रविवार, जनवरी 19, 2014

यक्ष प्रश्न

केन्द्रीय राज्यमंत्री डा. शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर थरूर की रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई मृत्यु ने फ़िर से महाभारत का यक्ष-युधिष्ठिर संवाद वाला प्रसंग याद दिला दिया और साथ में फ़िल्म नमकहराम में आलम(रजा मुराद) का बोला वह शेर भी कि -

’जीने की आरज़ू में रोज मर रहे हैं लोग,
मरने की जुस्तज़ू में जिये जा रहा हूँ मैं’

संभावनायें और परिस्थितियाँ इशारा कर रही हैं कि सुनंदा की मृत्यु स्वाभाविक नहीं है। ताजा ट्विटर-विवाद, आईपीएल जैसे प्रकरणों के चलते लगता तो यही है कि यह आत्महत्या या हत्या का मामला हो सकता है। इस रहस्य से पर्दा उठेगा कि नहीं, वीआईपी लोगों का इस प्रकरण से सीधे जुड़े होने के कारण फ़िलहाल तो यह भी एक रहस्य ही है। 

मृत्यु किसी भी रूप में आये, परिजनों के लिये क्षति रूप में आती है और मृत्यु का आत्महत्या या हत्या होना इस क्षति की मात्रा और प्रकार को कई तरीकों से बढ़ा देता  है। इतना जरूर है कि किसी आम नागरिक के साथ हुई ऐसी दुर्घटना अखबार में चंद लाईनों तक सिमट जाती है और किसी हाई-प्रोफ़ाईल के साथ ऐसा होने पर कई दिन की फ़ुटेज की उपलब्धता निश्चित हो जाती है। 

इस मामले में फ़ेसबुक पर लोगों की अलग अलग तरह की प्रतिक्रियायें देखीं।  हम हिन्दुस्तानियों को हर मामले में निर्णायक बनने का शौक\लत है सो प्रतिक्रियाओं से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। सेलिब्रिटी होने का एक पक्ष यह भी है कि आपका व्यक्तिगत कुछ भी नहीं रहने दिया जाता। प्रेस\मीडिया\लोग तो किसी की खाँसी को भी व्यर्थ नहीं जाने देते, यहाँ तो एक जान गई थी तो चूकना असंभव था। प्रतिक्रियाओं से तो आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन इस बात से आश्चर्य जरूर हुआ कि यह नौबत क्यों आई होगी? किसी कमजोर द्वारा ऐसा कदम उठाना फ़िर समझ आता है लेकिन रूप, धन, पद, शक्ति जैसे भौतिक साधनों से संपन्न लोग जब ऐसा कदम उठाते हैं तो आश्चर्यचकित न होना मुझे अजीब लगेगा। 

जीवन कभी भी आसान नहीं रहता। प्राथमिक चिंता रोटी, कपड़ा और मकान की होती है और आर्थिक/सामाजिक स्तर सुधरने के साथ दूसरी चिंतायें इसमें जुड़ती रहती हैं। बहुधा तो हम लोग इन चिंताऒं से जीवन भर जूझते रहते हैं लेकिन सब इतने भाग्यवान भी नहीं होते।वैसे हममें से शायद ही कोई होगा जिसने कभी न कभी आत्महत्या के विकल्प पर विचार नहीं किया होगा। मुझे लगता है कि बहुत बार परिस्थितियाँ इस तरह से प्रतिकूल हो जाती होंगी कि उनसे जूझते हुये जीवन बिताने की अपेक्षा अपने जीवन के अध्याय को स्वयं बंद कर देना कहीं ज्यादा आसान लगने लगता होगा।

अधिकांश और हो सकता है लगभग सभी प्रचलित धर्मों में आत्महत्या को वर्ज्य माना गया है लेकिन मानव सभ्यता कभी भी इससे अछूती नहीं रही होगी। आत्महत्या समस्याओं से मुक्ति नहीं, सिर्फ़ पलायन है। बल्कि ऐसा करके लोग अपने परिजनों को बिल्कुल अकेला कर देते हैं।  कुछ लोग या कुछ घटनाओं को जरूरत से ज्यादा महत्व देना कहीं की समझदारी नहीं है। सकारात्मक विचारों और सकारात्मक सोच से इस आत्मघाती सोच से बचा जा सकता है। 

आज मैंने कुछ आंकड़े देखे तो पाया कि आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या स्त्रियों से बहुत ज्यादा है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि कई गुना ज्यादा है।


ज्ञात मामलों की तह में जाने के सीमित प्रयास किये तो पाया कि आत्महत्या करने वाले पुरुषों में अधिकांश संख्या ऐसे लोगों की थी जिन्होंने 'आर्थिक कारणों' के चलते ऐसा कदम उठाया वहीं ऐसा कदम उठाने वाली स्त्रियों के लिये मुख्य वजह 'रिश्ते' रहे। 'आर्थिक कारणों' के चलते आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा होने की वजह तो यह मानी जा सकती है कि अभी तक इस क्षेत्र में आधिपत्य और जिम्मेदारी पुरुषों की ही ज्यादा रही है तो आत्महत्या करने वालों में भी पुरुष ही आगे रहे होंगे लेकिन ’रिश्ते’ वाला कारण तो दोनों के लिये समान महत्व वाला होना चाहिये न?

रिश्तों में तनाव के कारण आत्महत्या करने वालों में पुरुषों से स्त्रियाँ  कहीं आगे हैं। इसकी वजह क्या हो सकती है?

क्या रिश्ते तोड़ने या टूटते रिश्तों से सामंजस्य बिठाने में पुरुष ज्यादा माहिर हैं, ज्यादा प्रैक्टिकल हैं? 

समय गुजरने के साथ क्या स्त्रियाँ रिश्ते में स्वयं को पुरुष पर निर्भर और कमजोर मान लेती है? या फ़िर आम धारणा के विपरीत पुरुष भावनात्मक रूप से ज्यादा मजबूत हैं?  

अगर किसी रिश्ते को लेकर पुरुष गंभीर नहीं है तो क्या स्त्री के लिये जान दे देना ही सर्वोत्तम उपाय रह जाता है? 



बात मृत्यु की और आश्चर्य की हो और मुझे अतिप्रिय प्रसंग का ज़िक्र न आये, बहुत मुश्किल है। और तो और, यहाँ तो लगता है इस श्लोक में पूछे गये चारों प्रश्न और उनके उत्तर आज भी प्रासंगिक हैं।




67 टिप्‍पणियां:

  1. प्रश्न गंभीर है और विचारणीय . पता नही लोग ऐसा सोच भी कैसे लेते हैं

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  2. आहत होने वाला जब सीमा से परे आहत महसूस करने लगता है तब वह आहत करने वाले को ही आहत करने के उद्देश्य से अपना जीवन समाप्त करना निश्चित कर लेता है ।

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    1. ऐसा ही होगा अमित जी लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने से सिर्फ़ वही आहत होता है जिसने सीमा से परे जाकर आहत किया था। कम ही रिश्ते होते हैं जिनमें सिर्फ़ दो लोग इन्वॉल्व होते हैं लेकिन प्रभावित बहुत से पक्ष होते हैं।

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  3. 'जीवन से पहले और मरने के बाद क्‍या' शायद यह वाक्‍य आश्‍चर्यजनक तो है ही।

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  4. सीने में जलन ऑंखों में तूफ़ान सा क्‍यों हैं

    इस शहर में हर शख्‍़स परेशान सा क्‍यों है

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  5. शायद इस मामले में कोई विशेषज्ञ नहीं हो पाता।
    टिपण्णी करने का कोई स्कोप नहीं है ! इतने ऐंगल हो और एक एंगल की भी समझ न रखने वाले हम क्या कहें !

