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शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

ये ज़िंदगी के मेले....

जैसे जैसे उम्र निकल रही है, एक एक करके मन के सारे वहम धुलने लगे हैं। कितना यकीन था अपने ऊपर कि हमारे बिना यह काम रुक जायेगा, वह काम रुक जायेगा। मिन्नत करेंगे लोगबाग कि श्रीमान, आओ, तुम्हारे बिना  सब ठप्प हो गया है। और हम बारात में रूठे हुये फ़ूफ़ा या जीजा की तरह पहले मान-मनव्वल करवायेंगे और फ़िर निहाल कर देंगे  दुनिया वालों को । मगर न किसी ने मिन्नत की और न ही किसी ने य पूछा कि भाई क्यों नहीं दर्शन दिये आपने? बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले।

दिल्ली का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेला संपन्न हो गया है।  इसमें क्या नई बात है?  हर साल लगता है,  चौदह नवंबर से और दो सप्ताह तक प्रगति मैदान और आस पास के कई किलोमीटर के दायरे में  कंधे से कंधा टकराती भीड़ का समन्दर लहलहाता रहता है। वैसे तो महीना भर पहले ही कम-ऑन वैल्थ खेल भी संपन्न होकर चुके हैं, लेकिन उनके साथ हमारा कोई इमोशनल अटैचमेंट नहीं था। लेकिन इस बेवफ़ा ट्रेड फ़ेयर को तो हमने अपने खूने-जिगर से पाला पोसा था, इसने इतनी बेमुरव्वत क्यों दिखाई? बिना हमारे गये भी ठीक-ठाक संपन्न हो गया?

ट्रेड फ़ेयर एक ऐसा सब्जैक्ट है हमारे लिये, कि उस पर पूरा महाकाव्य लिख सकते हैं। बहुत छोटे थे तो पिताजी हमें  घुमाने ले जाते थे, उसका अपना अलग चार्म था। कोई चिंता नहीं, कोई फ़िक्र नहीं। देखे जाओ और आनंदित होते रहो। फ़रमाईश करना ही काम होता था, बहुत मजा आता था उस समय। एक दिन एक प्रवचन में ऐसे ही मेले का वर्णन सुनते हुये फ़िर से अपने बचपन में पहुंच गये और एक नया नजरिया पाया। जब हम पिता की  उंगली पकड़कर   मेले में घूम रहे होते हैं, कितनी चीजें हमारा मन मोहती हैं। सजे सजाये पैवेलियन, महंगे और अनदेखे सामान, फ़व्वारे, खाने-पीने का सामान, आकर्षक साज-सज्जा तो मजा तो हमें यही सब देखकर महसूस करके आता लगता है कि इन रंगीनियों, साजो-सामान  में ही जिन्दगी का उल्लास है। ऐसे में अचानक पिता की उंगली छूट जाये तो फ़िर? सब साजो सामान वहीं और वैसे ही, लेकिन आनंद की जगह डर, निराशा, खौफ़ हावी हो जाते हैं। तो असली आनंद जिस चीज में है, उसका महत्व  हम तभी समझते हैं जब वो चीज हमसे छूट जाये।

फ़िर हम हो गये जी जवान।  अपने फ़ैसले खुद लेने लगे।  ग्यारहवीं और बारहवीं में हमारे साथ बहुत अन्याय हुआ था। नखलिस्तान से उठाकर हमें रेगिस्तान में छोड़ दिया गया। कोई फ़ूल नहीं, जिधर देखो कांटे ही कांटे। हम भी हम ही निकले, मिले न फ़ूल तो कांटों से ही दोस्ती कर ली। कायदे के चक्कर में ऐसे बेकायदा हुये कि डीटीसी को आधा घाटा तो हमारे जैसों के कारण ही हुआ। हमारे बापू की मेहनत से कमाई गई रकम में से साढे बारह रुपये ऐडवांस में ले लेते थे डीटीसी वाले, तब जाकर आल रूट पास जारी करते थे। हमने भी कमर कस ली कि पैसे वसूल करके ही छोड़ेंगे। सुबह घर से निकलने की  भी ऐसी हड़बड़ी रहती थी कि पेरेंट्स निहाल होते थे कि देख लो स्कूल जाने का कितना शौक है हमारे लाडले को। लाडला दूसरे कैक्टसों के साथ सारा दिन दिल्ली दर्शन में व्यस्त रहता था, बापू के साढे बारह रुपये जो वसूल करने होते थे।

