नाम में क्या रखा है, इस बारे में अलग अलग पोस्ट आ चुके हैं। इस विषय पर हमने यह अनुभव किया है कि नाम में कुछ रखा है या नहीं, ये सब निर्भर करता है उस समय के हमारे ऑन-मोड पर। विद्युत सप्लाई के जैसे ए.सी\डी.सी. दो मोड होते हैं, हमारे इसी तरह के दस बीस पचास मोड हैं। जो स्विच चालू है, हमारे फ़ैसले उसी आधार पर होते हैं। जब अपना देशी मोड चालू होता है, उस समय हम काका हाथरसी से सहमत होते हैं और जिस समय ग्लोबल मोड काम कर रहा हो, उस समय शेक्सपीयर जी को ऑब्लाईज कर देते हैं। लो जी, तुसी हो जाओ खुश, साड्डा की है? यू सैड इट वैरी रैटली – वाट्स देयर इन अ नेम।
शीला-मुन्नी से शुरू हुई बातों पर तर्क वगैरह तो बहुत देख लिये, हम तो आपको एक दो वाकये बताते हैं, नाम से संबंधित। एक हमारे अधिकारी हुआ करते थे – सिंघल साहब, निहायत ही शरीफ़, ईमानदार, कर्मठ अलाना फ़लाना। अब भाई लोगों, ये अलाना फ़लाना को लेकर इशू मत बना देना, ये पता नहीं कैसे आजकल हमारा तकिया कलाम बन गया है, हर जगह अपने नाम के साथ चेप देते हैं कि हम बड़े अलाना फ़लाना हैं। तो हमारे सिंघल साहब सब मानवीय गुणों से भरपूर थे, लेकिन कुछ घटनायें उनके साथ ऐसी घट जाती थीं कि पूछिये मत। ये तो भगवान भला करे, प्रियदर्शन जैसों ने सिच्युएशनल कामेडी की थोड़ी सी आदत डाल दी, न तो हमारी बातें बिल्कुल ही बेसिरपैर की मान ली जातीं।
एक दिन एक बुजुर्ग बैंक में आये, साथ में एक महिला थी जो उनकी पुत्री थी। आकर बोले कि इसका खाता खोलना है। हमारे सीनियर बोले, “हां बोल, नाम के सै बेबे का(हरियाणा में बेबे = बहन\बेटी के लिये आदरसूचक शब्द)।
बाबा, : ”जी, नाम सै इसका गदरो।”
सिंघल जी: “आयं, गदरो? यो के नाम होया भला?”
बाबा, : “जी, जद गदर होया था तब होई थी ये, इस खातिर नाम गदरो सै।”
सिंघल जी: “ओ बाबा, गदर कद होया था?”
बाबा, : “जी, जद यो होई थी, तब होया था।”
और उसका खाता इसी नाम से खोला गया।
ऐसे ही एक बार एक और बंदा आया। साहब ने उससे पूछा, “हां, नाम बता।”
वो बोला, “जी, बाणिया।”
सिंघल जी: “आयं, बाणिया? भाई बाणिया क्यूंकर लिखावे सै?”
वो बोला, “जी, बाणिया ही सूं मैं।”
सिंघल जी: “रै, बाणिया तो मैं भी सूँ। नाम बता।”
वो बोला, “जी, मन्नै तो सारे बाणिया ही कहके बुलावे सैं।”
सिंघल जी: “अचछा, जिस नाम से नहीं बुलावे हैं, वा बता।”
वो बोला, “जी, सुरेश।”
सिंघल जी: “हां, इब ठीक सै।” और फ़िर मेरी तरफ़ देखकर कहने लगे, “देख्या, पूछ लिया न सही नाम?”
