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गुरुवार, सितंबर 16, 2010

आखिर पड़ौसी ही पड़ौसी के काम आता है

"दो महीने में दीवालिया हो जायेगा पाकिस्तान, सैलरी को भी नहीं पैसे"

1. ये मैं नहीं कहता जी, वहाँ के वित्त मंत्री अब्दुल हाफ़िज़ शेख ने कहा है। और मुझसे नहीं कहा है, ये आज के   दैनिक भास्कर के एक समाचार का शीर्षक है। खबर में वही बढ़ता रक्षा खर्च और उसी अनुपात में बढ़ता कर्ज, आई.एस.आई. को दी जाने वाली भारी सरकारी मदद, भीषण बाढ़, राहत सामग्री का खुले बाजार में बिकना, कर्ज का पाकी जी.डी.पी. का आधे से अधिक होना और अंत में यह घोषणा कि हालात ऐसे ही रहे तो दो महीने के बाद  पाकिस्तान के पास कर्मचारियों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं रहेंगे।
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2. शुरू में खल वंदना हो गई, अब सुनो एक छोटा सा पुराना और बासी चुटकुला। अखबार में एक मशहूर बदमाश ने विज्ञापन दिया, "बीबी चाहिये।" तीन दिन में ही उसके पास तीन हजार से ज्यादा मेल आ गये, "हमारी वाली ले जा।"

आर्थिक परिदॄश्य पर आजकल मर्जर का जमाना है। बेशक हम अति साधारण इंसान हों, इरादे बहुत बुलंद हैं हमारे। हम भी मर्जर करेंगे, भले ही पोस्ट के स्तर पर। शेख साहब इतना तो जानते ही होंगे कि उनके देश की ये हालत क्यों हुई।  कोई बात नहीं,  आखिर पड़ौसी ही पड़ौसी के काम आता है। आपकी चिट्ठी को हम तार समझते हैं, और इस खबर को विज्ञापन, तो पैरा संख्या 1 और 2 का मर्जर करते हुये हमारी पेशकश है कि "हमारी वाली ले जा"  मतलब हमारे वाले प्रधानजी को ले जा। बहुत शरीफ़, कर्मठ, ईमानदार, फ़र्माबरदार है।   जहाँ तक हमारा अंदाजा है जरूरी काम करने से पहले भी "मैडम, मे आई गो टू......?" की आज्ञा ले लेते  हैं। आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ और जी.डी.पी. के माहिर हैं। जब हालात सुधर जायें तो भेज देना वापिस, तब तक हमारी तो देखी जायेगी।
p.s. - पुरानी कहावत है, भैंस तो गई सो गई, काटड़ू को साथ ले गई - नया जमाना है तो काटड़ू के साथ भैंस भी लेकर जानी पड़ेगी नहीं तो वांछित परिणाम मिलने की कोई गारंटी नहीं है।

:) मेरे एक प्रिय ब्लॉगर सतीश पंचम जी ने एक पात्र परिचय करवाया था - जाहिली जी। उसी से प्रेरणा लेकर आज की डोज़।
एक चोरी के मामले में फ़त्तू धरा गया। पहली से तीसरी डिग्री तक सब फ़ेल हो गये, लेकिन फ़त्तू ने जुर्म नहीं कबूला।  थानेदार ने रोटी पानी सब बंद कर दियाकि भूखा मरता तो कबूलेगा ही। तीसरे दिन तक तो फ़त्तू झेल गया, फ़िर गुहार लगाई कि मर जाऊंगा, कुछ दे दो खाने को, मैं कबूल कर लेता हूं। कस्टडी का एक दिन ही बचा था, थानेदार ने खुश होकर चाय-बिस्कुट खिलवाये। छककर खाकर जब फ़त्तू उठा तो थानेदार ने कहा कि चल अब कबूल कर चोरी तूने की थी। 
फ़त्तू:         कुण सी चोरी जी?
थानेदार:  अबे साले, पांच दिन पहले की थी तूने, इब पूछै सै कुण सी चोरी? तेरे तो अच्छे भी कबूलेंगे।
फ़त्तू:         थानेदार साहब, एक दिन और सूँ थारे धोरे, फ़ेर तो जमानत हो ही जायेगी।  पन्द्रह मिनट पहले जो   चाय-बिस्कुट खिलाये थे, वो तो कबूल करा लै पहलां, फ़ेर करियो पांच दिन पुरानी चोरी की बात। बड़े आये कबूल करवाने वाले......




गाना सुनो अज्ज पंजाबी दा, सुरजीत बिन्दरखिया दी अवाज विच्च