गुरुवार, मई 26, 2022

एक्स्ट्रा वसूली

रविवार को अकेला था तो मैं एलिफेंटा गुफाएं, जो कि मुंबई से कुछ दूर घड़ापुरी नामक टापू पर हैं, देखने चला गया था। वहाँ जाने के लिए गेटवे ऑफ इण्डिया से फैरी चलती है जो लगभग एक घण्टे में उस टापू तक पहुंचा देती है। बालकनी में जाने के पहले ही उनका एक कर्मी खड़ा था जो ऊपर जाकर बैठने के दस रुपए एक्स्ट्रा ले रहा था, मैंने सामान्य प्रैक्टिस समझते हुए दे दिए। बाद में अन्य लोग आए तो एडवांस कलेक्शन सम्भव नहीं रहा होगा, वो ऊपर आकर सबसे दस रुपए लेने लगा। एक दम्पत्ति जिनके साथ एक बच्ची भी थी, फैल गए कि एक्स्ट्रा कुछ नहीं देंगे। उन्हें देखकर एक और जोड़ा भी फैल गया। थोड़ा-बहुत इमोशनल ड्रामा करके उस कर्मी ने फैरी के जैक स्पैरो को आवाज लगाकर कहा, "मास्टर, तीन लोग ये और दो लोग ये पेमेंट नहीं दिया है।" मैंने सोची कि पचास रुपए के चक्कर में शायद बीच समन्दर में जाकर फैरी को हिचकोले खिलवाए जाएं लेकिन मास्टर ने जैकस्पैरोपना नहीं दिखाया। अब जाकर मुझे मेरे दस रुपए का दुःख हुआ। 

लौटते में फैरी दूसरी थी लेकिन कहानी फिर वही, बोले कि ऊपर तले में जाने का दस रुपया एक्स्ट्रा। अबके मैंने काउंटर ऑफर दिया कि दस रुपए मुझे दे दो तो मैं बेसमेंट में चला जाता हूँ। वो नहीं माना, मेरी वैसे भी कोई मानता नहीं है इसलिए मैं इसे ईगो का विषय नहीं बनाता। चुपचाप सामान्य सीट पर बैठ गया। अकेला था इसलिए कोने वाली सीट ले ली, सबसे आगे की सीट। जाते समय की अपेक्षा लौटते समय समुद्र में लहरों की हलचल कुछ अधिक थी।

मैंने टाइटैनिक नहीं देखी लेकिन बढ़िया हवा, पानी की छिटपुट बूंदें मुझे अपनी इस छोटी सी यात्रा का मिलान अमानुष, पाइरेट्स ऑफ द कैरिबियन, वाटरवर्ल्ड, कास्टअवे आदि के साथ करने को पर्याप्त प्रेरणा दे रही थीं। अचानक से फैरी से honking की आवाजें आने लगीं। इनके हॉर्न की आवाज भी अलग तरह की होती है, कुछ-कुछ बिगुल जैसी। वैसे सब जानते होंगे लेकिन मैंने चूँकि इस यात्रा के लिए ताजा ताजा 260₹ + 10₹ अलग से खर्च किए हैं तो ज्ञान छौंकना बनता है कि भले ही ये स्टीमर/फैरी सड़क या पटरी पर न चलकर समुद्र में चलते हों लेकिन इनका एक निर्धारित रुट होता है, सामान्यतः उसी रुट का पालन करना होता है। यह अलग बात है कि यह रुट एकदम से रेल की पटरी या सड़क जैसा फुट/मीटर की बाध्यता नहीं माँगता। इस कारण आने और जाने वाले स्टीमर/फैरी कुछ अंतर से ही एक दूसरे को क्रॉस करते हैं।

