मेरा एक सहकर्मी है, नहीं था, पता नहीं ये है ठीक है या था ठीक है। कई साल हम इकट्ठे रहे आजकल अलग अलग जगह पर पोस्टेड हैं। जाने दो, हरियाणा का वासी, ठेठ जाट और उसपर तुर्रा ये कि कई साल तक उसकी और मेरी सीट साथ साथ रही थी। मतलब अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने गुणों, दुर्गुणों की खान है वो। पक्का आर्यसमाजी, तर्क ऐसे जोर से किया करता कि बस पूछिये मत। चाय का ऐसा शौकीन कि हर एक घंटे के बाद तलब लग जाती उसे, “रे, चाय मंगा ल्यो रे कोई सा।” मैं नया नया आया था, पहला ही दिन था मेरा वहां। मैंने सोचा कि यार इसमें क्या बड़ी बात है? प्यून को आवाज लगाने ही वाला था कि दूसरी तरफ़ बैठे साथी ने इशारे से रोक दिया। ’दो मिनट चुपचाप बैठ,’ हंसते हुये उसने धीरे से मुझसे कहा। मैं भी पुराना तमाशबीन, बैठा रहा। दो नहीं पांच मिनट लगे होंगे, मेरे यार ने पन्द्रह बार हांक लगा दी होगी, और फ़िर खुद ही खड़ा होकर कहने लगा, “मन्नै ई बोलकर आनी पड़ोगी, सारे बैठे हैं मेरे सुसरे जाढ़ भींचकर” और जाकर खुद ही चाय का आर्डर देकर आया। अब साथ वाला कहने लगा, ’इसका रोज का ड्रामा है, तलब लग जायेगी तो न्यूऐ रुक्के मारेगा और फ़िर आप ही चाय पिलायेगा सबको।’ बस जी अपने को जम गया बंदा, अपनी पटेगी इसके साथ, पटी अपनी और खूब जमकर पटी।
एक दिन बताने लगा कि मेरे गांव के घर में एक पीपल का पेड़ है। जब कभी भी गांव जाना होता है, देखता हूं कि घर की सभी औरतें कुंये से पानी खींचती हैं और पीपल को जरूर चढ़ाती हैं, और मैं उनकी धर्मान्धता का हमेशा बहुत मजाक उड़ाया करता। फ़िर उसने बताया कि एक दिन पता नहीं उसके मन में क्या आई कि बिना काम के ही वैसे ही गांव चला गया। बाहर चारपाई पर बैठा था और अंदर उसके लिये चाय-दूध की तैयारी चल रही थी। अनायास ही उठा और कुंये से एक बाल्टी पानी खींचा और जाकर पीपल की जड़ में डाल दिया। कह रहा था कि मेरी चाची ने मुझे देखा और हैरान भी हुई कि आज तुझे क्या हुआ है? रात को वो अपने बीबी बच्चों के पास शहर लौट आया। सुबह गांव से फ़ोन आया और चाची ने बताया कि कल शाम जिसे तुमने पानी डाला था, वो बरसों पुराना पीपल का पेड़ गिर गया है। बात हंसी मजाक में आई गई हो गई, लेकिन वो भूल नहीं पाया अब तक कि ये केवल संयोग मात्र है या फ़िर कुछ लेने-देने का संबंध? आखिर तो हम भारतीय बहुत पहले से और विज्ञान जगत भी सौ पचास साल से वनस्पति में जीवन को मानता ही है।
भूला अगर वो नहीं, तो मैं भी नहीं। मेरे अपने दादाजी अंतिम समय में लगभग तीन साल तक बिस्तर में रहे। मधुमेह के कारण उनके घुटनों पर असर पड़ गया था। वैसे एकदम एक्टिव, खुराक वगैरह उस समय भी हमसे ज्यादा, आवाज हमसे ज्यादा बुलंद, जिंदादिल एकदम। इन तीन सालों में अपना उनका वास्ता सिर्फ़ खाना लाकर देने तक, दवा देने तक या थोड़ा बहुत हंसी मजाक तक ही रहा, पता नहीं क्यूं। पिताजी रिटायर हो चुके थे तब तक, और मेरे दादाजी की व्यक्तिगत संभाल उन्होंने स्वेच्छा से और जिद करके अपने तक ही रखी। नहलाना, धुलाना, कपड़े बदलना, बिस्तर पर पड़े मरीज के सभी दैनिक कार्य, सब कुछ पिताजी के सुपुर्द था और उन्होंने पूरी तपस्या के साथ यह काम किया। बाई द वे, बता दूं कि मेरे पिताजी अकेले पुत्र रहे अपने मां-पिताजी के, एक बहन और थीं और उनका भी तब तक देहांत हो चुका था। बल्कि मेरे दादाजी के बड़े भाई नि:संतान थे तो मेरे पिताजी दो परिवारों के अकेले पुत्र रहे।
