शुक्रवार, अगस्त 10, 2012

युगपुरुष

वो किसी राजमहल का सुसज्जित प्रसूति कक्ष नहीं बल्कि कारागार था|  आततायी सत्ता का जैसा प्रभाव बाहर समाज में  था, वैसा ही उस अंधेरी काल कोठरी में भी था| वहाँ  पसरा सन्नाटा बाहर के सन्नाटे का ही सहोदर था| यूं तो सत्ता बहुधा निरंकुशता की ही प्रतीक रही है, रामराज्य अपवाद ही होते हैं लेकिन  निरंकुशता की निरंतरता जब दिनोदिन गहरी और गाढी होती जाती है,  कभी न कभी वह क्षण आता ही है जब अन्धकार भी अपना विस्तार थामने को विवश हो जाता है| यही वह क्षण होता है जब गहन अन्धकार को चीरकर प्रकाश की एक लौ भभकती है,  एक ज्योति प्रज्ज्वलित होती है -  एक अमर ज्योति| यही वह क्षण होता है जब असुरी सत्ता के सर्वनाश का शंखनाद करता  एक युगपुरुष इस धरती पर अवतरित होता है|  

आतंक, अन्याय, दुराचार, शोषण अपने दांतों और नाखूनों से जब  मानवता को नोच खसोट रहे होते हैं, असल में वे अपने पाप का घडा स्वयं भर रहे होते हैं| अपने खोखले उसूलों को क्रूरता का जामा पहनाकर वो सामान्य जन को प्रताडित तो करते दिखते हैं लेकिन असल में वो खुद अंतर में कातर और भयभीत होते हैं और यही कुंठा उन्हें उनके कुकृत्यों के लिए बाध्य करती है| यही वह क्षण होता है जब किसी कृष्ण का धर्म की फिर से स्थापना के लिए आगमन होता है| 

उस कृष्ण का आगमन, जिसने जन-जन में उत्साह का संचार कर दिया| वही साधारण जन जो निरीह और खुद को असहाय मान कर हरदम कमर झुकाए और घुटने टिकाये सत्ता के सामने नतमस्तक होना अपना भाग्य समझते थे, अपनी और संगठन की शक्ति पहचानने लगे| 

परम्परागत आत्मनिर्भर ग्राम्य अर्थव्यवस्था को  बाजारी शक्तियाँ नष्ट करने  लगी थीं|  गाँव देहात में बहुतायत में उपलब्ध  दूध, दही,  घी का दोहन करके दुग्ध सरिता  का रुख नगरों की ओर मोड़ दिया गया  था| बालक कृष्ण ने बाल सुलभ तरीकों से समाज का ध्यान इस तरफ आकर्षित किया|

जल जैसे प्राकृतिक साधन पर कुंडली मारे बैठे कालिया नाग का मर्दन करते कृष्ण ने  अपनी प्राथमिकताएं सिद्ध कर दी| लोकोपयोगी संसाधनों पर बलपूर्वक कब्जा समाज को स्वीकार्य नहीं| 

इंद्र जैसे प्रभावशाली देवता की अपेक्षा गोवर्धन को ज्यादा मान देकर कृष्ण ने फिर से स्पष्ट  किया कि वन, भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधन हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं|

ठेठ बालपन में ही पूतना, वकासुर जैसों और फिर बाद में अग्रज बलराम की सहायता से अपने से कहीं विशालकाय चाणूर, मुष्टिक मल्लों को पराजित करके कंस के अत्याचारों को चुनौती दे दी थी कि अब अन्याय सहन नहीं होगा| 

कालान्तर में कंस वध भी हुआ और शिशुपाल वध भी| और ये सब करते हुए निर्भय कृष्ण कहीं भी अहम प्रदर्शन करते नहीं दिखते बल्कि उनकी निर्भीकता आमजन के लिए अभय का सन्देश और साथ में सखा भाव  लिए थी|  महाभारत के युद्ध में संख्या बल में भारी असमानता के रहते भी पांडवों की विजय संभव हुई तो सिर्फ इसलिए कि श्रीकृष्ण मात्र अर्जुन के रथ के सारथी ही नहीं थे, वरन सम्पूर्ण पांडव पक्ष के सारथी की भूमिका में थे|

त्रेतायुग  में राम  ने  मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया, वो उस युग की मांग थी| द्वापर तक आते आते सभ्यता ने कई रंग देख लिए|  द्वापर के इस अवतार कृष्ण  ने आवश्यक होने पर पुरातन मान्यताओं का अंधानुकरण करने की बजाय नए युग की नई मान्यताएं स्थापित कर दीं|  योग और शक्ति के  साथ कूटनीति, राजनीति को मिलाया| 

युगपुरुष किसी एक धर्म, जाति, देश के नहीं होते वरन सम्पूर्ण मानवता के होते हैं क्योंकि उनके द्वारा किये जाने वाले काम व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर सर्वजन के हित के ही होते हैं|.व्यक्तिगत रूप से तो जैसे कष्ट  उठाने के लिए ही अवतार लेते हैं लेकिन फिर भी कोई रुदन नहीं, कोई विलाप नहीं, कोई प्रलाप नहीं|  कर्तव्य हमेशा सर्वोपरि| 

गीता जैसा अनमोल सन्देश विश्व को देने वाले श्रीकृष्ण ने जिस भारतभूमि पर जन्म लिया, वह भूमि धन्य है और हम सब  धन्यभागी हैं|

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आप सबको बहुत बहुत शुभकामनाएं| 

                                               

116 टिप्‍पणियां:

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    1. अरे वाह!! आपको भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं|

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  2. प्रेरक शब्द, सुन्दर पोस्ट! जन्माष्टमी की शुभकामनायें!

