गुरुवार, जून 27, 2013

केदारनाथ

जून माह के मध्य में देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तरांचल में भारी बारिश, बादल फ़टने की प्राकृतिक घटनाओं के चलते हुई विभीषिका ने  समस्त देश को हिलाकर रख दिया है। ऐसी आपदाओं के होने के कारणों पर, उनसे बचाव\पूर्व-पश्चात प्रबंधन पर हमारे विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन किसी भी परिपक्पव मनुष्य की पहली प्राथमिकता स्थिति को सामान्य करने की होनी चाहिये।  आपदा प्रबंधन में सेना\आईटीबीपी के अतुलनीय योगदान ने फ़िर बहुत से लोगों को बचा लिया नहीं तो हानि की मात्रा बहुत ज्यादा होती।  अपने परिवार में या परिचय में एक की भी असमय मृत्यु हमें शोकाकुल कर देती है, यहाँ तो हजारों की संख्या में नागरिक असमय काल के गाल में समा गये। वास्तविक हानि का  अब तक अनुमान नहीं लगाया जा सका है।

दूसरी तरफ़ इन दुर्घटनाओं से भी अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक हित साधने वालों की कोई कमी नहीं है    और ये काम इतनी सधे तरीके से किये जाते हैं कि इनकी तह तक पहुँचना बहुत आसान नहीं रहता। ब्लॉगर भाईजान अपने सेक्रेटरी पर बात डाल सकते हैं या प्रतिष्ठित अखबारों पर डाल सकते हैं, मीडियावाले अपने से भी ज्यादा प्रतिष्ठित जर्नलिस्ट्स पर डाल सकते हैं, विकल्प असंख्य हैं। ऐसे जुझारू लोग ही इस और इससे पहली पोस्ट के सरोगेट फ़ादर हैं, हम जैसों के प्रेरणास्रोत हैं। वो खुद भी बाज नहीं आते और समय समय पर हमारे अंदर का कलुष भी निकलवाते रहते हैं। 

पीछे वाली पोस्ट से आगे बढ़ते हुये एक बार ’हारम’ एग्रीगेटर पर most viewed articles के अंतर्गत पहले\ दूसरे नंबर पर चमकती रही एक पोस्ट का स्नैप शॉट(एडिटिड वर्ज़न) देख लें। एडिशन में शब्दों के साथ मैंने कोई छेड़्छाड़ नहीं की है, मेरी समझ में जितना कुछ बात करने लायक है, उसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
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’महिलाओं की आबरू’ और ’उनकी आबरू पर हमला’ पर जो लिंक दिया गया है, वो वही है जो लिंक मैंने पिछली पोस्ट पर दिया था और  उत्तराखंड में हुई त्रासदी से इसका संबंध पूछा था। मुझे दोनों में कोई संबंध नहीं दिखा था तो सोचा आप से मार्गदर्शन ले लूँ।  हो सकता है आपके चश्मे का रंग मेरे चश्मे से अलग हो और कुछ ऐसा दिख जाये जो मुझे नहीं दिख रहा था लेकिन इस मामले में आप सब भी मेरी तरह ’ऐंवे-से’ ही निकले।

सिर्फ़ ऊपर वाली पोस्ट और उसमें दिये लिंक ही नहीं, अंग्रेजी की कई पोस्ट्स भी देखीं जिनमें महिलाओं के साथ बलात्कार होने की बात कही गई लेकिन लेखक ने जिक्र किया कि उन्होंने किसी से ऐसा सुना है। नुकसान तो दूसरे प्रांत के लोगों के साथ  उत्तरांचलवासियों का भी हुआ है बल्कि उनका ज्यादा हुआ है। लूटपाट और बलात्कार वाली घटनायें जानकर मैं सोच रहा था कि भूखे-प्यासे लोग, जिनकी खुद की जान पर बनी हुई है वो क्या ऐसी हरकतों में शामिल हो सकते हैं? डाक्टर, वैज्ञानिक, मनोविशेषज्ञ इस बात पर ज्यादा अच्छे से बता सकते हैं। 

