरख्तों को टूटते देखा है,
छोटे छोटे पोधे पनप जाते है
इस जमीन ने यूँ ज़माने देखे हैं
यह तो जिंदगी है यूं ही चलेगी़
प्रत्युत्तर देंहटाएंकभी मिलेगी कभी बिछड़ेगी...
देखकर वो मुस्कुरा तो दिया लेकिन…। न गले मिलने में कोई ऊष्मा, और न हाथ मिलाने में वो जोश,
प्रत्युत्तर देंहटाएं.......................
waqt insa ke kitna badal deta hai...............
agle kari ki pratiksha me........
pranam.
मत लिखा करिए संक्षेप में, कुछ चीजें विस्तार मांगती हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंविस्तार बाँध के रखने वाला हो तो और अच्छा है।
आज कहूँगा नहीं, धारणा तो खैर वैसे भी नहीं बनाया करता हूँ, देखता हूँ आगे, जारी तो है ही...
sanjay ji, jidagi kis kadam par kaun sa imtihan le , kaha nahin ja sakta.bahut hi badiya likhe hai.............
प्रत्युत्तर देंहटाएंसंक्षेप में न लिख पाना तो मेरी भी बीमारी है.सेम पिंच टाइप कुछ कहा जा सकता है. कहानी रोचक लग रही है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंघुघूती बासूती