बुधवार, सितंबर 19, 2012

मुरारी लाल ...?

कश्मीरी गेट स्टेशन पर हमेशा की तरह भीड़ थी| इंटरचेंजिंग  स्टेशन होने के नाते पीक ऑवर्स में भीड़ का न होना अस्वाभाविक लगता है, भीड़-भाड़ देखकर  ही  नार्मल्सी का अहसास होता है| बहुधा अपना नंबर दूसरी ट्रेन में ही आता है, यानी कि हमारे लाईन में लगने के बाद आने वाली दूसरी मेट्रो में| धक्का मुक्की करने की आदत कभी रही नहीं और वैसे भी 'लीक छोड़ तीनों चलें' में से अपन वन-टू-थ्री कुछ भी नहीं| कैस्ट्रोल की विज्ञापन फिल्म अपने को आईडियल लगती  है, चाहे पाखाने की लाईन में लगे हों,  कोई ज्यादा जल्दी वाला आ जाए तो उसे   'पहले आप' कह ही देते हैं| अपना नंबर आते आते पहली मेट्रो भर चुकी होती है, कुछ देर के लिए नंबर वन का अहसास हम भी ले लेते हैं| हमेशा की तरह दूसरी मेट्रो आई तो अपन लाईन में सबसे आगे थे|  फिर  भी   गेट  खुलते खुलते चढ़ने वाले कई वीर बहादुर लोग अपने से पहले ही आरोहण कर चुके थे| जल्दी वाले भागकर सीट पर कब्जा करते हैं, अपन एंट्री मारकर अपना कोना पकड़ लेते हैं| लॉजिक ये है कि उधर वाला दरवाजा केन्द्रीय सचिवालय स्टेशन पर ही खुलता है तो उतरने में  ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती|

गेट के एक कोने पर राड पकड़कर  मैं खडा था और उसी गेट के दूसरे किनारे पर नजर गई तो अपने से एक दो इंच ऊंचा एक छः  फुटा जवान बन्दा भी बिलकुल उसी मुद्रा में अपने हिस्से की राड पकडे खडा था|  संयोग से हमारे बीच जो  चार पांच लोग खड़े थे, सब औसत या फिर औसत से कम कद के थे| खाली दिमाग तो आप सब जानते ही हैं, शैतान का घर होता है| अमर चित्रकथा में कभी देखा भगवान के द्वारपाल जय-विजय का चित्र ध्यान आ गया|  दोनों ऐसे खड़े थे जैसे सच में किसी राजमहल के द्वारपाल हों|  दिमागी खुराफात बढ़ने लगी, मैं अपने सह द्वारपाल के चेहरे का जायजा लेने लगा| कद में तो मुझसे ऊंचा था ही, सेहत में भी मुझसे इक्कीस| उम्र मुझसे चार पांच साल कम रही होगी, कसरती बदन, टीशर्ट में एकदम किसी हीरो के माफिक लग रहा था|  सुदर्शन व्यक्तित्व बार बार ध्यान खींच रहा था और मैं द्वारपालों वाली कल्पना से भी अब तक छुटकारा नहीं पा पाया  था|  

बन्दे ने बहुत करीने से मूंछें बढ़ा रखी थी, अभी तक हमारी तरह सफेदी झलकनी शुरू हुई नहीं थी| मूंछों के भी तो  कितने स्टाईल हैं आजकल| इस बन्दे ने मूछों को नीचे की तरफ विस्तार दे रखा था, एकदम होंठों से नीचे तक जा रही थीं| एक हमारी मूंछ है, दो महीने में सिर्फ एक बार सही सेट होती है जब सैलून  में हजामत-शेव  बनवाते हैं वरना तो कभी ऊंची-नीची और कभी एकदम से बेतरतीब| मेट्रो चल रही थी, साथ साथ मेरे विचार भी| बार बार उसकी तरफ देखता था और ये  पाया कि वो भी शायद कुछ समझ रहा है क्योंकि जब भी देखा, उसे भी इधर ही देखते पाया| फिर मैं दूसरी तरफ देखकर सोचने लगा कि  टाईम बहुत बदल गया है, ऐसा न हो कि वो कुछ उल्टा सीधा समझ ले| बहुत हो गयी कल्पना, कहीं अगले बन्दे ने मुझे  दोस्ताना टाईप वाला  समझ लिया तो जवाब देते न बनेगा| इससे अच्छा तो चंचल को थोड़ा मोडीफाई  करके याद कर लेते हैं -  मैं नहीं देखना, मैं नहीं देखना| 