मेरे खुद के एक कुलीग और बहुत अच्छे मित्र इसी क्षेत्र के रहने वाले है। उस दिन दूसरी ब्रांच से एक दूसरे  गढ़वाली मित्र किसी काम से आये तो उन दोनों की बातचीत में इस बात को लेकर बहुत फ़िक्र थी कि कैसे उनके क्षेत्रवासियों का नाम ऐसी दरिंदगी भरी घटनाओं में सामने आ रहा है। अपनी दौड़ नेट तक है तो  मैंने घर आकर नेट पर ऐसी खबरों की वास्तविकता जाननी चाही।  वाकई कई पोस्ट्स दिखीं लेकिन जब विस्तार में जाकर पढ़ा तो कुछ और ही पाया। ऐसा नहीं कि लूटपाट नहीं हुई होगी या वो जस्टीफ़ाईड है लेकिन इस आड़ में भ्रामक दुष्प्रचार करना केवल सनसनी पैदा करने की ललक है या इसके पीछे हैं कुटिल इरादे, इस पर सबके अपने अपने ख्याल हो सकते हैं। 

हो सकता है औरों को ये सब बातें बहुत बड़ी न लगती हो लेकिन सबके पैमाने भी तो एक से नहीं हो सकते।  मुझे भी कई बार लगता है कि कुछ बातों पर मेरी प्रतिक्रिया अजीब सी होती है,  लेकिन अंतत: तो मैं खुद के प्रति ही जवाबदेह हूँ और मुझे यही ठीक लगता है कि इस बात की तरफ़ अन्य इच्छुक मित्रों का ध्यान भी जाये। हो सकता है समय की कमी या किसी और वजह से वो इधर न देख पाये हों या फ़िर यह कि हो सकता है कि इस बहाने से मुझे ही इस घटना को मेरे किसी अनदेखे कोण से देखने का अवसर मिल जाये।

हाँ, एक बात जरूर कहना चाहता हूँ कि शब्दों का जीवन मानव-जीवन से कहीं ज्यादा लंबा है और प्रभाव असीमित। बहुत बार एक शब्द या एक वाक्य भी जीवन की दिशा बदल देता है।  हम बचपन में कहावत सुनते थे कि ’मारते का हाथ पकड़ सकते हैं लेकिन बोलते का मुँह नहीं।’ आज के समय में इस मुहावरे के आयाम और भी विस्तृत हो गये हैं, बोलने के साथ हमें लिखने की भी आजादी मिल गई है तो सूचनाओं को ग्रहण करने में और भी अधिक सतर्कता की आवश्यकता है।

दैवी आपदा से प्रभावित प्रत्येक जीव तक हमारी संवेदना पहुँचे और उनके दुख का कुछ हिस्सा हम बाँट सकें,  ईश्वर से यही प्रार्थना है। 

40 टिप्‍पणियां:

  1. समाज में हर जगह हर तरह के लोग हैं भक्‍तों की लाइन में भी हर तरह की जनता रहती है क्‍या कीजि‍ए

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  2. लानत है ऐसी ऐसी निराधार खबरें बनाने वालों पर.....
    निराधार रूमर फैलाना अपराध है, अमानवीय मानसिकता तो ऐसी खबरेँ बनाने मेँ है.असल "कुत्ते गिद्ध नोच रहे है लाशें" और "श्रद्धालुओँ की लूट रहे है आबरू" शीर्षक इन दुराचारियों के लिए होने चाहिए.

