शनिवार, मार्च 01, 2014

चलो एक बार फ़िर से..

"आप खुद को ईमानदारी के इक्कीसवीं सदी के अवतार के समकक्ष तो नहीं समझते जो उनकी हर प्रेस कान्फ़्रेंस की तरह अपनी लगभग हर पोस्ट में कोई न कोई सवाल पूछ लेते हो?"  इस आरोप की प्रबलतम संभावना के बावजूद ये प्रश्न पूछ रहा हूँ, "पोस्ट के शीर्षक से आपको क्या लगता है?"

किसी को फ़िल्मी गाना याद आयेगा, किसी को हीरो या हीरोईन, किसी को साहिर और किसी को इस गाने से जुड़ा एक सांझा फ़ैसला लेकिन इतनी आसानी से हम अपनी खोपड़ी में उपजी बात बता दें तो फ़िर हमें पूछेगा ही कौन? एल्लो, य तो एक और सवाल हो गया :) 

चलिये बहुत दिन हो गये मुद्दों पर उल्टी सीधी बातें करते, आज पुरानी बातें करते हैं। और रिलेक्स रहिये, दिमाग पर ज्यादा जोर देने की कोई जरूरत नहीं, सवाल का जवाब हम खुद ही दिये देते हैं लेकिन देंगे अपने तरीके से, जान लीजिये। वैसे भी आजकल है चुनाव का समय और सब उलझे हैं सरकार बनाने में और हम ठहरे हमेशा से बेमौसमी बात करने वाले, तो आप ये लिंक देखिये तो समझ ही जायेंगे साड्डे  इस ’चलो एक बार फ़िर से’ दा मतबल :)

अब इस मुद्दे पर एक दो बातें वो जो अब तक लिखी नहीं थीं। लिंक में दिये किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम में एक बार अमृतसर के एक बहुत सीनियर साथी मिले, ’थापर साहब’ जिनकी रिटायरमेंट में साल भर ही बचा था। बड़े जिन्दादिल आदमी हैं, हर मौके पर पहली प्रतिक्रिया उन्हींकी होती थी। प्रशिक्षण के पहले सेशन से ही मैंने महसूस किया कि उन्हें लगभग सभी फ़ैकल्टी मेंबर बाकायदा नाम से जानते थे। चायकाल के दौरान मैंने जब उनसे पूछा कि क्या वो पहले ट्रेनिंग सेंटर में रहे हैं तो उन्होंने मना कर दिया। मैंने फ़िर पूछा कि यहाँ का हर स्टाफ़ फ़िर आपको कैसे जानता है? उन साहब ने बताया कि  बड़ी शाखा होने के चलते प्राय: उनकी शाखा से किसी न किसी को ट्रेनिंग के लिये नामांकित किया ही जाता रहता है और उनकी शाखा में अधिकतर महिलायें ही कार्यरत हैं। वो ट्रेनिंग पर जाना असुविधाजकन समझती हैं, सर्विस रूल्स के अनुसार प्रशिक्षण में जाने से मना करना या न जाना एक प्रतिकूल आचरण समझा जाता है। स्टाफ़ की जाने में अनिच्छा और न जाने के लिये झूठे-सच्चे बहाने बनाने की दुविधा के बीच सर्वमान्य हल एक निकलता था - थापर साहब। ब्रांच मैनेजर को कन्विंस करके प्रजातंत्र की दुहाई देते थे कि जैसे प्रजातंत्र में दिमाग नहीं सिर गिने जाते हैं, वैसे ही ट्रेनिंग के लिये व्यक्ति विशेष से मतलब नहीं बल्कि नग गिने जाते हैं।   वो खुद बताने लगे कि ऐसे ही एक मौके पर महिला समूह की तरफ़ से एक बार तो मज़ाक में ये भी कहा गया, "थापर साब चले जाणगे, ऐत्थे रहके वी ऐनां ने करना की हुंदा है?(थापर साहब चले जायेंगे, वैसे भी यहाँ रहके भी इन्होंने करना क्या होता है?)"  सब अपने अपने हिसाब से मतलब निकालकर हँसते रहते हैं और थापर साहब की चिट्ठी तैयार हो जाती है। यही राज बताया थापर साहब ने अपनी पॉपुलैरिटी का। लगे हाथों यह भी स्पष्ट कर दूँ कि ट्रेनिंग पर जाने के अनिच्छुक सिर्फ़ महिलायें ही नहीं होती बल्कि बहुत से पुरुष मित्र भी ऐसे देखे हैं जिनकी ट्रेनिंग की खबर आते ही वो बीमार हो जाते हैं, वहीं बहुत से कर्मचारी ऐसे भी होते हैं जो विभिन्न कारणों से ट्रेनिंग कार्यक्रमों में जाना पसंद करते हैं। मैं किस कैटेगरी में आता हूँ, ये नहीं बताऊँगा वरना मेरी इस बात का भी दूसरा मतलब निकाल जायेगा :) 