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    1. धन्यवाद, आपको भी सपरिवार शुभकामनाएं|

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  3. जन्माष्टमी का महात्म्य और उसकी सामयिक विवेचना बहुत ही सटीक है... आपको भी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!!

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  4. आपका भी अभिनन्दन. पुनः एकबार उस ज्योति के प्रकट होने की प्रार्थना करते हैं.

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  5. कृष्ण भगवान्स्वयम !
    सुन्दर निबंध सा आनन्द देता लेख -बहुत प्रांजल ..
    जन्माष्टमी पर आपको बहुत शुभकामनाएं !

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    1. धन्यवाद अरविन्द जी, आपको भी सपरिवार शुभकामनाएं|

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  6. अपने खोखले उसूलों को क्रूरता का जामा पहनाकर वो सामान्य जन को प्रताडित तो करते दिखते हैं लेकिन असल में वो खुद अंतर में कातर और भयभीत होते हैं और यही कुंठा उन्हें उनके कुकृत्यों के लिए बाध्य करती है| यही वह क्षण होता है जब किसी कृष्ण का धर्म की फिर से स्थापना के लिए आगमन होता है|

    कृष्ण जन्म की प्रासंगिकता, महात्म्य भरी गम्भीरता से व्याख्यायित!! बधाई!!
    जन्माष्टमी की अनंत शुभकामनाएं

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    1. अत्यंत आभार आपका सुज्ञ जी|

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    2. सम्यक् एवम् सटीक । यथा नाम तथा गुण ।

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  7. .........
    krishna-shtami ki sabhi ko subhkamnayen????

    post ke liye abhar cha ......


    pranam.

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  8. दुर्लभ संदर्भों से सजी बेहतरीन पोस्ट। आपको जन्माष्टमी की ढेर सारी बधाइयाँ...

    जै श्री कृष्ण।
    राधे..राधे...

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  9. आपको जन्माष्टमी की ढेर सारी बधाइयाँ...

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  10. जन्माष्टमी की बधाईयाँ और शुभकामनाएं.......
    @ कालान्तर में कंस वध भी हुआ और शिशुपाल वध भी| और ये सब करते हुए निर्भय कृष्ण कहीं भी अहम प्रदर्शन करते नहीं दिखते बल्कि उनकी निर्भीकता आमजन के लिए अभय का सन्देश और साथ में सखा भाव लिए थी|

    @ त्रेतायुग में राम ने मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया, वो उस युग की मांग थी| द्वापर तक आते आते सभ्यता ने कई रंग देख लिए| द्वापर के इस अवतार कृष्ण ने आवश्यक होने पर पुरातन मान्यताओं का अंधानुकरण करने की बजाय नए युग की नई मान्यताएं स्थापित कर दीं| योग और शक्ति के साथ कूटनीति, राजनीति को मिलाया|

    कितना सच, कितना सामयिक | आभार इस प्रेरक चिट्ठी के लिए | :)

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    1. धन्यवाद शिल्पा जी, बहुत बहुत आभार|

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  11. युगपुरुष किसी एक धर्म, जाति, देश के नहीं होते वरन सम्पूर्ण मानवता के होते हैं क्योंकि उनके द्वारा किये जाने वाले काम व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर सर्वजन के हित के ही होते हैं|.व्यक्तिगत रूप से तो जैसे कष्ट उठाने के लिए ही अवतार लेते हैं लेकिन फिर भी कोई रुदन नहीं, कोई विलाप नहीं, कोई प्रलाप नहीं| कर्तव्य हमेशा सर्वोपरि|




    एक दम शत प्रतिशत सहमत
    ऐसा क़ोई अवतार जब क़ोई स्त्री लेती हैं तो युग स्त्री ना कह कर उसको काली , दुर्गा या फिर नारीवादी का नाम दिया जाता हैं
    कहीं किसी कथा में युगस्त्री शब्द का प्रयोग हुआ हो तो बताये
    कृष्ण हर रूप में पूज्य हैं रहेगे क्युकी हिन्दू आस्था के प्रतीक हैं और ईश्वर हैं पर उनको निष्ठा से चाहने वाली राधा आज मंदिर में उनसे पहले पूजी जाती हैं
    http://indianwomanhasarrived2.blogspot.in/2010/09/blog-post_02.html
    http://mypoemsmyemotions.blogspot.in/2007/06/blog-post_28.html

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    1. @ उनको निष्ठा से चाहने वाली राधा आज मंदिर में उनसे पहले पूजी जाती हैं -

      मेरी समझ में किसी कृष्ण भक्त ने इस बात का विरोध भी नहीं किया है| न सिर्फ ये बल्कि राम के साथ भी जब उनकी संगिनी का नाम लिया जाता है तो सीता राम ही कहा जाता है|

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    2. और राधेश्‍याम में भी राधा पहले ही आता है।

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  13. आदरणीय रचना जी,

    युग पुलिंग शब्द है अतः युग स्त्री कौन लेखक लिखेगा? :)

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    1. जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घट जाहिं,
      गिरिधर, मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं!!
      /
      एक और मान्यता है कि केवल कृष्ण ही पुरुष हैं... अब पुरुष हों या युगपुरुष या साधारण पुरुष क्या अंतर पड़ता है.. सूरदास ने तो कृष्ण को बच्चे से बड़ा होने की नहीं दिया.. उनके लिए तो वह युग-शिशु ही बने रहे.. एक सम्पूर्ण अवतार होते हुए भी साधारण व्यक्तित्व.. अतीत में जनमकर भी भविष्य के नायक!!
      काली माता, दुर्गा मैया, गंगा मैया तो सब कहते हैं, कभी राम पिता या कृष्ण पिता नहीं सुना कहते हुए.. हाँ परमपिता के साथ साथ जगज्जननी सुना है!! सौरी, जगज्जननी के साथ-साथ परमपिता सुना है!!

