शनिवार, फ़रवरी 05, 2011

इक फ़रियाद


एक बहुत पुरानी कहानी पढ़ी थी, न कहानी का नाम ध्यान है और न लेखक का, लेकिन बहुत पसंद है अपने को। उस समय यदि मालूम होता कि किसी को कभी बताने की नौबत आयेगी या कोई हमारी लिखी बात को पढ़ेगा भी, तो  याद भी रखते। खैर, कथासार बताते हैं आपको, लेखक महोदय को हृदय से क्षमा सहित धन्यवाद पहुंचे।

कहानी थी एक डाकिया जी की, जो दीन के पाबंद और पांच वक्त के नमाजी थे। वेशभूषा से,  चेहरे पर छोड़ी दाढ़ी से मानो नूर बरसता था।     उम्र अभी छोटी ही थी, लेकिन ध्यान इधर उधर न बिखरा होकर हर वक्त ऊपरवाले की इबादत में मशगूल रहता था। जहाँ रहते थे, जहाँ काम करते थे और जिस इलाके में डाक बांटने का काम करते थे, उन साहब की खासी इज्जत थी। मस्जिद की तामीर होनी हो, कोई और मजहब का काम हो, इंतजामिया कमेटी में उनका शामिल होना इस बात की तसदीक थी कि सब कुछ सही हाथों में है। कहानी की शुरुआत में दिखाया गया कि उनका डाक बांटने का इलाका बदल दिया जाता है और वो डाक विभाग के आला अधिकारी जोकि एक अंग्रेज था, के सामने पेश होकर उनसे वो तबादला रद्द करने की गुजारिश कर रहे हैं। नया इलाका चूँकि ’हुस्न का बाजार’ था, डाकिया बाबू को अपना दीन बिगड़ने का डर था, और इसी वजह से वो तबादला रद्द करवाना चाहते थे। लेकिन कहते हैं कि बेदर्द हाकिम के आगे फ़रियाद का कोई फ़ायदा नहीं होता, उन्हें भी नहीं हुआ। यही सुनने को मिला कि एक बार जाकर काम संभालिये, मौका लगते ही तबादला निरस्त कर दिया जायेगा। अब हमारे नायक ठहरे खुदा के बंदे, और कोई मजहब या धर्म रिज़क और रोजी से नमकहरामी नहीं सिखाता, वे भी बेमन से ही सही अपने काम को संवारने में जुट गये। पुराना डाकिया उन्हें साथ लेजाकर उस बाजार की सारी बसावट की जानकारी देता है, खास खास ठिकानों का खास परिचय देता है और अगले दिन से वे अपने काम में लग गये। बात पुराने जमाने की है, सच की और  सच्चे आदमी की भी इज्जत होती थी। कुछ समय बीतते न बीतते उस इलाके के चुनिंदा अड्डों में उनकी खासी पैठ हो गई।  भीतर तक पहुंच हुई, खतो-किताबत में मदद करते करते नौबत यहाँ तक पहुंची कि खास दावत वगैरह की रसोई की सुपुर्दगारी तक और खास महफ़िलों के इंतजामात तक   उनके हाथ आ गये।  और तो और, घरेलु और बाजारू मुद्दों पर उनकी अहम राय की कदर होने लगी और वक्त दौडने लगा।  कहानी के अंत में वही हाकिम का दफ़्तर, और वही फ़रियादी – साल भर पहले जो  गुहार लगाई थी तबादला निरस्त करने की, वो मंजूर हो चुकी थी।   तो साहब लोगों, वही हाकिम और वही फ़रियादी, हाकिम वैसा ही बेदर्द था जैसा पहले था और फ़रियादी का हुलिया बदला हुआ था। सफ़ाचट चेहरा, कपड़े इत्र से महकते हुये और तुर्रा ये कि इस बार भी  फ़रियाद वही पुरानी  थी कि हुज़ूर मेहरबानी करें और इलाका न बदलें, यहीं रहने दें। जनाब रच बस गये थे रंगीनियों में।