अन्य यात्री अपने जोड़ीदारों/सेल्फी आदि में मस्त दिखे लेकिन मैं अकेला था तो सोचने लगा कि लगातार बज रहे हॉर्न के पीछे क्या कारण हो सकता है? यह स्पष्ट समझ आ गया कि सामने वाली फैरी को कुछ संकेत दे रहा है। इतने में इस मास्टर का सहायक फैरी के सबसे आगे के नुकीले हिस्से में जाकर सामने से आ रही फैरी को दोनों हाथ हिलाकर और ऊंची आवाज में रुकने के लिए संकेत करने लगा। कन्फ्यूजन ये हो रहा था कि इधर वाले का हॉर्न सुनकर सामने वाला दूर से ही अपनी फैरी को रुट से अलग ले जाता था। दो केस ऐसे होने के बाद हमारी फैरी वाले ने एक अतिरिक्त काम किया कि हॉर्न देने के साथ स्वयं भी यूटर्न ले लिया। अब लोगों के माथे पर चिंता झलकने लगी। आगे संक्षेप में बताऊं तो जैसे-तैसे इस बार सामने वाले को भी समझ आया कि कोई विशेष बात होगी, दूर से ही इनका हाल्टिंग संवाद हुआ और दोनों फैरी को एकदम निकट लाकर और लगभग रोककर इधर से एक युवक को उधर वाली फैरी में कुदवाया गया। पता चला कि इन साहब को आधे रास्ते में आकर पता चला था कि मोबाईल टापू पर ही छूट गया है। ये सब कवायद इसीलिए थी। मेरा अनुमान है कि हमारे स्टीमर को कम से कम दो किलोमीटर का एक्स्ट्रा रास्ता तय करना पड़ा होगा और समय भी अतिरिक्त लगा। मैंने ऐसे समझा कि मेरे दस रुपए ऐसे वसूल होने थे।

प्रदूषणों में सबसे खराब प्रदूषण मुझे ध्वनि प्रदूषण लगता है विशेष रूप से सड़क पर बजते अनावश्यक हॉर्न लेकिन उस दिन ये आनन्द का कारण बने। जीवन में कुछ उल्लेखनीय न चल रहा हो तो छोटी छोटी बातें भी बड़ी लगती हैं।

शनिवार, अप्रैल 23, 2022

विचित्र चिंताएं

दिल्ली के साथ भी एक विचित्र सा सम्बन्ध रहा है, न हम बंधें और न ही छूट सके। जीवन में दो ही मुख्य उद्देश्य रह गए लगते हैं, दिल्ली में कुछ वर्ष रहो तो 'चलो दिल्ली से' और कुछ वर्ष दूर रहो तो 'चलो दिल्ली।' एक बार पुनः दिल्ली छूट रही है, एक बार पुनः मैं अनिश्चय की स्थिति में हूँ कि प्रसन्न दिखना चाहिए या अप्रसन्न। मेरी चिंताएं भी तो विचित्र हैं, साथी लोग बताते हैं कि मुम्बई में आवास मिलना बहुत कठिन है और मुझे चिंता है कि छाता तो नहीं खरीदना पड़ेगा?

अन्ततः यही तय पाया गया कि देखें आगे क्या होता है। और कुछ नहीं तो इस बार नॉस्टैल्जिक होने का अभिनय भी सीख लेंगे☺️


