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रविवार, फ़रवरी 20, 2011

डिफ़रेंट बैंड्स - समापन कड़ी


पिछला भाग

पता नहीं, ध्यान नहीं दिया साथी लोगों ने या फ़िर इग्नोर कर दिया, मैं थोड़ा दूर था, सुना तो मैंने भी और नागवार भी गुजरा। फ़िर उसने दो तीन बार वही जनाना-मर्दाना वाली बात की और कहता ही रहा। जीतू को  जोश आ गया, “आ जा कौन सा खेल खेलेगा, फ़्लैश? आ जा।”

लो जी उतर गया राकेश कुर्सी से और बाकी सब हट गये पीछे। अब वो फ़िर से बिदक गया। “दो लोगों में क्या मजा आयेगा? चाल बढ़ाने वाला कम से कम एक तो और हो।” कोई नहीं माना।  मैं थोड़ा दूर जरूर था लेकिन जब जीतू ने भी कहा कि हां, चाल बढ़ाने वाला तो चाहिये कोई, एक है तो सही लेकिन पता नहीं किसके ख्यालों में खोया हुआ है, तो उठना ही पड़ा। वैसे भी जिसे याद करने की कोशिश कर रहा था, उसका नाम ही स्साला याद नहीं आ रहा था:)  यूँ भी किसी क्षेत्र विशेष के हारे हुये जुये में बहुत लक्की होते हैं,  और यहां तो मर्दानगी का सर्टिफ़िकेट भी अग्रिम में मिल रहा था। अपनी जीत पक्की।

“ले प्यारे, चाल बढ़े न बढ़े, ताल से ताल जरूर मिलेगी।” जीतू के साथ अपना वैसे भी ताल से ताल मिला वाला पुराना आंकड़ा था। नई नई नौकरी थी, पचास पैसे प्वाईंट फ़िक्स करके खेल शुरू कर दिया, स्टैंडर्ड इतना ही था जी हमारा तब(अब उतना भी नहीं रहा)।  बिल्लियों की लड़ाई में बंदर वाली बात करते हुये लगे हाथ एक ओर्डानेंस पास कर दिया हमने कि जीती गई रकम से आज का डिनर और उससे पहले और बाद के सब कार्य संपन्न किये जायेंगे। इस बहाने से सबके स्वास्थ्यवर्धन का हीला भी बनाया गया। पैदल चलने से पुट्ठे पुष्ट हो जायेंगे और बाहर की हवा से फ़ेफ़ड़े खुश हो जायेंगे। बाकी सब बोनस….।  सारे हैप्पी हैप्पी हो गये जी, दर्शक भी और तब के खिलाड़ी भी।

शुरू में बहुत जीता बिहारी बाबू, कह सकते हैं जिताया गया।  जीत्तू हमारा एकदम टिपिकल हिन्दी फ़िल्मों के हीरो की तरह  पहले पिटता रहा, फ़िर जो धुनाई शुरू की तो बस पूछिये मत।  साईड  हीरो तो हम थे ही,  या यूं कहिये मुख्य गायक के साथ संगत देने वाले।  राकेश  जितने जीता था, वो हारा सो हारा,   पल्ले से ढाई सौ रुपये और गंवा बैठा। हमारी उस समय की सैलरी का लगभग पन्द्रह प्रतिशत!   राकेश का चेहरा देखकर दया आने लगी थी और बाकी सब फ़ोकट में तमाशा देख रहे थे।   सब उसकी ऊंची ऊंची बातों से और हर बात में नखरे दिखाने की आदत से  भरे बैठे थे। कोई अमीर है तो किसी को खाने को नहीं देता।    जीतू ने पूछा राकेश से, “देख ले भाई अपनी जेब की गुंजाईश, तुझे तो अभी तनख्वाह भी नहीं मिली है।”  राकेश के आंय बांय करने पर उसने पत्ते पैक कर लिये और डिक्लेयर कर दिया पैक-अप और कंपनी को मार्च करने का आर्डर मिल गया।
लो साहब, चल दी टोली अपनी रोज की आवारगी पर।  शहर में पहुंच गये तो डिनर से पहले का कोर्स पूरा करने को सूप वगैरह की कोई रेहड़ी तो थी नहीं, जूस वाले के पास जाकर जूस का आर्डर किया। पेमेंट की बात आई तो राकेश बाबू कहने लगे कि अभी आप कर दीजिये पेमेंट, फ़िर हिसाब करते हैं। अपने को तो खैर कोई दिक्कत नहीं थी इसमें, काहे कि रैपूटेशन बहुत शानदार थी अपनी। घर से निकलते तो पान वाला,   किराने वाला, सब्जी वाला, फ़ल वाला, जूस वाला, हलवाई, धोबी, नाई कहिये तो हर तबके के लोगों से नमस्ते मिलनी शुरू हो जाती थी(सबके पैसे दाब रखे थे:))     और पिछली वसूली करने के लिये अगली उधारी नहीं बंद होनी चाहिये, हमरी न मानो तो मनमोहना से पूछो। विश्व बैंक, मुद्रा-कोष सब जगह ऐही फ़ार्मूला चलदा है। पिछला कर्जा वापिस लेना है तो नया खाता चालू करो।