अब आप को मजा बेशक न आया हो, हमने  जब कहानी पढ़ी तो बहुत मजा आया था। लाईव फ़िल्म देखने का, कहानी या उपन्यास पढ़ने का जो मजा आता है वो समीक्षा में नहीं आता। कोई फ़िल्म देखे, साहित्य पढ़े एक जमाना बीत गया है। शहर में ले देकर एक सिनेमाघर है और कोई लाईब्रेरी नहीं। बच्चों को डीवीडी ला देते हैं, लेकिन हमारे लिये सिनेमा के पर्दे का मुकाबला ये इक्कीस इंच की स्क्रीन क्या करेगी?  अपना तो वही पुराना रवैया कायम है, या तो ’नो डिमांड    या   फ़िर नो लिमिट’ ,     बेशक  भूखे मर रहे हैं लेकिन घास नहीं खा रहे।     अकेला सहारा अखबार थे और अब तो अर्सा हो गया अखबार देखने का भी मन नहीं करता।  ये अखबार क्या खाकर हमारे ब्लॉगजगत का मुकाबला करेंगे?  ’कहीं दंगल वीर जवानों के, कहीं करतब तीर कमानों के’ वाले स्टायल में गुटबाजी, पहलवानी, राजनीति के अखाड़े  सक्रिय हैं। भोजन के छहों रस, भाव के नौ रंग, सोलह कलायें, छत्तीस श्रॄंगार, छप्पन भोज का आनंद यहाँ विद्यमान है तो ’कौन जाये ऐ जौक,  इन गलियों को छोड़कर।’

घर से दूर का तीन साल का स्टे पूरा होने में लगभग चार महीने बचे हैं, बच्चों का शिक्षा-सत्र समाप्त होने में लगभग एक से डेढ़ महीना। फ़िलहाल की प्लानिंग के अनुसार तब अपन  दो तीन महीने अकेले रहेंगे और बच्चा पार्टी(समेत उनकी मम्मी)  अपने दादा-दादी  और चाचा-चाची के पास। हमारा पी.सी. कश्मीर हुआ पड़ा है, दूसरी पार्टी कहती है हमारा है और हम कहते हैं ये हमारी जान है। वक्त से बड़ा कोई नहीं, देखते हैं किसके हक में फ़ैसला होता है। हमने खुद को नियंत्रित करना शुरू कर दिया है, पिछली कुछ पोस्ट्स से पांच दिन में एक पोस्ट के व्रत का पालन कर रहे हैं।  कहीं ऊपर बताई कहानी के नायक वाला हाल न हो जाये कि बेदर्द हाकिम के आगे फ़रियाद करते दिखाई दें कि तबादला निरस्त कर दो, अब तो मजा आना शुरू हुआ था।

ऐसा नहीं कि will नहीं है, है जरूर है, लेकिन way नहीं दिखता है।  साईबर कैफ़े में जाकर लिख सकते हैं, पढ़ सकते हैं और कमेंट भी कर सकते हैं लेकिन साल भर पहले लुधियाना में एक साईबर कैफ़े में पड़े एक छापे की याद आ जाती है तो पसीने छूट जाते हैं। पार्टीशंड केबिन बने हुये थे, शायद फ़ी घंटा दो सौ से ढाई सौ रुपया चार्ज करते थे। ज्यादा लग रहा है? है ही ज्यादा, ठगी कर रहे थे जी क्योंकि जब छापा पड़ा तो पता चला उस साईबर कैफ़े में पी.सी. ही नहीं थे। अब चढ़ते बुढापे में ढाई सौ रुपया घंटा खर्च भी करें और पी.सी. भी न बरामद हो वहाँ छापे के दौरान तो क्या मुंह दिखायेंगे?