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    1. ऐसी खबरें निराधार हों या साधार, लेकन इन्हें छापने वालों के मंतव्य अवश्य ही बहुत नीच हैं।

      सनसनी फैला कर खबर फैलाने और आस्थाओं को चोट पहुँचाने का असली चेहरा एक पत्रकार के मुखौटे में।भेड़ की खाल में भेड़िये शायद ऐसे ही लोगों को कहा जाता है।

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  3. नहीं संजय जी ,
    इन खबरों में कितना सच कितना झूठ था ये तो ईश्वर ही जाने मगर पूरी तरह से ये कपोल कल्पित भी नहीं थी । मीडिया द्वारा बार बार इस बात को उठाए जाने और पीडितों की शिकायत के बात उत्तराखंड पुलिस ने बहुत से नेपाली युवकों को गिरफ़्तार किया जिनके पास से लाशों से उतारे हुए सोने , गहने , नकदी आदि मिली । पुलिस ने उन्हें शारीरिक जांच के लिए भी भेज दिया क्योंकि पुलिस को शक था कि इन्हीं में से कुछ वो भी हैं जो इंसान के रूप में हैवान का रूप धरे हुए हैं । फ़ेसबुक पर एक महिला पत्रकार सुनीता भास्कर जी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है । हां आपकी बात सही है कि इन घटनाओं को कई बार जानबूझ कर किसी उद्देश्य के वशीभूत बढा चढा कर पेश किया जाता है।
    जो भी हुआ अफ़सोसजनक हुआ

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    1. अजय भाई, गलत करने वाले को पकड़ा भी जाना चाहिये और कड़ी से कड़ी सजा भी मिलनी चाहिये। हैवानों के साथ हमें कैसी भी सहानुभूति नहीं है।

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  4. दुनियां में क्या क्या नही होता, दुखद.

    रामराम.

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  5. त्रासदी में निचे तक गिर जाने का ठेका बस नेताओ ने ही नहीं लिया है , मौका मिले तो क्या गरीब क्या अमिर सभी इसमे लग जाते है , ताऊ की लंगर वाली पोस्ट पर मैंने भी कहा था की पहली नजर में तो मुझे भी ये खबर झूठी लगी थी किन्तु बाद में सच लगाने लगे जब खबर देखने लगी जिसमे बच कर आये लोग बता रहे थे कि एक बिस्किट का पैकेट सौ रु और पानी दो सौ में बेचे गए ये काम स्थानीय लोग कर रहे थे ,कुछ गांव वालो ने लोगो को खाना तो दूर पानी तक नहीं दिया , लोग बाद में भूख तक से मरे है और खच्चर वाले लोगो से लुट पाट कर रहे है , हद तो तब हो गई जब एक साधू बाबा मासूमियत से बता रहे थे की माया ( वो पैसा नहीं बोल रहे थे ) गंगा में बह रही थी तो हमने उसे उठा लिया , साधुओ के पास से लाखो रु बरामद हुए जो केदारनाथ मंदिर से "लुटे" गए थे तोड़ कर फेकी गई तिजोरिया सबुत थी उस लुट की , तो आप क्या उम्मीद करते है की आदमी जब इतना गिर सकता है तो इस तरह का अपराध क्यों नहीं कर सकता है , जंगल में महिलाओ को खीच कर ले जाने की बात का असल मतलब तब समझ आया जब
    ( एक एन जी ओ के बारे में पता चला जो उत्तराखंड के त्रासदी वाली जगहों पर जाने का प्रयास कर रहा है , एन जी ओ त्रासदी के बाद अनाथ बेघर हुए बच्चो और महिलाओ को बचाने का प्रयास करता है उसका कहना है की ऐसी हर त्रासदी के बाद ऐसी महिलाओ और बच्चो की खरीद खारोख्त बढ़ जाती है या कुछ गलत लोग ऐसी जगहों पर जा कर अनाथ बच्चो और महिलाओ को गलत धंधे में ले कर आते है , वो ये देखती है की अनाथ बच्चे महिलाए और अपाहिज पुरुष और वृद्ध भी सही जगहों पर जाये , गलत लोगो के हाथ न लगे ।) ये टिपण्णी मैंने अपने ही पोस्ट में दी है आप के शंका करने से पहले ।
    जब खबरे सुनती हूँ की अस्पताल में ४५ % जली महिला या कोमा में पड़ी महिला के साथ रेप हो गया तो ये खबरे हम महिलाओ को आश्चर्य में नहीं डालती है । जहा तक मैंने खबर देखि है ये आरोप स्थानीय लोगो पर नहीं बल्कि उन खच्चर वालो पर लगी है जिनमे से ज्यादातर नेपाल से यहाँ आये है बस यात्रा के समय के लिए पैसे कमाने , कुछ के पास से सेना और पुलिस ने लाखो के गहने और पैसे बरामद भी किये है , लाशो से गहने तक उतारे गए है और जरुरत पड़ने पर फुल गई लाशो के उंगलिया हाथ तक काटे गए है , एक बच कर आये व्यक्ति को सुन रही थी कह रहे थे की स्थानीय लोगो ने जरा भी मदद नहीं की आज उनके इस व्यवहार को हमने भोगा है कल को उनका ये व्यवहार उन्हें ही भोगना पडेगा , न हम वहा जायेंगे और न किसी को जाने की सलाह देंगे । इंसान के निचे गिरने की कोई हद नहीं होती है , खबरों में मसाला लगाया गया ये मान सकती हूँ किन्तु पूरी तरह मनगढ़ंत है ये नहीं मान सकती हूँ ।

