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रविवार, मई 13, 2012

पैमाने कैसे कैसे? ...


कल शाम बैंक से घर लौटा तो देखा पिताजी के साथ चौधरी अंकल बैठे हैं। यूं तो पडौस में ही रहने वाले हैं लेकिन आजकल किसी के घर आना जाना विशेष काम से ही होता है जैसे शादी ब्याह का निमंत्रण देना हो या किसी की मृत्यु या गंभीर बीमारी जैसी कोई बात हो। वो जमाने अब नहीं रहे जब पडौस की रसोई की महक से अपने घर बनी दाल सब्जी अपना स्वाद खो बैठती थी और हक़ से उधर से साग मंगवा लेते थे।बगल वाले घर में बाप-बेटा या भाई-भाई या पति-पत्नी के झगडे की आवाज सुनाई पड़े तो जाकर समझाने, डांटने के लिए खून का रिश्ता होना जरूरी नहीं होता था। अब हम सब खाए, पिए, अघाए लोग हो चुके हैं, 'माईंड योर ओन बिजनेस' जितनी अंगरेजी भी जानते ही हैं।

चौधरी अंकल को देखकर थोड़ी हैरानी भी हुई और कुछ खटका सा भी लगा, आज पता नहीं कैसे इधर का रास्ता भूले हैं? मालूम चला, एकदम से तेज बरसात शुरू हो गयी थी और वो उस समय हमारे दरवाजे के सामने से ही निकल रहे थे। हँसते हुए कहने लगे, 'अन्दर नजर नजर पडी तो भाई साहब बैठे दिख गए और मैंने सोचा कि मुलाक़ात हुए बहुत दिन हो गए हैं। बारिश से भी बचाव हो गया और भाई साहब से भी राम राम हो गयी।' कुछ देर बार जाने लगे तो मेरे गाल पर प्यार से थपथपाकर गए, और बयालीस साल का मैं, उस स्पर्श को देर तक महसूस करता रहा।

जाने कितनी बार सुन चुका हूँ पापा से और दादाजी से भी इन चौधरी अंकल की कहानी, कल फिर छेड़ कर बैठ गया। मेरे दादाजी और इनके ताऊजी पगड़ीबदल भाई बने हुए थे। कहानी कहो या किस्सा, शुरुआत होती है सन सैंतालीस के पार्टीशन से। एक काफिला चला आ रहा था उस जमीन को छोड़कर जो कल तक हिन्दुस्तान ही था, उस जमीन की तरफ जो अब उनके हिस्से का हिन्दुस्तान घोषित किया जा चुका था। कितने ही पूरे परिवार और कितने ही आधे अधूरे परिवार, जवान आदमी औरत से लेकर बच्चे, बूढ़े, बीमार, विकलांग, गर्भवती महिलायें भी उस भीड़ में शामिल थे। एक आदमी बीमार था और बीमारी के चलते बार बार काफिले से पीछे रह जाता था। ऐसे ही एक मौके पर वो काफिले से कटा और कुछ लोगों के सबाब का सबब बनते हुए काट डाला गया। उसके परिवार के दुसरे लोगों के साथ उसकी गर्भवती स्त्री भी काफिले में शामिल थी, एक के जाने से कारवाँ तो नहीं रुका करते सो वो काफिला भी चलता ही रहा। जालंधर पार करने के बाद काफिला तितर बितर होना शुरू हो गया, जिसके जिधर सींग समाये वो उधर ही बसकर जिन्दगी की सलीब ढोने लगा।

दिल्ली आने के महीने भर के बाद उस महिला ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिनका जिक्र मैंने पोस्ट के शुरू में चौधरी अंकल के रूप में किया है। संक्रमण काल था, कुछ लोगों ने इनके ताऊजी जोकि घर के मुखिया थे, को अनुज-वधू, जो विवाह के साल भर बाद ही विधवा हो चुकी थी के पुनर्विवाह की सलाह दी। अपनी पत्नी और मेरे दादा-दादी की मौजूदगी में ताऊजी ने अनुज-वधु को पुत्री मानते हुए ये बात शुरू की लेकिन उस मुश्किल से बीस साल की महिला ने एकदम से उस बात को खारिज कर दिया। शादी भी हो चुकी, माँ भी बन चुकी। पति नहीं रहे लेकिन पुत्र तो है, चाहे मजदूरी करके जीवन काटना पड़े लेकिन खुद का और बेटे का पेट भर ही लेगी। बेटे ने भी कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया, पढ़ लिख कर सरकारी नौकरी में आ गया। यही हैं हमारे चौधरी अंकल। अब तो असिस्टेंट कमिश्नर की पोस्ट से रिटायर भी हो चुके, माताजी और पत्नी स्वर्ग सिधार चुकी हैं और आज भी उस परिवार की शराफत, चरित्र और विनम्रता की लोग मिसाल दिया करते हैं।