तो जी हम उस समय कुटिल नहीं थे, हम तो लिखवा ही देते अपने खाते में, लेकिन जीतू अड़ गया। आखिर आधा घंटा पहले ही मर्द होने का अवार्ड मिला था उसे। राशन पानी लेकर चढ़ गया राकेश पर, दोस्तों में जो नहीं कहना चाहिये वो तक कहने लगा। राकेश का पहला बहाना था, हम आने से पहले कपड़े नहीं बदल पाये, पैसे दूसरे कपड़ों में रह गये हैं। जवाब मिला, “ये तेरी सरदर्दी थी, तुझे देखना था। अब जाकर ले आता हूं मैं। तुम सब यहीं रुको।”  राकेश ने रोक लिया,  “अभी हैं भी नहीं इतने पैसे, सेलरी मिली नहीं है न अभी।”  जवाब मिला, “बात तय करने से पहले सोचनी थी अपनी गुंजाईश। क्यों खेला इतना दाँव?”   राकेश बोला, “हम तो मजाक कर रहे थे।”    जीतू के साथ राजा भी कूद पड़ा, “अब हम मजाक करेंगे। तेरा कुर्ता  उतारकर इस जूस वाले के पास रखा जायेगा। पायजामा ढाबे वाले के पास। बनियान पान वाले के पास और फ़िर किसी की कुछ मीठा खाने की इच्छा हुई तो हलवाई के पास भी….।”   फ़ौजी भाई भी अपने पिक्यूलियर नाश्ते की इतनी आलोचना सुन चुका था कि इस योजना को मूक समर्थन दे रहा था। लगे हाथों वो भी कह उठा, “कल नाश्ता भी तू बनाईयो और बंक में ले जाण खातिर रोटी टिक्कड़ की भी तेरी जिम्मेदारी।” 

सबको सीरियस देखकर राकेश गिड़गिड़ाने लगा, “भूल हुई हमसे, इस बार बात जाने दीजिये।”  सबका एकमत से फ़ैसला था, “नो रिलैक्सेशन।” वो रोने को हो आया। हो हुज्जत देखकर बगल के पी.सी.ओ. का मालिक आ गया, चिंटू। हमसे तीन चार साल छोटा था, लेकिन बैडमिंटन खेलता था हमारे साथ और अपना खास बंदा था एस.टी.डी. के चक्कर में:)  सब देखकर मुझसे कहने लगा, “भाई साहब, जान छुड़वा दो बेचारे की। गरीब आदमी है।” हम थोड़ा सा मौका-ए-वारदात से अलग होकर बात कर रहे थे,  मैंने कहा, “वाह बेटे, मोहब्बत हमसे और हिमायत इसकी? ये गरीब दिखा तुझे, जानता नहीं तू इसको। बड़े तगड़े घर से है, आढ़त,  ठेकेदारी, प्रिंटिंग प्रैस, बाग-बगीचे हैं इनके। सिनेमाहाल में भी हिस्सेदारी है इसकी।”  चिंटू बोला, “भाईसाहब, बाकी सब मैं नहीं जानता। हाँ, सिनेमा हाल वाली बात के बारे में जानता हूँ कि इसके पापा वहाँ गेटकीपर हैं। मेरे यहाँ से फ़ोन करता रहता है, इसलिये जानता हूँ।” मैं गया, उसे  घेरे से निकालकर लाया और चिंटू के सामने उससे पूछा, “उस सिनेमा हाल का नाम बताओ जिसमें  तुम्हारे परिवार की हिस्सेदारी है।”  वो फ़ूट फ़ूटकर रोया, “मैं सब बता दूँगा साफ़-साफ़, अभी मुझे इन से बचाईये।” कह दिया जी हमने अपनी टोली से कि इसका बाकी मुकदमा अड्डे पर लौटकर, अब कोई कुछ नहीं कहेगा। मुश्किल से आज मौका हाथ आया था सबके, मन मसोसकर रह गये थे सब। असंतोष था साथियों के मन में, आपस में बातचीत न के बराबर हुई।  उस दिन जैसा बेस्वाद खाना हमने कभी नहीं खाया। सिगरेट भी एकदम मीठी लगी उस दिन, बेस्वाद।