मन ने कहा, देखना नहीं है तो सोचने में क्या हर्जा है? सोच तो सकते ही हैं| बन्दे ने मूंछें ऐसी क्यों रखी होंगी? इन्हें थोड़ा ऊपर की तरफ उमेठ लेता तो एकदम 'मेरा गाँव मेरा देश' वाले  विनोद खन्ना जैसा लगता|  धीरे से नजर उठाकर देखा तो जाए कि अगर मूछें ऊपर की तरफ हों तो कैसा लगे?  येस्स, परफेक्ट एकदम विनोद खन्ना| लेकिन यार, अब तुम क्यों इधर देख रहे हो? भाई मेरे, मेरी नीयत बिलकुल ठीक  है| ले यार, मैं ही फिर से नजर दूसरी तरफ कर लेता हूँ| बड़ा खराब टाईम आ गया है| 

अच्छा ये जो पुलिस कई बार पोस्टर चिपका देती है कि अपने आसपास देखिये, कहीं कोई आतंकवादी तो नहीं? अलग अलग भेष में एक ही चेहरे, इतना फर्क पड़ जाता है दाढी मूंछों को इधर उधर या ऊपर नीचे करने से? इसी बन्दे ने अगर दाढी भी बढ़ा रखी होती तो कैसा लगता? देखूं  ज़रा| हाँ, सच में चेहरा मोहरा बदल तो जाता है| अबे यार, दो मिनट उधर  नहीं देखता रह सकता क्या? चल मान ले कि बार बार मैं देख ही रहा हूँ तुम्हें तो कुछ ले लिया क्या? बाईगोड लोग बहुत असहिष्णु हो गए हैं, आदमी भी सेल्फ कान्शियस होने लगे हैं | जा यार, अब सच में नहीं झांकना तेरी तरफ| होगा मिस्टर इंडिया, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला| 

ये मेट्रो  वाले भी जान बूझकर ऐसी अनाऊँसमेंट  लगाते हैं, 'माइंड द गैप'| अबे सालों,  गैप में माइंड लगा दिया तो बाकी कामों में तुम्हारे फूफाजी आयेंगे माईंड लगाने? गाडी में चार डिब्बे फालतू लगा नहीं सकते, चले हैं हमें सिखाने| खुद को कुछ आता जाता नहीं है पैसा कमाने के सिवा और बात करते हैं| नहीं देखना यार तेरी तरफ अब, वैसे भी हमारा स्टेशन आने वाला है| फिर से  वही धक्कापरेड करनी है, एक और मेट्रो|  घर से दफ्तर तक सीधी एक मेट्रो होती तो मजा आ जाता| एक जगह से बनकर चलती और दूसरी जगह टर्मीनेट होती चाहे डिसमिस होती| ठाठ से हम भी  सीट पर बैठकर आते, न गेट पर खडा होना पड़ता और न ऐसे  द्वारपाल बनना पड़ता|

एक बात तो है, बन्दे की पर्सनेल्टी है जबरदस्त| मूंछे नीची रखने का मतलब है कि समझदार भी है| कुछ समय पहले तक घर में घुसते समय लोग मूंछें नीची कर लेते थे, आजकल बाहर भी नीची रखने में ही समझदारी है| या तो रखो ही नहीं, या फिर इसकी तरह रखो| वापिसी में कहीं नीची करनी भूल गए तो पता चला कि लेने के देने पड़ गए|  खैर, जो भी हो, हमारा बन्दा है एकदम मॉडल या हीरो के जैसा| लगता है ये  भी इसी स्टेशन पर उतरेगा| एक काम करता हूँ, उतरकर इसको बता देता हूँ कि मैं बार बार इसलिय देख रहा था कि अगर  मूछें ऊपर की तरफ उठाकर रखे तो इसकी शक्ल और पर्सनैल्टी एकदम विनोद खन्ना से मिलती है और अब भी  ट्राई  करे तो किसी फिल्म या सीरियल में हीरो का रोल मिल सकता है|   हो सकता है इसके मन में कोई मेरे बारे में कोई गलतफहमी आ रही हो, दूर हो जायेगी| जितनी  बार मैंने उसकी तरफ देखा, वो भी  बार बार मेरी तरफ देखता था| वैसे तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन गलतफहमी ख़त्म ही हो जाए तो अच्छा है|