शुक्रवार, अप्रैल 15, 2022

विरोधाभास

प्रायः माना जाता है कि सफलता आत्मसंतोष लाती है और असफलता कुण्ठा। मैं इस मान्यता पर प्रश्न नहीं उठाता, मेरा कोई मनोरथ पूरा होने पर मुझे भी प्रसन्नता और आत्मसंतुष्टि मिली लेकिन असफल होने पर(जिसके अवसर भी पर्याप्त मिले) मैंने पाया कि दुःख यदि हुआ भी तो बहुत अल्पकालिक। हिसाब लगाने बैठा जाए तो सफलताओं की दर भी असफलताओं से बहुत कम बैठेगी और जीवन पर उनका प्रभाव भी। समय मिलने पर मैंने इस बात पर मनन किया कि एक ही स्थिति में विभिन्न लोग भिन्न व्यवहार क्यों करते हैं? कुछ हैं जो आपे से बाहर हो आते हैं और कुछ को देखकर लगता ही नहीं कि कुछ विशेष हुआ भी है। मेरी प्रयोगशाला में 'सब्जेक्ट' मैं ही होता हूँ तो मेरे निष्कर्ष भी मुझपर ही आधारित हैं। मैं दो मुख्य कारण समझ पाया और दोनों कारण भी मेरी भांति विरोधाभासी भी हैं, एक कारण तो यह कि मैं लोक व्यवहार, हानि-लाभ, हित-अहित आदि के बारे में अन्यों की भांति स्पष्ट नहीं सोच पाता और दूसरा यह कि बचपन में विद्यालय प्रार्थना के बाद बोले जाने वाले श्रीमद्भागवत गीता के कर्म और फल वाला एकाध श्लोक अवचेतन में कहीं धंसे रह गया। किसी कार्य की सिद्धि के लिए प्रयास करना ही मेरे वश में था, यदि वह मैंने सत्यनिष्ठा से किए थे तो अनुकूल परिणाम न मिलने पर भी मुझे दुःखी रहने का कोई अधिकार नहीं। श्रीमद्भागवत गीता के बारे में उचित ही कहा जाता है कि यह भारत की ओर से विश्व को प्रदत्त सबसे बड़ा उपहार है। 
विरोधाभास का सन्दर्भ यह है कि इस ईशवाणी को अत्यंत प्रभावी मानते हुए भी मैं अब तक इसका पूर्ण लाभ नहीं उठा पाया, मनोरंजन को कुछ अधिक ही महत्वपूर्ण मानता रहा।

रविवार, अक्तूबर 10, 2021

मनके

मैं एक मध्यमवर्गीय क्षेत्र का निवासी हूँ जिसे वास्तव में निम्न-मध्यमवर्गीय ही कहना चाहिए। मेरा जन्म 1970 का है, मैं मेरे अनुभव लिखूँ तो यही समझा जाए जो मैंने देखा। उससे पूर्व अर्थात 1948 से लगभग साठ-सत्तर के दशक तक यह क्षेत्र निम्न आयवर्ग वालों का ही रहा होगा। देशविभाजन के बाद विस्थापित होकर आए परिवारों को भारत के विभिन्न स्थानों पर बसाया गया था तो मेरे अनुमान में ऐसे सभी स्थानों पर लगभग ऐसा ही सामाजिक टेक्सचर होना चाहिए। लोगों की आर्थिक स्थितियाँ बदलती रही हैं, उसके साथ ही सामाजिक व अन्य स्थितियाँ भी। 

कुछ व्यक्तियों को नौकरी मिल गई, अधिकाँश ने मजदूरी और छोटे-मोटे व्यवसाय से जीवन की नई पारी आरम्भ की। समय के साथ कुछ ने अपने आरम्भिक धन्धों को विस्तार दिया, कुछ ने स्वयं या उनकी सन्तति ने कार्य बदले भी। यह तथ्य है कि नई पीढ़ी के अधिकाँश बच्चे वर्तमान की वस्तुओं, तकनीकों को पुरानी पीढ़ी की अपेक्षा अधिक व्यवहारिक रूप से जानते हैं। साथ ही यह भी उतना ही सत्य है कि यही पीढ़ी अपने परिवारों की साठ-सत्तर वर्ष पुरानी आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि से पर्याप्त परिचित नहीं। इस परिचय न होने में मैं इस पीढ़ी का दोष नहीं देखता, मुझे यह you can't eat the cake and have it too जैसी अवस्था लगती है।

