रविवार, जुलाई 05, 2020

निकट न दूर

पिछले बरस आज ही के दिन...
- गूगल मैप्स पर देखा, मेट्रो स्टेशन से दूरी लगभग नौ किलोमीटर दिखा रहा था। उस दिन मेरा face भी शायद index of mind हुआ रखा था, बाहर निकलते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। उनमें से एक ने तिलक लगा रखा था, मैंने उसे जगह बताई तो वो पूछने लगा कि लौटना भी है क्या?
 मैंने कहा, "हाँ, मुझे वहाँ मुश्किल से दस मिनट लगेंगे।"
उसने कहा, "दो सौ रुपए दे देना, सर। वहाँ से आपको वापिस आने के लिए ऑटो आसानी से मिलेगा भी नहीं।" मैं भी कहने को हुआ कि तुम्हे भी वहाँ से सवारी आसानी से नहीं मिलेगी लेकिन चुप रह गया।
चले तो सावधानी के लिए मैंने GPS लगा रखा था। पहले सिग्नल पर लालबत्ती थी तो मैंने कहा कि यार GPS तो राइट टर्न बता रहा है। उसने तुरंत फोन निकालकर किसी से कन्फर्म किया और बत्ती हरी होने पर राइट टर्न लिया। बोला, "सर, मैं गलत एड्रेस समझ गया था। ये तो मेरे सोचे से कम से कम डबल दूरी पर है।" 
मैंने कहा, "मतलब वहीं जाना होता तो तुम मुझसे डबल से भी ज्यादा किराया चार्ज कर रहे होते? खैर, अपना नुकसान मत करो यार। मीटर स्टार्ट कर लो, जितना बनेगा उससे बीस रुपये ज्यादा दे दूँगा।"
अनमना सा वो बोला, "नहीं सर, अब मीटर क्या चालू करना।"
वापिस आकर जब दो सौ रुपए दे दिए तो रिक्वेस्ट सा करते हुए बोला, "सर, बीस रुपये और दे देते तो ..।"
मैंने दे दिए, बेमन से। साथ ही इतना जरूर कहा कि तुम अपनी वेशभूषा के साथ न्याय नहीं कर रहे हो।
- पिछले कई वर्षों से किसी कारण से रास्ते में नाईयों की पंद्रह-बीस दुकानें छोड़कर एक विशेष दुकान पर जाता हूँ। मालिक मर चुका, बच्चे नाई का काम कर रहे हैं लेकिन बेमन से। मैं अब भी वहीं जाता हूँ लेकिन अब मन से नहीं जाता। मरे मन वाले कब तक जिएंगे?
- रात को घर लौटते समय रोज देखता हूँ कि तथाकथित सम्भ्रान्त दिखने वाले/वालियाँ उन लोफरों की ठेलियों से सब्जी खरीद रहे हैं जो महिलाओं को देखकर जानबूझकर आपस में भद्दी भाषा बोलने लगते हैं, अश्लील इशारे कर रहे होते हैं लेकिन महिला ग्राहकों के साथ 'आप' तो ले ही लीजिए', 'जो मर्जी दे दीजिए' जैसे वाक्य बोलते हैं। ग्राहक खुश होती हैं कि  कि लड़के बदतमीज हैं लेकिन हमारी तो इज्जत करते हैं, सब्जी भी सस्ती देते हैं और वैसे भी गाली गलौज हमसे थोड़े ही करते हैं...
- कुछ दिन से मैं देख रहा हूँ कि डेयरी प्रोडक्ट्स की एक नई रिटेल चैनशॉप्स दिखने लगी हैं। जबरदस्त डिस्काउंट और ऑफर्स, और सरनेम राजपूतों का है। जरूर चल निकलेगी। थोड़ी सी छूट देकर तो हमें कोई भी अपना गुलाम बना ले। दूध, घी, पनीर में कुछ रुपए बच जाएं तो कुछ बुरा है? समझेंगे कि मूवी देखने जाएंगे तो एक पॉपकॉर्न  इस बचत का। ए बचत, तुझे सलाम। पासपोर्ट प्रकरण के बाद तो समझ आना चाहिए कि संविधान अपनी पसंद का नाम/कुलनाम लगाने की छूट देता है भाई, तू कायकू इतना सोचेला है? 
हाहाहा इतना तो तुम भी मानोगे कि राजपूती नाम तुमसे बहुत ऊँचा है।
- प्रभाष जोशी ने एक बार भारत पाकिस्तान के हॉकी मैच के बारे में, जिसमें भारत पूरे मैच में आगे चल रहा था लेकिन अंतिम क्षणों में धड़ाधड़ गोल खाकर हार गया था, लिखते समय परिणाम को  दोनों टीम की किलर इंस्टिंक्ट से जोड़ा था। और, उस किलर इंस्टिंक्ट को अलग-अलग कौम की 'आत्मा के आवागमन'  और 'बस, यही एक जिंदगी' मान्यताओं से जोड़ा था। उनके लिखे को सही या गलत बताने वाला न्यायकार मैं नहीं लेकिन तब वो लेख मेरी अपनी सोच को व्यवस्थित ढंग से लिखा हुआ लगा था। जिन्हें समझ आता है कि यह चक्र अनन्त है वो समय के साथ प्रवाहमान हो लेते हैं और जिनके लिए यह 'करो या मरो' है वो नियम/नैतिकता सब ताक पर रखकर हासिल करने में जुट जाते हैं।
- - मैं दूर तक देखने की कोशिश करता हूँ तो पास का सब ओझल होता दिखता है। I hope कि जो पास का देखते हैं, उन्हें दूर का भी सब साफ दिखता होगा.....

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