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शुक्रवार, अगस्त 10, 2012

युगपुरुष

वो किसी राजमहल का सुसज्जित प्रसूति कक्ष नहीं बल्कि कारागार था|  आततायी सत्ता का जैसा प्रभाव बाहर समाज में  था, वैसा ही उस अंधेरी काल कोठरी में भी था| वहाँ  पसरा सन्नाटा बाहर के सन्नाटे का ही सहोदर था| यूं तो सत्ता बहुधा निरंकुशता की ही प्रतीक रही है, रामराज्य अपवाद ही होते हैं लेकिन  निरंकुशता की निरंतरता जब दिनोदिन गहरी और गाढी होती जाती है,  कभी न कभी वह क्षण आता ही है जब अन्धकार भी अपना विस्तार थामने को विवश हो जाता है| यही वह क्षण होता है जब गहन अन्धकार को चीरकर प्रकाश की एक लौ भभकती है,  एक ज्योति प्रज्ज्वलित होती है -  एक अमर ज्योति| यही वह क्षण होता है जब असुरी सत्ता के सर्वनाश का शंखनाद करता  एक युगपुरुष इस धरती पर अवतरित होता है|  

आतंक, अन्याय, दुराचार, शोषण अपने दांतों और नाखूनों से जब  मानवता को नोच खसोट रहे होते हैं, असल में वे अपने पाप का घडा स्वयं भर रहे होते हैं| अपने खोखले उसूलों को क्रूरता का जामा पहनाकर वो सामान्य जन को प्रताडित तो करते दिखते हैं लेकिन असल में वो खुद अंतर में कातर और भयभीत होते हैं और यही कुंठा उन्हें उनके कुकृत्यों के लिए बाध्य करती है| यही वह क्षण होता है जब किसी कृष्ण का धर्म की फिर से स्थापना के लिए आगमन होता है| 

उस कृष्ण का आगमन, जिसने जन-जन में उत्साह का संचार कर दिया| वही साधारण जन जो निरीह और खुद को असहाय मान कर हरदम कमर झुकाए और घुटने टिकाये सत्ता के सामने नतमस्तक होना अपना भाग्य समझते थे, अपनी और संगठन की शक्ति पहचानने लगे| 

परम्परागत आत्मनिर्भर ग्राम्य अर्थव्यवस्था को  बाजारी शक्तियाँ नष्ट करने  लगी थीं|  गाँव देहात में बहुतायत में उपलब्ध  दूध, दही,  घी का दोहन करके दुग्ध सरिता  का रुख नगरों की ओर मोड़ दिया गया  था| बालक कृष्ण ने बाल सुलभ तरीकों से समाज का ध्यान इस तरफ आकर्षित किया|

जल जैसे प्राकृतिक साधन पर कुंडली मारे बैठे कालिया नाग का मर्दन करते कृष्ण ने  अपनी प्राथमिकताएं सिद्ध कर दी| लोकोपयोगी संसाधनों पर बलपूर्वक कब्जा समाज को स्वीकार्य नहीं| 

इंद्र जैसे प्रभावशाली देवता की अपेक्षा गोवर्धन को ज्यादा मान देकर कृष्ण ने फिर से स्पष्ट  किया कि वन, भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधन हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं|

ठेठ बालपन में ही पूतना, वकासुर जैसों और फिर बाद में अग्रज बलराम की सहायता से अपने से कहीं विशालकाय चाणूर, मुष्टिक मल्लों को पराजित करके कंस के अत्याचारों को चुनौती दे दी थी कि अब अन्याय सहन नहीं होगा| 

कालान्तर में कंस वध भी हुआ और शिशुपाल वध भी| और ये सब करते हुए निर्भय कृष्ण कहीं भी अहम प्रदर्शन करते नहीं दिखते बल्कि उनकी निर्भीकता आमजन के लिए अभय का सन्देश और साथ में सखा भाव  लिए थी|  महाभारत के युद्ध में संख्या बल में भारी असमानता के रहते भी पांडवों की विजय संभव हुई तो सिर्फ इसलिए कि श्रीकृष्ण मात्र अर्जुन के रथ के सारथी ही नहीं थे, वरन सम्पूर्ण पांडव पक्ष के सारथी की भूमिका में थे|

त्रेतायुग  में राम  ने  मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया, वो उस युग की मांग थी| द्वापर तक आते आते सभ्यता ने कई रंग देख लिए|  द्वापर के इस अवतार कृष्ण  ने आवश्यक होने पर पुरातन मान्यताओं का अंधानुकरण करने की बजाय नए युग की नई मान्यताएं स्थापित कर दीं|  योग और शक्ति के  साथ कूटनीति, राजनीति को मिलाया| 

युगपुरुष किसी एक धर्म, जाति, देश के नहीं होते वरन सम्पूर्ण मानवता के होते हैं क्योंकि उनके द्वारा किये जाने वाले काम व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर सर्वजन के हित के ही होते हैं|.व्यक्तिगत रूप से तो जैसे कष्ट  उठाने के लिए ही अवतार लेते हैं लेकिन फिर भी कोई रुदन नहीं, कोई विलाप नहीं, कोई प्रलाप नहीं|  कर्तव्य हमेशा सर्वोपरि| 

गीता जैसा अनमोल सन्देश विश्व को देने वाले श्रीकृष्ण ने जिस भारतभूमि पर जन्म लिया, वह भूमि धन्य है और हम सब  धन्यभागी हैं|

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आप सबको बहुत बहुत शुभकामनाएं|