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शनिवार, सितंबर 25, 2010

बिछड़े सभी बारी बारी-५






भाग-१भाग-२,  भाग-३भाग-4 और  अब आगे झेलिये

सुबह के लगभग आठ बज गये थे और हम झिलमिल गुफ़ा के बाहर बने खोखों में चाय पी रहे थे और साथ में कुछ खा भी रहे थे जिन्हें दुकानदार पकौड़े बता रहा था। आगे का चार्ज अब भोला को सौंप दिया गया था। भोला ने दुकानदार से वापिस जाने के  रास्ते के बारे में पूछा। दुकानदार बोला, “यहाँ से ऋषिकेश जाने के दो रास्ते हैं।” भोला बीच में ही बोला, “ओ यार, दो रंग ते दो रस्ते प्यार दे  पता है सानूं, ओ रस्ता बता जिसदे आसपास तीन चार किलोमीटर तक कोई मन्दिर न हो, इन बंदों का पता ठिकाना नहीं कुछ।” फ़िर जैसा कि पता चला, एक रास्ता तो वही था जिसपर चलकर हम पहुंचे थे, दूसरा एक कच्चा रास्ता था जो जंगल में से होते हुये गंगा बैराज के पास निकलता था। उसी lesstrodden रास्ते पर चलने का फ़ैसला करके हम चल पड़े।
वापिसी में और भी कई टोलियाँ मिलीं, थे लगभग सारे ही छड़े। ये सारा रास्ता उतराई का था तो मुझे लग रहा था कि वापिसी में कोई दिक्कत नहीं आयेगी। अब जो हालत हो रही थी तो विजय सिंह की वो गज़ल याद आ रही थी, ’कल जो पी थी अजी ये तो उसका नशा है, तुम्हारी कसम आज पी ही नहीं’।  पिछली सारी रात जो पहाड़ों में चलते रहे थे, अंधेरी रात, ठंडी हवायें, कोई इंसानी कोलाहल नहीं, और मंजिल तक पहुंचने का रोमांच और सबसे बड़ी बात ये कि भीड़ का हिस्सा न बनकर कुछ अलग चलने और अलग से कुछ करने का थ्रिल, उस समय तो कुछ महसूस नहीं हो रहा था लेकिन अब उतराई में भी पैर कहीं रखते थे और पैर कहीं पड़ता था।  भोला रूट इंचार्ज तो बन गया था लेकिन इस परेड में हमारी पोजीशनिंग वही थी पुराने वाली। भोला कहने लगा, संजय बाऊ दे मैं अग्गे नहीं चल सकदा और लोक दे पीछे नहीं रैणा। मतलब, हरावल दस्ते में मैं, बीच में भोला और कवर अप देते हुये आलोक, असली बात उसका ये  डर था कि कोई जानवर कहीं आकर हमला न कर दें। अपन आगे इसीलिये थे कि काश इसका सोचा सच हो ही जाये और खुदा की कसम मजा आ ही जाये। खैर एक्दम पथरीला रास्ता था, ऊबड़ खाबड़। जंगल कुछ घना नहीं था लेकिन फ़िर भी माहौल तो अच्छा सा था ही। एक जगह पर आये तो देखा कम से कम तीस चालीस लड़के इकट्ठे होकर रुके हुये हैं एक जगह।  पास जाकर देखा तो रास्ते को घेर कर लंगूरों का एक जत्था बैठा था जैसे हर दूसरे तीसरे दिन हमारे देश में  चक्का जाम होता रहता है।  अब लड़के तो लड़के, कोई हुश्श शुश्श करता तो उधर से वो काले मुंह वाले भी दांत पीसते। एक लड़के ने एक पेड़ की टूटी हुई टहनी  उठाई और जैसे ही उस झुंड की तरफ़ फ़ेकंने लगा, भोला ने बहुत गुस्से से उसे डांटा और फ़िर हमुमान चालीसा पढ़ने लगा। सच कहूँ, तो मुझे खुद अजीब सा लग रहा था लेकिन उसमें श्रद्धा बहुत है, और हर धर्म और हर देवी देवता के  बारे में। लड़कों को समझाया कि शरारत न करें और पांच सात मिनट बाद रास्ता क्लियर हुआ।