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  6. बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी इसलिए फिलहाल nocomments

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  7. यह कहना बेमानी है कि सुखी कौन है और संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है... अनुत्तरित प्रश्न मुँह बाए खड़े रह जाते हैं और जिंदगी ( या मौत) आगे निकल जाती है।
    सुनंदा पुष्कर की ह्त्या एक सोंची समझी साजिश है जिसका पर्दाफ़ाश C B I वैसे ही करेगी जैसाकि उसने आरुषी हत्याकांड का किया था

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    1. पर्दाफ़ाश के बारे में ऐसी ही आशा/अपेक्षा/आशंका हमें भी है।

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  8. छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिये, यह मुनासिब नहीं आदमी के लिये।

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  9. किम् आश्चर्यम् ? प्रतिदिन लोग मर रहे हैं पर मैं तो जीवित हूँ मैं जीवित रहूँगा , मैं नहीं मरूँगा , यही आश्चर्य है ।

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    1. यही भ्रम समस्‍याओं का जनक है।

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  10. आत्‍महत्‍या भी मन का भाव है, कभी कभी कुछ लोगों में प्रबल वेग से उठ जाता है और वे इस स्थिति को प्राप्‍त होते हैं।

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    1. जी बिल्कुल, प्रबल वेग होता है लेकिन कुछ विशेषज्ञ भी कहते हैं कि यह क्षणिक होता है, अच्छी सलाह से या अच्छी संगति से वह क्षण टल जाये तो इस अनहोनी की संभावना नगण्य रह जाती है। रही बात विशेषज्ञों की तो वो भी फ़ाईनेंशियल एक्स्पर्ट्स की तरह ही होते हैं जो उन्हें धन कमाना सिखाते हैं जो पहले से ही खुद एक्स्पर्ट्स से ज्यादा धनवान होते हैं। विशेषज्ञों की बातें भी बातें हैं, बातों का क्या.

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  11. संजय बाउजी, सबसे पहले तो यह घटना हत्या है या आत्महत्या है, इसपर जाँच का नाटक चलने के बाद ही जो फ़ैसला हमारे सामने रखा जाएगा उसे मानना होगा.. जैसे शास्त्री जी की अचानक मृत्यु, नेताजी की विमान दुर्घटना, आरुषि-हेमराज हत्याकाण्ड, ललित नारायण मिश्र बम-विस्फोट काण्ड आदि..
    "लेकिन रूप, धन, पद, शक्ति जैसे भौतिक साधनों से संपन्न लोग जब ऐसा कदम उठाते हैं तो आश्चर्यचकित न होना मुझे अजीब लगेगा।" ये अजीब लगने वाली बात ही नहीं है, क्योंकि जब दो पतियों के बाद दो पत्नियों का त्याग किये जाने वाले की तीसरी पत्नी बनने का निर्णय करने वाले समाज की सदस्य हों तो रूप, धन, पद, शक्ति ही हत्या/आत्महत्या अर्थात मृत्यु का कारण बनते हैं. अब इन बातों पर आश्चर्य नहीं होता.
    हाँ, आत्महत्या की बात आपने सही कही.. ख़ुद मैं चौबीस घण्टे में एक बार इस बारे में ज़रूर सोचता हूँ.. फिर बड़े भाई रविन्द्र शर्मा साहब का शे'र याद आ जाता है:
    .
    ऐ इमारत, कूदने वाले से यह तो पूछती,
    ज़िन्दगी से क्यों तुझे आसान मर जाना लगा!

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    1. @ ये अजीब लगने वाली बात ही नहीं है, क्योंकि जब दो पतियों के बाद दो पत्नियों का त्याग किये जाने वाले की तीसरी पत्नी बनने का निर्णय करने वाले समाज की सदस्य हों तो रूप, धन, पद, शक्ति ही हत्या/आत्महत्या अर्थात मृत्यु का कारण बनते हैं. अब इन बातों पर आश्चर्य नहीं होता.

      जैसा की पोस्ट में कहा गया है हम बहुत ही जल्दी निर्णय पर पहुँच जाते है , सुंनदा के दूसरे पति की मौत एक एक्सीडेंट में १०९७ में ही हो गई थी तब उनके बेटे की आयु कुछ ५ -६ वर्ष कि रही होगी और वो थरूर से २००८-९ में मिलती है और १० में विवाह करती है , जीवन में ११-१२ वर्ष वो अकेले जी चुकी थी । गिनती आकंड़ो से राय़ नहीं बनानी चाहिए कई बार चीजे उससे अलग होती है , विवाह को ज्यादा महत्व न देने वाले इस तरह की प्रतिक्रिया नहीं देते है , ऐसी प्रतिक्रिया वही देते है जिनका उन पर विश्वास होता है उनके जीवन में उसका महत्व होता है , वरना तो तलाक के लिए याचिका लगाई जाती है और मुआवजे की गिनती की जाती है । अफसोस हम सभी बाहरी आवरणों से ही लोगो के बारे में विचार ज्यादा बनाते है ।

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    2. नाटकों की हमें आदत हो चुकी है, एक और सही।

      अजीब ये लगता है कि बहुत स्ट्रॉंग दिखने वाले लोग भी अंदर से हमारे जैसे ही हैं।

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    3. आपको अजीब क्यों लग रहा है, मजबूत से मजबूत इंसान के जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जब वो कमज़ोर हो जाता है, राम के जीवन में और विश्वामित्र के जीवन में भी ऐसे पल आ चुके हैं ।
      अफ़सोस कि आपको ये नाटक लग रहा है !

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    4. आपको हुये अफ़सोस के लिये हमें भी अफ़सोस है, ’जाँच’ को अब नाटक नहीं कहेंगे।

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    5. अंशुमाला जी की सधी और संतुलित बातों का मैं शुरू से ही प्रशंसक रहा हूँ.. इसलिये उनकी बातों से सहमत होते हुये भी कुछ बातें अपनी ओर से बतौर स्पष्टीकरण रखना चाहूँगा..
      @गिनती आकंड़ो से राय़ नहीं बनानी चाहिए कई बार चीजे उससे अलग होती है...
      गिनती के आँकड़ों का इस्तेमाल मैंने शशि तरूर के लिये किया है (क्योंकि जब दो पतियों के बाद दो पत्नियों का त्याग किये जाने वाले की तीसरी पत्नी बनने का निर्णय)...
      सुनन्दा जी के दूसरे पति की मृत्यु कर्ज़ न चुका पाने के कारण हुई.. अब वो घटना भी आत्महत्या थी या एक साधारण रोड ऐक्सिडेण्ट.. पता नहीं!! ग्यारह वर्षों के अकेलेपन (हालाँकि मुझे इससे कोई ऐतराज़ नहीं, न वो इस पोस्ट के मुद्दे से जुड़ा है) में कनाडा में एक मित्र का साथ भी सम्मिलित है!!
      वर्त्तमान प्रकरण पर 'हमें निर्णायक नहीं होना चाहिए' कहने के बावजूद भी हम उसे आत्महत्या मान रहे हैं.. और रही बात जाँच के नाटक की, तो इस बात पर मैं आज भी कायम हूँ.. बहुत सारी जाँच देखी है इस महान राष्ट्र की महान जाँच एजेंसी के द्वारा!!
      अंत में दिवंगत आत्मा के लिए मेरा सम्वेदनाएँ..