कई साल पहले सिख धर्म के एक प्रकांड विद्वान का एक लेख पढ़ा था, जिसमें उन्होंने दशम गुरू श्री गोबिंद सिंह जी का तत्कालीन समाज पर प्रभाव का जिक्र करते हुये एक तथ्य बताया था कि उस काल में फ़कीरा, घसीटा, गरीबा जैसे नाम बहुत प्रचलन में थे और देश, कौम में जिन्दादिली भरने के लिये उन्होंने अपने अनुयाईयों को दिलेर सिंह, नाहर सिंह, बलवान सिंह जैसे ओजपूर्ण नाम देने शुरू कर दिये थे। उनका अपना व्यक्तित्व, करनी, उद्देश्य बिना शक प्रेरणा के सबसे बड़े कारक थे, लेकिन इस नाम परिवर्तन की मुहिम का भी लोगों में उत्साहवर्धन करने में, आत्मबल बढ़ाने में बहुत योगदान था। इतिहास गवाह है कि मुट्ठी भर खालसाओं की फ़ौज क्या कुछ कर गुजरी थी।
उदय प्रकाश जी की कहानी ’वारेन हेस्टिंग्ज़ का सांड’ में वारेन बहुत हैरानी से अपनी डायरी में लिखते हैं, “कितनी हैरानी की बात है कि भारत में गाय भैंस तक का एक प्रॉपर नाऊन होता है और जब उनका मालिक या चरवाहा गौरी, श्यामा या कजरी या ऐसे ही किसी नाम से किसी गाय को बुलाता है तो झुंड में से वही गाय निकलकर बाहर आ जाती है।
समय बदलता गया और आज के समय में नाम में ही नहीं, स्पेलिंग में भी बहुत कुछ रखा है। कितने ही प्रात:स्मरणीय\रात्रिस्मरणीय प्रोड्यूसर\प्रोड्यूसराओं को अपनी क्रियेशन्स का नाम कितना ही तोड़ना मरोड़ना पड़े, लेकिन आरंभ करते हैं किसी खास अक्षर से। तो जी अंत में तय यह हुआ कि धरती गोल है, हम जहाँ से चले थे अभी भी वहीं के वहीं हैं। जिसे जैसा लगे, वैसा माने – हमारे भरोसे न रहे कोई कि हम कोई हल बतायेंगे। हम तो खुद ही कन्फ़यूज़्ड हैं।
छेड़ाखानी करने वाले तो सही मायने में धुन के पक्के होते हैं। आज शीला मुन्नी जैसे नामों को लेकर छेड़ाखानी कर रहे हैं, ये सब न होता तो भी उन्होंने किसी और बहाने से यही काम करना था। सबके अपने अपने संस्कार हैं। अपने हाथ में अगर कुछ है तो, खुद को नियंत्रण में रखने की कोशिश करना। हम खुद को और अपने आसपास वालों को समझा सकें कि आजादी और उच्छृंखलता में अंतर है, तो उससे अच्छा समाधान कोई नहीं।
:) फ़त्तू ऑन जॉब -
कंगाली के दौरान फ़त्तू एक सेठ के यहाँ नौकरी पर लगा। पहला ही दिन था। जाड़ा जोरों पर था, ग्राहक घरों के भीतर दुबके बैठे थे । ऐसे में कोई पेमेंट लेने वाला आया तो सेठजी बोले, “भाई, फ़िर ले जाईयो, आज तो मौसम ने ईसी-तीसी करवा राखी सै।” दूसरा बंदा आया तो उसे भी यही जवाब, ठीकरा मौसम के सर। अब फ़त्तू को बहुत बुरा लग रहा था, बेकार में दूसरे को क्यों बदनाम कर रहा है सेठ, लेकिन बेचारा करता भी क्या? फ़िर से कोई व्यापारी अपने पैसे लेने आया तो सेठजी ने वही डायलाग दोहराते हुये अबकी बार फ़त्तू से कहा, “रे, बाहर चक्कर तो काट के आ जरा, देख तो बाकियों का के हाल सै? आड़े तो मौसम ने ईसी तीसी करवा राखी सै।” फ़त्तू के मौका थ्या गया, भागकर बाहर गया और दौड़ता हुआ वापिस आया, चमकते दमकते मुख से बोला, “सेठ जी, मौसम ने एकल्ले आप की ही नहीं, सारी मार्किट की ईसी-तीसी कर राखी सै।”