लौटकर फ़िर से वही पैसों के हिसाब किताब की बात छेड़ी जीतू-राजा ने और अब मुझे चुप रहने की हिदायत देकर सारे कपड़े और बैग झाड़ा उसका, चिल्लर वगैरह मिलाकर एक सौ सत्तर-अस्सी रुपये निकले। बकाया रकम के बराबर की जली कटी सुनाई गई और वो आंसू टपकाता रहा। सुबह ऑफ़िस के लिये निकले तो अपना इकलौता बैग उसके कंधे पर था। लंच से पहले उसके पैसे उसे लौटा दिये मेरे दोस्तों ने, दिल के बुरे नहीं थे|    दोस्तों में अपना इतना कहना काफ़ी था कि बहुत हो गया ड्रामा अब इसके पैसे इसे लौटा दो, नहीं तो मैं अपने पास से दे दूंगा। सबक सिखाना जरूरी भी था और आज तक उन सबको ये नहीं मालूम कि उसके घर के असली हालात क्या थे। राकेश ने आंख नहीं मिलाई लेकिन पैसे ले लिये। अपनी तरफ़ से भाषण दे दिया उसे कि झूठी शान कभी कभी महंगी पड़ जाती है। और जुए जैसी चीज तो जो न करवा दे वो थोड़ा।

दोस्तों में  किसी को याद भी नहीं होगी अब उसकी, हफ़्ते दस दिन के लिये ही आया था हमारी जिन्दगी में।  बाई चांस कुछ दिन में ही उसका ट्रांसफ़र हमारे हैड आफ़िस से एक ब्रांच में हो गया था तो रोजाना का इंटरैक्शन भी खत्म हो गया। मेरे पास कभी कभी फ़ोन जरूर आ  जाता था। उस ब्रांच से जब कोई स्टाफ़ आता था तो अपने बिहारी बाबू का हालचाल जरूर पूछते थे हम। और जब सामने वाला बताता था कि यार, है तो वो बहुत तगड़े घर से, आढ़त,  ठेकेदारी,  प्रिंटिंग प्रैस,  बाग-बगीचे , ट्रांसपोर्ट और पता नहीं क्या-क्या  हैं उसके परिवारवालों के, सिनेमाहाल में भी हिस्सेदारी है  बस हरकतें टुच्ची सी हैं उसकी,      तो मेरे यार बहुत हँसते थे। अच्छा! ट्रांसपोर्ट भी खोल ली उसने?      मैं शायद उदास हो जाता था(बहाना भी तो चाहिये होता है गमजदा होने या दिखने के लिये:) ),   हम दुनिया वालों ने ही सिखाया होगा न उसे कि खुद को एक ब्रांड की तरह न दिखाये तो उसकी कदर नहीं होगी।  

ये सब लिखने का मतलब राकेश या उस जैसे लोगों की आलोचना नहीं, सबके अपने सच हैं और अपने विश्वास। और अपना तो यही मानना है कि वो आसानी से बदलते भी नहीं।  सबको अपने अपने सच, अपने यकीन, अपने मूल्य और अपनी मान्यतायें मुबारक। मैं लिख रहा हूँ तो अपने नजरिये से लिखा मैंने, राकेश बाबू कहीं लिख रहे होंगे तो अपने नजरिये से हमें बेवकूफ़ बनाने के किस्से लिख रहे होंगे या सुना रहे होंगे।

खैर, हमारा साथी तो नहीं ही बदला लेकिन मैं बदल गया। आजकल जमीन से थोड़ा ऊपर होकर चलता हूँ,  बात-वात करने का अहसान तो कर देता हूं दूसरों पर,  कोई  पास आने की कोशिश करे या हँसी-मज़ाक करने की कोशिश करे तो वहीं हूल दे देता हूँ उसे – ओये,  होस में रहकर बात कर। जानता नहीं है किससे मजाक कर रिया है? अब हम पैले वाली नईं रै गये, अब हम से बड्डे बड्डे नैसनल, इंटरनैसनल लैवल के बिलॉगर,  धरम करम वाले, लाज शरम वाले,  दवा-मरहम वाले  मजे लेते हैं:))  

चलो जी हटाओ ये सब, आज सुनो एक और फ़ेवरेट गज़ल