'अगला स्टेशन केन्द्रीय सचिवालय है| यहाँ से वायलेट लाईन के लिए बदलें|'  क्यों भाई, कोई जबरदस्ती है? हमें सूट  न करती होती तो बिलकुल न बदलते| कभी वायलेट लाईन के लिए बदलो, कभी पीली रेखा से पीछे रहें|    ***या समझा है हमें?  पीली रेखा को समझा ले  न  कि आगे रहे हमसे, सारे उपदेश हमारे लिए ही हैं| एक दिन  तुम्हारी भी क्लास लेनी है| हिन्दी अंगरेजी की ऐसी तैसी करके रख दी है तुमने| 

' हाँजी सर, धक्का मत दो| उतरना है यहीं पर,  वरना मुझे शौक थोड़े ही है दरबानी करने का जो  पंद्रह मिनट से गेटकीपर बनके खडा हूँ|  ओ पहलवान, उतरने देगा हमें, तभी तो चढ़ पायेगा| ऐसे जोर लगाने से कोई फायदा नहीं| पता नहीं कब कामनसेंस आयेगी लोगों को| घर से पता  नहीं  क्या खाकर आते हैं, चढ़ना है तब धक्के मारेंगे और उतरना है तब धक्का मारेंगे| अभी यमदूत आ जाएँ न तो फिर बैकसाईड  से  धक्के लगाने लगोगे, न जी हमें नहीं जाना, हमें जल्दी नहीं है| जाहिल लोग कहीं के|'

उतरकर बैग,पाकेट रोज  चैक करने पड़ते हैं जी, पता चले कि इतनी भीड़ में मोबाईल या वैलेट निकाल लिया किसी हाथ के जादूगर ने| जेबकतरे भी हाई प्रोफाईल हो गए हैं आजकल, मेट्रो में सफ़र करते हैं| हाँ, सब ठीक है| अरे वो कहाँ गया मेरा यार विनोद खन्ना, जालिम सफाई तो देने देता| अब यहाँ तो छह फुटे और पांच फुटे  सब बराबर हैं, सामने अपनी मेट्रो खड़ी  है, उसे देखूं या अपने उस हमसफ़र को? मिल जाता तो उसे बता देता कि क्यों बार बार उसे देख रहा था| वो पता नहीं क्या क्या समझ रहा होगा क्योंकि वो भी बार बार घूर रहा था, समझ नहीं आया|  ये भीड़ भी न एकदम निकम्मी  है, खो गया न बन्दा| चलो यार संजय कुमार, जाने दो उसे,  गलत समझेगा तो हमारा क्या लेगा? वो भी तो घूर रहा था| 

'क़ुतुब मीनार को जाने वाली मेट्रो....'      मैं अभी उसी प्लेटफार्म पर ही था, चलने को हुआ कि  कंधे पर हाथ रखकर किसी ने मेरा ध्यान खींचा, देखा तो थोड़ा हटकर वही खड़ा था| 

मुझसे कहने लगा, 'बॉस, एक बात बोलूँ?'   

बोलने की तो मैं सोच रहा था, समझ गया कि उसे एक आदमी द्वारा बार  घूरना और बार बार देखना खला होगा| तुम बोल लो यार, मैं फिर अपना पक्ष रख लूंगा| 'हाँ भाई, बोलो?' मेरे मुंह से फिलहाल इतना ही निकला|

'आप अगर अपनी मूंछ  को थोड़ा सा ..'  मेट्रो के गेट खुल चुके थे और उतरने वाली भीड़ धक्के मारती हुई हम दोनों को अलग अलग दिशा में ले गयी| जाहिल लोगों ने पूरी बात भी नहीं सुनने दी और न मुझे कुछ कहने दिया|  समझ नहीं पाया कि क्या कहना चाह  रहा था वो...|
                                                                     

80 टिप्‍पणियां:

  1. अब समझ में आया कि तने खड़े द्वारपाल क्या क्या सोच सकते हैं?