ऐसी ही एक और ट्रेनिंग की बात है कि भोपाल जाना हुआ था। रात को साढ़े ग्यारह बजे होंगे कि उस्तादजी का फ़ोन आ गया(हमारे पाले उस्तादजी को तो पुराने पाठक जानते ही हैं)। समय के हिसाब से थोड़ा अजीब लगा, हालचाल पूछा तो वो अपनी कुछ न बताकर मेरे ही हालचाल अलग-अलग कोण से पूछते रहे। जब मैंने इतनी देर से फ़ोन करने की वजह पूछी तो कहने लगे, "थोड़ी देर पहले टीवी पर देखा कि आज भोपाल में बंटी चोर पकड़ा गया है। ध्यान आया कि आपने भी आज ही वहाँ पहुँचना था। अब टीवी पर शक्ल तो उसकी दिखाई नहीं, मैंने सोचा कि कहीं संजय जी..............हिच,.हिच.."  उधर से मैं हैल्लो, हैल्लो करता रहा लेकिन लाईन में शायद कुछ दिक्कत आ गई थी। बाद में लौटकर मैंने पूछा भी कि क्या वाकई मैं उन्हें इस सम्मान के लायक लगा था कि बंटी चोर के समकक्ष समझा जाऊँ? कहाँ वो इतना बड़ा नाम और कहाँ मैं एक साधारण सा बैंककर्मी? उनकी सोच से असहमति जताई और ये भी जताया कि उनके ऐसा सोचने से मेरी जगह कोई और होता तो उसे बुरा भी लग सकता था। ये भी कि कैसे उनकी इस असंभव सी संभावना ने मेरी सेल्फ़-एस्टीम का बंटाधार कर दिया है। उस्तादजी तो ठहरे उस्तादजी, बोले,  "जिसे बुरा लग सकता था, उसकी छोड़ो।  उस दिन आपसे फ़ोन पर बात हो पाई यानि कि आप वो नहीं निकले जो मैंने सोचा था। उससे मुझे कितना बुरा लगा था, ये आपने सोचा? मैं रिश्तेदारी में, रिपोर्टर्स को  सबको बता रहा होता कि इस आदमी को इतना नजदीक से जानता था लेकिन ये हो न सका, बल्कि मेरी सोच का बंटाधार आपने कर दिया।"

बाद में कभी उस ट्रेनिंग कार्यक्रम की बात होने पर उसको हम ’ऑपरेशन बंटाधार’ कहकर याद करते रह्ते थे। 

बताने का मतलब ये है कि हम अब आपसे सप्ताह भर बाद मिलेंगे - बोले तो बंटाधार तो पहले ही हो चुका, अब शायद ’ऑपरेशन धुंआधार’ के बाद। तब तक एक एकदम सेक्यूलर लेकिन शायद कैपिटलिस्टिक सैल्यूटेशन - ’ओके टाटा, बाय-बाय’ या ’ओके टाटा, होर्न प्लीज़’ या फ़िर ’एज़ यू प्लीज़’ क्योंकि ट्रेनिंग हो या जिंदगी, ब्लॉगिंग हो या फ़ेसबुकिंग, खुश हों या दुखी हों,  "ये  तो न्यूए चालैगी" :)

15 टिप्‍पणियां:

