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सोमवार, मार्च 07, 2011

शोध-पत्र....


अखबार की खबरों से उकताकर इधर की दुनिया में आये थे।, आये तो फ़िर ऐसे रमे कि अखबार वगैरह पढ़ने सब भूल गये। अब जब आते-जाते, सोते-जागते ये नैट की दुनिया हमारे ऊपर के माले में कब्जा कर गई तो जाकर स्थिति की गंभीरता का अहसास हुआ। लेकिन अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। 
पुष्ट सूत्रों ने बताया  हैं कि आजकल रात में सोते समय भी हम कभी रोते हैं, कभी हँसते हैं। उनकी बात में हमने करैक्शन किया कि सोते समय ही हम रोते हैं या हँसते हैं। ये ’भी’ और ’ही’ का जरा सा अंतर बात के मायने बदल देता है।

स्पष्टीकरण माँगा गया, “वजह बताओ, क्यों हँसे थे?”  सतर्क, सजग और सावधान सरकारें किसी भी तरह के विद्रोह को शुरुआती चरण में ही दबा लेती हैं, न कि  हमारी केन्द्र सरकार की तरह कि पहले समस्या को बढ़ने दिया जाये, फ़िर कभी वार्ता, कभी पैकेज के जरिये सुलटाने की कोशिश की जाये।  

हमने हमेशा की तरह बात घुमाने की कोशिश की, “ज्यादा तानाशाही से हालात बिगड़ते ही हैं, थोड़ी स्वायत्तता अधीनस्थ लोगों को मिलती रहे तो सही रहता है। नींद में थोड़ा सा हँस लिया या मुस्कुरा लिया गया तो ऐसा तो कोई कुफ़्र नहीं टूट पड़ा।” हमारी ओब्जैक्शन ओवररूल्ड हो गई हमेशा की तरह। 

हमने फ़िर कोशिश की, “थोड़ी सी प्रेरणा वड्डे सरदारजी से लेकर देखो। राजा बाबू को स्वायत्तता  दे रखी थी,  वो भी खुश और इनकी अपनी मोटर भी चलती  रही पम-पम। बाद में बात खुलखुला गई तो फ़ट से बयान दे दिया कि मुझे क्या पता कि ये मेरे मंत्री संतरी क्या कर रहे थे?  मेरे बयान ले लो, मेरे से कर लो पूछताछ।   मैं कहीं भ्रष्टाचार का दोषी मिल जाऊँ तो बात करना।  हो गई न ईमानदारी सिद्ध?  अब राजाबाबू पहुंच गये ससुराल, सरदारजी की कुर्सी सलामत। इसी नीति  पर चलना चाहिये।  हम अगर थोड़ा बहुत इधर-उधर तीन-पांच  कर भी लेते है  वो भी नींद में, तो तुम पर कोई इल्जाम थोड़े ही आयेगा? और अगर कोई टोक भी दे तो सरदारजी वाला  फ़ार्मूला है ही।”

लेकिन हमारा ये फ़ार्मूला भी फ़ेल हो गया। सुनने को ये मिला, “तुम लो प्रेरणा सरदार जी से, वो बेचारे  क्या अपने मन से हंसते  बोलते हैं?  इशारा मिलता है, वैसे ही कह देते हैं और देख लो फ़ल मिल रहा है, कित्ती बड़ी कुर्सी मिली हुयी है उन्हे। और देखो जरा  अपने लक्षण, बिना इशारे के हँस देते हो,  टूटा स्टूल भी नहीं मिलेगा।  वजह बताओ, हंसने का  क्या चक्कर है(पसीने आने वाली बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा गया हमसे,  SWOT analysis पक्का है)?”    

क्या बताते?  और बता देते तो किसने मानना  था कि पोस्ट पर आते कमेंट्स को देख सोच कर नींद में कोई खुश हो सकता है।

महाशिवरात्रि को कई दिन बीत चुके लेकिन असर जैसे अब तक है।  लिखना कुछ और चाहा था, लिख दिया इधर उधर का। अब करते हैं जी ’टु द प्वाईंट’ बात। इस रोज रोज की छीछालेदर से दुखी होकर हमने फ़ैसला किया कि फ़िर से पहले जैसा हुआ जाये। अखबारों, किताबों, रिसालों से दोस्ती की जाये। अखबार पढ़ने शुरू किये। ब्लॉगिंग का इतना असर तो हो गया है कि हर सीधी बात भी पेचोखम लिये दिखती है। महंगाई,  भ्रष्टाचार,  साम्प्रदायिकता, भाई भतीजावाद, हत्या, लूटपाट, चार बच्चों की मां प्रेमी संग फ़रार  जैसी बातें वैसे भी अब बोर करती हैं तो हम निकल लिये मेन रास्ता छोड़कर पगडंडियों की सैर पर।
ध्यान गया दो शोध पत्रों पर। 