अब पहाड़ी रास्ता लगभग खत्म हो गया था, ढलान भर रह गई थी। दोनों तरफ़ ऊंची ऊंची घास, इतनी ऊंची की  छोटा मोटा हाथी  तो दिखे भी नहीं, इसीलिये शायद हाथीघास कहते हैं उसे। अब हमारी व्यूह संरचना छिन्न-भिन्न हो गई थी, क्योंकि दिन निकल आया था अच्छी तरह और जंगली जानवरों का खतरा अपेक्षाकॄत कम हो गया था। ऐसा ही तो होता है हम अबके साथ, किसी आसन्न संकट के समय हम चौकन्ने होते हैं, और संकटकाल के बाद या शान्त समय में लापरवाह और हमारी इसी गफ़लत का फ़ायदा शरारती लोग उठा जाते हैं। खैर, अब हम लोग थके हुये थे, हंसी-मजाक वगैरह भी न के बराबर हो रहा था और रास्ता बहुत लंबा लग रहा था। कोई थक जाता तो बिना किसी से कुछ कहे थोड़ा सा सुस्ता लेता और फ़िर जो आगे निकल जाता वो इंतज़ार करता और इस बहाने सुस्ता लेता। ऐसे ही एक समय में भोला पीछे रह गया, एक मोड़ पर मैं और आलोक खड़े उसे देख रहे थे। कुछ देर में वो दूर से तेज तेज कदमों से  आता दिखाई दिया।  आलोक ने मुझे इशारा किया और हम थोड़ा सा घास में होकर खड़े हो गये। भोला ने मोड़ पार किया, आगे दूर दूर तक कोई नहीं दिखा और भोला ने एकदम से फ़र्राटा भरा और भाग लिया। अच्छी से अच्छी मेक की गाड़ी फ़ेल हो जाती उसकी एक्सेलेरेशन देखकर।  जब तक हम घास से बाहर निकल कर उसे पुकारते, तब तक हमारा देसी ’ओसान बैल्ट’  सीमा रेखा से बाहर पहुंच चुका था।
अपनी वो पेट दर्द और पीछे पुलिस वाली पोस्ट तो याद ही होगी आपको, कुछ वैसा ही सीन था। मैं और आलोक अब आराम से चलते हुये बैराज की तरफ़ बढ़े और सोच रहे थे कि हमारा स्वागत किस अंदाज में होगा। लो जी, शिव-शंभू, शिव-शंभू करते हमारा रास्ता खत्म हुआ, गंगा के किनारे एक स्टाल बना हुआ था, जिसकी हालत पिछली शाम से देखी गई सभी दुकानों से बेहतर थी और हमारा भगौड़ा भोला   ब्रैड पकौड़े खा रहा था। हमने उससे पूछा कि भागा क्यों, तो हमीं पर इल्जाम लगा दिया कि हम उसे अकेले को छोड़कर भागे थे और वो हमें पकड़ने के लिये भागा था और फ़िर उसने ब्रैड-पकौड़े की कड़ाही के पास ही आकर दम लिया था। मैंने कहा, फ़िर खाना भी यहीं खा लेते हैं, टाईम तो हो ही रहा है, लेकिन उसने वीटो लगा दिया कि इस दे कोल भरथा नहीं हैगा। अब साहब,एक बेगुणी चीज के लिये ऐसे गुणीजन को नाराज करना हमारे भुरभुरे स्वभाव के विरुद्ध था। उसे लेकर बाजार में आये, एक ढाबे से उसकी पसंदीदा डिश के साथ खाना खिलाया। कुछ देर आराम करके हरिद्वार को वापिसी, और रात में ट्रेन पकड़ी और लौट के …………..।
मैं फ़ोन या दूसरे संपर्क  के मामले में बहुत आलसी, चूज़ी और जो जो नैगेटिव गुण हो सकते हैं, उनसे लबरेज हूँ। मैं नहीं करता फ़ोन, लेकिन उसका फ़ोन अब भी हर दस पन्द्र्ह दिन बाद आ जाता है, ’कदों चलना है दुबारा?”  शेर के बच्चे ने पेंशन ऑप्शन नहीं दिया ’कौन करेगा जी हर महीने बैंक वालों के दर्शन?’इक्को वार पी.एफ़. लैके चले जाना है।” पी.एफ़. में अभी तक नोमिनेशन नहीं किया किसी का। सनझाता था मैं तो आखिर में इस बात पर तैयार हुआ कि मेरा नाम लिखवा देता है, अब मैं मुकर गया। जिम्मेदारी से मुकरने में वैसे ही बड़ा नाम है अपना। फ़ोन पर एक और ताकीद हर बार करता है, “बच्चों पर गुस्सा न करना।”  अपने बच्चों को प्यार भी नहीं कर सकता और दूसरों को सीख देता है। आखिर में फ़िर वही सवाल, “कदों चलना है हरिद्वार दुबारा?”  उसे तो झूठमूठ कह देता हूँ हर बार कि आ रहा हूँ अगले महीने, छुट्टियां बचा कर रखे और वो यकीन भी कर लेता है लेकिन मैं ही कहाँ निकल पाता हूँ अब?