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    2. @जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घट जाहिं,
      गिरिधर, मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं!!
      :)

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    3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    4. http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%97

      युग पुलिंग शब्द है
      yug neutral shabd haen jaraa aap dobaraa check karae

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    5. @चला बिहारी ब्लॉगर बनने

      स्त्री अपने बच्चो के लिये बिना " पिता " के भी "माँ " होती हैं लेकिन पुरुष पिता तभी बनता जब वो अपने बच्चे की माँ के साथ होता हैं . इसीलिये स्त्री का हर रूप माँ का रूप माना जाता हैं जबकि पुरुष केवल और केवल पुरुष ही बना रहता हैं . माँ की कोख से बच्चे का परिचय माँ से होता हैं , माँ के दूध से बच्चे का परिचय माँ से होता हैं लेकिन बच्चे के पिता से बच्चे का परिचय माँ ही करवाती हैं .


      जगज्जननी के साथ-साथ परमपिता सुना है!!

      यही मैने भी कहा हैं

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    6. मशहूर नाटक - अंधा युग!!!

      प्रश्न:
      ऐसा क़ोई अवतार जब क़ोई स्त्री लेती हैं तो युग स्त्री ना कह कर उसको काली , दुर्गा या फिर नारीवादी का नाम दिया जाता हैं
      कहीं किसी कथा में युगस्त्री शब्द का प्रयोग हुआ हो तो बताये??????"

      उत्तर:
      इसीलिये स्त्री का हर रूप माँ का रूप माना जाता हैं जबकि पुरुष केवल और केवल पुरुष ही बना रहता हैं!

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    7. @इसीलिये स्त्री का हर रूप माँ का रूप माना जाता हैं जबकि पुरुष केवल और केवल पुरुष ही बना रहता हैं!
      सलिल जी
      अफसोस की लाइक की सुविधा ब्लॉग पर नहीं है !

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    8. सलिल जी जबसे आये हैं ब्लॉग पढ़ने का आनंद ही दोगुना हो गया है।:)

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    9. कमाल हैं
      कहा मैने "इसीलिये स्त्री का हर रूप माँ का रूप माना जाता हैं जबकि पुरुष केवल और केवल पुरुष ही बना रहता हैं ."

      और तारीफ़ सलिल जी की हो रही हैं :):)
      मेरे कमेन्ट को मेरे ही प्रश्न का उत्तर बना कर क्या सिद्ध किया गया ?? यही ना की मेरे प्रश्न के उत्तर आप दे ही नहीं सकते ??
      और उसके बाद पाठको की तारीफ़ उफ़ उफ़ उफ़ , कोई क्या पढ़ कर ताली बजाता हैं और लाईक करता हैं ये तो पाठक जाने पर कम से कम मेरे कमेन्ट को पढ़ लेते तो ऐसा ना लगता मुझे की मेरी बात को पसंद भी किया गया और मुझे अनदेखा भी किया गया

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    10. मुझे लगता है कि आपके कमेन्ट को आपके ही प्रश्न का उत्तर बना कर यह सिद्ध किया गया है कि उत्तर प्रश्न में ही छुपा हुआ है|
      अब आप कह सकती हैं कि वही महाभारत के संजय की भूमिका ...:)

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    11. कस्तूरी कुंडलि बसै मृग ढूँढै बन माँहि।
      ऐसै घटि घटि राँम हैं दुनियाँ देखै नाँहि॥

      --कबीर साखी

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    12. rachna ji - aap hi ka prashn aap hi ka uttar | it is true that we have to find most answers within ourselves....

      aapko bhi claps hai ji :) salil ji ko for relating ur two statements, sanjay ji for writing the post, and u for ur statement :)

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    13. शिल्पा जी,
      'भी' को 'ही' कर देतीं आप, और अच्छा रहता| सलिल जी के साथ तो अपना पुराना खाता चल रहा है, पहली बात तो वो इन बातों पर नाराज नहीं होते और अगर हुए भी तो खिला पिलाकर या उनसे खा पीकर बाँध लेंगे उन्हें तो:)
      और शान्ति की ब्रांड एम्बैसेडर बनने के लिए हमारी तरफ से आपके लिए भी claps हैं जी|

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    14. वाह वाह क्या बात है ! संजय जी की पोस्ट पर इस बार तो मैंने संजयागिरी कर दी , एक टिप्पणी और इतना धमाल | अब समझ आ गया की ब्लॉग पर लाइक की सुविधा क्यों नहीं है :))))
      रचना जी
      सलिल जी ने तो वैसे वो लाइक मुझे वापस कर दी थी उन्हें स्वीकार नहीं है किन्तु हम लिया हुआ लाइक वापस नहीं करते है इसलिए आप को कोई लाइक हम नहीं देने वाले है | आप के और मेरे विचारो में इतनी समनाता है की यही संजय जी के ब्लॉग पर हमें बहने घोषित कर दिया गया था तो आप के एक विचार पर लाइक क्या देना , मुझे नहीं लगता है की इसकी जरुरत है हम दोनों को :)

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  14. कृष्ण ने पूरे जीवन एक नेतृत्व का उदाहरण दिया है..

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    1. सम्पूर्ण जीवन ही सम्पूर्ण दर्शन रहा|

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    2. "अब पुरुष हों या युगपुरुष या साधारण पुरुष क्या अंतर पड़ता है."
      +
      "काली माता, दुर्गा मैया, गंगा मैया तो सब कहते हैं, कभी राम पिता या कृष्ण पिता नहीं सुना कहते हुए"
      =
      इसीलिये स्त्री का हर रूप माँ का रूप माना जाता हैं जबकि पुरुष केवल और केवल पुरुष ही बना रहता हैं!
      /
      तालियाँ, लाइक, कमाल, अद्भुत, बेहतरीन.. ये सब सुनने के लिए मैं कमेन्ट नहीं करता.. जिनके हिस्से की हों उन्हें मुबारक..!

