बैंक की वार्षिक लेखाबंदी, पेंशन वितरण, ऑडिट आदि आदि के चलते मुश्किल से दो दिन की छुट्टी का जुगाड़ हो पाया था। सोमवार को ड्यूटी करके रात भर बस में जागकर सुबह दिल्ली पहुँचा। नहा धोकर नाश्ता किया और जिस स्कूल में बच्चों के एडमिशन की बात पहले से कर(वा) रखी थी, वहाँ पहुंच गया। प्रिंसीपल महोदया से मिलने का सुयोग जब तक मिला, बारह बज चुके थे। परिचय देकर जब मिलने का मकसद बताया तो उन्होंने कहा कि छोटे बेटे का टैस्ट ले लेते हैं लेकिन बड़ा जोकि दसवीं कक्षा में आया है, उसका दाखिला मुश्किल है। सी.बी.एस.ई. बोर्ड के तहत अब दसवीं कक्षा में एडमीशन देने के लिये बहुत सी औपचारिकतायें हैं और बहुत दिक्कत आती है। सारा केस उन्हें फ़िर से बताया तो वे कन्विन्स तो हो गईं कि आपका जेनुईन मामला है, लेकिन वही बात कि सी.बी.एस.ई. से अनुमति आपको खुद ही लेकर आनी होगी। थोड़ा इंतजार कीजिये, दो बजे स्कूल के मैनेजर कम डायरेक्टर साहब आते हैं, उनसे बात कर लीजिये। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि जितनी मदद हो सकेगी वे करेंगी। मैनेजर साहब आये, फ़िर से वही सारी कहानी दोहराई गई और इस बार मैंने खुद ही कहा कि सी.बी.एस.ई. वाली अनुमति की जिम्मेदारी मेरी। तब इधर से भी हरी झंडी मिल गई। मैनेजर साहब ने बताया कि एक एफ़िडेविट भी देना होगा जिसमें तमाम तरह के डेक्लेरेशन रहेंगे, एफ़िडेविट तैयार करवाकर स्कूल में लाकर दिखा दिया जाये तो वो इस आशय का एक पत्र सी.बी.एस.ई. को एड्रेस करके स्कूल के लैटर हैड पर बनवाकर दे देंगे। अगले दिन एक बजे का समय तय हो गया। इस बीच छोटे वाले का टैस्ट भी हो चुका था। समय हो चुका था तीन, सुबह से बच्चे भी भूखे थे और जिसके माध्यम से स्कूल में बात चल रही थी, वो सज्जन भी सुबह से ही हमारे साथ थे, बोले तो जैसे हम भूखे वैसे हमारे मेहमान भी भूखे। आधी जंग जीतकर बुद्धू पार्टी घर को लौट आई। एम.बी.बी.एस. के अकेले अकेले फ़ोटू भी एडमीशन फ़ार्म पर लगाने को चाहिये थे। शाम को ये आयोजन भी संपन्न हुआ। अथ श्री प्रथम दिवसे कथा।
दूसरे दिन एफ़िडेविट तैयार करवाकर निश्चित समय यानि एक बजे से पहले ही स्कूल पहुंचे। एफ़िडेविट से संतुष्ट होकर प्रिंसीपल साहिबा ने फ़ारवर्डिंग लैटर तैयार करवा दिया। टाईपिस्ट महोदय ने लैटर टाईप किया, हमने प्रूफ़ जाँचा। दूसरे के दोष पकड़ने के माहिर होने की विशेषता के चलते(थैंक्स टु सो मैनी यंगर ब्लॉगर्स) वो साधारण सा लैटर तीसरी बार में जाकर ओके हुआ। अटकते भटकते सी.बी.एस.ई. कार्यालय पहुंचे। डीलिंग सीट पर जाकर नमस्ते की तो साहब ने ऊपर से नीचे देखा, पहले मुझे फ़िर चिट्ठी को। पहला ओब्जैक्शन आया कि साथ में पिछली कक्षा की मार्कशीट और ट्रांसफ़र सर्टिफ़िकेट की अटैस्टेड फ़ोटोकापी लगानी थी जबकि मैंने स्कूल के कहे अनुसार ओरिजिनल लगा दी थी। दरयाफ़्त करने पर पता चला कि जिस स्कूल में एडमीशन करवाना है, वही अटैस्ट करेंगे। मैंने पूछा कि अटैस्टेड का क्या मतलब होता है? जवाब मिला कि अटैस्टेड का मतलब है कि ये असली की ही फ़ोटोकापी है। मैंने अपना पक्ष रखा कि जब स्कूल के लैटर हैड पर उन्होंने संलग्न कागजों में इसका विवरण दे दिया है फ़िर अटैस्टेड की क्या जरूरत रही? और फ़िर मैं तो उसके बदले में आपको ओरिजिनल ही दे रहा हूँ। नियमों से बंधे बाबू साहब ने दलील दी कि ओरिजिनल की आपको जरूरत पड़ेगी।
मैंने पूछा, “कहां जरूरत पड़ेगी? ये देखकर अगर इन्हें नौकरी मिलती हो तो फ़िर मैं एडमीशन नहीं करवाता।”
बाबू साहब उवाच, “भाई साहब, आप मजाक कर रहे हैं? नवीं क्लास की मार्कशीट के आधार पर चौदह साल के बच्चे को नौकरी मिल जायेगी क्या?”
