(डिसक्लेमर - अपना इस पोस्ट में सिर्फ नमक है, आटा पीढ़ियों का है| कहाँ आटा है और कहाँ नमक, ये अब मुझे भी नहीं पता|)
एक लड़के का पेट कुछ गड़बड़ कर रहा था, उसकी मां ने उसे एक वैद्यजी के पास जाने को कहा| वो गया और अपनी समस्या बताई| वैद्यजी ने निरीक्षण करने के बाद उसे कहा कि कोई विशेष बात नहीं है, कुछ खाने पीने में लापरवाही के चलते पेट खराब हुआ है, घर जाकर खिचडी बनवाकर खा लेना, ठीक हो जाओगे| अब वो ठहरा पुराने टाइम का और पुराने स्टाइल का बन्दा, जिसे सिर्फ खाने से मतलब रहता था| 'चूल्हा चौका संभाले घर की औरतें' मानसिकता वाला था तो उसे खिचडी के बारे में कुछ मालूम नहीं था| वैद्य जी से बार बार पूछने लगा तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा काम सिर्फ इतना है कि घर जाकर अपनी मां से यह कहना कि खिचडी खानी है, वो समझ जायेगी|
अब वो चल दिया अपने घर को, और कहीं उस डिश का नाम न भूल जाए इसलिए 'खिचडी-खिचडी' का जाप करता घर को चल दिया| अब रास्ते में पता नहीं उसने शेर देख लिया कि कोई हिरनी, ये कन्फर्म नहीं है लेकिन अब वो खिचडी की जगह 'खाचिडी-खाचिडी' बोलता जा रहा था| कोई किसान अपनी पकी फसल की रखवाली कर रहा था और ये उसे देखते हुए अपने उसी मंत्र पाठ में जुटा रहा| किसान को आया गुस्सा, उसने सोचा कि मैं तो हलकान हुआ जाता हूँ इन चिड़ियों को भगाते-भगाते और ये उन्हें 'खाचिडी-खाचिडी' कहकर उकसा रहा है| किसान उकस गया और उस लड़के की छित्तर परेड कर दी| फिर उसे समझाया कि 'खाचिडी-खाचिडी' नहीं बल्कि 'उड़चिडी- उड़चिडी' बोल|
उसने फिर से रास्ता नापना शुरू किया, अब बोल रहा था 'उड़चिडी- उड़चिडी|' कुछ आगे गया तो एक बहेलिया जाल बिछाए और दाना गिराये बैठा था| काफी देर से खाली बैठा था और इसकी 'उड़चिडी- उड़चिडी' सुनकर उसने बोहनी न होने का जिम्मेदार इसे मान लिया| जाल समेट लिया गया और बालक की फिर से हो गई छित्तर परेड| बहेलिये का आज का दिन खराब हो चुका था तो आगे के लिए उसे ऑर्डर मिला कि 'ऐसा दिन कभी न आये' का जाप करना है|
आज्ञाकारी बालक फिर से चल पडा और आगे चलकर एक और कामेडी-cum- ट्रेजेडी उसका इंतज़ार कर रही थी| किसी अभागे की घुडचढी हो रही थी, बालक के मुंह से 'ऐसा दिन कभी न आये' सुनकर घोड़ा या दूल्हा या दोनों ही न बिदक जाएँ, इस आशंका से बाराती बिदक गए और बालक के साथ CP once more हो गई| नया हुकम हुआ 'ऐसा सबके साथ हो' रटने का|
अगले पड़ाव पर किसी की शमशान यात्रा की तैयारी हो रही थी| बालक-उवाचम श्रवणयन्ति , मुर्दे को वहीं छोड़कर भीड़ ने उस बेचारे मरीज को अधमरा कर दिया गया| लंगडाता-कराहता वो घर पहुंचा तो उसकी मां ने सारी कहानी सुनकर उसको तो नहीं पीटा, अपना माथा पीट लिया|
इस कथा से बालक ने ये सबक सीखा कि वैद्य से इलाज करवाना बड़ा कष्टकारक होता है|
लोककथा है, लगभग सभी ने पढ़ सुन रखी होगी| ये जरूर हो सकता है कि अब भूल गए होंगे, मुझे बहुत पसंद रही हैं ऐसी कहानियां| आजकल शायद इनका कथन श्रवण कम हो गया है फिर भी आशा तो कर ही सकते हैं कि जैसे सबके दिन बहुर रहे हैं, इनके भी बहुरेंगे:)
ब्लॉग सक्रियता बनाए रखने के लिए आज इस से अच्छी, शानदार, सार्थक कोई और बात सूझी नहीं और हमने एक साधारण सी कहानी याद करने-कराने की कोशिश कर ली| हाजमा ठीक रखियेगा, आपको पसंद आयें न आयें लेकिन आती रहेंगी ऐसी पोस्ट्स| इस बहाने अपनी भी तैयारी होती रहेगी, काहे से कि आने वाले समय में नाती-पोता(he+single+single) को कहानी सुनाने का डिपार्टमेंट भी अपने ही जिम्मे आएगा:)