कोई पार्क, कोई सिनेमा, कोई बाजार, कोई रोड, कोई कालोनी नहीं छोड़ी हमने जिसपर हमारे कदमों की छाप न पड़ी हो। लेकिन थे हम वैजीटेरियन शुरू से ही, फ़ूलों की खुशबू ले लेते थे लेकिन तोड़ते मरोड़ते नहीं थे। ऐसे में पहली बार दोस्तों के साथ  ट्रेड फ़ेयर में गये।

घूमते रहे इरादतन, गैर-इरादतन। जब थक गये तो बैठने  की जगह देखने लगे।   एक पैवेलियन के निकास द्वार के पास  फ़र्श में एक फ़ाल्स स्टेप था, होगा सिर्फ़ दो इंच का। एक लंबा सपाट गलियारा, एक्दम समतल और उसके बाद अचानक ही फ़र्श में थोड़ा सा गैप था। अपनी निगाह तब  ऐसी जगह पर बहुत पड़ती थी, जहां  something happening होने के चांस हों। वहीं अड्डा जमा लिया। यार दोस्तों ने बहुत कहा कि किसी लान में बैठेंगे लेकिन हमने तो वहीं साईड में एक रेलिंग पर बैठने की जिद की और सिर्फ़ पन्द्रह मिनट का समय मांगा कि अगर यहाँ बैठने में मजा न आया तो सबको पार्टी पक्की।

हमारी पिछली इलैक्शन ड्यूटी के दौरान एक साहब आये, आकर रौब से परिचय दिया ’I am observer’      बताओ जी, कैसी बीती होगी हमपर?  हम बचपन से ऑब्जर्वर चले आ रहे हैं और यहाँ हमें ही हूल दे रहे हैं साहब अपने ऑब्जर्वर होने की।    तो साहब, उस दिन रेलिंग पर बैठे बैठे अपनी मंडली  के साथ ऐसी ओब्जर्वेशन कीं कि इसरो वाले भी क्या करते होंगे। पेश है कुछ नमूने-

- जो बुजुर्ग या अनुभवी टाईप के थे, उनमें से एक भी उस जगह पर नहीं लड़खड़ाया। धीरे धीरे सधी चाल से ऊपर नीचे देखकर चलने वाले लोग छोटी मोटी मुसीबतों को पहले ही भाँप लेते हैं।

- जो उच्छृंखल टाईप के नौजवान थे, चलते किधर और देखते किधर थे, उनमें से आधे से ज्यादा वहाँ आकर डगमगा जाते थे – फ़िर अपनी झेंप मिटाने के लिये साथी के साथ धौल धप्पा करने लगते कि तूने धक्का दिया है।

- नौजवानियाँ(गलती शल्ती हो तो झेल लेना जी, भाषा-ज्ञान  हमारा ऐंवे सा ही है) जो अपने स्वाभाविक वेशभूषा में थीं, वे सहज रहीं और जो फ़ैशन के चक्कर में चोला बदलने की कोशिश में थी उनमें से अस्सी प्रतिशत वहाँ आकर झटका खा गईं। इतना जरूर है कि उन्हें संभालने वालों की कोई कमी नहीं थी, मिजाजपुर्सी करने वालों की कोई कमी नहीं थी। क्या बालक, क्या बूढ़े, क्या जवान, क्या कुंवारे और क्या उम्रकैदी – जरा सा स्कोप देखते ही सहारा देने को, संभालने को, मदद करने को तत्पर। और जितने ज्यादा पूछने वाले हों, उतनी ही हाय-हाय ज्यादा।