मैंने कहा, “श्रीमान जी, मजाक तो आप कर रहे हैं। मैं आपको ओरिजिनल देने को तैयार हूँ और आप हैं कि अटैस्टेड फ़ोटोकापी की जिद कर रहे हैं।”
उन्होंने किसी नियम का हवाला दिया कि वहाँ ऐसा ही लिखा है। मैंने कहा कि मैं भी एक जगह नौकरी करता हूँ, आप जैसी रौब वाली जगह तो नहीं है, लेकिन फ़िर भी कुछ चीजें डीलिंग हैंड के विवेकाधीन होती हैं। अगर आप मेरी बात से कन्विंस नहीं हैं तो अलग बात है, लेकिन अगर आपको मेरी बात ठीक लगती है तो कुछ पुनर्विचार करें। गलती से ये भी बता दिया कि अटैस्ट करवाने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन बात कम से कम कल तक जायेगी और मुझे आज रात वापिस लौटना है। टिप्पणियां पाने के चक्कर में चमचागिरी करनी आ गई है, ये कला वहाँ काम आ गई। दो तीन बार सर सर बोला उन्हें, साहब थोड़े से फ़ूल गये और कहने लगे कि मैडम से पूछकर आता हूँ। मैंने और चढ़ाया, "भाई साहब आप भी वड्डी सरकार से कम नहीं हो वैसे:)"
खैर, वो हाईकमान से केस डिस्कस करके आये और अहसान कर दिया मुझपर। “वैसे तो नियम एकदम स्पष्ट हैं, लेकिन आपका केस जेनुईन है इसलिये हम ओरिजिनल मार्कशीट और ट्रांसफ़र सर्टिफ़िकेट से काम चला लेंगे। कल से बच्चे को स्कूल भेज दीजिये, परमीशन आठ दस दिन में स्कूल में पहुंच जायेगी।” नतमस्तक होकर, आभारी होकर, अनुग्रहीत होकर लौटकर घर आया तो लंच और डिनर के बीच का समय हो चुका था। फ़िर रात में वापिस भी लौटना था, अगले दिन से ब्रांच में आडिट होना था और हम बैंक वाले वैसे भी बहुत बदनाम हैं कि काम धाम कुछ करते नहीं और तन्ख्वाह सबसे ज्यादा और सबसे पहले लेते हैं।
उससे अगले दिन जब छोटा भाई बच्चों के एडमिशन करवाने स्कूल गया तो पता चला कि सी.बी.एस.ई. कार्यालय से स्कूल में फ़ोन आ चुका है कि ट्रांसफ़र सर्टिफ़िकेट पर पुराने स्कूल के इंस्पैक्टर के काऊंटरसिग्नेचर भी चाहिये थे, वो नहीं हैं। वो बेचारा सारा दिन अपने काम का हरजा करके स्कूल, सी.बी.एस.ई. की नई बिल्डिंग और पुरानी बिल्डिंग, सीट दर सीट चक्कर काटता रहा। दो तीन बार मैंने डीलिंग हैंड से फ़ोन पर बात की और शाम तक जाकर इंस्पैक्टर के काऊंटरसिग्नेचर की कोई वैकल्पिक व्यवस्था हो सकी। एक बार फ़िर से बच्चे को स्कूल भेजने की आज्ञा मिल गई है, लिखित परमीशन में अभी समय लगेगा।
बिना फ़ीस और विविध शुल्क लिये स्कूल वाले बच्चे को क्यों पढ़ायेंगे और पैसे जमा करवा देने के बाद फ़िर से कहीं कोई कोमा, बिन्दु या रेखा या कोई और ऐसा वैसा ओब्जैक्शन लग गया तो? मेरा काम करने के लिये तो मेरा छोटा भाई है, जो अपना काम छोड़कर भी इधर से उधर धक्के खा लेगा लेकिन जिन बच्चों के पास ऐसे चाचा, मामा नहीं हैं उनका इन सब बातों में क्या कुसूर है? और बहुत सी बातें हैं, बोर्ड की परीक्षा तो वैकल्पिक हो गई, लेकिन किसी क्लास में एडमिशन के लिये परीक्षा जरूर ली जायेगी। ईश्वर न करे जिस घर में हालात बहुत अच्छे न हों, उस घर के बच्चों को पढ़ने का भी हक शायद नहीं मिलना चाहिये। पढ़ जायेगा तो आने वाले समय में नौकरी की भी अपेक्षा कर सकता है। ये सब सवाल तो तब उमड़ रहे हैं जब एक बहुत हाई फ़ाई स्कूल की बात नहीं हो रही। और सौभाग्य से जिनसे भी वास्ता पड़ा है, स्कूल प्रबंधन हो या सी.बी.एस.ई. कार्यालय, वो अपेक्षाकृत सहयोग ही करते दिख रहे हैं। लेकिन कुछ सुविधा शुल्क अभी तक उन्होंने लिया नहीं है, सो दिल है कि मानता नहीं कि काम हो जायेगा।