  1. कमाल का को-इंसिडेंस है कि आज अपनी पोस्ट में आपका ज़िक्र किया {इसे कृपया अपनी पोस्ट पर टिप्पणी देने का निमत्रण न मानें :) } और आज अपनी पोस्ट लेकर हाज़िर... मौसम हालाँकि धोखा दे रहा है आपके शहर में लेकिन असली मौसम जो आज के टाइम होना चाहिए था उसका असर दिखाई देने लगा है.. मैं सबसे कम ट्रेनिंगशुदा नौकर हूँ अपने महकमे का.. लेकिन थापर साहब की तरह के इंसान हमारे यहाँ भी होते थे एक.. फ़र्क़ सिर्फ इतना था कि जनाब की सेटिंग थी एच.आर.एम. सेक्शन में.. हर ट्रेनिंग में नम्बर कम पड़ ही जाते थे और ऐसे में हमारे थापर साहब को तैनात कर दिया जाता था नम्बर पूरा करने के लिये... काम तो ख़ैर सुभान अलाह था उनका, ट्रेनिंग बाकायदा हर विषय में तीन-चार बर ले रखी थी!
    और वो बण्टीढार वाला किस्सा भी मज़ेदार रहा!! एक साहब ऐसे ही भोपाल पहुँचे और उतरते ही रिक्शे पर लाउड्स्पीकर पर कोई चिल्लने लगा - आ गया! आपके शहर में 'जोरू का ग़ुलाम! रोज़ाना चार शो!! भाई साहब उल्टे पैरों लौत गए.. कहने लगे इन लोगों को कैसे पता चला मेरे बारे में!!
    बाकी मस्त!!

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    1. ट्रेन में ही था जब फ़ोन पर आपका कमेंट पढ़ा, पूरा सप्ताह लाऊडस्पीकर की आवाज सुनते ही कान उधर लगा लेता था और आपको याद करता था :)

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  2. पता नहीं, हाथ से अवसर निकल कर कहाँ छिपा होगा, भगवान की कृपा से फिर मिलेगा।

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  3. अब अपनातो कभी वास्ता नहीं पड़ा..एक बार पड़ा था तो अपने ट्रेनिंग देने वाले उस्तादों के सामने ही कुर्सी पर नींद के लपेटे में सोते रहे..

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  4. चलिए अपना दुःख साझा करने से मन हल्का होता है :):)
    अब का कहें, इन सरकारी महकमों में गोईंठा में घीव सुखाने और बूढ़े तोतों को रटवाने का बड़ा चलन है, आपको भी भेज ही दिया रट्टा लगाने, जबकि हाकिमों को भी अच्छी तरह से मालूम है आपसे होना-जाना कुछ भी नहीं है, फिर भी सींघ कटवा कर बाछा बनने के लिए आपको भेज दिया बताईये भला आईसा जुलूम कोई करता है का ?? :):)
    धीरज से काम लीजिये, हमरी संवेदनाएं आपकी ट्रेनिंग रूपी सज़ा के साथ हैं :) आप भी थापर साहब के चरण चिन्हों पर चलते रहिये कभी न कभी आपको भी लोग अपनी पोस्ट पर याद करेंगे, यानि कि कुछ न कुछ किया कीजिये कुछ न हो तो पाज़ामा फाड़ कर सिया कीजिये :)

    "पोस्ट के शीर्षक से आपको क्या लगता है?"
    पोस्ट के शीर्षक से हमको तो बुझा रहा है 'बिन मौसम बरसात " :)
    आभारी हैं आपके....दिल से :):)

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन ब्लॉग-बुलेटिन - आधा फागुन आधा मार्च मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. तो आप भी अक्सर ट्रेनिंग ले लेते हैं (दो बार तो ऊपर ही देख लिया ),ट्रेनिगें भी तो
    तरह-तरह की होती है - जब जैसा मौका लगे !

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  7. मिलते हैं ब्रेक के बाद।

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  8. कभी कभी समझ आता नहीं कि ट्रेनिंग किस बात की :)

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  9. "जिसे बुरा लग सकता था, उसकी छोड़ो। उस दिन आपसे फ़ोन पर बात हो पाई यानि कि आप वो नहीं निकले जो मैंने सोचा था। उससे मुझे कितना बुरा लगा था, ये आपने सोचा? मैं रिश्तेदारी में, रिपोर्टर्स को सबको बता रहा होता कि इस आदमी को इतना नजदीक से जानता था लेकिन ये हो न सका, बल्कि मेरी सोच का बंटाधार आपने कर दिया।"

    यह भी खूब रही. हा हा हा....

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