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  2. अजीब इत्तेफाक है! होता है, होता है आखिर वहाँ सोचने के लिए और था भी क्या? चेहरा बार- बार देखना था तो एक आदमी के चेहरे पर दाढ़ी-मूँछों के अलावा होता भी क्या है सोचने के लिए?

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    1. सोचने को तो और भी बहुत कुछ होता है, होता है लेकिन मौके की बात है कि मन की मेट्रो किधर मुड़ जाए:)

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  3. मेरा गांव मेरा देश का विनोद खन्ना तो हमे खूब याद है। क्या कमाल की पिक्चर थी वो डाकूओं वाली!

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    1. वो दौर ही कुछ और था देवेन्द्र भाई|

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  4. हजामत, कयामत, सलामत, मलामत... गजलगोई आती तो कुछ बात बन पाती.

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    1. आपकी ये टिप्पणी ही ग़ज़ल सरीखी लग रही है राहुल सर|

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  5. sanam aate aate bahut der kar di......badi der se dar pe nigahe lagee thee....


    jai baba banaras...

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    1. मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है कौशल भाई|
      जय बाबा बनारस|

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  6. वाह भाई वाह, क्‍या गजब की मारी है? मूछे ही मूछों का भेद समझ रही थी और एक दूसरे से बतिया भी रही थी! अच्‍छा संस्‍मरण।

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  7. आनंदम...आनंदम्....

    वो वीरप्पन वाली मूछें भी गजब की थीं, द्वारपाल तो नहीं लेकिन चंदनपाल तो था ही :)

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    1. चंदनपाल?
      अच्छा नाम ।

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    2. संयोग देखिये, अमर चित्र कथा जिसकी याद आई, उसमें जय-विजय की मूंछें चंदनपाल जैसी ही थी :)

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  8. अगर आप अपनी मूंछ को थोडा सा और बड़ा रखते तो कसम से दिल्ली पुलिस के ऐ एस आई लगते ... शायद यही वो कहना चाहता था.:)

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    1. अरे नहीं यार, कहाँ ये मूंछ और कहाँ मसूर की दाल
      आई मीन कहाँ ये मुंह और कहाँ पुलिस की नौकरी
      आई मीन कहाँ ये .. ...........................:):)

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  9. द्वारपाल वाला वर्णन पढ़कर मज़ा आ गया. आप पाठक की लगातार दिलचस्पी बनाए रखते हैं.

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  10. मुरारीलाल के मैट्रो में मन में मचलते मुरमुरे :)
    आपकी मूंछे कैसी बनाने के बाद कैसी दिखेंगी हम बतायेंगे।
    कभी कोई ज्यादा ही घूर रहा हो तो चावडी बाजार स्टेशन पर उतर लिया करें।
    मेरा नम्बर आपके पास है ही।
    कभी-कभी रेल के गलियारे में हमें भी दरबान की तरह खडे होकर आने-जाने वालों को स्वागतम कहना पडता है :)
    ऐसी ही एक छोटी सी पोस्ट लिखी थी कभी ट्रेन में रोते बच्चे को देखकर उठ रहे विचारों पर
    प्रणाम

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    1. छोटे भाई, जब हमारा उतरने का टाईम होगा तब तक चावडी बाजार वाले रोहतक वाली ट्रेन में चढ़ चुके होंगे|
      पुरानी पोस्ट ध्यान आ रही है, लेकिन फत्तू के किस्सों वाली पोस्ट के बाद कुछ नहीं दिखा, ऐसा नहीं होना चाहिए यार|

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  11. सञ्जय जी,
    रूट तो मेरा भी वही है.... 'राजीव चौक' से 'केन्द्रीय सचिवालय' के लिये बदलता हूँ.
    यदि आप केन्द्रीय सचिवालय पर उतरते हैं, तो सभी जल्द्बाजों को उतर-चढ़ जाने दें.. तो भी १०-१५ सेकण्ड मिलते हैं... आराम से उतरने के.
    कोई समझाने से नहीं मानता, जब तक कि किसी को चोट नहीं लग जाती.
    उलटे चोटिल व्यक्ति ही आगे से ध्यान रखता है कि उसे आगे से सबसे बाद में उतरना-चढ़ना है.