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    6. @अंशुमाला जी की सधी और संतुलित बातों का मैं शुरू से ही प्रशंसक रहा हूँ.
      सलिल जी
      ये आप की निजी राय है बहुत सारे लोग आप के इस राय से असहमत होंगे , किन्तु आप ने लिखा क्योकि आप निजी रूप से ऐसा सोचते है सम्भवतः मेरा व्यवहार आप के प्रति अलग और दुसरो के प्रति अलग हो ,समाज मेरे बारे में क्या सोचता है ये बाते आप को ये लिखते समय प्रभावित नहीं करती है , और आप ने जो लिखा वो मेरी वर्तमान सोच के कारण लिखा होगा भविष्य में मै क्या करुँगी ये तो मै स्वयं भी नहीं बता सकती । विवाह भी ऐसे ही है ये बहुत ही निजी विचार होता है हम इस बात की परवाह नहीं करते कई बार की लोग उसके बारे में क्या राय रखते है या लोगो के प्रति उसका व्यवहार कैसा है , वयक्ति का व्यवहार हमारे प्रति कैसा है हम इसे ही देखते है , और भविष्य को लेकर विचार भी उसी हिसाब से बनाते है , थरूर जरुर राजनीति के लिए युवा है किन्तु सामाजिक और विवाह के परिपेक्ष में देखे तो उनकी आयु प्रौढ़ की हो चुकी है कोई भी इस आयु में कुछ साल के साथ की बात नहीं सोचता होगा , या ये अनुमान नहीं लगा सकता कि इस सामाजिक और राजनीतिक जीवन को जी रहा व्यक्ति का व्यवहार ऐसा हो सकता है , या जो पत्नी के साथ "हाथापाई " जैसा कुछ कर सकता है जिसके निशान उसके चहरे पर दिखाई ही न दे । हमारे समाज में तो विवाह केवल विश्वास पर ही बन जाते है , फैसला सही था या गलत ये तो बाद में ही पता लगता है ।

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  12. मेरे लिए तो ये घोर आश्चर्य का विषय है की आप ने इस विषय पर पोस्ट लिखी , जिसमे विवाद और बहस की बहुत सी सम्भावना है खासकर स्त्री पुरुष को लेकर । सब कह ले तो अपनी बात कहती हूँ , वैसे डर भी लग रहा है लम्बी टिप्पणी से .......

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    1. समाज में रह रहे हैं तो एकदम से निरपेक्ष तो रहा नहीं जा सकता, वैसे ऐसे विषयों पर एकाध बार पहले भी लिखा है। विवाद या बहस जब व्यक्तिगत स्तर पर आ जाये या ’बिलो द बेल्ट’ हो तो उद्देश्य भटक जाती है, बस इतने ही रिज़र्वेशंस हैं मेरे या फ़िर समय का दबाव वरना तो हम ऐसे ऐसे विवाद खड़े कर दें कि रोज हंगामा उतर आये।

      कृपया टिप्पणियों की लंबाई से आशंकित न हों, विस्तृत प्रतिक्रिया(ओं) की प्रतीक्षा रहेगी।

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  13. यक्ष के प्रश्नों के उत्तर युधिष्ठिर के आलावा कोई पांडव ना दे सका...फिर हमारी बिसात क्या है...प्रत्येक व्यक्ति के विचार उसके व्यक्तिगत होते हैं...परन्तु उनका प्रभाव उनके इर्द-गिर्द सभी पर पड़ता है...समाज को आइना दिखाता आलेख...

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  14. जो भी हुआ गलत हुआ ,अंत किसी समस्या का हल नही हो सकता ....

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  15. एक ही उत्तर सुचिंतित और सत्य लगता है यह दुनिया एक भ्रम है। माया है !

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  16. फिलहाल ये कहना मुश्किल है कि ये आत्महत्या का केस है या हत्या का । अगर जो हत्या है फिर तो बात बिलकुल ही बदल जाती है लेकिन अगर ये आत्महत्या थी तो ऊपर से देखने पर तो यही कहेंगे, जो क़दम सुनंदा ने उठाया, वो सरासर गलत ही है । मन तो यही कहता है, एक माँ होने के नाते उसे कम से कम अपने बेटे के बारे में सोचना चाहिए था । लेकिन मानव मन बहुत कॉम्प्लेक्स होते हुए भी कुछ मामलों में बड़ा सिंगल ट्रैक होता है, और वो है प्रेम का मामला । प्रेम में पड़ा हुआ दिल कुछ नहीं देखता और प्रेम में पड़े हुए दिल के आत्मसम्मान को अगर चोट लगती है, फिर तो सोचना, समझना, दिखना, सुनना सब बंद हो जाता है, ये दुनिया उनके काबिल ही नहीं लगती फिर यहाँ रहने का कोई अवचित्य भी नहीं लगता, जब मन ऐसी स्थिति में आ जाता है तो ऐसे क़दम कुछ लोग उठा ही लेते हैं, इसमें धन-दौलत, पोजिशन-पावर, रूप गुण का होना, या नहीं होना कोई मायने नहीं रखता । अगर ऐसा नहीं होता तो लोग तख़्त-ओ-ताज़ क्यों छोड़ देते भला प्रेम के लिए ।
    उस एक इंसान द्वारा 'रिजेक्टेड' महसूस करना, जिसके इर्द-गिर्द ही उसकी दुनिया घूमती है उससे बड़ी तक़लीफ़ दूसरी नहीं हो सकती । जब पति ही ये जता दे कि तुमसे बेहतर विकल्प है मेरे पास, तुम हार रही हो तो पत्नी द्वारा ऐसा क़दम उठाना आपको आश्चर्य में क्यों डाल रहा है ??
    हर स्त्री अपने रूप-गुण, पैसा-पावर से परे सिर्फ स्त्री, प्रेमिका, पत्नी , माँ, बहन, बीवी, लुगाई भी होती है, और जब वो ये सब होती है तो इन सारे लबादों से अलग रहती है.....
    अगर समय रहते शशि थरूर अपने विवाहेतर सम्बन्ध का खंडन पब्लिकली करते, सुना देते दो-चार खरी-खोटी उस पाकिस्तानी पत्रकार को, तो उनकी पत्नी भी रहती और राजनैतिक साख में में भी इज़ाफ़ा होता, एक पाकिस्तानी महिला पत्रकार से इतनी नज़दीकी वैसे भी किसी भारतीय राजनयिक के लिए कोई अच्छी बात नहीं लगती है.....
    चलिए बढ़िया है, आपने ये पोस्ट लिखी स्त्री मन की कुछ बातें यहाँ कहने का मौका मिला, और पुरुषों को आग़ाह करने का भी अवसर मिला कि अपनी पत्नियों के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाने से पहले उसके अंजाम के बारे में भी सोचें, ऐसा किसी के साथ कभी भी और कहीं भी हो सकता है.। पति के लिए पत्नी सिर्फ पत्नी ही बनी रहना चाहती है.…। पीरियड !