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    1. एनजीओ वाली बात आपने बताई लेकिन किसी भी एनजीओ से संबंधित न होने के बावजूद इस बात का मुझे अनुमान था। ऐसी संकट की घड़ी बहुतों के एकदम से सक्रिय होने का बहुत उपयुक्त अवसर होती है।
      असपताल में भर्ती या कोमा में किसी स्त्री के साथ ही नहीं, मासूम बच्चियों और अशक्त वृद्धाओं के साथ रेप जैसी खबरें हम आदमियों को भी आश्चर्य में नहीं डालतीं। विषय थोड़ा अलग हो जायेगा लेकिन कमजोरी का फ़ायदा उठाने के लिये दोपाया कहीं तक गिर सकता है। और इसीलिये संबंधित मुद्दों पर मेरा सुझाव लड़कियों को मजबूत बनाने का और साथ ही अनावश्यक खतरा मोल न लेने का रहता है।
      हर दूसरी घटना की तरह स्थानीय लोगों के बारे में सबके अपने अनुभव हैं। कुछ लोगों की स्थानीय लोगों ने बहुत मदद भी की, हालाँकि यह अहसान की श्रेणी में नहीं ही आता लेकिन ऐसा नहीं कि सबने लूटा ही।
      खबरों को पूरी तरह मनघड़ंत न बताकर मैं उस प्रवृत्ति की तरफ़ ध्यान दिलाना चाह रहा था जो हमें उस लिंक जैसे माध्यम से दिखती है। कुछ समय के बाद इन्हीं खबरों को आधार बनाकर देश, धर्म और समाज पर आघात किये जायेंगे जबकि इन खबरों के अंदर जो लिंक हैं, वो इस घटना से बिल्कुल असंबद्ध हैं।

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  6. kadua sach hai....aaspaas aiseme zyada bhediyehee nazr aate hain.

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  7. achchha kiyaa aap ne post dae kar confusion dur kar diyaa
    maenae aap ki pichhli post kayii baar padhi par koi baat gehri haen is kae allawaa kuchh samjh nahin aaya thaa

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    1. विश्वास है, आपका ध्यान उसी पुरानी पोस्ट पर है जिसके बारे में मैं सोच रहा था।

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    2. i read your last post and saw the link but could not make out exactly the problem but as it was your post i knew there was a problem and you will come back sooner about the actual issue and hence this post was a confusion relieving one
      although i was unaware of such problem
      yet sanjay yesterday in the survivor stories one person said that he his wife and daughter were escorted for safety by local youth { i am not sure whether he said nepali or indian } and as sson the night came their intention came out and they wanted to molest the teenager daughter , he then said that he gave away all his belongings and some how saved his daughter

      AS FAR AS I THINK THE PLOY TO MOLEST THE DAUGHTER MUST HAVE BEEN DONE TO TAKE ALL THE VALUABLES

      there is another story today that doctors in that area found 2 people with pressure cookers and when they opened those there were chopped of limbs of dead bodies WITH JEWELRY .