    बहुत श्रेष्ठ संस्मरण.... अंत तक बाँधे रखा. आप द्वारपाल की भूमिका अच्छी निभाते हैं. जब तक पूरा पढ़ न लो - जाने ही नहीं देते... "तौ सम कौन द्वार का पाल"...

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    1. अपन तो आलसी ही हैं प्रतुल भाई, इन्तजार करते ही हैं लेकिन तकलीफ कई बार दूसरों की परेशानी देखकर होती है| खासतौर पर दिल्ली में पहली बार आये लोग जब उतरने में इतनी जल्दी न दिखा पायें और इधर से चढ़ने वाली भीड़ आधे परिवार को वापिस मेट्रो में धकेल कर ले जाती है तो देखकर अच्छा नहीं लगता और विडम्बना ये है कि इन जल्दबाजों में ज्यादा संख्या भी नॉन-देहालाईट्स की होती है|

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  12. आपकी लेखनी के साथ आपको प्रणाम इसलिए नहीं की मैं आपको प्रेम करता हूँ बल्कि इसलिए की आपकी नज़रें मेट्रो में ही नहीं सब जगह दोस्तों की परख रखती है . आपके इस जज्बे को मेरा शत शत नमन .आपके इसी दरियादिली ने मुझे आपका दीवाना बना दिया .

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    1. सिंह साहब, प्रणाम कहकर तो आप लज्जित करते हैं| स्नेह मिलता रहे आपका, बहुत है|

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  13. कई बार जाना हुआ उस रूट पर और द्वारपाल की नुद्रा में खड़े होने का मौक़ा भी मिला.. मगर अपना घूरने का एक ही स्टाइल रहा है.. दरवाज़े पर बनती परछाईं (उस रूट पर तो मेट्रो भूमिगत है ना) में उसकी शकल को अच्छे से निहारना.. जी भर देखना और पकडे भी न जाना.. मगर मुरारीलाल मुझे भी मिले और मुरारी ललना भी..
    आपके किस्से सुनकर तो अपना कोई/कई भूले किस्से याद आ जाते हैं.. सो वो कहानी फिर कभी! फिलहाल तो मेट्रो की रफ़्तार की तरह धाँसू पोस्ट.पढते हुए हम भी पीली रेखा से पीछे खड़े हो गए.. कई बार तो लगा कि आपकी रफ़्तार देखकर ही रेखा पीली पड़ गयी है!! जीते रहिये!!

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    1. फिर कभी, फिर कभी तो बहुत बार हो चुकी| आपके अंदाज में इन किस्सों को सुनना पढ़ना अलग ही अनुभव होगा, इंतज़ार है|
      आप आशीर्वाद देते रहेंगे, हम जीते रहेंगे, श्योर|

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  14. अरे हाँ!! वो मुरारीलाल के बाद सवालिया निशाँ क्यों लगा दिया?? कोई शक!!!

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    1. पूरी नहीं सुन पाया न, इसलिए ? लगा दिया था| शक तो वैसे नहीं ही है :)

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  15. पूरी पोस्ट भर मुझे अपनी याद आती रही -आप भी रखने का शौक करते हैं क्या ? :-)

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    1. समझ नहीं पाया मिसिर जी, बनारसी नहीं हूँ न :)

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  16. अगर दोनों में से एक भी मूछमुंडा होता तो एक पोस्‍ट का घाटा हो जाता /:-)

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    1. :)पोस्ट तो तब भी आ जाती.. ..
      एक महिला होती तो शायद घाटा होता :)

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    2. पोस्ट तो शायद तब भी आ जाती ......:-)

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    3. हा हा हा हा ,,, घाटा न होता ये दावा है, ऐन्वेई थोड़े "मो सम..." हैं :)

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  17. 'बिटवीन द लाइंस' पढूँ या 'बिटवीन द मूंछ' .......| रोचक वर्णन, औचक अंत और भौचक्के हम |

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    1. अजी आप तो खुद बड़ों बड़ों को भोंचक्के करने की मूंछें मेरा मतलब दम रखते हैं:)

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  18. ये मूंछें जो न कराए कम है....नत्थूलाल की मूंछे हों या उस दूसरे द्वारपाल की....पर लगता है कि कुछ मामलों में हम एक जैसे हैं....अपनी मूंछे भी हर दूसरे तीसरे दिन रुप बदलती रहती हैं.....फैशन की माफिक लंबी छोटी होती रहती हैं ..पर परफेक्ट नहीं हो पाती....वैसे अच्छा किया जो ज्यादा न घूरा..हर कोई दोस्ताना नहीं होता..पर दोस्ताना कौन करने लगे ये भी पता नहीं होता..