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    1. Having said all this mumbo-zumbo, अपनी शादी बचाने के लिए फाईट करना पड़े तो फाईट करना चाहिए गिव-अप करना बुजदिली है।

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    2. - तख्त-ओ-ताज छोड़ने वाले अधिकतर मामलों में पुरुष ही रहे होंगे जिन्होंने छोड़ा।
      - आत्मसम्मान को चोट सिर्फ़ पुरुष ही पहुँचाता है?
      - मेरी राय में यह सब होने के बाद भी घर परिवार/बच्चों को भुलाकर आत्महत्या जैसा कदम उठाना नितांत आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति है।
      - मुझे आश्चर्य में यही बात डाल रही है कि रिजेक्शन का ज्यादा प्रभाव स्त्री पर ही क्यों? स्त्रियाँ क्या इस बात को मानकर ही चलती हैं कि उन्हें रिजेक्शन नहीं मिल सकता या नहीं मिलना चाहिये? आसपास ऐसे पुरुष भी देखे हैं जो अपनी पत्नी स दुत्कारे जाते हैं और इस वजह से समाज में भी उनको हेय दृष्टि से भी देखा जाता है लेकिन वो आत्महत्या नहीं करते। तो इसका मतलब ये निकाला जाये कि पुरुष प्राय: स्वाभिमानी नहीं होते?
      - वो पत्रकार पाकिस्तानी न होकर स्वदेशी होती तो ये ओके था?
      अच्छा हुआ आपने स्त्री मन की कुछ बातें यहाँ शेयर की। आगाह होने वाले आगाह हो जायेंगे और जिन्हें नहीं होना वो नहीं ही होंगे।

      असली बात तो यही है जो mumbo-zumbo saidne के बाद लिखी है, शादी बचाने के लिये टाईट-फ़ाईट जो करना पड़े वो किया जाये। to give-up is not a sane thing.

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    3. अफसोस उस बच्चे के लिए है जो एक गम्भीर बीमारी से पीड़ित है और उसकी माँ नहीं है और सौतेला बाप है, जो देश की कम ख़र्च एयर्लाइंस में सफ़र करने वालों को कैटल क्लास पब्लिक कहता है!!

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    4. Sanjay Ji,
      मेरी टिप्पणी एक स्त्री की भावनाओं के सन्दर्भ में है, सुनंदा जो एक स्त्री थी ने ऐसा क्यूँ किया होगा, मैं सिर्फ इतना कहना चाहती थी.…

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    5. असली बात तो यही है जो mumbo-zumbo saidne के बाद लिखी है, शादी बचाने के लिये टाईट-फ़ाईट जो करना पड़े वो किया जाये। to give-up is not a sane thing.

      सप्तपदी में लिये हुए वचन जिस दिन तोड़ दिये गए शादी उसी दिन समाप्त होगयी। जो पुरुष या स्त्री शादी से इतर सम्बन्ध बनाता हैं उसके लिये तो वही लड़ेगा जो विवश होगा। शादी बचा ली गयी सैनिटी का परिचायक हैं या अनैतिकता को बढ़ावा देने का इस पर भी आप कभी विमर्श करवा दे http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2008/04/blog-post_30.html

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    6. हां तो ठीक ही कहा है न, शादी बचाने के लिये पति या पत्नी(जैसा भी मामला हो) उसे टाईट करना पड़े या फ़ाईट करनी पड़े तो करनी चाहिये। टाईट-फ़ाईट वहीं किया जायेगा जहाँ सुधार की गुंजाईश है, एकतरफ़ा सरेंडर करके झेलते रहने की सलाह भी नहीं दी और जान लेने देने की सलाह भी नहीं दी। अनैतिकता को बढ़ावा देने वाली फ़ाईट की हिमायत नहीं की जा रही।
      लिंक वाला विमर्श भी जरूर देखेंगे।

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    7. टाईट-फ़ाईट वहीं किया जायेगा जहाँ सुधार की गुंजाईश है,
      solutions are needed to break the conditioning how many years more and how many generations more we need to "correct " the people who dont keep the sanctity of marriage alive . they are bad example setters and its high time the society started punishing legally the couples who creat such situations in society and set bad examples. the best is to separate and live alone rather then the showing off that how much forgiving the couple is and how much they love . some "miistakes " cant be forgiven and we need to think a better option then the old options because old options are now leading to so much mental pressure that deaths take place . do you remember the chand - fiza episode ??

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    8. @ मुझे आश्चर्य में यही बात डाल रही है कि रिजेक्शन का ज्यादा प्रभाव स्त्री पर ही क्यों? स्त्रियाँ क्या इस बात को मानकर ही चलती हैं कि उन्हें रिजेक्शन नहीं मिल सकता या नहीं मिलना चाहिये? आसपास ऐसे पुरुष भी देखे हैं जो अपनी पत्नी स दुत्कारे जाते हैं और इस वजह से समाज में भी उनको हेय दृष्टि से भी देखा जाता है लेकिन वो आत्महत्या नहीं करते। तो इसका मतलब ये निकाला जाये कि पुरुष प्राय: स्वाभिमानी नहीं होते?
      इस मामले में स्त्री कि स्थिति बड़ी ख़राब है दोनों ही स्थति में नुकशान उसका ही होता है ,पुरुष को जब रिजेक्शन मिलता है तो क्या होता है ये सब आप अक्सर खबरो में तेजाबी कांड , "अवैध संबंधो " के शक में पत्नी बहन बेटी की ह्त्या , आदि के रूप में पढते होंगे , तेज़ाब कांड में तो रिजेक्शन में रिस्ते होते ही नहीं है किन्तु वहा भी भुगतना स्त्री को ही पड़ता है , ऑनर किलिंग में भी कई बार सलेक्शन को भुगतना पड़ता है , जबकि पति के पत्नी को छोड़ने वाले किस्सो में अपनाने के बाद रिजेक्शन कि बात आती है , मझधार में छोड़ देने जैसा , कई बार होता है न जब हम समाने वाले को सजा नहीं दे पाते है तो खुद को सजा दे देते है इस उम्मीद में की उसे सबक मिलेगा , आत्महत्या कर सबक देने कि सोच रखने वाली मुर्ख पत्निया नहीं जानती की उनके आत्महत्या करने के बाद सबक तो दूर उन्हें ही पागल डिप्रेशन की मरीज , स्त्री को तो भगवान भी नहीं समझ सकते जैसे ढेरो जुमले से उन्हें ही गलत साबित कर दिया जाता है ।

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    9. न तो रिश्ते इतने सरल होते हैं न ही जीवन कम्पार्टमेंट में बंटा होता है कि हैम सोचें पहली बोगी का काम अब ख़तम हुआ अब दूसरी बोगी में चलते हैं । विमर्श करने के लिए तो हम बहुत आसानी से जीवन को एक फॉर्मूले में बाँधने की कोशिश करते हैं, लेकिन हर जीवन की अपनी पेचीदगियाँ होतीं हैं, ख़ास करके तब जब आप और भी रिश्तों से जुड़े होते हैं, मसलन बच्चे ।

      नैतिकता का तकाज़ा तो यही है कि जीवन में सब कुछ साफ़-सुथरा हो, लेकिन क्या हर किसी के साथ ऐसा है ?? और अगर ऐसा नहीं है तो क्या सिर्फ अपनी बात साबित करने के लिए आत्महत्या या हत्या करना सही है ??? ऐसे कदम उठाने से किसी एक तो आपने सबक सिखा दिया लेकिन उसके साथ कितनो के साथ आप अन्याय कर जाते हैं.। सुनंदा की ही बात लीजिये, अगर उसने आत्महत्या की है तो शायद ही शशि थरूर को एक सबक़ मिला हो, शायद ही उसको राजनैतिक आघात भी लगा हो लेकिन ऐसा कदम उठा कर सुनंदा ने अपने बच्चे को दुनिया में बिलकुल अकेला ज़रूर छोड़ दिया । वो भी कुछ वर्षों में सम्हाल जाएगा और सब भूल-भाल जाएगा।

