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गुरुवार, फ़रवरी 10, 2011

बात एक और मायने दो...


एक गज़ल लगाई थी कभी अपनी एक पोस्ट में, ’चमकते चाँद को टूटा  हुआ तारा बना डाला,’  फ़िल्म थी आवारगी और गाने वाले थे गुलाम अली साहब। चाँद, टूटा-फ़ूटा, आवारगी और गुलाम अली, इन चारों में अपनी पसंद के हिसाब से रैंकिंग देनी हो तो चारों संयुक्त विजेता सिद्ध हो जायें। चारों एक से बढ़कर एक पसंदीदा चीजें हैं अपनी।  यही वजह थी कि गज़ल बहुत पसंद थी, है और रहेगी। एक लाईन है इसमें, ’मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ’  - ये जी हमारी पर्सनैल्टी का बड़ा अहम हिस्सा है। देखना और हैरान होते रहना, न देखने से हटते हैं और न हैरान होने से बचते हैं।

पौने तीन साल पहले जब यहाँ आया था तो शायद शुरू के दूसरे तीसरे दिन ही बैंक में एक ग्राहक आया, छ; फ़ुटा बंदा, खड़ी मूंछें,  भरी-भरी दाढ़ी,  भव्य पर्सनैल्टी और जो भी दूसरा ग्राहक आता, ’बाई जी, सत श्री अकाल’  कहकर अभिवादन कर बुलाता  उसे।  हो गये जी हम हैरान कि भाई ये कैसी\कैसा बाईजी?    इससे पहले बाईजी से अपना वास्ता या तो कोठों पर पड़ा था, मेरा मतलब है जी कि इस शब्द से अपना परिचय फ़िल्मों, उपन्यासों में दिखाये गये कोठों की मालकिन को संबोधित किये जाने तक से संबंधित था। समझाया खुद को कि जमाना बदल रहा है, हो सकता है ……। दुनिया इतने में कहाँ रुकने वाली थी, थोड़े दिन में  कोई बंदा  हमें भी बाई जी कहकर बुला गया।   धरे रह गये सारे चरित्र प्रमाणपत्र, शराफ़त का ये अंजाम?  हमें डेली पैसेंजर साथी संजय भाई साहब या संजय भैया कहकर बुलाया करते थे, हमारा प्रेमी स्टाफ़ भोला हमें संजय बाऊ कहकर बुलाया करता था लेकिन ’बाईजी’ ?    लेकिन क्या  कर सकते हैं जी, कहते हैं कि कोई मार पीट कर रहा हो उसका हाथ पकड़ा जा सकता है लेकिन बोलने वाले की जबान नहीं पकड़ी जा सकती। वैसे भी बापू ने बुरा न देखने, सुनने और बोलने के अलावा ऐसा भी कहा बताते हैं कि ’ग्राहक भगवान होता है।’   ठीक है भगवान, बना दो जो बनाना है तुम।  हमारा क्या है, हमने कौन सा यहाँ परमानेंट लंगर डालना है, चले ही जाना है यहाँ से तीन साल बाद।

लेकिन बात खटक तो गई ही थी, शाम को हमारे गार्ड साहब से जिक्र चला। हथियार वाले बंदों से अपनी सैटिंग हमेशा से सही बैठा करती है। जब उनसे बात की तो वो हँस दिये, “साबजी, मैं फ़ौज विच नौकरी दे दौरान राजस्थान रया सी, उत्थे मैं वी इस ’बाईजी’ दे चक्कर विच बड़ा परेशान रया। अलग अलग जगह ते एक ही शब्द दे अलग अलग मायने होंदे ने।” उन्होंने बताया कि पंजाब के इस इलाके में बाई जी, या बाई, या बई अपने से बड़े भाई को कहते हैं। आदरसूचक शब्द है, इसलिये चिंता की कोई बात नहीं।  कुहासा छंट गया, अब याद आया कि एक गाना देखा था ’जी नईं जान नूं करदा रंगली दुनिया तों’ और उसके गायक का नाम लिखा हुआ आता था पम्मी बाई। लो जी,  खुश हो गये हम। हमें खुश या दुखी होने के लिये बहुत बड़ी बातों की दरकार कभी रही भी नहीं, जरा जरा सी बात पर हो जाया करते हैं, हा हा हा।