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    3. @ तालियाँ, लाइक, कमाल, अद्भुत, बेहतरीन.. ये सब सुनने के लिए मैं कमेन्ट नहीं करता.. जिनके हिस्से की हों उन्हें मुबारक..!

      of course | लेकिन जब हम किसी मित्र के घर जाते हैं, तो वह शरबत , नाश्ता आदि आदि देते हैं , प्रेम सहित | उस शरबत को पीने हम वहां नहीं गए होते | परन्तु उस मित्र से यह नहीं कहते की "यह शरबत पीने मैं तुम्हारे घर नहीं आया था - यह तुम्हे ही मुबारक " | आपका कमेन्ट अच्छा लगा, क्लाप्स का जी किया - हमने क्लेप्स किये | आपको अस्वीकार हैं, तो वापस लिए लेते हैं जी :) |

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    4. संजय जी के शब्दों में कहूँ तो नहीं जी वो क्या है कि चाय, नाश्ता, शरबत आदि से कोई परहेज नहीं.. लेकिन ये तालियाँ, वालियां, लाइक-वैक से थोड़ा एम्बैरेस हो जाता हूँ..
      वैसे जब शिल्पा जी, अस्वीकार का तो प्रश्न ही नहीं.. घर पर कई ऐसी वस्तुओं का अम्बार लगा है जो मेरी पसंद की नहीं, लेकिन आदर सहित किसी ने उपहार में दी है तो स्वीकार है!!

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    5. :)

      भूखे को अन्न, प्यासे को पानी
      जय हो बाबा अमरनाथ बर्फानी|

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    6. :)

      "I didn't wanted to open, I did because I had to."
      "I didn't wanted to field close-in, I did because I had to."
      "I didn't wanted to keep, I did because I had to."
      "I didn't wanted to captain, I did because I had to."
      "I only wanted to play, everything else was a part of the job. All, good or bad, gracefully accepted."

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    7. सलिल जी
      मेरी जब नहीं नहीं शादी हुई थी और मुंबई आई , तो यहाँ हर छोटी बात पर नाराज हो जाती तो कभी खूब गुस्सा करती और कभी कभी पता ही नहीं चलता था की मै ऐसा कुछ कर रही हूं और फिर लगता था ऐसा क्यों कर रही हूं , अब बताइये अचानक से अपने परिवार से दूर हो जाना , अकेले रहना , हफ्तों हो गये परिवार के लोगों का चेहरा देखे , फिर अपने हाथ का सडा मडा , बेढंगा खाना खाना और कभी ना खाना , नई जगह पर नीद पुरा ना होना जब इन्सान इतने परेशानी, असुविधाओ से घिरा हो तो उसका किसी भी बात पर नाराज हो जाना लाजमी है , अपना पुरा गुस्सा पतिदेव पर निकाल करते थे | वैसे उम्मीद है आप को इस टिप्पणी पर तो नाराजगी नहीं आ रही होगी :))))

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    8. सलिल जी
      हम तो आप की हर उस टिप्पणी को अच्छा कहते रहेंगे जो पसंद आयेगी आप भले स्वीकार ना करे :) बचपन में घर आया मेहमान जब उन्हें दी गई मिठाईया नहीं खाता था तो हम बच्चे पहले ही तय कर लेते थे की उसके जाने के बाद कौन कौन सी मिठाई खायेगा वो ठीक से घर के बाहर भी नहीं गये होते थे और हम उस नाश्ते पर टूट पड़ते थे :))

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  15. कृष्ण के व्यक्तित्व और कर्मों का सही मूल्यांकन धार्मिक नही वरन राजनैतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ही हो सकता है. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी. मुझे कृष्ण का कूटनैतिक और राजनैतिक रूप, उनके कर्मों के व्यापक और गहरे सामाजिक, राजनैतिक असर के कारण पसंद आता है. सही मायनों में एक दूरदर्शी व्यक्ति थे कृष्ण. एक व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए अपने दोस्त को, अपनी बहन को भगा कर ले जाने और शादी करने के लिए कहता है क्योंकि इससे उसके दोस्त की शक्ति बढ़ेगी और आगे चल कर देश और समाज का भला होगा. नरकासुर को मारने के बाद लगभग सोलह हज़ार राजकुमारियों से सिर्फ़ इसलिए शादी की ताकि उन्हें समाज से, अपहृता होने का दंश नही बल्कि ब्याहता होने का सम्मान प्राप्त हो. राजनीति के घातों-प्रतिघातों के माहिर थे कृष्ण. स्थापित सामाजिक मान्यताओं चुनौती दे, उन्हें अपने पुरुषार्थ से बदलते हुए समाज के सर्वांगीण विकास के लिए 'स्व' से पहले 'सर्व' को रखना ही उन्हें युगपुरुष बनाता है. कृष्ण ने जो सोंचा, सो किया और यही बात उन्हें 'अवतारी' बना देती है. महाभारत और गीता कलियुग में भी उतने हीं समीचीन हैं जितने द्वापर में थे.


    'बड़ी देर भई नंदलाला, तेरी राह तके ब्रज बाला...'