बात बहुत मामूली सी लग सकती है सबको, क्योंकि ऐसे किस्से एकाध नहीं बल्कि बहुतायत में मिल जायेंगे बशर्ते किसी के पास इन बातों के लिए समय हो लेकिन मेरे लिए बहुत अहम् है। अब और भी ज्यादा क्योंकि ब्लोगिंग जैसी चीज से वास्ता है अपना। इस कहानी के पात्रों को जब ब्लोगिंग में वर्णित पैमानों से नापता हूँ तो हैरान हो जाता हूँ। उस महिला को बोल्ड माना जाए या नहीं जिसने अपनी जिन्दगी कैसे बितानी है इस पर दोटूक निर्णय ले लिया था? क्या उसे अबला कहना नारीशक्ति का अपमान नहीं होगा? उसकी ससुराल वालों को, उसके जेठ जेठानी जिन्होंने कम से कम बीस साल तक पहले उन माता-बेटे की रोटी, कपडे की जरूरत पूरी की उसके बाद अपनी और अपने बच्चो के बारे में सोचा, इंसान माना जाए या नहीं? क्योंकि मैंने तो एकता कपूर के सीरियल्स की तरह यहाँ भी ये पाया है कि ससुराल का मतलब ही है साजिशों का घर।

और सबसे ज्यादा इन चौधरी अंकल के बारे में सोच रहा हूँ, अब कुछ ब्लोगीय बातें।

महीना भर पहले जिन दिनों पाकिस्तानी सदर अजमेर जियारत के सिलसिले में भारत आये थे और हम मेहमाननवाजी में बिछे जाते थे, उन्ही दिनों में एक अतिसक्रिय ब्लॉगर महोदय की एक पोस्ट देखी। उन दिनों फिर से चर्चाओं में आये 'हाफिज सईद' के बारे में लिखी पोस्ट, टाईटिल से लेकर कंटेंट तक उस मोस्ट वांटेड के कारनामों को इसी बिला पर जस्टिफ़ाईड करती पोस्ट थी जिनसे हमारे चौधरी अंकल और उन जैसे हजारों लाखों लोगों को होकर गुजरना पडा था। कमेन्ट किया था, लेकिन अमूमन जैसा होता है वैसे ही वो कमेन्ट बिना छपा ही रह गया।

दंगों में लूटपाट, ह्त्यायें, मार-काट, अंग भंग, शील भंग ही हुआ करते हैं, अगर इनकी वजह से किसी का आतंकवादी बनना जायज होता है तो हमारी तरफ का पलड़ा यकीनन भारी होगा। उस शख्स के घर वाले यदि दंगों में मारे गए थे, उनकी जमीन अगर लूट ली गयी थी तो पाकिस्तान से आने वाले लाखों शरणार्थी अपनी जमीनें सर पर लादकर इधर नहीं लाये थे। उनके साथ भी यही सब हुआ था और ज्यादा हुआ था। और ये सब रुका तभी था, जब उसी भाषा में जवाब मिलने लगे थे। हमारी तरफ तो इस बेसिस पर राज्यपोषित आतंकवादियों  की संख्या शायद दुसरे देश की सेना से भी ज्यादा होती।

लिंक नहीं दे रहा हूँ क्योंकि इससे हमारे ब्लॉगजगत की धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में पड जायेगी। ये शांति, सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता भी न गज़ब की चीजें हैं - एकदम से गज़ब तमाशा। एक पक्ष से भड़काऊ बाते हों तो कोई बांदा नई, इधर से उस भाषा में जवाब जाए तो एकदम से हलचल मच जाती है, वो भी पहले अपने खेमे में ही:) और यही बात है जो अपने पर और अपने समाज पर कभी गर्व करने का मौक़ा देती है और कभी शर्म का भी। गर्व इस बात का कि कम से कम सही गलत पर टोकने वाले तो मिल ही जाते हैं हमें, हम मानें या न मानें ये हमारे संस्कार लेकिन वो लोग कितने बदनसीब हैं जिनके गलत को भी सही कहना मजबूरी होता है एक पूरे फिरके के लिए। और शर्म इस बात के लिए कि अपने स्वार्थ, लोलुपता और डर को शान्ति, समरसता जैसे आवरण से ढंकते हैं हम लोग। बात बेबात जहर उगलना जरूरी नहीं लेकिन इन पक्तियों से सहमत हुए बिना रह सकते हैं क्या? -

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,
उसका क्या जो दन्तहीन , विषहीन और सरल हो।

अंत में, विकीपीडिया की विश्वसनीयता पर संदेह हो रहा है।  खोजने पर बता रहा है  कि  शुतुरमुर्ग भारत में नहीं मिलते।  कन्फ्यूज्ड अगेन, स्माईली कौन सा लगाना चाहिए,

:) या :( ?

                                                
                                                           
                                                                (गूगल से साभार )