      I FEEL WE ARE NO MORE AS CIVILIZED AS WE ALL PROJECT OUR SELVES TO BE

      wearing jewelry even to pilgrimage ?? astonishing as well

      pregnant woman in late 20s going to pilgrimage and abortions taking place

      LESSER READ AND SAID BETTER

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    3. जैसा कि रोहित ने अपने कमेंट में कहा है कि विपत्ति के समय मनुष्य का सर्वोत्तम और निकृष्टतम निकल कर बाहर आता है, यह बात सही है। स्वाभाविक है कि हर घटना को अलग परिवेश\सोच से आये लोग अलग नजरिये से देखते हैं। कुल मिलाकर यह पीड़ादायक है और इसमें संस्कारों की भी भूमिका है और प्रशासन की इमेज की भी। There is a general feeling that one can go scotfree after doing anything, it is a big disappointment on every part.

      Yes, we are not like that as we all project ourselves to be.

      As regards wearing jewelry. again, different people have different opinion. I remember one of my seniors almost scolding me a number of times for not wearing any ring, chain etc. on the plea that such things can prove as an emergency tool in case one got stuck somewhere.
      We ought to be much more disciplined, simple and down to earth. My friend Deepak Baba in his post insisted to follow the style of our ancestors, I second him.

      and thanks Rachna ji for this valuable comment.

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  8. किसी चीज की लिमिट होती है....हमारी बुद्धि की भी लिमिटी है...लिमिट माने सीमा यानि बुद्धि की हद...पर जब बुद्धि हद को पार करती है तो भ्रम का शिकार होने लगती है...खबरें आती हैं..जो झूठी लगती हैं..पर होती नहीं...दोनो चेहरे एक साथ दिखते हैं...कहते हैं विपदा में मनुष्य के अंदर का बेहतर औऱ निकृष्टतम आता है....एख रोटी 500 रुपए में भी बिकी है....औऱ कई लोगो को खाना फ्री में भी खिलाया गया है....इसी तरह बदमाशों ने असहाय लोगो पर हमला किया औऱ उनका पैसा लूट लिया...ये बातें बचकर आई लोगो ने बताई है...। खबरें मनगढ़ंत नहीं होती अक्सर । इस बार लगभग सारी खबरें सीधे आ रही हैं।

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    1. विपदा में मनुष्य के अंदर का बेहतर औऱ निकृष्टतम आता है - सहमत हूँ रोहित भाई। खबरों के बारे में उतना सहमत नहीं हूँ। सबसे पहले और लाईव कवरेज के चक्कर में बहुत बार बात का बतंगड़ बना देते हैं भाई लोग। संयोग की बात है इस पोस्ट के पब्लिश होने के बाद ही ’विद्यासागर नौटियाल’ जी का लिखा उपन्यास ’मेरा जामक वापस दो’ पढ़ा है। पहाड़ के आदमी हैं, कम्युनिस्ट पार्टी से विधायक भी रहे हैं और यह उपन्यास ऐसी ही घटना पर आधारित है। मेरी धारणा के विपरीत भी बहुत कुछ है उसमें लेकिन सच्चाई को जिस शालीनता से बयान किया है, सोचने पर मजबूर करती है।

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  9. चिंतनीय स्थिति और विचारणीय ऐसा किसी क्लिपिंग में एक आध बार दिखलाया गया है किन्तु कितना सच मालिक जानें मैं आपकी बातों से सहमत हूँ

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  10. विश्वास अपनी जगह अच्छा होता है। अन्धविश्वास नही।

