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रविवार, अगस्त 08, 2010

A confession - बस ये जानना और बाकी था....

आज थोड़ा हटके है जी। किसी को  जोर का झटका धीरे से लगे या धीमा झटका जोर से लगे तो सारी  जिम्मेदारी  हमारी ही है। हम कोई भारतीय रेल नहीं हैं कि कह दें ’सवारी अपने सामान की स्वयं जिम्मेदार है।’  पहले से बता देना इसलिये जरूरी है कि हो सकता है बाद में जाकर आपको अहसास हो कि  हम आज तक बेकार में ही वाह-वाह करते रहे। जिन सज्जन या सज…..   यानि कि  भद्र पाठकों की भावनायें, सम्वेदनायें वगैरह ज्यादा सेंसिटिव हों, कृपया यू-टर्न का इस्तेमाल करें ताकि बाद में और ज्यादा पछतावा न हो। जब जागो तभी सवेरा समझ लेना चाहिये।
भारतीय सिनेमा के ग्रेटेस्ट शोमैन राजकपूर ने जी जान से फ़िल्म बनाई थी, ’मेरा नाम जोकर।’  पब्लिक ने फ़िल्म को नकार दिया, दुखी होकर राजकपूर ने कहा था, ’जो मैं दिखाना चाहता था, वो पब्लिक ने नहीं पसंद किया, अब मैं वो दिखाऊंगा जो पब्लिक को पसंद है।’ बॉबी, सत्यम शिवम सुंदरम, प्रेम रोग और राम तेरी गंगा मैली जैसी सुपरहिट फ़िल्में इसी ज़िद का नतीजा थीं। किसी सामाजिक समस्या का नाम लेकर अंग-प्रदर्शन की चाशनी में पकाकर वो ऐसी डिश परोसते रहे कि पब्लिक पागल हो गई।
हमने भी एक स्क्रिप्ट लिखी है जी, थोड़ी सच्ची थोड़ी काल्पनिक। अप्रूवल हेतु प्रस्तुत है। नायक हमीं बनेंगे जी अपनी इश्टोरी के, वैसे भी या तो कुडि़यों का है जमाना या  एंटी हीरो का है जमाना। हमारे अंदर दोनों क्वालिटी हैं, गैरों के साथ कुड़ियों जैसा नरम दिल और अपनों के लिये एंटी हीरो।
मान लीजिये कि आज से लगभग अठारह बीस साल पहले हमारी इश्टोरी का हीरो  नामजद  हुआ था  एक सामूहिक ब्लात्कार के केस में। पीडि़ता का चाल-चरित्र,  भूत-वर्तमान, आसपास का माहौल जैसा भी रहा हो, खूब हो-हल्ला मचा। थाना, कोर्ट, कचहरी, धरने, प्रदर्शन , दंगा-फ़साद सब कुछ हुआ।   आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला, हमारे पक्ष के लोगों ने जो हुआ उसे सही ठहराया और दूसरे पक्ष के लोगों ने खुद के साथ हुये अन्याय की हर तरह से दुहाई दी। लेकिन सच तो यह है कि यह सब हुआ था। 
अब पेंच ये फ़ंसा जी कि कई साल के बाद हीरो की आत्माराम या जमीरखान जो भी कहते हों, जाग खड़े हुये। उसे अपनी गलती का, अपने द्वारा ढाये गये ज़ुल्मों का ऐहसास हुआ, शर्म के मारे बस डूबे नहीं। उसने पाला बदल लिया और दूसरे पक्ष की आंखों का तारा बन गया।
स्क्रिप्ट यहां फ़ंस गई है जी आकर हमारी।  कानूनी कार्यवाही चल रही है, कयामत का दिन बस आया ही चाहता है, फ़ैसले की घड़ी नज़दीक ही है। सवाल ये है  कि हीरो का यानि मेरा क्या होगा?  जो मेरे साथी  थे, उन्होंने और उनके वकील ने तो उनके निरपराध होने की दलील दी है, लेकिन मैं तो कुबूल कर चुका हूं कि मैं उस सबमें शामिल था। अगर वो सब किसी साजिश के तहत हुआ  था  या किसी क्षणिक उद्वेग का नतीजा था, मेरे पाला बदलने से क्या हकीकत बदल गई? औरों पर तो बेशक अपराध सिद्ध न भी हो, मैं तो सबके सामने जुर्म कबूल चुका हूं , तो क्या मेरा अपराध सिद्ध नहीं होता?   दूसरी तरफ़ अगर मुझे हृदय परिवर्तन की वजह से या किसी और वजह से छूट मिल जाती है तो क्या कल को कोई और शातिर इस बात का फ़ायदा नहीं उठायेगा? यह कहानी दोबारा नहीं दोहराई जायेगी, क्या गारंटी है इसकी?  पहले बलात्कार कर लेंगे, फ़िर बाद में पश्चाताप कर लेंगे।                  
इश्टोरी के इस ट्विस्ट पर आकर उलझ गया हूँ जी, अब आपसे नहीं पूछूंगा तो किससे पूछूंगा? हीरो को माफ़ी दे दी जाये या जुर्म कबूलने पर सजा का हकदार है वो? बाई द वे, इस स्क्रिप्ट पर फ़िल्म बनी तो ड्यू क्रेडिट सही टिप्पणीकार को जरूर मिलेगा।  बल्कि सारा क्रेडिट ही उसे दे देंगे, हमारी तो देखी जायेगी।                         

जारी है या  नहीं है, पता नहीं जी। बॉक्स-ऑफ़िस के ट्रैंड पर डिपैंड है सब।

:) फ़त्तू खुद को बावला कहकर बुलाये जाने से हैरान और परेशान था। एक दिन भटकते टहलते अपने गाँव से दूर किसी दूसरे गाँव जा पहुँचा। गर्मी से बेहाल, कुँये पर पहुँचा तो देखा कि एक के बाद एक लड़कियाँ, बहुयें पानी भरकर ले जा रही हैं। वो एक ओर खड़ा होकर देखता रहा और देखता ही रहा। आसपास  के कुछ लोगों की नजर भी उस पर पड़ी और उन्हें उसकी नीयत पर शक सा भी होने लगा। लेकिन एक अनुभवी बूढ़े ने उसकी नजर को देखा और पानी भर रही एक बहू से कहने लगा, “बहू, इस बावले नै पाणी तो प्या दे माड़ा सा, प्यासा सै।” 
फ़त्तू ने पानी पी लिया और बूढ़े से जाकर पूछने लगा, “ताऊ, मन्नै सब बौअला कहया करैं सैं, या बात तन्नै कुण सा बता गया?”
ताऊ बौल्या, “रै बौअले, किसै के बताण की जरूरतै न पड़ती,  तेरे जिसेयां के लच्णछ  आप ही बता दें सैं।”