    सादर

    ललित

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    1. मुझे भी देखकर अजीब लगता था ललित जी कि लोग कृष्ण को सिर्फ माखन चुराते और रास रचाते चरित्र में बांधकर ही देख लेते हैं| लेकिन फिर वही बात आती है कि हम वही देखते हैं जो देखना चाहते हैं, वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं| और इन लीलाओं से सुलभ और क्या होगा? जो कृष्ण ने स्व त्याग किया, उसे जीवन में उतारेंगे तो कुछ खोना पडेगा और वो हमें मंजूर नहीं|
      प्लान करके लिखता तो आपके बताए प्वाईन्ट्स यकीनन मेरी पोस्ट में आये होते, बल्कि द्वारका शिफ्टिंग करना, गो रक्षण जैसे बहुत से बिंदु ऐसे हैं जो कवर किये जा सकते थे| लेकिन अपनी लिमिटेशंस, अपन तो इतने में ही हांफने लगते हैं:)
      आपके कमेन्ट से अपनी पोस्ट को विस्तृत महसूस आकर रहा हूँ, धन्यवाद और एक बार फिर से बधाई|

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    2. कृष्ण अकेला ऐसा व्यक्तित्व है जिसने कभी कुछ थोपा नहीं किसी पर.. जिसने जैसा देखा वैसा ही पाया.. कोई उनके बाल रूप पर रीझा है तो कोई उनकी रास-लीलाओं पर.. कितना विस्तार है इस चरित्र में.. एक ओर स्नान करती गोपियों के वस्त्र चुरा लेता है और दूसरी ओर द्रौपदी के लाज की रक्षा में प्रस्तुत होता है.. होठों पर बंशी लिए नृत्य भी करता है और कुरुक्षेत्र में युद्ध को प्रेरित भी करता है.. इतनी वेराइटी किसी व्यक्तित्वा में नहीं.. तभी तो गीता की जितनी व्याख्या हुई उतनी किसी शास्त्र की नहीं.. और सबसे ऊपर ये अकेले ऐसे भगवान हैं जो उदास नहीं हैं.. सीरियस नहीं हैं.. बुद्ध, महावीर, जीसस आदि के चेहरे पर तेज है लेकिन हँसी नहीं, और ये भगवान कभी नृत्य भी करते हों यह तो कल्पना से परे है..
      संजय बाउजी, एक ब्लॉग-पोस्ट की सीमा में इन्हें बांधा ही नहीं जा सकता!!

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    3. सलिल भाई,
      बाँधने का प्रयास दुर्योधन करते हैं, याद है न कृष्ण चेतावनी? 'बाँधने मुझे तू आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है?' अपन तो पहले ही डिस्क्लेमर लगा देते हैं:)
      सच में, इतने विराट व्यक्तित्व, एक ही समय पर इतने स्तरों पर सामान रूप से भूमिका निभाने वाले महानायक को शब्दों में बाँधने की क्षमता की कल्पना भी अपन जैसे नहीं कर सकते|आपने और भी विस्तार दिया, इसीलिये तो मैं कहता हूँ कि मुझे मिलने वाले कमेंट्स मेरी पोस्ट्स की वैल्यू उठा देते हैं| धन्यवाद तो खैर मैं कहने से रहा आपको:)

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    4. :)

      यह देख महाभारत का रण....
      मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान कहाँ इसमें तू है?

      प्रतीक्षा है एक और महाभारत की, पर स्वयं से...
      काश ! कोई कृष्ण मिलता जीवन रण में और कहता...

      तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय: युद्धाय कृत निश्चयः...
      सलिल जी से थोड़ा सा मेरा इत्तेफ़ाक डिफर करेगा...

      कृष्ण ने हर वह चीज़ थोपी जो सर्वहित में थी, यह मेरी समझ है. उदाहरण के लिए फिर से महाभारत का अध्ययन करना पड़ेगा या कृष्ण चरित्र पर थोड़ा और गहन मनन करना पड़ेगा. या फिर गोवर्धन पूजा भी एक उदाहरण हो सकता है.

      आज ज़रूरत 'सर्वहित' को पुनः परिभाषित करने की है जिसकी क्षमता शायद किसी में नही है...

      सादर

      ललित

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    5. यही तो कमाल है ललित भाई.. थोपा न उसने था, न मैं थोपता हूँ अपने विचार.. आपकी असहमति और डिफरेंसेज़ सर माथे... कभी आराम से बैठकर इस विषय पर चर्चा करेंगे!!

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    6. @ बाँधने का प्रयास दुर्योधन करते हैं, याद है न कृष्ण चेतावनी?

      बाँधने का प्रयास माँ ने भी किया था - रस्सी छोटी होती जाती थी | फिर प्रेम से माँगा तो बांध भी गये | बांधें वाले के ह्रदय के बहाव पर है | प्रेम से तो वे बंधे ही हुए हैं हमेशा |

      salil ji - thanks for the wonderful clarity of your views. please do raise this somewhere some day - i shall be eager to read it

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    7. आज ज़रूरत 'सर्वहित' को पुनः परिभाषित करने की है जिसकी क्षमता शायद किसी में नही है...
      clap clap clap

      a new horizon is bound to come when such thoughts come

      हटाएं
  16. हमारी Mythology में दो मुख्‍य पात्र हैं एक अच्‍छा एक बुरा और हमने अपने सामाजि‍क मूल्‍य इन्‍हीं के इर्द र्गि‍द पि‍रोए हैं...

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    1. हमेशा से ही यह होता आया है काजल भाई|

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  17. आज तो घनघोर पोस्ट है! :)
    थोड़े में कहूँ तो सच में हम धन्यभागी है।
    अपने देवत्व से इतर भी, अवतारी गुणों से परे भी, मैं कृष्ण को परं श्रद्धेय मानता हूँ।

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  18. लोग आजकल भगवानों में भी अपना मतलब तलाशते रहते है।
    समयनुसार इन सबका जन्म हुआ, क्या अब किसी महापुरुष या किसी देवी का जन्म होगा? समय सब प्रश्नों को हल करेगा, हम हो ना हो सबका समाधान होगा।

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    1. सही बात पडौसी भाई| हल निकलेंगे, समाधान सबका होगा|