    सब तरह के लोग सब जगह होते हैं। जिनके घर संसार उजड़ गये वे भले न कर रहे हों, किन्तु बहुत कुछ हुआ है वहां। बिलखता हुआ पिता जिसके बच्चे ने उसकी गोद में प्यास से तडपते दम तोड़ दिया झूठ नही कह रहा होगा न कि उसके बच्चे को बचा कर ले जाने को उसने हजारों रूपये दिय और बच्चे को पचास कदम दूर फेंक कर चले गये धोखेबाज़ ... जो यह करने वाले हैं तो वह करने वाले भी। शर्मसार हूँ कि कितना गिर सकता है मनुष्य :( :(

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  11. नेपाली भी सीमा पार क्र के आते हैं। सील नही है पूरी सीमा। उस ओर इतनी त्रासदी नही हुई है।

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    1. प्रशासन अपनी जिम्मेदारी सही से निभाये तो ऐसी नौबत कम से कम आयें।

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    2. और एक बात कहना चाहूंगी ।

      ऐसी हर घटना (कुकृत्य) के पीछे विदेशी हाथ देखना / इलज़ाम विदेशियों पर डाल देने (जैसे मैंने यहाँ नेपालियों की बात कही) भी एक गलत प्रवृत्ति है।

      ये काम नेपाली भी कर रहे हैं और हिन्दुस्तानी भी । हर समाज में हर समय हर तरह के लोग होते है। ऐसी दुर्घटनाओं के बाद स्थितियों का फायदा लेकर अपनी जेबें भरने वाले लोग भी होते हैं और अपनी जान जोखिम में डाल कर दूसरों की सहायता करने वाले भी ।

      इस त्रासदी के बाद भी दोनों ही तरह की घटनाएं देखने में आई हैं किन्तु दुर्भाग्यवश खबरें उछलती वही हैं जिससे खबरी का निहित स्वार्थ पूरा हो रहा हो।

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  12. लालच की कोई सीमा नहीं होती , और असहाय अवस्था में किसी को देख , मानव भी कम राक्षस नहीं होते !!
    मंगल कामनाएं निर्दोषों के लिए ..

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    1. आप सही कह रहे हैं सतीश भाई, मैं भी यही कहता हूँ कि आदमी से ज्यादा खतरनाक जानवर भी कोई नहीं।

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    2. yahi sach hai' ...........hai na''


      pranam.

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  13. बहुत सुन्दर आलेख, आँख खोलने वाली .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (01.07.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी. कृपया पधारें .

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  14. दोनों पोस्ट विचारणीय हैं। मतलबी अखबार ने चकाचक बिकने वाला शीर्षक लगाया और किसी मतलबी ब्लॉगर ने अपने मतलब का शीर्षक देखते ही चिपका दिया, समाचार पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं समझी। अपने एजेंडे के अनुसार कुछ लोग हर मौके का फायदा उठा लेते हैं। सच्चाई है कि चोर-उचक्के पैनी नज़र से बचाने के लिए चाहे गेरुआ कपड़े पहनें चाहे सफ़ेद, वे साधु या सूफी नहीं हो जाते। न जनता इतनी मूर्ख है कि तथ्य और प्रोपेगेंडा का अंतर न पहचान सके। हाँ, तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि जब सब ठीक हो तब भी शासन, अनुशासन, प्रशासन नहीं दिखता तो फिर अफरातफरी की स्थिति में तो अव्यवस्था होनी ही है।

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    1. अखबार का शीर्षक चकाचक बिकने वाला तो था लेकिन यह कतई नहीं था।


      ~@ जनता....मूर्ख -
      I pray what you are saying is true.

      जो जनता ऐसे हाकिमों को ही जानती मानती है, उसके भाग्य में यही सब होना है।

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    2. यथार्थ कहा, अनुराग जी.....
      "अपने एजेंडे के अनुसार कुछ लोग हर मौके का फायदा उठा लेते हैं।"

      ऐसी विपदाओं में भी लोग अपनी अपनी विचारधारा का पिष्ट-पोषण ही करते है.पीडाओं का भी उल्लेख दर्द से नहीं अपनी सोच के दर्प से करते है.