लेकिन जाना जरूर  है एक अनजाने और लंबे  सफ़र पर, जिसकी कोई मंजिल  नहीं  और हर अनछुई और अनजानी जगह मंजिल हो, देखते हैं कब निकलना होगा। अपनी डैडलाईन  ज्यादा से ज्यादा २०१५ तक तय है, बाकी तो देखी जायेगी।
अगर आप सबको घुमक्कड़ी का शौक है या यात्रा संस्मरण अच्छे लगते हैं तो इस ब्लॉग, मुसाफ़िर हूँ यारों  पर नजर जरूर डालियेगा। बंदा एक मौलिक घुमक्कड़ है, सिंपल, जमीन का आदमी, मस्त। मुझ सहित कुछ लोग इसे घुमक्कड़ी का ब्रांड एम्बैसेडर कहते हैं और अगर आप इन महाराज की सारी पोस्ट्स पढ़ लें, तो शायद आप भी मान जायेंगे। एकदम सादगी से, बिना लाऊड हुये कहीं भी और किधर भी चल देना, मेरी नजर में तो परफ़ैक्ट घुमक्कड़ है।
पहले सिर्फ़ महिला ब्लॉगर्स से माफ़ी मांगी है, आज हिन्दी-ब्लॉगर्स से अग्रिम माफ़ी का अभिलाषी हूँ।
:) सफ़र में फ़त्तू महाराज को रात हो गई। एक मकान दिखाई दिया तो दरवाजा खटखटाने पर मालकिन जी बाहर आईं। सारी बात सुनने के बाद उन्होंने सहानुभूति तो दिखाई लेकिन साथ ही कहा कि इनके पति घर में नहीं हैं, कमरा एक ही है  और वे अकेली हैं। चरित्र पर इस तरह से शक किये जाना  फ़त्तू को बहुत नागवार गुजरा। उसने महिला से कहा, “देखिये जी, मैं एक हिन्दी-ब्लॉगर हूँ।  आप सबको एक नजर से मत देखिये। मैं एक शरीफ़, इज्जतदार इंसान हूँ, कोई ऐरा गैरा नहीं। पिछले लगभग दो साल से मैं हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ। मेरे देश विदेश में इतने फ़ॉलोअर्स हैं, इतने कमेंट मुझे मिलते हैं, ऐसा और वैसा।” इतना सुना दिया अपने हिन्दी ब्लॉगर होने पर कि महिला को उन्हें शरण देनी ही पड़ी। बातचीत चलने पर महिला ने बताया कि छोटी जगह है, ज्यादा खर्चे हैं नहीं, एक छोटा सा पौल्ट्री फ़ार्म है, गुजारे लायक कमाई वहाँ से हो ही जाती है। खैर, फ़त्तू अग्निपरीक्षा से सकुशल पार हुआ और  सुबह जाते समय फ़त्तू ने पौल्ट्री फ़ार्म पर नजर डाली तो मुर्गे और मुर्गियों की लगभग बराबर संख्या देखकर महिला से कहा, “ मेरी जानकारी के हिसाब से इतनी मुर्गियों के साथ इतने मुर्गे पालना बेकार है। एक मुर्गा रहने पर भी आपका इस साईज का पौल्ट्री फ़ार्म बखूबी चलेगा। महिला बोलीं, “जी,आप ठीक कहते हैं, लेकिन आप को गलती लगी है। इनमें से मुर्गा तो एक ही है, बाकी सारे तो हिन्दी-ब्लॉगर्स ही हैं।”
बहुत हो गई जी कुक्क्ड़-कूं, आज के लिये इतना बहुत है। गाना सुनिये सीनियर बर्मन साहब की आवाज में, हम करते हैं सफ़र की तैयारी।