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    1. देखते रहते हैं बदलती प्रोफाईल तस्वीरें| कहीं तुम ही तो नहीं थे बिरादर?

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    2. अपन तो लंबे चोड़े न हैं....हां लोग कहते हैं कि अंदर से गहरे जरुर हैं..पर हम तो अपने को उथला ही समझते हैं...इसलिए वो लंबा द्वारपाल कोई और ही होगा....वैसे अपन की एक तस्वीर अब ब्लॉग में चेप दी है..ताकि लोगबाग अगर गलती से कहीं मेट्रो में देख लें तो जबरदस्ती रोक कर कहें कि अजी हम आपको पहचानते हैं....औऱ जो इनवाइट करके भूल जाते हों वो भी हमें देख लें....औऱ ये न कहें कि तस्वीर मे आप अलग लगते हो....तस्वीर में बंदर लेकिन मिलने पर लंगूर लगते हो......तो अपन जैसे इस तस्वीर में हैं उसी तरह के हैं। छोटा सा कद...छोटी सी दुनिया....

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  19. यह विचार बना रहता है कि दूसरा क्या सोच रहा होगा, किंतु सोच व तरीका अधिकाँश बार समान होता है. बस अभिव्यक्ति नही हो पाती.

    हर भार भीड सम्भावनाओँ को बिखेर जाती है.

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    1. यही कहना या फिर जानना चाहता था सुज्ञ जी, सोच-विचार की फ्रीक्वेंसी और फ्रीक्वेंसी लेवल वाली बात|

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  20. अरे उसे यु ही जाने दिया, जाइये और फिर से खोजिये उसे कही कुम्भ के मेले में बिछड़े भाई ना लिकल जाये :))
    पोस्ट बहुत अच्छी लगी शुरू से अंत तक लगा सामने से गुजर गई ट्रेन ,
    इस बार बच गये किसी पुरुष को घूरते अगली बार जरा ध्यान से कही सामने वाला बंदा इस वाले से ज्यादा तेज और वही निकला और मैट्रो में ही दोस्ताना शुरू कर दे तो चलती मैट्रो से भागना भी असंभव होगा :)) मूंछे नीची हो या ऊपर उससे फर्क नहीं पड़ता है असल बात तो शरीरी के अन्दर का जिगर बड़ा होना चाहिए यदि वो हो तो मूंछ निचे होने के बाद भी सम्मान ऊपर होता है |
    यहाँ तो मुंबई में तीन भाषाए सुननी पड़ती है और भीड़ से बचने के लिए और लंबी दूरी वाले सीट के लिए कई बार लोग जिस दिशा में जाना है उधर ना जा कर पहले दो तीन स्टेशन दूसरी तरफ जाते है जहा से ट्रेन शुरू होती है और वहा से आराम से बैठ कर अपने घर जाते है , किन्तु छोटी दूरी वाले के लिए ये संभव नहीं है |

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    1. अब तो बिलकुल नहीं खोजना, भाई की जगह वही निकला तो चलती मेट्रो से भागना भी असंभव :)
      जिगरे वाली बात पर - जय हो|
      अपुन के कुछ साथी लोग भी सीट के चक्कर में और सीढियां न चढ़ने के चक्कर में ऐसईच करते हैं, लेकिन अपन इस लोचे में नहीं पड़ते| सीट से परहेज है और सीढ़ियों से प्यार इसलिए गोरेगांव तो नहीं, खड़ेगांव के बाशिंदे बने रहना पसंद करते हैं|

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  21. हा हा! वागा बार्डर पर दोनो तरफ के जवान भी कुछ ऐसा सोचते होंगे! :-)