एक दूसरा हाईवे और सूझा था कि शोले फ़िल्म की तर्ज पर कोई सूरमा भोपाली टाईप का जीव पट जाये तो हमारे बड़े भाई साहब सतीश सक्सेना जी की इनाम वाली घोषणा का फ़ायदा उठा लें। बेनामी, छद्मनामी होने का आरोप हम पर लगाकर कोई कर दे केस दर्ज, बड़े भाई तो जबान दे ही चुके हैं फ़ी पेशी पांच हजार का ईनाम।  उनकी मुहिम सफ़ल हो जायेगी, हमें नाम और दाम मिल जायेंगे, ले आवेंगे एक सैकंड हैंड कम्प्यूटर। तो जी, तलाश जारी है, इच्छुक आरोपकर्ता हमारी मेल आई.डी. पर संपर्क कर सकता है, एग्रीमेंट साईन  करना होगा। इनाम सारा हमारा और इकराम उसका जो हमें पकड़वायेगा।

आखिर में वो शेर जो एक कस्बे की नुमाईश में हलवाई की दुकान पर लिखा देखा था.

’लिखा परदेस किस्मत में, वतन को याद क्या करना,
जहाँ बेदर्द हाकिम हो, वहाँ फ़रियाद क्या करना।”

और हम ठहरे एक नंबर के येड़े, फ़िर भी फ़रियाद करते ही जाते हैं कि हुज़ूर, फ़ैसला बदल लो हमारे तबादले का, अभी तो मजा आना शुरू हुआ था:))

41 टिप्‍पणियां:

  1. जिसने भी लिखी हो बड़ी खूबसूरत कहानी है ! सायबर कैफे वाले मामले से ऐसा लगा कि जैसे बड़े साहब (हालात) ने आपका ट्रांसफर एक खास इलाके में करना तय कर लिया हो :)
    वैसे भी ,वो पार्टीशंड केबिन में ढाई सौ रुपये वाले सिलसिले सुगन्धों वाली सफाचट जिस्मानियत की जानिब ही इशारा कर रहे हैं :)

    हाकिम से ट्रांसफर की फ़रियाद कुछ यूं कीजिये कि पी.सी.कश्मीर ना होने पाए !

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  2. बहुत बढ़िया कहानी और कहानी का इशारा ...
    चिंता न करें, पी.सी. को लेकर साझी सरकार चलने दीजिए और हमें भी आपके शब्दों का आनंद लेते रहने दीजिए ...

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  3. अच्छी कहानी है जिसकी भी हो। दुनियादारी का तकाज़ा भी यही कहता है कि जहाँ जाओ वहाँ के लोगो से घुल मिल के उन्ही के जैसा बन के रहो वरना अजनबी बन के रहना होगा। मगर ये दिल भी अजीब शै है हर जगह और हर चीज से लगाव कर बैठता है फिर छोड़ने में तकलीफ होती है।

    सायबर कैफे की बात पर कहूँगा कि यूँ तो रेलोँ बसों में हादसे होते रहते हैं तो क्या हम यात्रा करना छोड़ दें? वैसे एक कहावत याद आ रही है- दूध का जला छाछ भी फूँक फूँक कर पीता है, कहीं आप भी दूध के जले तो नहीं? :)

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  4. जहाँ जाते हैं, वहीं रमने का आनन्द आने लगता है कुछ ही दिनों में।

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  5. रमता जोगी, बहता पानी :) इस ब्रांड वाला प्रवचन सुनने का मूड लग नहीं लग रहा वैसे आपका.
    ज्यादा दिन नहीं लगते है कहीं और भी मजा आने लगता है.

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  6. अच्छी शिक्षाप्रद कहानी है ,सूफी संतों जैसी ही ...!

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  7. कहानी तो हमें आपकी ही लग रही है ओरीजनल टाइप(आइडिया चाहे जिस किसी का रहा हो आपके पहले), उपर वाली और उसके बाद का अफसाना भी क्‍या कम है.

