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शनिवार, नवंबर 03, 2012

जिन्दगी मिलेगी दोबारा..


1. देर रात गये राजा को माँस खाने की इच्छा हुई, फ़ौरन ही आदेश पालन की तैयारी होने लगी। माँस उपलब्ध करवाने वाले ने सोचा कि बकरे के शरीर से बाहर लटकते अंडकोष को काटने मात्र से  ही अभी का काम चल जायेगा और यह सोचकर छुरी हाथ में लेकर आगे बढ़ा। बकरा हो हो करके हँसने लगा। चकित वधिक मुँह बाये उसकी ओर देखने लगा तो बकरे के मुँह से आवाज आई, "जाने कितने जन्मों से मैं तेरा  और तू मेरा गला काटते आये हैं, तेरे इरादे जानकर मुझे  हँसी इसलिये आई कि आज से  तू नया हिसाब शुरू करने जा रहा है।" वधिक ने छुरी फ़ेंक दी और अपनी जिंदगी के असली उद्देश्य की तलाश में लग गया।

2. एक सहकर्मी मित्र  है, पारिवारिक परिचय भी है। वो और उसका दो साल  छोटा भाई शिक्षा के मामले में एकदम समान हैं। एक ही स्कूल में  पढ़े, फ़िर एक ही कॉलेज में,  कोर्स भी एक ही और यहाँ तक कि प्राप्ताँक भी बराबर। दोस्त हमारा शराब को छूता भी नहीं और उसका भाई एक भी मौका छोड़ता नहीं, एक के न पीने की और दूसरे की पीने की वजह पूछी तो जवाब भी उनकी शिक्षा की तरह एक ही आया, "बचपन से पिताजी को हमेशा ही शराब पिए हुये देखा, इसलिये...।

3. अपनी छोटी सी बच्ची का एकाऊंट खुलवाने के बारे में जानकारी ले रही एक महिला ग्राहक ने पूछा  कि आई.डी. प्रूफ़ के रूप में बच्ची का पासपोर्ट वैध डाक्युमेंट है न? इतनी छोटी सी बच्ची का पासपोर्ट? वो बताने  लगीं कि इसका पहला जन्मदिन सेलिब्रेट करने वो लोग दो तीन महीने पहले बैंकाक गये थे। और मैं सुबह शाम देखता हूँ पुल के नीचे उस गंधाते बज़बज़ाते नाले के किनारे मानव और पशु मल-मूत्र, हड्डियों और लोथड़ों, कूड़े  के बीच जाने कौन सा  खजाना तलाशते दो साल से लेकर चौदह-पन्द्रह साल तक के बच्चे।  इनका पटाया बीच यही है,  पोस्टल एड्रेस गंदानाला, बारापुला।

बकरे वाली कहानी सच है या गलत, नहीं मालूम क्योंकि इन कहानियों को तर्क की कसौटी पर कसा ही नहीं जा सकता।
दोस्त जरूर सही है जो कहता है कि पिताजी इतनी पीते थे कि मेरी पीने की इच्छा ही नहीं हुई और छोटा  भाई भी सही है जो कहता है कि पिताजी इतनी पीते थे कि देखादेखी मैं भी पीने लगा।
उस प्यारी सी महंगी सी बच्ची को नजर न लगे, जिसे उसके माँ बाप, दादा दादी और नाना नानी पहला जन्मदिन मनाने विदेश लेकर गये और इन लोकल पटाया बीच वाले बच्चों को तो नजर भी कौन लगायेगा, मस्तराम मस्ती में और आग लगे बस्ती में।

क्या चीज है जो दो जीवों के प्राप्य में इतना अंतर डाल देती है? एक जीव अपनी तन की भूख या मन की मौज पूरी करने के लिये दूसरे जीव के प्राण लेने में सक्षम और दूसरा अपने निरीह, सुंदर या उपयोगी होने की कीमत अपना जीवन देकर चुकाने को विवश, बहुत बार तो बचने के लिये विवश आँखों  से देखने के अलावा कुछ और कर सकने में अक्षम। समान अवसर, समान संस्कार  और समान उपलब्धियों के बावजूद किसी विषय पर एकदम विरोधी परिणामों का  निकलना।  एक ही जैविक तरीके से इस दुनिया में  आने वालों के जीवन में इतना वैषम्य कि एक के हाथ में छुरी और दूसरे की गर्दन पर छुरी ?

कॉलेज समय में पढ़ते हुये दोस्तों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने के इरादे से बैंक में भर्ती के या दूसरी सरकारी नौकरी के फ़ार्म भर दिया करता था, कभी सीरियसली तैयारी  नहीं की क्योंकि अपने इरादे कुछ और ही थे। नतीजा आता तो पता चलता कि जिन्होंने खूब तैयारी की थी, वो रह गये और मैं पास हो गया। दिल के बहलाने को खुद के उन सबसे ज्यादा स्मार्ट होने का मुगालता पाला जा सकता है लेकिन अपनी सच्चाई खुद को  तो मालूम ही है।  हम सब दोस्त लगभग एक ही लेवल के थे, फ़िर  ऐसा क्यों होता था?

इन सब क्यों और  कैसे जैसे सवालों के बारे में मुझे जो सबसे उपयुक्त जवाब लगता है वो है, कर्मफ़ल। यही सटीक लगता है कि इस दुनिया के चलते रहने के लिये यह माया महाठगिनी आवश्यक ही  रही होगी। हर कर्म का तदनुरूप फ़ल, अच्छा कर्म तो उसका अच्छा फ़ल और बुरा कर्म तो उसका बुरा फ़ल। बुरे परिणाम भुगतते समय तो ज्ञानबोध वैसे ही खत्म हुआ रहता है,  अच्छा फ़ल मिलने पर प्रमादवश तामसिक कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं  जिनके परिणाम भुगतने के लिये फ़िर से इसी चक्र में उलझे रहना पड़ता है। और एकाऊंटिंग सिस्टम इतना चौकस  कि हर बारीक से बारीक कर्म का लेखा हाथोंहाथ अपडेट। एक जीवन तो क्या जाने कितने जीवन और कितनी योनियों तक ये चलता रहता है, आते हैं पिछला भुगतने और नये खाते और शुरू हो जाते हैं। ’जिन्दगी न मिलेगी दोबारा’ पर  किसी तरह यकीन कर लूँ तो फ़िर शायद ’सकल पदारथ है जग माहीं’ हो भी जाये, फ़िलहाल तो इस करमहीन नर को इस बात की ज्यादा चिंता  है कि ’जिन्दगी मिलती रहेगी दोबारा’ :( 

 चलिये, फ़िलहाल समेटता हूँ खुद को नहीं तो लोग पूछेंगे कि सिरीमान जी, तबियत तो ठीक है न? :) 

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एकदम से कोई भूला बिसरा गीत याद आ जाता है और हम उसे मन ही मन गुनगुनाने लगते हैं, अचानक ही आप पाते हैं कि वही गीत रेडियो पर बज रहा है। आपके साथ कभी ऐसा हुआ है? मेरे साथ बहुत बार होता रहा है। अभी तीन चार दिन पहले पुनर्जन्म और कर्मफ़ल विषय पर मित्रों की प्रतिक्रिया जानने की इच्छा से एक छोटी सी पोस्ट लिखी थी, पब्लिश नहीं की। वही रेडियो वाली बात हो गई।इस पोस्ट का लिंक अपनी पोस्ट(जब पब्लिश हुई) में देना चाहूँगा।