      और सच्ची बात कहूं तो इस वक्त तो यही लग रहा है न वो कुछ साबित कर पाई, न ही किसी को कोई आघात लगा है, उसके बिना भी सबका जीवन बदस्तूर चल रहा है.। उसका अपना भाई कहता है शशि ऐसा कर ही नहीं सकता, बेटा भी यही कह रहा है, शशि की पार्टी ने भी शशि को कोई सज़ा नहीं दी, तो निष्कर्ष क्या हुआ ऐसे कदम उठाने का, इससे बेहतर तो ये होता कि वो जीवित रहती और इस थरूर को नाकों चने चबवाती, टाईट फ़ाईट की बात तब होती।

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    10. इसी बारे में ’नाटक’ शब्द लिखा था।

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  17. मुद्दा ये भी हैं कि एक पत्नी ने अपने पति { अब नंबर कौन सा हैं ये इतना आवश्यक क्यूँ और कैसे और किसने बना दिया ?} कि उन ईमेल को प्रकाशित कर दिया , उन फ़ोन कॉल , ट्विटर इत्यादि को सबके सामने ला दिया जिनसे ये साबित हुआ कि एक रिलेशन शिप में होते हुए भी उस पति ने दूसरी रेलेशन शिप को बढ़ावा दिया और अंत भी किया।

    कितनी पत्नियां ये करती हैं , शादी के बाद का सम्बन्ध गलत हैं ये मानते हुए भी पति को एक सामाजिक सुरक्षा कवच देती हैं

    यहाँ सुनंदा ने मेहर को गलत माना तो पति को भी गलत माना। इस मुद्दे पर ना तो आपने बात कि और ना ही आप के टिपण्णी कारो ने
    जिंदगी कि सीमा ऊपर वाले का के हाथ होती , विधि में जैसी मृत्यु लिखी हैं वैसी ही होगी और जब होनी हैं तब ही होंगी लेकिन अपनी मृत्यु से सुनंदा , थरूर को एक सबक सीखा गयी और एक तरह से उनके पोलिटिकल करियर पर भी आघात ही कर गयी

    कम से कम उन बीवियों से तो वो लाख टाइम बेहतर थी जो जीती हैं उस पति के लिये जो उनके साथ रेह कर भी अन्य स्त्री से सम्बन्ध स्थापित करता हैं , करवा चौथ भी रखती हैं इसी तरह के पति के लिये और शादी को साथ जन्मो का सम्बन्ध भी मानती हैं और पति कि " गलतियों " को क्षमा करके महान बनती हैं

    आप कि प्रतिक्रया का इंतज़ार हैं

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    1. सहमत हूँ । मजनूँ की छठी औलाद है ये शशि थरूर, अब क्या करेगा चौथी शादी ? बस मुझे बेटे के लिए बहुत अफ़सोस है, बाकी जीना-मरना तो है ही.… जाना सबको है एक दिन ।

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    2. दोष किसका है और इसे ग्लोरिफाई कैसे किया जा रहा है यह कहना एक नए विवाद को जन्म दे सकता है... शशि तरूर जैसे घटिया और धन के मद में चूर व्यक्ति के लिए इस तरह महिलाओं को अपना खिलौना बनाना कोई अनोखी और आश्चर्यजनक बात नहीं है.. यह तो सुनन्दा को सोचना चाहिए था.. एक समय पूरी तरह कर्ज़ में डूबी और अपने स्वर्गीय पति के सारे कर्ज़ों की इकलौती वारिस बनी सुनंदा अचानक करोड़पति बन जाती हैं और शशि तरूर (बतौर काँग्रेस नेता)-सुनन्दा सम्बन्धों को विपक्ष द्वारा "बीस करोड़ की गर्ल-फ्रेण्ड" बताए जाने पर "आनन-फ़ानन में शादी" का रूप देते हैं!!
      पता नहीं सुनन्दा जैसी भोली महिला कैसे इस जाल में फँस जाती हैं!! वैसे दोष किसका मैं इसपर कुछ नहीं कहूँगा!!
      पुनश्च: ताज़ा प्राप्त समाचारों के अनुसार उन्हें ज़हर दिए जाने का सन्देह किया जा रहा है, पुष्टि होनी अभी भी बाक़ी है!

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    3. सलिल जी
      ना तो मैने सुनंदा को भोली कहा हैं ना थरूर को घटिया इत्यादि
      मैने सुनन्दा कि मृत्यु पर भी कमेंट नहीं किया हैं क्युकी कोई एक शादी करे या ३ लेकिन क़ानूनी दायरे मे हो तो हमे उस पर बात ही नहीं करनी चाहिये
      धन कौन कैसे कमाता हैं विधवा/ विधुर या डाइवोर्सी और कैसे करोड़ पति बन जाता हैं ये भी क्यूँ मुद्दा हो जबकि हैम सब जानते हैं कैसे होता हैं
      प्रश्न मात्र इतना हैं कि एक रिलेशनशिप में होने के बाद कोई अगर कहीं विपरीत लिंग के साथ इन्वॉल्व होता हैं तो कितनी पत्नियां इसको मुद्दा बनाती हैं ??
      दोष किसी का नहीं हैं दोष हैं व्यवस्था का जहां पति का सम्बन्ध किसी और स्त्री के साथ होने से पत्नी के अंदर एक इन्फीरियर फीलिंग आती हैं जिसके तहत वो पति को कुछ ना केह कर उस स्त्री पर दोष डालती हैं और अपने को सुपीरियर दिखने के लिये पति के साथ अपने सम्बन्ध को एक दम सही दिखने के लिये पति को निर्दोष साबित करती हैं तरुण तेजपाल का केस देख ले या कोई और।
      ज्यादा तो यही देखा जाता हैं कि पति के शादी से इतर सम्बन्ध कि जानकारी के बाद पत्नी के गर्भवती होने कि खबर आ जाती हैं और ९ महिने के अंदर ही घर मे मिठाई बांटी जाती हैं। एक फ़िल्मी सितारे के यहाँ तो पत्नी ने सरोगेसी के सहारा लिया और बच्चा पाया { अपनी भाभी से } उसके कुछ दिन पेहले तक उनके पति का अफैर एक मिस वर्ल्ड से माना जा रहा था

      सुनंदा ने कुछ जरुर ऐसा किया जिसको इस पोस्ट में नहीं समेटा गया बस इतना ही

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    4. रचना जी, बहुत संभव है बल्कि स्वाभाविक है कि इस पोस्ट में बहुत कुछ कवर नहीं किया जा सका होगा। मैंने ये पोस्ट सिर्फ़ थरूर दंपत्ति को फ़ोकस करके लिखी भी नहीं है, सुनंदा वाली दुर्घटना ने मेरे मन में कुछ प्रश्न फ़िर से जरूर खड़े कर दिये।
      समय मिलते ही कुछ और विस्तार देने का प्रयास करूँगा।

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    5. अकेली स्त्री पर दोष डालना भी उतना ही गलत हैं जितना अकेला पुरुष पर। किसी एक पर दोष डालने मात्र से सही जिम्मेदारी निर्धारित नहीं की जा सकती। व्यवहार में यही देखने को मिलता है कि अघटनीय होने के बाद सारा दोष किसी एक पक्ष पर डाल दिया जाता है।
      मेरी मंशा स्त्री की विवशता के कारणों को जानने की है।

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    6. @मेरी मंशा स्त्री की विवशता के कारणों को जानने की है।