पहला शोधपत्र बताता है कि मानव इतिहास में पर्यावरण संरक्षण में अभी तक का सबसे बड़ा योगदान जिसने दिया है, उसका नाम है ’चंगेज़ खान।’ अपने जीवन काल में उसने जो नरसंहार किये थे, जितने इंसानों का कत्ल किया था, उस गिनती के आधार पर गणना करके बताया गया था कि इस धरती से पता नहीं कितने क्यूबिक टन कार्बन का सफ़ाया किया था भले आदमी ने।   बताईये, कितना महान योगदान था उस का और हम सब उसे बर्बर, असभ्य, क्रूर कहकर याद किया करते रहे।  बहुत नाईंसाफ़ी हुई उस बेचारे के साथ, पता नहीं कैसे होगी प्रतिपूर्ति उसकी मानहानि की:)

अब बात दूसरी रिसर्च की।  शायद अमेरिका में  कोई रिसर्च की गई है और उन्होंने ये फ़रमान सुनाया है कि किसी के नाम का प्रथम अक्षर उस व्यक्ति के behaviour in queue का निर्णायक तत्व है। वर्णमाला के अक्षर क्रम के अनुरूप ही व्यक्ति लाईन में लगने के संबंध में  व्यवहार करता है। हमारी तो उमर गुजर गई लाईन में सबसे पीछे लगने में लेकिन लॉजिक अब जाकर पता चला है। स्कूल में थे तो बैकबेंचर, कहीं लाईन में लगने का मौका आये तो सबसे पीछे और अब तो ऐसी आदत हो गई है कि बस, ट्रेन या किसी प्रशिक्षण कार्यशाला, सेमीनार में जाना होता है तो चाहे सबसे पहले ही क्यूं न पहुंच जायें, नजर अपनी पिछली सीटों पर ही टिकी होती है, वहीं जाकर रखते हैं तशरीफ़ का टोकरा। अब तो आदत ही ऐसी हो गई है।      अपने आसपास नजर डालता हूं तो अब समझ आया कि  अभिषेक ओझा, अदा जी, अजीत गुप्ता जी, अमित शर्मा, अली सैय्यद साहब. अनुराग शर्मा जी, अरविन्द झा, अरुणेश जी, अंशुमाला जी, अर्चना जी, आशीष, अंतर सोहिल,  अविनाश जैसे ब्लॉगर्स इसलिये लाईन में हमसे इतनी आगे हैं। किसी यारे-प्यारे का नाम छूट गया हो तो E. & O.E.  ये नाम हमने सिर्फ़ उनके लिये हैं  जो आसपास हैं, दूर की नजर हमारी शुरू से ही कमजोर है:)   हम ऐंवे ही इनके लेखन की तारीफ़ किये रहते हैं, विद्वान लोगों ने जो कहीं इनका नाम अ से न शुरू करके किसी और वर्णाक्षर से किया होता तो पता चलता इन्हें आटे दाल का भाव। हम तो जहाँ हैं, मस्त हैं बल्कि सोचता हूं एक हलफ़नामा देकर नाम XANJAY  या   ZANJAY   रख लेता हूँ,  थोड़ा सा माडर्न लुक आ ही जाये:) 

खैर,  थ्योरी  दमदार लगी। कितना टाईम है यार लोगों के पास।   पता नहीं किस किस विषय पर रिसर्च करते रहते हैं। पता चला कि अमेरिका में कोई फ़ाऊंडेशन बनाकर यदि किसी रिसर्च वगैरह के नाम पर खर्च किया जाये तो उसे टैक्स में छूट मिलती है। तो इसका मतलब ये है कि टैक्स मैनेजमेंट, टैक्स- प्लानिंग, टैक्स इवेज़िंग  सब तरफ़ चलती है। कल ही एक दोस्त कह रहा था साल में 2060 रुपल्ली की छूट देकर मुखर्जी ने मूरखजी बना दिया वेतनभोगियों को। अपन आशावादी बने हुये थे, कहा ये भी न देते तो क्या उखाड़ पछाड़ कर लेते भाई?  तो भाई उदारवादीयों, वैसे तो त्वाडी गड्डी LPG(Liberalisation, Privatisation & Globalisation) पर चल रही है, बाहर के मुल्कों से थोड़ा सा सबक लेकर यहाँ भी रिसर्च वगैरह पर टैक्स की छूट वगैरह का ऐलान करो,  फ़िर देखो हमारे ब्लागजगत के जलवे। एक से एक प्रतिभा छुपी है यहाँ, ऐसी ऐसी रिसर्चें कर डालेंगे कि पनाह मांगते फ़िरेंगे सब विकसित देश और वहाँ के रिसर्चर।

तो साहब, जब तक टैक्स में छूट नहीं मिलती, आप सबको छूट है हमारी  रिसर्च से बचे रहो। जिस दिन छूट मिल गई, उस दिन देख लेंगे आप सबको:)

आज फ़िर दिखाते हैं आपको एक पुराना गाना, पसंद न आये तो हमारा नाम वही रख दीजियेगा पहले वाला:)