उस दिन कार्तिक पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा, गुरू नानक जन्म दिवस, गंगा स्नान और\या पता नहीं किन किन त्यौहारों की छुट्टी थी। देख लो जी कित्ती नाईंसाफ़ी है सरकार की, चालाकी भी कह सकते हैं कि सिर्फ़ एक छूट्टी में इतने त्यौहार और कम से कम तीन धर्म निबटा देती है। देर तक सोकर, नहा धोकर, इत्र फ़ुलेल लगाकर रोड इंस्पैक्टरी के इरादे से घर से निकलने वाला था कि पिताजी ने कहा कि यार आज तेरी छुट्टी है, मेरी मदद कर कुछ। तेरे दादाजी को नहलाना है, दो तीन दिन हो गये हैं। दो तीन दिन से दद्दू कुछ सुस्त दिख रहे थे, खाना भी कम खा रहे थे। मैंने कहा कि चलो पहली बार पिताजी ने कुछ काम कहा है, हाथ लगवा देते हैं। हम दोनों बाप बेटे ने मिलकर उनके कपड़े उतारे, नहलाया, बदन पोंछ कर कपड़े पहना रहे थे कि दादाजी ने अपनी आंखें तो खुली रहने दीं और सांस लेना बंद कर दिया। मेरा पहली बार सेवा टहल करना शायद बरदाश्त नहीं हुआ उन्हें, मुझे उसी समय याद आ गया पीपल का वो पेड़ जो शायद बरसों से बाट जोह रहा था मेरे दोस्त के हाथों पानी डाले जाने की।
दादाजी के बड़े भाई, मेरे बड़े दादाजी, मैंने पहले बताया कि नि:संतान थे। हमारी दादी का देहांत कई साल पहले हो चुका था। इनकी उमर अस्सी के ऊपर ही थी। घर हमारे तीन चार किलोमीटर के फ़ासले पर थे, कई बार कहने के बावजूद हमारे साथ रहने नहीं आ रहे थे वो, हर बार यही कहते कि कुछ हिसाब किताब है मेरा लोगों के साथ, समेट लूं फ़िर वहीं रहना है तुम लोगों के पास। वैसे कोई दिक्कत नहीं थी, उनके घर के आसपास सभी अपने कुल परिवार के ही लोग थे, हमारा घर ही उन सबसे दूर था। दूसरे तीसरे दिन कभी पिताजी, कभी मैं और कभी मेरा भाई उनसे मिलने जाते रहते थे। काफ़ी एक्टिव थे बड़े दादाजी हमारे, लेकिन वृद्धावस्था के चलते महीने दो महीने में एकाध बार नर्सिंग होम में एडमिट होना ही पड़ता था। साथ में रहने वाले जरूरत पड़ने पर हमें खबर कर देते और हमारे घर से कभी मेरे पिताजी और कभी मेरी मां और उधर के परिवारों से कोई सदस्य, सभी मिलजुल कर समय निकाल लेते थे। तीन चार दिन में बड़े दादाजी घर वापिस हो लेते थे। वही रूटीन शुरू, रात ढलते ही टी.वी. ऊंची आवाज में चालू और वो भी चालू हो जाते थे, ड्रिंकने और थिंकने में। हमारे साथ न रहने की सबसे बड़ी वजह यही समझ में आती है मुझे। मुझे फ़ख्र है कि मेरे घर का सबसे बिगड़ा सदस्य मैं हूं। इस बिगड़ैलपने पर फ़ख्र इसलिये होता है कि मेरे परिवार के बाकी सदस्यों की सादगी और बढ़ जाती है इससे।
तो जी ऐसा हुआ कि शाम को ऑफ़िस से वापिस आया तो मां कहने लगी कि तेरे बड़े दादाजी नर्सिंग होम में हैं। मैं कहने लगा, “इसमें क्या बड़ी बात है, छ: महीने न देखें नर्सिंग होम का बिस्तर तो बड़ी बात होगी।” भगवान के आगे मेरे पत्थरदिल होने की, बेरहम होने की, ममताशून्य होने की शिकायत की गई और समझाबुझाकर मुझे पहली बार नर्सिंग होम भेजा गया कि जा उनके पास, वो याद करते रहते हैं तुझे, और उन्हें अच्छा लगेगा। चला गया जी, सोचकर गया था कि घंटा भर बैठ कर आ जाऊंगा, वहां लग गये तीन चार घंटे, दूसरे परिवार से जिस रिलीवर ने आना था, वो आया ही नहीं। बैठा हुआ कुढ़ता रहा, खीझता रहा और जब वापिसी का मौका लगा तो कसम खाकर उठा कि आज के बाद नहीं आना इनके पास होस्पिटल में। दो घंटे के बाद फ़ोन आ गया कि मरीज के घर जाने की जिद के चलते उन्हें घर ले आया गया था और अब वो अपने असली घर को चले गये हैं। देख लो जी कैसी लाज रखी मेरी कसम की भगवान ने, पहली बार गया था उनसे मिलने नर्सिंग होम में, नहीं हुआ बरदाश्त उनसे भी। मेरी आंखों के सामने फ़िर से पीपल का पेड़ भरभराने लगा था….।