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  8. गंगा तट गये गंगादास, जमना तट गये जमुना दास, माहौल का असर तो लाजिम है
    कहानी जिसकी भी है अच्छी है,
    पीसी के मामले मे साझा सरकार सही कैसी रहेगी ?
    फरियाद करते रहिये तबादला रूक ही जायेगा

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  9. ha ha ha ..... ek kahani hamne bhi padhi thi....lekin mamala aisa tha ke sal-do-sal......
    khato-kitabat dete dete......tisre saal jab larekene sadi ki charche suru kiye......pata chala patang ki dor dakiya babu khud tham baithe hain...

    sasur mahraj padhar chuke hain....teen mahine se
    kum pe nahi man rahe.....mundan/shadi jaise kai
    kam hone hain...

    apke nazar-kasekahoon/blogspot.com

    pranam.

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  10. एक कंप्यूटर एक कनेक्शन..
    हरकारे का यही सिलेक्श्न :)

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  11. ये अखबार क्या खाकर हमारे ब्लॉगजगत का मुकाबला करेंगे? ’कहीं दंगल वीर जवानों के, कहीं करतब तीर कमानों के’ वाले स्टायल में गुटबाजी, पहलवानी, राजनीति के अखाड़े सक्रिय हैं। भोजन के छहों रस, भाव के नौ रंग, सोलह कलायें, छत्तीस श्रॄंगार, छप्पन भोज का आनंद यहाँ विद्यमान है तो ’कौन जाये ऐ जौक, इन गलियों को छोड़कर।’

    लेकिन सामने वाली पार्टी तो हाकिम है ना :)
    पी सी तो उधर ही जायेगा?
    (और मुझे तो आपके तबादले का इंतजार है जी)
    बस थोडा खर्चा और हो जायेगा और ये रंगीनियां आपके साथ ही रहेंगी।
    बिना पी सी के साईबर कैफे में चढते बुढापे वाले ही ज्यादा जाते हैं :)

    प्रणाम स्वीकार करें

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  12. अच्छा आगाह किया अगली बार अगर साइबर कैफ़े जाने की ज़रूरत महसूस हुई, तो तौलिया लेकर ही जाना उचित है!(मूँह छुपाने के लिये)!
    वैसे हलवाई बन्धु के शेर प्रेम पर दुष्यंत कुमार को याद किये बगैर रहा नहीं जा सकता! वो ये कि:
    "इस दहलीज़ से ये काई नही जाने वाली,
    ये खतरनाक सच्चाई नही जाने वाली,
    तू परेशां बहुत है, परेशां न हो,
    इन खुदाओं की खुदाई नही जाने वाली।"

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  13. arey arey....abhi tabadla na karao bhai....abhi to dosti hui thi....haaqim ka pata do, kuch sifarish lagai jaaye ;)

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  14. सतीश जी आते ही होंगे, मैंने उन्हें खबर कर दी है :)

    वैसे बढ़िया कहानी है, क्यूंकि कहानी कहने का तरीका तो कोई और रहा होगा लेकिन उसका सारांश भी मजेदार है |

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  15. कहानी अच्छी लगी क्योकि कहानी आदर्शवादी नहीं यथार्थवादी है | चित्रलेखा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है बस फर्क है उसमे वो अपने किये की अंत में प्रयाश्चित करते है | ये सही कहा की जब कोई कहानी या उपन्यास पढ़िये तो पूरे दृश्य अपने आप सामने चलने लगता है |

    और पीसी को काहे कश्मीर और अपनी जान बना रहे है तू नहीं और सही और नहीं और सही जहा जांयेंगे वहा कोई दूसरी मिल जाएगी, बाहरवाली से ( बाहरवाली पीसी ) इतना लगाव ठीक नहीं है :)))

    और घरवाली ( पीसी ) लाने का अच्छा उपाय बताया है मै ही मदद कर देती और ऐसे ऐसे आरोप मढ़ती को सतीश जी ५ की जगह दस देते पर अफसोस उन्हीने उसी पोस्ट में घोषणा वापस ले ली थी | मै तो खुद कई प्लान बना चुकि थी सारी मेहनत बेकार गई | सतीश जी :)

    और ये लुधियाना के साइबर कैफे वाले तो सीधा लुट रहे है हमारे बनारस में तो केबिन वाले कैफे आप को ५० रु घंटा में मिला जायेगा | बोलिये घरवालो दिन दुनिया से छुप कर एकांत में किसी से मिलने का इतना सस्ता उपाय कहा होगा | पर ये बताइये की आप ऐसी जगह क्या कर रहे थे ??