      वही तो मेरा प्रश्न था कि आप कि पोस्ट में स्त्री को विवश क्यूँ माना गया सुनंदा ने विवशता को ही तो तोड़ दिया हैं। वो अगर विवश होती तो वो करती जो एक पत्नी आज तक करती रही हैं यानि अपनी शादी को बचाती। अपने पति के गलत सम्बन्ध पर पर्दा डालती , परिवार को बचाने के नाटक करती अपनाए अहम् कि तुष्टि के दूसरी औरत का टैग लगा कर केवल उस स्त्री को बदनाम करती जिस से पति का सम्बन्ध रहा।
      सुनंदा ने ऐसा कुछ भी नहीं किया , उसने सब कुछ साफ़ तौर से पब्लिक के सामने रख दिया। उसकी मृत्यु निश्चित थी जिस तरह भी आनी थी आई। लेकिन अगर उसने आत्म हत्या कि हैं या उसको आत्म हत्या करने पर मजबूर होना पड़ा हैं तो उसने इतने तथ्य जरुर छोड़े हैं जिन से दोषी व्यक्ति को सजा हो और इसको विवशता नहीं कहा जासकता हैं
      वो परिपाटी से अलग तरह से चली हैं एक बदलाव कि बयार हैं ये सब महिला जो मर कर भी दूसरी स्त्रियों को सोचने पर मजबूर करती हैं कि विवशता से इतर भी रास्ते हैं।

      आप ने सुनन्दा प्रकरण का सबसे महत्व पूर्ण मुद्दा ना तो देखा और ना ही समझा { माफ़ी और सादर सहित ही ले इस लाइन को } और अपनी पोस्ट में उसका को लिखा ही नहीं , इस लिये आप कि पोस्ट पर विमर्श वही पुराना हैं जहां पुरातन सोच ज्यादा उभर कर आ गयी हैं।

      चाहती तो पहला कमेंट मेरा होता पर हमेशा सुना हैं कि " रचना जी नहीं चाहती कोई और स्त्री विमर्श पर सार्थक बात करे इस लिये पोस्ट के मुद्दे को स्त्री पुरुष का मुद्दा बना देती हैं " इस लिये इस बार जब सब लिख चुके तभी लिखा

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    7. @व्यवहार में यही देखने को मिलता है कि अघटनीय होने के बाद सारा दोष किसी एक पक्ष पर डाल दिया जाता है।

      जी हाँ व्यवहार में पति शादी से इतर सम्बन्ध रखता हैं और जब मन होता हैं वापस घर आजाता हैं और पत्नी से माफ़ी मांग लेता हैं , कभी कभी पति ये सब ना चाहते हुए भी करता हैं क्युकी अपनी सामाजिक इमेज को बिगाड़ने से डरता हैं और व्यवहारिक रूप से पत्नी उसे माफ़ करती हैं और दोनों नौ महीने के बाद माँ पिता बन जाते हैं
      ये सब एक विवश समाज और विवश मानसिकता से बंधे हैं लेकिन
      जो लोग इन से इतर कोई फैसला लेते हैं वो ही दुसरो को नए रास्ते दिखते हैं। बदलाव कि बयार वही लाते हैं और वो रहे ना रहे कम से कम उनके बारे में हम सब गाहे बगाहे मंथन तो करते ही हैं

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    8. स्त्री की विवशता - ऐसा नहीं कि मैं जिन्दा रहने को ही सबसे बड़ी उपलब्धि और उद्देश्य मानता हूँ लेकिन रिश्ता टूटने/धोखा दिये जाने को पुरुष के मुकाबले स्त्री के लिये जिन्दा रहने पर वरीयता देने को सही नहीं मानता। हो सकता है कि ऐसा कहकर मैं अपनी कायरता महिमामंडित कर रहा होऊं लेकिन मैं ऐसा ही सोचता हूँ। आपके लिये पत्नी द्वारा पति को येन-केन-प्रकारेण डिफ़ेंड करना ही विवशता है, सुनंदा के साथ जो हुआ(ऑफ़ कोर्स, आत्महत्या मानने में पूर्वाग्रहग्रस्त हो सकता हूँ मैं), मेरी नजर में वो भी स्त्री की विवशता ही है। इस नाते तो मैं खुद को आपसे बड़ा नारीवादी मान सकता हूँ।
      हत्या या आत्महत्या और छोड़े गये तथ्य और जाँच के बारे में मेरे जो अंदेशे थे, सलिल वर्मा जी ने उसी संदर्भ में ’नाटक’ शब्द का प्रयोग किया था। वो भी अपनी बात पर कायम हैं, और मैं भी उसी जवाब पर कायम हूँ कि ऐसे नाटकों के हम आदी हो चुके हैं। न्याय, कैरियर वगैरह सब समय सिद्ध कर देगा।
      मैं असहमति को आरोप नहीं मानता, अपनी (अ)क्षमतायं जानता हूँ इसलिये माफ़ी और सादर जैसे डिस्क्लेमर अनावश्यक हैं, इतना आप मान लें तो आप डिस्क्लेमर लगाने से बच जायेंगी और मैं बार-बार सफ़ाई देने से। मेरी पोस्ट संपूर्ण नहीं थी, हो भी नहीं सकती। वैसे भी मैं मुद्दे विशेष की बजाय एक ट्रेंड की बात कर रहा था। अगर पढ़लिखकर, आर्थिक रूप स आत्मनिर्भर होकर, मनमर्जी से जिन्दगी जीकर भी परिणाम वही निकालने हैं तो फ़िर पुरानी सोच को ही कोसते रहने से काम नहीं चलने वाला। सोच सिर्फ़ पुरातन है इसलिये गलत है, मुझे नहीं लगता।
      ’रचना जी नहीं चाहतीं...’ जरूर सुना होगा, सुनने के लिये तत्पर रहना ही होगा। हर बदलाव का स्वागत फ़ूलमालाओं से नहीं होता।

      सबसे बड़ी विवशता तो मेरी है कि बहुत समय तक सीरियस नहीं रह पाता, गंभीर से गंभीर बात पर कुछ देर के बाद हल्के-फ़ुल्के विचार आने लगते हैं। विवश समाज और विवश मानसिकता के बारे में मैं अपने दोस्तों से मजाक में कहता हूँ कि तलाक या छोड़ दिये जाने का डर पत्नी को और आत्महत्या की धमकी पति को वश में रखने के सर्वोत्तम व्यावहारिक उपाय हैं। अपने स्तर पर अनॉफ़िशियली ऐसे बहुत से तथ्य इकट्ठे कर रखे हैं, दुख ये है कि उनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध मानी जायेगी।

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    9. इस नाते तो मैं खुद को आपसे बड़ा नारीवादी मान सकता हूँ।
      lijiyae mae naari vadi hun yae aap sae kisnae kehaa ? aap haen yae aap khud keh rahey hae :)

      तलाक या छोड़ दिये जाने का डर पत्नी को और आत्महत्या की धमकी पति को वश में रखने के सर्वोत्तम व्यावहारिक उपाय हैं।
      good you have atleast said the practical truth what i call as comfort zone and people dont agree
      अपने स्तर पर अनॉफ़िशियली ऐसे बहुत से तथ्य इकट्ठे कर रखे हैं, दुख ये है कि उनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध मानी जायेगी।
      please share because that what blog writing is all about

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    10. व्यावहारिक सच्चाईयों के बारे में बाकी लोग मुझसे अच्छा ही जानते होंगे लेकिन वो लोग इन्हें पेट में रखना और भी अच्छे से जानते हैं, अंतर सिर्फ़ ये है कि मैं उकसाये में आ जाता हूँ :)