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    1. बिलकुल हो सकता है जी, इतना पक्का है कि सोचते एक जैसा ही होंगे|

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  22. मूंछें हों तो नत्थूलाल सी, वरना न हों काली कमली वाले ...:)

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    1. बाबू मोशाय,
      अगली बार कोई मुरारीलाल मिले तो उसकी पीठ पर धौल जमा के अपनी बात ज़रूर कह दीजियेगा जयचंद जी...:)

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    2. मूंछे हैं लेकिन नत्थूलाल जैसी नहीं है :(
      जयचंद तो धौल जमा देगा लेकिन उस चक्कर में हाथ कहीं इधर इधर लग गया तो? बात करती हैं..

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    3. A receiver must respond transmitter immediately.

      Murari Lal.

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  23. संजय जी,भाई आप कमाल है,दैनिक जीवन की साधारण सी घटनाओं में भी आप जिस तरह हास्य खोज लाते हैं ऐसा कम ही देखने को मिलता है।वैसे तो काफी आनंदित किस्म के शख्स मालूम पडते हैं पर ये तो बताइए इतनी कम दूरी में भी सीट न मिलने पर परेशान क्यों हो जाते हैं? अपने साथ तो उल्टा ही है ज्यादातर जयपुर से अलवर और दिल्ली तक का सफर द्वारपाल बनकर ही तय किया है ईयरफोन लगा गाने सुनते हुए फिर चाहे गाडी खाली ही क्यों न जा रही हो।अपनी टेन्शन तब बढ जाती है जब गेट पर ही खडे होने की जगह न मिले।
    और इन मूँछो के बारे में क्या कहें अपनी तो कह सकते हैं कि अभी शैशव अवस्था में हैं और मुझे ऐसी ही हल्की हल्की पसंद भी है दाढ़ी और मूँछ दोनों।हमेशा ऐसी ही रखेंगे ।मूँछे हो तो नत्थूलाल जैसी तो बिल्कुल न हो आधी जिंदगी इनकी सार संभाल में ही निकल जाती है उपर से शैम्पू और तैल का खर्चा अलग।छोटे बच्चे तो खेलने के लिए ही माँग लेते हैं।
    वो आदमी क्या कहना चाहता था ये तो पता नहीं पर अब से नजर रखिएगा हो सकता है उसका भी रूट भी यही हो मिले तो पूछ लिजिएगा कि भाई मूँछ पर क्या टिप्पणी करना चाहते थे और फिर हमें भी बताइएगा।

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    1. अरे यार, परेशान तो इसलिए होते हैं कि इस बात पर न होंगे तो किसी और बात पर होना पड़ेगा:)
      आगे जैसी भी रखियेगा लेकिन ये जो शैशवावस्था वाली दाढी-मूंछ है, इसे जब तक सहेजा जाए जरूर सहेजना क्योंकि ये अवस्था लौटकर नहीं आनी है|
      अपडेट हुआ तो जरूर करवाएंगे, अपने पास हैं भी तो ऐसी ही बातें|

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  24. .
    .
    .
    मुझसे कहने लगा, 'बॉस, एक बात बोलूँ?'

    बोलने की तो मैं सोच रहा था, समझ गया कि उसे एक आदमी द्वारा बार घूरना और बार बार देखना खला होगा| तुम बोल लो यार, मैं फिर अपना पक्ष रख लूंगा| 'हाँ भाई, बोलो?' मेरे मुंह से फिलहाल इतना ही निकला|

    'आप अगर अपनी मूंछ को थोड़ा सा ..'


    दाहिनी ओर से भी छाँट देते तो अच्छे भले इन्सान लगने लगोगे अभी तो एक तरफ छोटी एक तरफ लंबी मूँछ रखे अजीब से लग रहे हो...

    ऐसा कहा था, एक बार मेरे हमसफर ने... :)


    ...

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    1. शायद यही कहना चाह रहा हो, ऐसा कहता तो मैं सुनील शेट्टी की तरह पूछता, 'भाई, किसी दाहिनी तरफ, तेरी या मेरी?' आपने भी जरूर यही पूछा होगा :)


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  25. कमाल ही लिखते हैं आप संजय जी - बिलकुल किसी फिल्म के सस्पेंस जैसी रही पूरी पोस्ट | फिल्मों की पटकथा लिखने के बारे में सोचा कभी आपने ?