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  16. पोस्ट अच्छा लगा।लिखते रहिए। सादर।

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  17. @ अली साहब:
    फ़िलवक्त तो बड़े साहब(हालात से दीगर) भी एक अली साहब ही हैं।एक अली साहब हमारे दोस्त हैं, एक आप हैं हमारे सरपस्त और एक अली साहब हैं बिग-बास, देखिये क्या रंगत लाते हैं अब बड़े साहब(हालात) :))
    फ़रियाद करने के लिये रोना सलीके से आना चाहिये, सीख लें तभी करेंगे फ़रियाद। तब तक तो "न्यूऐ चाल्लेगी"


    @ इन्द्रनील जी:
    दादा, साझा सरकार में एक ने ब्लैकमेल करना ही करना है। और फ़िर कब तक कोई हमें झेले, हा हा हा..

    @ सोमेश सक्सेना:
    सही कहा दिल के बारे में भी। और भाई, छाछ के जले का भी कोई मुहावरा है क्या? :))

    @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    सही कहा जी आपने।

    @ अभिषेक ओझा:
    मजा तो अपने मन से ही होता है, कहीं भी और कभी भी आ जाता है हमें तो।

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  18. @ वाणी गीत:
    टिप्पणी के लिये आभारी हूं, वाणी जी।

    @ राहुल सिंह जी:
    कहानी किन्हीं बड़े लेखक की ही है सर, झूठ नहीं है ये। मुझे भी अच्छी लगी थी, दुर्भाग्य से लेखक का नाम ध्यान नहीं(कोई पाकिस्तानी लेखक थे)।

    @ दीपक सैनी:
    दीपक, कहकर फ़रियाद की तो क्या की? होईहै वही जो राम रचि राखा।

    @ संजय झा:
    भुगतो, हा हा हा।

    @ काजल कुमार जी:
    :))

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  19. @ अन्तर सोहिल:
    बहुतों को इंतजार है, वहाँ वालों को ’कब आओगे?’, यहाँ वालों को ’कब जाओगे?’ खर्चा करवाकर ही मानोगे, हा हा हा।

    @ ktheLeo:
    यानि कि तौलिये महंगे हो जायेंगे। ये खुदाई जानी भी नहीं चाहिये जी।

    @ अंशुमाला जी:

    @ saanjh:
    thanks for assurance. तबादले से दोस्ती का क्या लेना देना?

    @ नीरज बसलियाल:
    बड़े भाई हैं अपने, ज्यादा से ज्यादा कान खींच लेंगे:))
    कहानी यकीनन बहुत रोचक थी, मौका लगा तो बताऊँगा लेखक का नाम। उम्मीद है, कोहली साहब के अलावा औरों को भी पढ़ना पसंद करते होंगे।

    @ अंशुमाला जी:
    हमारी चले तो हम तो कश्मीर को पीसी बना लें, चलती ही तो नहीं।
    वो इस्कीम कैंसिल? धत्तेरे की। फ़िर से लेट हो गया मैं।
    एक घंटे के दो सौ रुपये बचाने इतनी दूर नहीं जाया जायेगा जी, लेकिन अबके बतायेंगे लुधियाना वालों को कि मार्केट रेट क्या चल रहा है। हम जी वहां स्टिंग आपरेशन करने गये थे।

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  20. संजय भाई आप ये कहानी में पीसी और सरकार की बात करके कहीं पीसी सरकार बनने के चक्‍कर में तो नहीं हैं।

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  21. कहानी बहुत अच्छी लगी . और आप भी रम गये है . फ़रियाद ना करे इस बारे मे तो अच्छा है

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  22. अपन ने भी भाई देश भ्रमण का ठेका ले लिया है....... जहाँ जाते है बस वहीं के हो लेते है..........