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    11. @मैं उकसाये में आ जाता हूँ :)

      oh my god , just on 3rd dec 2013 i read the following exchange of thoughts
      पर संजय जी फिर भी कहूँगा कि आपकी बातों में एक ठहराव है आप जल्दी अधीर नहीं हो उठते पता नहीं मेरे अंदर ऐसा धैर्य क्यों नहीं है जबकि मुझे पता है मैं कुछ बदल नहीं सकता।खैर ये सब चलता रहेगा ।
      राजन, प्रयोग तो कर ही सकता हूँ लेकिन उसे मानने के लिये औरों को मजबूर नहीं कर सकता :)

      राजन,’जल्दी अधीर न होना’ तारीफ़ की बात नहीं है। सीरियसली कहता हूँ अगर सब मेरे जैसे अधीर न होने वाले होते तो हम बहुत पिछड़े होते,

      and today you are saying मैं उकसाये में आ जाता हूँ :)

      decide sir so that accordingly we can plan our replies :)

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    12. Rachna ji, your replies/comments are already well planned.
      I wrote both things which may appear contradictory but I presume nothing is stationary, neither me nor the contexts. Had I known that I am taken that seriously, I would've prefixed 'all the time' to '’जल्दी अधीर न होना’ and 'many a time' to ' मैं उकसाये में आ जाता हूँ ' :)

      Everything in this universe undergoes constant changing(though exceptions are everywhere), as such It has been decided to hold reserve my right to change further :)

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    13. Sanjay "ji"
      similarly accept that sunanda and for that matter thurur and all others also have a right to change according to their whims and fancy and lets not and never call all this "natak "

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    14. I think there is some confusion due to this word 'natak.' Confining this particular word 'natak' to Sunanda's death is a wonderful analysis indeed :)

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  18. बड़े लम्बे-लम्बे कमेंट्स हैं, आराम से पढ़ूँगा। आपकी पोस्ट विमर्श का अखाड़ा बन ही जाती है क्योंकि आप ऐसा लिखते ही हैं। हत्या आत्महत्या के संबंध में एक बार मैने लिखा था---

    आत्महत्या का विचार मेरे मन में भी कई बार आया लेकिन हत्या के लिए निर्दयी और आत्महत्या
    के लिए निर्मोही भी बनना पड़ता है। हम न निर्दयी बन सके न निर्मोही।

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    1. @ विमर्श का अखाड़ा -
      दूध कलारिन हाथ लखि, मद समुझै सब ताहि..

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    2. पूरा दोहा तो ऐसे है :)

      'रहिमन' नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि।
      दूध कलारिन हाथ लखि, सब समुझहिं मद ताहि

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    3. मतलब की बात लेनी चाहिये बस, हमने अपने मतलब वाली ले ली।

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  19. वाकई श्लोक में लिखे प्रश्नो का शायद कोई उत्तर ही नहीं है और न होगा कभी। क्यूंकि मानवीय स्वभाव के चलते इंसान कभी किसी चीज़ से संतुष्ट हो ही नहीं सकता। जिसके पास जो है उसे वो ही प्रिय नहीं उसे वो चाहिए जो उसके पास नहीं अर्थात हर किसी को पड़ोसी के घर के आँगन में लगी घास ज्यादा हरी नज़र आती है। इसलिए पैसे वालों के पास सब कुछ होते हुए भी शांति नहीं अकेलापन होता है। जिस से तंग आकर एक दिन वो आत्महत्या का कदम उठा लेते है। और गरीब को उसकी अहम जरूरतों की पूर्ति के लिए जूझते-जूझते ना चाहते हुए भी यह कदम उठाना पड़ जाता है।

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    1. मानवीय स्वभाव ही है जो असंतुष्टता बनाये रखता है। स्वागत है पल्लवी जी।

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  20. सुंनदा ने आत्महत्या की या हत्या आदि आदि से परे एक आम सी बात करती हूँ , और मेरे द्वारा लिखे गए स्त्री - पुरुष ,स्त्री - पुरुष समाज और पुरुष मानसिकता में सभी स्त्री -पुरुष नहीं आते है , । जैसा आप ने पूछा है की स्त्री पुरुष के आत्महत्याओ की वजहों में इतना फर्क क्यों है , मेरी निजी राय है दोनों की परवरिश का फर्क दोनों के सामाजिक स्थिति में फर्क के कारण , जो पुरुष घर में कमजोर माँ, बहन, पत्नी, छोटे भाई के सामने शेर रहता है वही बाहर की ताकतवर दुनिया के सामने चूहा बना जाता है , वो उनसे लड़ नहीं पाता है , सहने कि शक्ति तो परवरिश में ही उसे नहीं मिली है , इसलिए वो कई बार गिर कर उठना भी नहीं जानता है , उसकी परवरिश उसे ये सिखाती है कि उसे हर जगह सम्मान मिलना चाहिए , जबकि समाज आप को सम्मान आप की आर्थिक स्थिति और आप की सफलता पर आप को देता है ,जब वो वहा से हारता है वो बर्दास्त नहीं कर पाता है , घर की मुर्गी साग बराबर की तरह घर के प्यार सम्मान की उसे कभी कद्र नहीं होती है , बस ट्रेन और लड़की के पीछे कभी नहीं भागने का एक जायेगी दूजी आएगी जैसे चालू कहावते बनाने वाले पुरुषो के लिए स्त्री से रिश्ते या कोई भी रिश्ते मायने नहीं रखते है ( संपत्ति के लिए भाइयो और पिता के बिच खून खराबे के किस्से आम है ) , पत्नी के आते ही परिवार को भूल जाना और यदि पत्नी का भी साथ छूटता है , चाहे तलाक मृत्यु या कोई अन्य वजह हो , वो तुरंत दूसरी पत्नी ले कर आता है , नए रिस्ते बनाता है पुराने की तो याद भी उसके जीवन में नहीं बचती है , उसके जीवन में ये सवाल तो कभी होता ही नहीं की पत्नी और परिवार नहीं रहा तो उसका क्या होगा , पत्नी चाहिए के विज्ञापन पर सभी अपनी पत्नी देने चले आये वाला चुटकुला हो या , इस कार से तिन बार दुर्घटना होने पर केवल पत्नी ही मरी हर बार इसलिए इसे लेने के लिए पतियो की लाइन लगी है वाला चुटकुला ये पत्नी के प्रति मानसिकता को दर्शाता है , कभी ऐसा चुटकुला सूना है जिसमे पति के मर जाने या उसे दूसरे को दे देने की बात कही गई हो , मजाक में भी पत्नी माँ बहन अपनो के मृत्यु या उससे अलग होने की बात नहीं करती है , क्योकि उनकी परवरिश ऐसी हुई है , उन्हें समाज से लड़ना और उसकी बाते सहना सिखाया जाता है , उन्हें सब कुछ सह कर हर हाल में मजबूत बने रहना है , किन्तु जब बात अपने पिता , भाई पति बेटे का हो तो उन्हें देवी बन जाना है सब त्याग कर देना है अपना पूरा जीवन उनके ही चारो तरफ गुजारना है , हम तो उस समाज में रहते है जहा कहा गया की पति के बिना तो पत्नी का जीवित रहना भी ठीक नहीं है उसे तो उसी के साथ सति हो जाना चाहिए , उसके पुरे जीवन में एक ही दौलत प्रदान कि गई है वो है रिश्ते और और उन रिश्तो को निभाने के लिए उन्हें कमजोर बनाया गया है , और ये रिश्ते एक तरफ़ा निभाए जाते है , जहा एक के पास अधिकार होता है तो दूसरे के पास बस कर्तव्य , और जब स्त्री अपने जीवन की बना दी गई धुरी इन रिश्तो को वो खो देती है तब उसे लगता है कि उसके जीवन में कुछ बचा ही नहीं जीवित रहने के लिए , क्योकि अपने लिए जीना तो उसे सिखाया ही नहीं गया , इसलिए समाज के ताने वो तब तक आराम से बर्दास्त कर लेती है जब तक उसका परिवार उसका साथ देता है , ससुराल के जुल्म भी सह लेती है क्योकि पति उसके साथ है भले ही सबके सामने नहीं किन्तु बंद कमरे में तो उसे झूठी दिलासा दे ही देता है ना की वो उसके साथ है , पति के जाने के बाद बच्चो के लिए जीना है जैसी बाते उसे जीवित रखती है किन्तु जब यही परिवार पति और बच्चे उसका साथ छोड़ देती है तब उसे लगता है कि उसके जीवन की तो धुरी ही चली गई जो उसके जीवित होने का कारण थी , इसलिए स्त्री के लिए रिस्ते और पुरुष के लिए रिश्तो के आलावा दूसरी चीजे ( आप उसे क्या कहेंगे आप पर छोड़ती हूँ ) ज्यादा महत्व्पूर्ण होते है ।