हर ऑफ़िस आज के समय में कम्प्यूटरीकृत है, कोई ओब्जैक्शन लगानी हो तो कहीं से भी निकल कर सामने आ जायेगी, अगर किसी कागज की या रिकार्ड की सत्यता जांचनी है तो ऑनलाईन रिकार्ड का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? मेरे घर का हाऊसटैक्स रैगुलर भरा जा रहा है। जो नहीं भरते उन्हें अभी तक नहीं पूछा गया लेकिन मेरे यहाँ नोटिस आया रखा है कि सन 2006-2010 का हाऊसटैक्स असैसमेंट और कर भुगतान मैंने नहीं किया है। दस दिन के अंदर प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष उपस्थित हो जाऊँ नहीं तो ……। यदि भर रखा है तो सभी कागज लेकर जाऊँ कि हां जी, मैंने गुनाह किया है जो आपके कहे अनुसार टैक्स भर दिया था और ये रहे सुबूत। किसी जमाने में जब मेरे दादालोग संयुक्त परिवार के रूप में रहते थे और फ़िर मेरे दादाजी के भाई अपने हिस्से की जमीन बेचकर कहीं और चले गये थे, बिजली का एक कमर्शियल मीटर जो कि मेरे दादाजी के नाम था, हमारे हिस्से आया। दसियों साल उसका मिनिमम बिल भरने के बाद जब उसे उतरवाना चाहा तो द्स हजार सुविधा शुल्क मांगा गया था। मीटर उतरवाने के लिये दस हजार? जवाब मिला था कि नहीं तो भरते रहिये तमाम उम्र इस हाथी का बिल।
मेरी आदम प्रवृत्तियाँ जोर मार रही हैं, सभ्यता के ढोंग में जीने की बजाय खुले आम जंगल का कानून नहीं लागू होना चाहिये? इन स्थितियों से आदर्श स्थिति वही नहीं थी क्या.? कम से कम मालूम तो रहता था कि जीने के लिये कितनी तरद्दुद करनी है। अभी की तरह एक भ्रम की स्थिति में तो नहीं थे हम कि हम एक सभ्य समाज हैं। सवालों के जवाब नहीं हैं, हर जवाब के सौ सवाल जरूर मिल जायेंगे। फ़िलहाल तो आज का जो हॉट टापिक चल रहा है उसी के बारे में सोच रहा हूँ, ’अन्ना की जन लोकपाल बिल की मांग मान लेने पर सब ठीक हो जायेगा न?’ ज्ञान-ध्यान की बातें अब मुझे ज्यादा समझ भी नहीं आती और मैं समझना चाहता भी नहीं, लेकिन मुझे लगता है कि सबको शिक्षा का अधिकार का कानून, रोजगार की स्वतंत्रता का कानून, बाल श्रम कानून, सार्वजनिक स्थानों पर धुम्रपान निषेधक कानून, दहेज विरोधी अध्यादेश वगैरह वगैरह शायद पहले से अस्तित्व में हैं और इनके कागजों में विद्यमान होने मात्र से समर्थ लोगों की रूह काँप उठती है इसीलिये ऐसे अपराध और इन कानूनों के अनुपालन में होने वाली चूकें अब शायद नहीं ही होती होंगी।
सुन रहे हैं कि अन्ना की मुहिम को जबरदस्त समर्थन मिल रहा है, हमारी तरफ़ से भी शुभकामनायें। शायद आई.पी.एल. वाले तो घाटे में रहेंगे इस बार, काहे कि अन्ना ने सारा फ़ोकस हाईजैक कर लिया दिखता है। पी.वी.आर., शापिंग माल्स, बार वगैरह अब खाली रहेंगे क्योंकि जनता ससुरी जाग गई है, एक हम जैसे हैं जिन्हें गहरी नींद ने घेर रखा है। नींद है कि जाती नहीं, होश है कि आता नहीं।
’सुखिया सब संसार है, खावत है और सोत,
दुखिया दास कबीर है, जागत है और रोत।"
खाने दो यारों मुझे भी और सोने दो, प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब:))