अब आपको इसीसे संबंधित एक मजेदार बात बताते हैं। पच्चीस छब्बीस साल का जमींदारों का एक लड़का है इसी गांव का, मस्तमौला सा,।  स्वभाव ऐसा सरल है उसका कि कुछ पूछिये नहीं। न उसे किसी की जाति बिरादरी से मतलब है, न किसी की माली हैसियत से।   यारों का यार और स्वभाव वही कि ’दिलबर के लिये दिलदार हैं हम  और दुश्मन के लिये  तलवार हैं हम।  अपनी सही जमने लगी थी उससे।   सारे गांव के जितने छंटे हुये, उभरे और उभरते सितारे, उम्र में चाहे उससे पन्द्रह बीस साल बड़े ही क्यों न हों, उसे बाईजी ही कहकर बुलाते हैं।  तो हमारे इस बाईजी के बापू एक दिन कहीं जा रहे थे और सड़क के दूसरी तरफ़ एक दुकान पर अड्डा जमाये तीन चार क्रीमी लेयर के बंदे  कुछ प्रोग्राम बना रहे थे। प्रोग्राम में बाईजी की शिरकत जरूरी थी, सामने से उसके बापू को आते देखकर एक ने आवाज लगाई, “ओ रूपे......., बाईजी कित्थे है, घर हैगा या खेत ते?”   अब बापू ने बोलना शुरू किया, “भैण दे यारों, इधर आओ तुसी। मैं दसदा हां त्वानूं(मैं बताता हूं तुम्हें),  मुंडे नूं कैंदे ओ बाईजी ते उसदे बापू नूं बुलांदे हो, ओये रूपे?(लड़के को कहते हो बाईजी और उसके बाप को बुलाते हो ओये रूपे?)     

मैं लेट हो गया यारों, मेरा  ब्लॉग बनाने से पहले ही बाईजी चला गया है दूसरे मुल्क।  न तो एक और फ़ौजी आ गया होता अपनी साईड:))

एक और पेंशनर है हमारा,  जब भी पेंशन लेने आता है तो अपनी एंबैसेडर कार में आता है। हर बार कह्ता था, कभी जरूरत हो गाड़ी की तो मुझे फ़ोन कर देना। एक बार सरकारी काम से स्टाफ़ को कहीं जाना था और उस दिन शादियों का मुहूर्त होने के कारण कोई टैक्सी नहीं मिल रही थी, मुझे उसकी याद आई। मैंने कहा कि उस बाई को  फ़ोन कर देता हूँ, वो जरूर आ जायेगा। स्टाफ़वाले बिदक गये,  “न जी, उसकी गाड़ी में कौन बैठे? दिखता तो है नहीं उसे।”  मैंने कहा, “यार, हर महीने तो गाड़ी लेकर आता है वो। अगर दिखाई न देता हो तो कैसे इतने दिन हो गये और कोई एक्सीडेंट वगैरह की बात नहीं सुनी?”  बताया गया कि बचपन से इसी गांव में रहा है तो एक एक रास्ता उसका नापा हुआ है, रही बात सड़क पर चलने वालों की, तो जहाँ दूर से उसकी एंबैसैडर दिखाई देती है, शोर मच जाता है ’आ गई बाई दी गड्डी’ और लोग बाग खुद ही दौड़ कर और भाग कर रास्ते ऑल-क्लियर कर देते हैं।” 

मैं सोचने लगा और महसूस करने लगा वो नजारा और सुगबुगाहटे – एंबैसैडर का घर्घर नाद सुनो,     सड़कें खाली करो कि बाई की एंबैसैडर आती है।  रैप्युटेशन और गुडविल कितनी मुश्किल से बनती है? कितनी मेहनत लगी होगी बाई को अपनी दहशत कायम करने में, शायद बहुत ज्यादा। अगली पेंशन लेने आयेगा तो करूंगा रिक्वेस्ट कि बाई, मेरा फ़ालोवर बन जा न यार। थोड़ा सा संगति का असर हो जाये मुझपर भी कि दूर से कहीं पोस्ट आती दिखे तो शोर सा मच जाये ’आ गई संजय बाई दी पोस्ट, आ गई।’  मेरी गुडविल बन जायेगी और संभावित मठाधीशी की तरफ़ एक कदम और उठ जायेगा:))