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  21. दूसरी बात आप ने कही स्त्री ताकतवर क्यों नहीं है , रिश्तो के सामने कमजोर क्यों पड़ जाती है तो आप के यक्ष प्रश्न का उत्तर ये प्रश्न है कि क्या पुरुष एक ताकतवर स्त्री को बर्दास्त कर पायेगा
    १- एक बेटी जो कहे की उसे अभी आगे और पढना है या उसे नौकरी करनी है इसलिए वो अभी शादी नहीं करना चाहती या उसे इस तरह के लडके से विवाह करनी है इसलिए लड़का उसकी पसंद का खोज जाये या लड़का पसंद किया है उससे विवाह किया जाये । क्या ऐसी मजबूत बेटी पिता बर्दास्त कर पायेगा
    २- बहन कहे की भाई जब पिता के हम सभी बच्चे है तो उनकी संम्पत्ति में केवल भाइयो का ही हक़ क्यों, घर न सही कम से कम पैसे में तो उसे हिस्सा दो, जब बाकि भाइयो में उसे बांटा जा रहा है तो उसे क्यों छोड़ा जा रहा है , हिस्सा लेने वाले भाई जब बुरे नहीं है तो बहन क्यों बुरी बन जाती है , रिस्ते रखने की ये शर्त क्यों केवल बहन से क्यों कि सम्पति का हिस्सा छोडू , पैसे तो सभी के पास भरपूर है , भाई बर्दास्त कर पायेगा मजबूत बहन ।
    ३- ससुराल में पति के बराबर का सम्मान और जीवन जीने की आजादी , माँ कब बनना है की आजादी , और घरेलु हिंसा को तथाकथित हाथपाई न मामने की आजादी जिसमे चोट के निशान केवल पत्नी में ही दिखे पति पर एक भी नहीं , पति के गलत ख़राब होने पर उसे छोड़ देने की आजादी वाली ताकतवर पत्नी को क्या पति और समाज बर्दास्त कर पायेगा ।
    जो आज अपने समाज का हाल है वहा हम ताकतवर नहीं कमजोर स्त्री को ही बर्दास्त कर सकते है , शुक्र मनाइये की स्त्री रिश्तो को लेकर कमजोर है कुछ हजार बर्दास्त नहीं कर पाने पर मर जाती है तो मरे कम से कम समाज में परिवार रिश्ते तो बचे है , जिस दिन स्त्री ताकतवर बनेगी तो हर तरफ से बनेगी समाज चाहेंगे की समाज की इच्छा से कही बने और कही नहीं तो ये सम्भव नहीं है , इसलिए उसका कमजोर होना समाज के सुचारु रूप से चलते रहने के लिए जरुरी है इसलिए उसके कमजोर होने पर प्रश्न ने खड़ा करे और स्त्री को शुरू से ही कमजोर बनाने का सृजनात्मक काम होते रहने देना चाहिए ।

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    1. देर से आने के लिए माफ़ी चाहती हूँ जानती हूँ इतनी देर तक किसी एक ही विषय को दिमाग में बना कर रखना सम्भव नहीं है और उसी क्रम में जवाब देना भी मुश्किल होता है , इसलिए जवाब देने की कोई भी आवश्यकता नहीं है , बस विचार भर रखे है , आप के और कोई प्रश्न हो तो जरुर जवाब देने का प्रयास मै करुँगी एक स्त्री के रूप में ।

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  23. संजय जी,आप जो सवाल उठाए इसका जवाब आप खुद ही दे चुके हैं।वैसे आँकडो की ही बात करें तो जितनी महिलाओं ने रिश्तों के चलते आत्महत्या की उतने ही पुरुषों ने भी की ही है।इसलिए इस मामले में तो दोनों बराबर या लगभग बराबर ही है।वैसे आत्महत्या के कारणों को आंकडो के जरिये ही नही समझा जा सकता।पुरुषों की आत्महत्या की दर ज्यादा इसीलिए है क्योंकि रिश्तों के साथ साथ आर्थिक पक्ष भी वहाँ है।जबकि महिलाओं के मामलों में ऐसा नही है।पर जब महिलाएँ भी घर की चार दिवारी से बाहर निकल दुनिया देखेंगी तो दोनों की आत्महत्या दर समान हो जाएगी।(देखिए मै कैसी मनहूस बात बोला ।पर यह सच है यारा।नास्तिक होने के कारण ईश्वर न करे भी नही बोल सकता)।एक बार यह अध्ययन में आया था कि ब्रेकअप के बाद जहाँ लड़किया सच को स्वीकार कर आगे बढ़ जाती है वहीं ज्यादातर लड़के अवसाद में चले जाते है या खुद को शराब सिगरेट में डुबो लेते है या खुदखुशी कर लेते है।इसका कारण यह कि वे अपनी समस्या दूसरों से शेयर नहीं करते।हाँ कुछ तेजाब ले निकल पड़ते है लेकिन उनकी संख्या वैसे ही अपवाद जैसे अवैध संबंधों के चलते अपने पति या बच्चों को मौत की नींद सुला देने वाली महिलाए।कम से कम अपनी समस्या दूसरों को बताकर मन का बोझ कम करने वाली बात पुरुषों को महिलाओं से सीखनी चाहिए.और जेंडर कि क्या बहस करूँ.जितना करता हूँ बढ़ती ही चली जाती है.कि करां पिट्रोल ख़तम ही नहीं होंदा.

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  24. यक्ष प्रश्न है उसका उत्तर है..आजकल तो आत्महत्या के इतने कारण होने लगे हैं कि पूछिए मत..कोई इज्जत की खातिर जान लेता है..तो कोई झूठा लांछन लगने पर छत से कूद जाता है...कोई रोटी कपड़े का इंतजाम न होने के कारण तो कोई प्यार में नाकाम होकर..भावना में बहकर होने वाली आत्महत्या पर रोक लग सकती है बशर्ते कोई अपनी दुख बांटे..पर जिससे बांटे वो उसका मजाक न उड़ाए...बाज बार परिस्थितियां ऐसी होती है कि इंसान आत्महत्या की ओर अग्रसर हो जाता है।

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