- जूनियर ब्लॉगर्स की तर्ज पर जो बच्चा दिल वाले गिरू फ़िसलू थे, वे लड़खड़ाते थे तो अगले ही पल सब भूलभालकर फ़िर रंगीनियों में, आपाधापी में खो जाते थे, यथास्थिति फ़ौरन बहाल हो जाती थी उनकी।

लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता आपको कि  ये सब चीजें हमारी लाईफ़ में भी घटित होती रहती हैं।  हम अपनों की कदर तभी करते हैं, जब थामी हुई उनकी उंगली छूट जाये। जिन्दगी के सभी सुख मौजूद रहते हुये भी मन उचाट रहता है, फ़िर मालूम चलता है कि असली सुख तो उस सहारे में था न कि इस दुनिया की रंगीनियों में। और  कभी बहुत समय तक समतल रास्ते पर जिन्दगी चलती रहे तो हम लापरवाह हो जाते हैं, थोड़ी सी भी परेशानी आई जैसे फ़र्श में डेढ-दो इंच का गैप, तो लड़खड़ा जाते हैं। अपनी मानसिक स्थिति के अनुसार ही हमारी प्रतिक्रिया होती है। मैंने देखे हैं ऐसे उदाहरण भी कि कोई बड़ी से बड़ी मुसीबत भी हंसकर झेल जाता है और हम जैसे भी हैं कि थोड़ी सी परेशानी भी भारी लगती है। कोई अपनी दूरदृष्टि के चलते आने वाली मुसीबत से बचने का उपाय कर लेता है, कोई गप्पबाजी और बेकार की बातों में व्यस्त रहकर जमीनी सच्चाई को भूले रहता है और फ़िर चोट खा जाता है। कोई बात का बतंगड़ बना लेता है(हम हूँ ना?)    और कई बच्चों की तरह दिमाग की स्लेट से सब पोंछ-पांछ कर फ़िर से तैयार, नये झटके झेलने के लिये।

अब ज्यादा बोर आज ही कर दूंगा तो फ़िर कौन आयेगा जी यहाँ?  ऐसे ही कभी एक रिपोर्ट आपके सामने एक कस्बे की नुमाईश की दी जायेगी, कुछ हमारी सेल्फ़ डेराईव्ड ओबजर्वेशन्स के साथ। फ़िर करियेगा फ़ैसला, बड़े शहर के मेले मस्त होते हैं या छोटी जगह पर होने वाले ऐसे आयोजन ज्यादा अच्छे होते हैं। लेकिन अब पेंडिंग काम बढ़ते जा रहे हैं, इसका भी बोझ दिमाग  पर रहने लगा है। एक नन्हीं सी जान और कितने बोझ, अल्लाह जाने क्या होगा आगे?      अपना तो जी फ़िर वही आखिरी जवाब  है,  देखी जायेगी…..

:) फ़त्तू का छोरा पढ़न खातिर चंडीगढ़ में रहने लगा था। फ़त्तू पहले बार मिलने गया तो छोरा उसे सैक्टर सत्रह की मार्केट में ले गया। वहां जब फ़त्तू ने देखे चलते फ़िरते बुत, रूप के खजाने, हुस्न के लाखों रंग,  तो उसके दीदे फ़टे के फ़टे रह गये।
फ़त्तू छोरे से पूछने लगा, “रे, यो के सैं?”
छोरा,   “लुगाई सैं, और के होंगी?”
फ़त्तू, “यो सारी लुगाई सैं?”
छोरा, “हां बाबू, लुगाई सैं”
फ़त्तू ठंडी सांस भर के बोला, “वाह री म्हारी किस्मत, आज बेरा पटया कि लुगाई ईसी होया करें, म्हारी तो सारी उमर भैंस गेल ही कट गई।”

फ़त्तू गांव लौटकर रूखी सूखी खायेगा और ठंडा पानी पीयेगा।