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  23. कश्मीर समस्या पर समझौता हो सकता है...कहिये अपनी उनसे कि कश्मीर तुम्हें मिलेगा लेकिन फ्री में संजय को भी ले जाना होगा...देखिये कैसे आपका काम बनता है...
    गारंटी है जी मेरी...हा हा हा..
    आपकी पोस्ट पढ़ कर एक कहानी मुझे भी याद आई है...कभी लिखूंगी...फिलहाल तो इस ब्लॉग पर आपकी कहानी 'इंतज़ार' को आवाज़ देने की बात की थी मैंने...अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूँ...इरादा तो पक्का है....बस वक्त की बहुत कमी है मुझे इस समय...आशा है आप मेरी समस्या समझेंगे..

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  24. @ प्रेम सरोवर जी:
    पधारने का शुक्रिया, सर।

    @ राजेश उत्साही जी:
    राजेश भाई,फ़िलहाल तो पी.सी.की ही सरकार है।

    @ धीरू सिंह जी:
    गांठ बांध ली जी आपकी बात, ’आंसू न बहा, फ़रियाद न कर’ नहीं करेंगे जी।

    @ उपेन्द्र ’उपेन’:
    ठेकेदारी मुबारक हो उपेन्द्र जी:)

    @ अदाजी:
    हा हा हा, कश्मीर बच गया जी, सच में।
    आपकी कहानी का इंतज़ार है जी बेसब्री से।
    और मेरे लिखे को आपकी आवाज हासिल होगी, ऐसा इरादा है आपका तो, वक्त की कोई बंदिश नहीं है। अनुग्रहीत हूँ।

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  25. @ अंशुमाला ,
    इन्टरनेट को सुधारने का प्रयत्न करना वाकई बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं ! हज़ारों तरह के लोगों के मध्य काम करने में यह सब भी मिलेगा ही ! बहुत से मित्रों को ऐतराज था कि उक्त घोषणा का दुरुपयोग बहुत होगा और किस किस को जवाब दिया जायेगा १ अतः वह मदद घोषणा हटाना ही ठीक लगा !
    .:-))
    अदनान सामी को सुनना अच्छा लगा !
    शुभकामनायें !

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  26. बेनामी06/02/2011, 11:16:00 am

    संजय जी आप तो कहीं भी जाएँ आपकी मौज है. आपने अपना दल जो बना रखा है. अविनाश, रविशंकर, दीपक, अंतर सोहिल, सोमेश, आशीष जैसे युवा ब्लॉगरोँ की फौज खड़ी कर रखी है आपने। कोई दादा कहता है कोई हुकुम कोई सर. माने सारे सर झुकाए हाथ जोड़े घेरे खड़े हैं. लगता है जल्द ही आप मठाधीश होने वाले हैं.

    सही है जब सभी यही कर रहे हैं तो आप क्यों पीछे रहें.

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  27. संजय बाऊजी!
    अपनी पेशेवर ज़िंदगी के सालों का औसत देखता हूँ तो पाता हूँ कि ढ़ाई साल से ज़्यादा टिकने नहीं दिया हाकिमों ने. हर बार चोला बदला और हर बार खुश रहो अहले चमन अब हम तो सफर करते हैं का मर्सिया पढना पड़ा.
    लेकिन वो कहावत है न कि केक के अंदर से कितना भी तेज़ चाकू डालकर निकाल लो उसपर निशान रह ही जाते है. अब तो न हाकिम से इल्तिजा करता हूँ न आँ हज़रत से...
    जेहि बिधि राखे राम ताहि बिधि रहिये!!