    पढने से लगता है आप और वे पुरानी हिंदी फिल्मों के बिछड़े हुए भाई हैं :)

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    1. रामसे ब्रदर्स का नया अवतार - मूंछ्से ब्रदर्स :)

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    2. मूंछ्से ब्रदर्स की मुरारी लाल पार्ट-२ भी अब बननी चाहिए..क्यूंकि कहानी बड़ी सस्पेंसियायी हुई एंडयाई है...:)

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  26. रोचक शैली में द्वारपालों की मानसिक स्थिति का वर्णन लुभाया .
    इस पोस्ट से गाने का कोई लिंक है क्या :)

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    1. है न, पोस्ट में विनोद खन्ना का और इस फिल्म का जिक्र आया है:)

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  27. hummm.....je baat......isai liye hum apke kadam ke nishan dhoondhte
    rahte hain..........

    bhary good istory......man garden-garden ho gaya...


    pranam.

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  28. शानदार!
    करीब दर्जन भर कारणों से मेरी मेट्रो से खुन्नस है (बेचारी मेट्रो का दोष नहीं है) सो जब तक साथ वाला जोर नहीं लगाता मैं कभी मेट्रो में नहीं चढ़ता - अकेले तो कतई नहीं। तो द्वारपाल वाले किस्से हमारे हिस्से कम ही आए हैं।
    आपने पाँच-छः साल के मूंछिया कैरियर में बहुत बार खुद को अजय देवगन और विनोद खन्ना मान अघाए हैं पर उन्हें बचाए रखने भर वोट नहीं मिले कभी। :)

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    1. कभी दर्जन भर कारणों का खुलासा हो जाये तो हमारा भी ज्ञानकोष कुछ समृद्ध हो।
      पता नहीं क्या वजह रही होगी लेकिन अधिकतर हीरो लोग मूँछविहीन ही दिखते\पसंद किये जाते हैं। वैसे तो यह व्यक्तिगत रुचि की बात है लेकिन कई बार व्यक्तिगत मामले भी लोकतांत्रिक तरीकों से ही निपटते हैं, फ़िर भी मेरा मानना है सफ़ेदी आने से पहले तक मूँछ ट्राई जरूर करनी चाहिये फ़िर तो जब सफ़ेदी झलकने लगे तो उनका उन्मूलन लगभग अपरिहार्य है ही:)

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  29. अनूठा लेखन !
    व्यंग्य और गांभीर्य का अद्भुत समन्वय !

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  30. मज़ेदार किस्सा है। पढकर वह दोस्त याद आया जो सदा मूँछ के बारे में ही परेशान रहता था। अपन तो आपके रोज़ाना के मेट्रो-मार्ग पर एक बार ही गये थे और इत्तेफाक़ से उसी दिन एक नये दोस्त, पुराने सहकर्मी, कलाकार, कवि, नर्मदिल, गर्मजोश और सुदर्शन व्यक्तित्व से मुलाक़ात भी हो गई ...

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    1. हमें ’मैजेस्टिक मूँछ’ याद है, आपकी पोस्ट्स में से अतिप्रिय एक पोस्ट्स में से मुझे अतिप्रिय एक पोस्ट।

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  31. बढिया किस्सा पर अब तक खल रहा होगा कि बात पूरी नही हो पाई । काश वो कहता हलो जयचंद आप अपनी मूछें थोडी नीचे तक .......

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  32. राजीव चौक पर जब भीड धक्का मारती है तो पता नही लगता कि आपके साथ का बंदा कहां गया । बडा रोचक वर्णन और उत्सुकता आखिर दिल में ही रह गयी जो सालती रहेगी

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  33. यह पोस्ट बहुत ही रोचक है। मेरे नए पोस्ट 'बहती गंगा' पर आप सादर आमंत्रित हैं।

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  34. बस मजा आ गया. मुलाकात होगी तो आपकी मूंछों को सहला दूंगा.

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    1. चलिये, आपसे मुलाकात के इंतजार का एक और वसीला हुआ।

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  35. उत्तर

    1. नक्को मिले जी, हमने तलाशा भी नहीं।

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