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  19. कृष्ण वे जननायक थे जिन्होंने श्रमिक को उसके श्रम का मूल्य दिलाने के लिये संघर्ष किया,वंचितों को उनके अधिकार दिलाने के लिये युद्ध में अपनी महत्वपूर्ण भूमिकायें निभायीं,शोषितों को उनकी शक्ति से परिचित कराया, कृषकों-गोपालकों को शोषक राजसत्ताओं के पंजों से मुक्त कराया...। यूँ इस दृष्टि से वे साम्यवादी लगते हैं ...हैं भी, पर आज के कम्युनिज्म की तरह अतिवादी नहीं। उनका कम्युनिज्म शोषण के विरुद्ध एक लोकतांत्रिक-कम्युनिज्म था। भारत को आज पुनः कृष्णनीति की आवश्यकता है। कृष्ण सदा प्रासंगिक रहे हैं रहेंगे भी।
    आज आपने कृष्ण के व्यावहारिक और प्रासंगिक स्वरूप को स्पष्ट किया। सच्चे अर्थों में कृष्ण की आराधना तो यही होगी कि हम शोषण के विरुद्ध उठ खड़े होने में समर्थ हो सकें। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद! दिल से धन्यवाद! कलेजे से धन्यवाद! शरीर के अन्दर और भी जितने विसरा हैं उन सबसे भी धन्यवाद!

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    1. बैस्ट पार्ट यही लगता है डाक्टर साहब कि सबकुछ और सब परफेक्ट, कोई अतिवाद नहीं जिसे कह सकते हैं 'the right blend' जहां जहां से आप धन्यवाद दे रहे हैं, वहाँ वहाँ तक मेरी तरफ से आभार पहुंचे|

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  20. उत्तर
    1. पुराने दोस्त की एक पंक्ति की टिप्पणी से मजा आ गया| अब प्रगट भये हो बंधु, तो परिकल्पना के आगे भी कुछ हो जाए:)

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  21. सरकार से डर कर अब कोई अवतार भी इस धरा पर अवतरित होने की हिमाकत नहीं कर सकता...कोंग्रेस ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन से सबकी रूह थर्राती है...सारे देवी-देवताओं का आह्वाहन करो...भारत को इस बीमारी से मुक्त करें...जय श्री कृष्ण...

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    1. सरकार को स्थिर रखने में इस हथियार का बहुत महत्व है, जो चूं-चपड़ करता दिखता है उसी की फाईल पर से धूल झड़ने लगती है:)

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  22. युगपुरूष पैदाइशी नहीं होते, जो मानवता और सर्वजीवों के हित के लिये कार्य करते हैं, उन्हें युगपुरूष या अवतार कहा जाता है।
    वो कभी पुराने की नकल नहीं करते और बंधे-बंधाये नियमों की बजाय वर्तमान में जो हितकर है उसी के अनुसार कर्म करते हुये सम्पूर्ण जगत के लिये उदाहरण बनते हैं।

    क्यों हम हमेशा किसी कृष्ण या राम के अवतरित होने का इंतजार करते रहते हैं???
    प्रणाम

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    1. सामर्थ्यानुसार अपने अपने स्तर पर प्रयास तो करते ही रहना चाहिए बंधु|

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  23. द्वापर के इस अवतार कृष्ण ने आवश्यक होने पर पुरातन मान्यताओं का अंधानुकरण करने की बजाय नए युग की नई मान्यताएं स्थापित कर दीं| योग और शक्ति के साथ कूटनीति, राजनीति को मिलाया|

    सटीक आकलन किया है वक्त के साथ परम्परायें और मान्यतायें बदलनी ही चाहिये क्योंकि देश काल और परिस्थिति के अनुसार ही कार्य संभव हो सकता है ।

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    1. स्वस्थ सजग सोच होगी तो बदलाव आयेंगे ही वन्दना जी| आपका धन्यवाद|

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  24. हफ्ते भर पहले तय किया की बिटिया की रोज रोज की कहानी सुनने की मांग को अब कृष्ण की कहानियो से पूरी की जाये अब वो इन कहानियो को समझने की आयु में आ चुकि है और वो काफी लंबी चलेगी, जहा राम कथा एक तार में चलती है और रावण के बाद समाप्त हो जाती है वही कृष्ण लीला कृष्ण की तरह ही विराट है जहा कहानी एक तार पर या एक प्रसंग पर नहीं चलती है १६ कलाओ में पारंगत माने जाने वाले कृष्ण के जीवन में वो सब है जिसकी शिक्षा मै अपनी बेटी को आज भी दे सकती हूं , ये युग पुरुष कलयुग से सबसे नजदीक लगता है , जहा कुछ लोगों को उनके किया गलत या झूठ लग सकता है मुझे वो कूटनीति लगती है और समय पड़ने पर रणछोड़ होना भी बुरा नहीं होता है , वहा घोखे झूठ से अपने हिस्सा जाने पर संतोष कर लेना का ज्ञान नहीं है बल्कि सही को ( धर्म ) हर जायज तरीके में पा लेने की शिक्षा है , वहा पचपन की चंचलता है , कशोर की समझदारी और मित्रता भी है , गंभीर और जीवन को सार्थक करने वाली शिक्षा है तो युद्ध और हिंसा को भी जरूरत पर करने की आज्ञा | एक स्त्री के रूप में कहूँ तो कृष्ण एक ऐसे पात्र है जिसे कोई भी स्त्री हर रूप में पुत्र ( कितनी मजेदार बात है की जहा स्त्री अपने ही गर्भ से जन्म लिए बच्चे को अपना मानती है यहाँ स्त्री देवकी नहीं यशोदा बनना चाहती है ) सखा, प्रेमी, पति और गुरु हर रूप में पा लेने की कमाना एक साथ करती है , कितना विरोधाभास है ना :) किन्तु ऐसा ही है कृष्ण का रूप है ही इतना विराट | बस मुझे तो एकही शिकायत है उनसे वो है उनका निर्मोही होना ! हा शायद निर्मोही ना होते तो वो सब नहीं कर पाते जो किया , किन्तु उनका क्या जो उन से मोह लगा बैठे थे उन्हें भी अपने जैसा बना देना था | सबसे बुरा आज कल लोगों के इस कथन से लगता है की " वो करे तो रासलीला और हम करे तो........... जो प्रेम को बस शरीर से जोड़ते है वो कभी नहीं जान सकते है की मन आत्मा का प्रेम क्या होता है और रासलीला क्या है | आप सभी उन्हें भगवान के रूप में पूजते है मेरी लिए वो कहानी के एक पात्र है जो मुझे बहुत ही पसंद है और मै उनसे हमेसा सखा भाव में जुड़ती हूं |