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  15. आपदा के समय सबके स्वर समवेत उठे, सबके कर्म समवेत जुटें।

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    1. असली बात यही है, कम से कम आपदा के समय तो सब एक सुर में बोलें और एक लक्ष्य के लिये काम करं।

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  16. संजय जी शुरू में ऐसी ख़बरों से मैं भी विचलित हो गया था... इसलिए भी दुखी हुआ के भारत के इस हिस्से के लोग बड़े शांतिप्रिय और करुण मन वाले हैं...
    लेकिन ग्वालियर से गए श्रद्धालु जब लौटे और उनसे मेरी बात हुयी कि आपने पिछले १० दिन कैसे बिताये... उन्होंने बताया कि वहां के लोगों ने हमारे खाने-पीने का इंतजाम किया बिना कोई दाम लिए.
    वापस लौटे यात्रियों से बात करने के बाद थोडा सुकून मिला कि इंसानियत अभी जिंदा है.... ख़बरों में भले ही मार दी जा रही हो

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    1. लोकेन्द्र भाई, दुनिया में दोनों ही तरह की विचारधारायें और उनके मानने वाले रहते ही हैं। खबरवाले बेशक चौबीस घंटे दिख रहे हों लेकिन हर चीज को सनसनीखेज बनाकर अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं।

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  17. आप द्वारा इंगित यह पहलू विचारणीय हो सकता है! मगर तमाम स्रोतों से जो खबर छन कर आ रही है -नराधमों ने किया है भले ही इक्का दुक्का ही क्यों न हो!

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    1. अरविन्द जी, बेशक ही ऐसा करने वाले नराधम हैं और उन्हें उनके दुष्कृत्यों की सजा मिलनी भी चाहिये फ़िर वो किसी भी देश, धर्म या जाति के क्यों न हों।

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  18. आप किसी को दोष दे लीजिए लेकिन ये सच्चाई नहीं बदल सकती कि ऐसा हुआ था और वहाँ से आनें वाले लोग इन बातों की तस्दीक कर रहे हैं ! पहाड़ के लोगों नें सहायता भी बहुत की लेकिन नेपालियों नें इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया !

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    1. दोषी को सजा न मिले तब तक दोष अपना ही है पूरण जी, किसी को दोष क्या देना?

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  19. मनुष्य और पशु में विशेष अंतर रह नहीं गया है इन दिनों , ये मान भी लें कि मीडिया बढ़ा चढ़ा कर बता रहा हो , मगर सच्चाई के अंश मौजूद होने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता !!
    समाजों में उदासीनता या नैराश्य की भावना ना उपजे , इसलिए सकारत्मक पक्ष को भी उतना ही हाईलाईट किया जाना चाहिए जितना जोर शोर से नकारत्मक ख़बरों को प्रकाशित/ प्रदर्शित किया जाता है !

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    1. आपकी टिप्पणी से अक्षरश: सहमत हूँ वाणी जी, अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देकर ही हम विपत्ति से लड़ सकते हैं।

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  20. आदरनीय भाईसाब ...इतने बिस्तार से आप सभी बिद्वतजनों के बिचारो को पढने का सुअवसर प्राप्त हुआ. सच है जो लोग भ्रामक स्थित पैदा कर रहे हैं उनका यह कृत्य अमानवीय है...बहुत ही चिंतन के मुद्दे पर ध्य्नाकर्षण कराते हुए शानदार लेख के लिए हार्दिक बधाई ..सादर प्रणाम के साथ

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    1. डा.आशुतोष जी,
      अपनी अल्प समझ से जैसा समझ आता है, मैं तो वही लिख देता हूँ। आप सुधीजन अपना अभिमत देते हैं, चर्चा को विस्तार तो उसी से प्राप्त होता है। आपके स्नेह के लिये आभार व्यक्त कर रहा हूँ।

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