वो दिन है और आज का दिन, मेरा अपना कोई बीमार होता है तो मैं कोशिश करता हूं कि रिस्क न ही लूं कोई। पत्त्थरदिल समझा जाना मंजूर है, लेकिन…। यहां ब्लॉगजगत में आया, तो कुछ पुराने ब्लॉगर्स ने मुझे हाथों हाथ ले लिया, मैं धन्य हो गया। मैंने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुये कुछ ऐसे ब्लॉग शार्टलिस्ट किये, जो अपेक्षाकृत नये थे और मुझे अपीलिंग लगे, मैं उनका फ़ॉलोवर बन गया। इनसे भी शायद बर्दाश्त नहीं हुआ,
२.http://athaah.blogspot.com/३. http://bhanu-choudhary456.blogspot.com/
४. http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/
ये मैंने दो चार उदाहरण दिये हैं, जिसे छू दिया है वही इनैक्टिव हो जाता है। हा हा हा। जस्ट फ़ॉर टैस्टिंग ’अपना पंचू’ को फ़ॉलो करना बंद किया तो लोकेन्द्र सिंह राजपूत जी कुछ ऐक्टिव दिखने लगे हैं। जो पुराने वाले हैं अपने यार बेली, वो पके हुये हैं, लेकिन मुझे अब भी अपने पर यकीन है। हा हा हा...
क्यों नहीं भारत सरकार मेरे इस मिडास टच का फ़ायदा उठाती? पकड़ो किसी घोटालेबाज को, किसी आतंकवादी को, किसी देश के दुश्मन को, एक बार कुटम्मस चढ़ाकर भर्ती करो किसी नर्सिंग होम में, और मुझे भेज दो उसकी लुक-आफ़्टर करने। अबे सालों, तुम्हारी धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी और अलानी फ़लानी छवि भी बरकरार रह जायेगी और मेरा भी कुछ जीवन सफ़ल हो जायेगा। कल को कहीं अमरीका या चीन को पता चल गई न ये बात, तो ले जायेंगे हाईजैक या लोजैक करके, फ़िर हाथ मलते रहना कि ब्रेन ड्रेन हो गया। अभी तो कदर नहीं करते, फ़िर भेजोगे रंग बिरंगे डोज़ियर जैसे अब मांगते हो दाऊद को, और पाकिस्तान देता नहीं। खैर, हम नाउम्मीद नहीं हैं जी, जब चाचा, पायलट, किसान पुत्र, धरती पुत्र, अर्थशास्त्री जैसे प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो आप में से कभी न कभी कोई ब्लॉगर भी जरूर प्रधानमंत्री बनेगा। तब अपनी सुनवाई जरूर होगी। पता नहीं कितने खूनों से हाथ रंगे जाने हैं अपने, देखी जायेगी।
:) फ़तू के गृहस्थ जीवन में उठापटक चल रही थे और इसके चलते फ़त्तू ने दाढ़ी वाढ़ी बढ़ा रखी थी, दिखने में बाबाजी ही लगता था उन दिनों। एक दिन गली में से जा रहा था तो एक मियां बीबी का झगड़ा देख सुनकर ठहर गया। बीवी गुस्सा होकर घर से निकली और दौड़ती हुई फ़त्तू के पास से निकल गई। उधर मियां ने आवाज भी लगाई थी कि ’बाबाजी, पकड़ियो इसे।’ फ़त्तू चुपचाप उस औरत को भागते हुये देखता रहा।
उसके पति ने पास आकर गुस्से में कहा, “क्या बाबाजी, पकड़ न सके था इसनै?”
फ़त्तू, “बाबाजी ने के कहे था पकड़न ताईं, बाबाजी तो अपनी नै ही छोड़ै हांडे है।”तो जी, फ़त्तू से तो रहो सारे बेफ़िक्र, वो तो अपनी ही छोड़े फ़िर रहा है। मस्त रहो और आजादी का दिन सैलीब्रेट करो। हमें तो इस दिन भी ड्यूटी पर जाना है, देखी जायेगी हमारी आजादी की तो।
देशभक्ति के गाने तो बहुत से बजेंगे आज सब जगह, यहां तो कुछ और ही सुन लेना।