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    1. अंशुमाला जी! काश कि ब्लॉग में भी लाइक का ओप्शन होता!!
      (हे गोविन्द! जो तूने दिया था वो तुझे ही समर्पित कर रहा हूँ!) :)

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    2. लाइक का ओप्शन रह्ता तो सबसे ज्यादा लाईक्स अन्शुमाला जी के कमेन्ट पर आते, तीन चार तो मैं ही कर देता चाहे वैफ़श्री की आई.डी. भी इस्तेमाल करनी पड़ती:)

      चरित्र विविधता वाली आपकी बात से सौ फीसदी सहमत| बुरा लगने वाली बात से भी|

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    3. निश्चित ही ऐसे कमेंट्स पर सर्वाधिक लाइक बनता है।

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    4. शिल्पा जी
      हम तो उन नालायको में है जो किसी के घर गये और कोई हमसे चाय पूछे तो कहते है कोई और अच्छी चीज घर में नहीं है क्या पिलाने या खिलाने के लिए :) हम तो हमें मिले सारे नाश्ता , शरबत गटक जाते है चुपचाप, हमको कोनो परहेज नहीं है सभी की सब लाइक स्वीकार है, हा एक बात और कहेंगे इतने में मेरा क्या होगा :))

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    5. वैसे एक बात मजेदार है की जो कृष्ण के अस्तिव को नहीं मानता है उसे मात्र कहानी का एक पात्र मान रहा है उसकी टिप्पणी को पसंद किया जा रहा है :)
      ठीक भी है मंदिर जाने पर तो हम को भी प्रसाद मिल ही जाता है !

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    6. lo bolo
      paathak ki pasand ko tum kaese question kar saktii ho
      tum ne kyaa kehaa important blog me hotaa hii nahin haen , important hotaa haen kitni clap mili so mae to apnae hissae ki clap kisi aur ko laenae nahin daeti aur ek tum ho tumhari taarif ho rahii haen phir phi question kar rahii ho ??

      aur kehtii ho kisi ne sanjay kae blog hi hamey behnae kehaa thaa galat kehaa thaa , ek thaeli kae chatte battae sahi rehtaa

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    7. मैं तो नई पोस्ट में p.s लगाने वाला था कि खबरदार अगर किसी ने रचनाजी के अलावा किसी और के लिए क्लेप किया तो अच्छा नहीं होगा| चलिए फिर कभी सही|

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    8. नई पोस्ट में p.s लगाने वाला था
      mujhae aabhas thaa
      isliyae ab no comment policy

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    9. मुझे भी आभास था, thanks anyway.

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    10. अरे अंशुमाला जी - आपका यह कमेन्ट अब देखा | आपने उस पोस्ट से नाराजगी जाहिर की है शायद ?
      :)
      तो
      बता दूं की वहां बदलाव कर दिया है - आपकी बात से ही मेरा ध्यान गया की मेसेज कुछ और था, convey कुछ और हुआ - देख लीजियेगा समय मिले तो | आपके कमेन्ट का उत्तर भी दिया है |

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  25. पोस्‍ट तो मंगलकारी है, लेकिन टिप्‍पणी में देवत्‍व लिंग भेद की सीमा में छटपटाता दिखता है.

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    1. छटपटाहट है तो कुछ नतीजा निकलेगा भी, B+ हैं जी हम आजकल:)

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  26. जय हो,जय हो
    यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:
    तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम

    आपकी इस पोस्ट पर आकर पवित्र हो गए,संजय भाई.
    शानदार पोस्ट,लाजबाब टिप्पणियाँ.

    श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे,हे नाथ नारायण वासुदेव

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    1. आपका आशीर्वाद मिलने से हम तर जाते हैं राकेश भाई साहब|

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  27. इस पोस्ट को पढ़कर दो श्लोक याद आ गए--
    १-
    आदौ राम तपो वनादि गमनं हत्वा मृगा काञ्चनं ।
    वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव सम्भाषणम् ।।
    बाली निर्बलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम् ।
    पश्चद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्य रामायणम् ।।

    २-
    आदौं देवकी देव गर्भ जननं गोपी गृह वर्धनम् ,
    माया पुतन जीव ताप हरणं गोवर्धनं धारणं ,
    कंसच्छेदन कौरावादि हननं कुंती सुत पालनम् ,
    एतद श्रीमदभागवत पुराण कथितं श्री कृष्णलिलामृतम् ||

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    1. वाह-वाह, सब समेट दिया दो श्लोकों में ही|

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  28. प्रेरक पोस्ट! बहुत गहन सोच से लिखी रचना