इस परिवर्तन की अवधि में कुछ प्रसंग मुझे रोचक लगते हैं। उस समय हमारे लोगों के पास श्रम से कतराने की लग्जरी नहीं थी। आदमी लोग सुबह अपनी नौकरी अथवा व्यवसाय के लिए निकल जाते थे, स्त्रियाँ घर-गृहस्थी के कामों में जुट जाती थी। कुछ दिनों में मैंने देखा कि अनेक स्त्रियाँ प्रतिदिन 4-5 के समूह में बोलती-बतलाती जाती हैं, कुछ देर में लौटती हैं तो हाथों में थैले-झोले लटकाए। पहले मुझे लगा कि राशन डिपो से चीनी आदि लाती होंगी लेकिन ये तो प्रतिदिन का काम हो गया जबकि कंट्रोल के दिनों में प्रतिदिन चीनी बँटना असम्भव था। इन स्त्रियों में एक कॉमन बात थी कि ये सब 'परले मोहल्ले' की थीं। 'परला मोहल्ला' अर्थात हमारी छोटी सी कॉलोनी के दूसरे छोर पर बसे कुछ घर जिनमें हमारे जैसे विस्थापित परिवार ही रहते थे। वो भी बिल्कुल हमारे जैसे ही लुटपिट कर आए थे लेकिन इधर वाले स्वयं को उनसे श्रेष्ठ(मेरे लिए अज्ञात कारणों से) मानते थे। कुछ जिज्ञासाएं ऐसी होती हैं जिनका त्वरित शमन आवश्यक लगता है, यह उस श्रेणी की न होकर होल्ड की जा सकती थी तो मैंने किसी से पूछा नहीं। जीवन-मरण का प्रश्न न हो और जिनका उत्तर हम स्वयं खोज सकें, उसके लिए औरों पर प्रश्न दागना मुझे प्रिय नहीं। लेकिन जैसाकि बता चुका, 'परला मोहल्ला' कॉलोनी के दूसरे छोर पर था और उधर मेरा नियमित जाना भी नहीं होता था, जिज्ञासा मन में बनी रही। कुछ दिन बाद उस ओर गया तो देखा कि लगभग हर घर के बाहर चबूतरे पर, चारपाई पर या बरामदे में स्त्रियाँ अपने आगे रंग-बिरंगे मनकों(प्लास्टिक के मोती) का ढेर लगाए बैठी हैं। हाथ लगातार सुई, प्लास्टिक की डोर, मनकों से जूझ रहे हैं और चपड़-चपड़ भी चल रही है। ऐसे ही बिन्दुओं को जोड़कर जो चित्र बना तो वो यह था कि उसी मोहल्ले के एक व्यक्ति जो अब कुछ दूर जाकर रहने लगा था, ने जॉबवर्क पर आर्टिफिशल मालाएं आपूर्ति करने का उद्यम आरम्भ किया। ये सब स्त्रियाँ उसके यहाँ से तौलकर मनके और अन्य सामग्री लाती थीं, अपनी दिनचर्या को थोड़ा सा पुनर्व्यवस्थित करते हुए मालाएं बनाती थीं। अगले दिन तैयार माल वापिस, नया कच्चा माल लिया और वही दिनचर्या आरम्भ। स्वाभाविक है कि श्रम का मूल्य अल्प ही सही लेकिन नकद मिलता था। सहकारिता जैसी यह व्यवस्था लम्बे समय तक चली। मेरा अनुमान है कि पारिश्रमिक नाममात्र का ही होता रहा होगा लेकिन उस दौर में इस एक कृत्य ने उन स्त्रियों के साथ उनके परिवारों को आर्थिक रूप से सम्बल दिया होगा। 

मुझे वह मॉडल बहुत प्रेरक लगा था, 'अमूल' और 'लिज्जत' जैसे प्रकल्पों की जानकारी बहुत बाद में हुई।

प्रश्न ही उठाते रहने वालों के प्रश्न कभी समाप्त नहीं होते। प्रतिबद्धता के मापदण्ड पर देखेंगे तो ऐसे लोग समाधान खोजने वालों से इक्कीस नहीं इकतीस ही होते हैं क्योंकि इन पर समाधान का कर्तव्य/दायित्व नहीं होता।

अब तो वैसे भी टूलकिट जैसी तकनीक आ चुकी है। डिपो से रंग-बिरंगे प्रश्न कच्चे माल के रूप में उठाओ, ट्विटर/फेसबुक/इंस्टा में पिरो दो। अगले दिन डिपो से नया प्रश्न उठाओ & so on..

Show must go on...