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  29. अपन के लिए कान्हा स्वच्छ निर्मल जल हैं जिसमें जैसी झांकने के वक्त अपन की सूरत की रंगत होती है वैसी नजर आ जाती है....वैसे भी अंधेरं में उजाला तो श्री कृष्ण ही करते हैं बस हमारे लोगो के ही आंखों में उजाला गायब हो जाता है...असम में अवैध घुसपैठियों को गोली से मारना जलाना चाहिए..मगर जलाया जा रहा है देश की मीडिया को...देश के सिपाहियों को..अब ये जलाने वाले कौन है ये खोजना बाकी है सबूत के साथ सरकार को..आमजन तो जानती ही है...कान्हा भी जानते हैं
    1971 के युद्ध के कई संस्मरण पढ़े हैं...ये एक युद्ध था जिसमें स्रवोच्च पद पर बैठी शख्सियत से लेकर सेना का जवान तक पूरी तन्मयता औऱ धीरता के साथ जंग में उतरा हुआ था...ऐशे में जीत तो होनी ही थी..वो भी नेक मकसद से किया जा रहा युद्ध था..।

    पर आप से क्या कहूं..आप जाने कहां खोए रहते हैं...करने का कुछ मन न हो तो क्या कह सकते हैं..आप उस रेड लाइट पर राजकपूर को याद कर सकते थे...यानि गा सकते थे..रुक जा...वो जाने वाली रुक जा......शायद वो पसीज जाती और किसी गाड़ी के टायर से टकरा कर लौट आती आप तक...

    वैसे अंदर की आवाज ने कई बार बचाया है...और हां फायदे औऱ नुकसान के नियम तो जगह के हिसाब से बदल जाते हैं..आपका नुकसान किसी का फायदा .।
    रही बात सो कॉल्ड मोहब्त और हैसियत के मारो की..या पत्नी और पती के प्रेम का..तो वो तो वैसे भी अर्थ जगत के बलवान होने से उड़नछू सा होता जा रहा है..वैसे भी हर बार भोली(?????? वाह री भोली) बुलबुल ही शिकार बनती है .. पढ़ाई लिखाई की तो क्या हुआ ....उसमें कोई किसी को जांचने का पैमाना तो नहीं सिखाया जाता ना..ये तो साथ रहने पर ही पता चलता है.....क्यों ठीक कहा न

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    1. जय हो रोहित महाराज की:)
      गाना तो गाने का अपना मन था यही वाला इसीलिये तो पोस्ट पर लगाया था, शायद ध्यान नहीं दिया मीडिया वालों ने:)

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    2. दरअसल न तो गाना और न ही उसका पहला फ्रेम मेरे कम्प्यूटर पर अवतरित हुआ था बिरादर.....वैसे भी नजर मेरी है मीडिया की नहीं ...मैं बिरादर कह रहा हूं और आप मीडिया वाला ..कुछ इस अंदाज में जैसे गरिया रहे हों..हीहीहीहहीहीही...असल में आप भी मेरी तरह गलती करते नहीं, गलती हो जाती है ..ठीक वैसे जैसे देर करते नहीं, देर हो जाती है ......हीहीहीहीहीही...

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  30. कृष्ण ने योग , माया , अधिकार , कर्तव्य , राजनीति , कूटनीति , अर्थशास्त्र , सामाजिकता के नए उदाहरण प्रस्तुत किये . वे बंधी बंधाई लीक पर नहीं चले . उनका व्यक्तित्व हर युग में प्रेरक है !
    बहुत बधाई और शुभकामनायें , देर से सही !

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  31. उस दिन हम जल्दी में थे इसी का नतीजा था की पोस्ट में लिखी किसी बात पर टिप्पणी ना दे कर अपनी बाच कर चले गए , टिप्पणी देने के बाद निचे से ऊपर जा रहे थे टिप्पणियों को देखते हुए ताकि उनकी लम्बाई चौड़ाई देख कर अंदाजा लगा सके ही इन सभी को अभी पढ़ने का समय है की नहीं उसी समय सलिल जी की उस टिप्पणी पर नजर पड़ी क्योकि उस पर प्रश्न उत्तर जैसा लिखा था तो वो पसंद आई किन्तु इतना समय नहीं था की सभी टिप्पणी पढ़ कर उस पर कोई विचार रख सकती इसलिए मैंने लाइक कारने की सुविधा की बात की ताकि बिना शब्द को लिखे टिप्पणियों को लाइक किया जा सके कित्नु ये नहीं देखा की वो रचना जी की बात को दोहरा रहे है | मतलब ये की उस दिन दी गई मेरी दोनों ही टिप्पणी ठीक नहीं थी एक तो मैंने पोस्ट में लिखी बात की जगह अपनी बची और पूरी टिप्पणियों को पढ़े बिना वो लिखा दिया | अब समझ आ गया की बिना पूरी कथा पढ़े कभी कुछ नहीं कहना चाहिए |

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  32. ओह ! ये तो शतक लगा गया , शतक की बधाई संजय जी , किन्तु ये तो सिल्वर मैडल है , गोल्ड ( २०० टिप्पणी ) की उम्मीद की जाये की नहीं , उम्मीद है पानी की कमी नहीं होगी :)

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    1. बधाई के जवाब में तो धन्यवाद कहना ही बनता है, धन्यवाद है आप का| क्लैप्स आपके लिए:)

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  33. बोलिए मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया की जय.
    १०१ का अधिक महत्व है हिंदू मान्यता अनुसार.
    बहुत बहुत बधाई,संजय भाई.

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  34. हे योगेश्वर श्रीकृष्ण ! यहाँ हम क्या कहें.? बहुत धुआंधार चर्चा है !

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  35. बहुत देर से आ पायी, बहुत सुन्‍दर पोस्‍ट। कृष्‍ण का सही स्‍वरूप वास्‍तविक स्‍वरूप है।

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  36. गीता जैसा अनमोल सन्देश विश्व को देने वाले श्रीकृष्ण ने जिस भारतभूमि पर जन्म लिया, वह भूमि धन्य है और हम सब धन्यभागी हैं| शुभकामनाएं....सार्थक पोस्ट

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  37. युगपुरुष हर युग के होते हैं....

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