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  28. @ सतीश सक्सेना जी:
    बड़े भाई, अदनान सामी का गाना पसंद आया, शुक्रिया।

    @ बेनामी जी:
    सबसे पहले तो आभार स्वीकार करें कि इस लायक समझा। कहीं भी मौज वाली बात से 150% सहमत, यहाँ कीबोर्ड पीटने से पहले भी यार जहाँ भी गये हैं या रहे हैं, मौज बनी ही रही है। आप जो भी हैं, हैं कोई अपने ही क्योंकि जो नाम आपने लिखे हैं उनमें से कुछ के कमेंट्स तो इस पोस्ट पर हैं ही नहीं। चलिये आपने सुझा दिया है तो ये जो सर झुकाये, हाथ जोड़े घेरे खड़े हैं, उनकी आँखें शायद खुल जायेंगी।
    और दोस्त, मठाधीश तो हम पहले से ही हैं, बस लोग मानते ही नहीं थे:))
    एक विशेष आभार भाषा के सुसंस्कृत होने का स्वीकार करें। ऐसा करके आपने सिद्ध कर दिया है कि आप एक सभ्य परिवार से संबद्ध हैं। वैसे अगर नाम से भी कमेंट करते तो कोई बुराई नहीं थी। चलिये अगली बार सही।

    @ चला बिहारी....:
    सलिल भैया, हमने भी अपने लिये इल्तज़ा कभी नहीं की।
    कोशिश ऐसे ही रहने की करते हैं, जैसा आपने सुझाया और आगे भी यही होगा।

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  29. अच्छी शिक्षाप्रद कहानी है|

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  30. भाई साहब,
    ये बिना PC वाले साइबर कैफे में लोग करते क्या हैं ?

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  31. पता नहीं [b]हुकुम[/b] कुछ लोगों को अच्छी चीज़ें हजम क्यों नहीं होतीं। किसी को खुश देख लिया तो पेट में दर्द, किसी को आदर मिलते देखा तो बदहज़मी, किसी की बात में मिठास देखी तो खट्टी डकारें …… खैर अपना अपना पेट है अपनी अपनी क्षमता !
    ऊपर वाले से दुआ है कि नीचे वालों का स्वास्थय दुरुस्त रखे :)


    ==================================================

    वैसे कहानी खूब रही और तकलीफ़ का अन्दाज़-ए-बयाँ भी। हम तो यही कह सकते हैं कि दोनो पार्टियों का काम चले। और रही तबादले की बात तो एक शेर याद आता है कि "दुनिया ने राह-ए-फ़ना में किसका दिया है साथ…… तुम भी चले चलो यूँ ही जब तक चली चले"

    नमन।

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  32. @ prkant:
    भाई साहब, गमे-दुनिया से निज़ात पाने को और बड़े गम की गिरफ़्त में फ़ंसने जाते हैं, बिना PC वाले साईबर कैफ़े में:)

    @ रवि शंकर:
    अनुज, अब भी नहीं माने? :))
    चला चली चलेगी अभी।

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  33. बेहतरीन कहानी पढ़ाने के लिए आभार. ..दिलचस्प लगी.

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  34. अच्छी लगी कहानी, और कहानी का इस्तेमाल भी। पोस्ट और टिप्पणियों में अच्छे शेर पढ़े। अपना हाथ-पैर तो ऐसे भी बहुत तंग है इनमे, सो यही कहूँगा, "मिट्टी झाड़ दुबारा बेहिचक लग जाएँ, दरख्तों-खूँटों में कुछ फर्क तो हो"। पर फिर सोचता हूँ, जो सीधी रह गई, वो पगडण्डी ही क्या?

    वैसे गए ज़माने कि जहाँ will हो वहाँ way/runway/highway हुआ करते थे, आजकल तो केवल stakeholders हुआ करते हैं। :)

    @बात पुराने जमाने की है, सच की और सच्चे आदमी की भी इज्जत होती थी।
    सच लिखा है, नंबर २६ पर पुष्टि भी हुई है। बात वाकई 'पुराने ज़माने' की लगती है। :)

    P.S.: खुद ही तो कहा कि पी.सी. में 'जान' बसती है, कोई जान यूँ ही बरामद करवाएगा भला? क्या जान सिर्फ आपकी-हमारी ही हुआ करती है? :)

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  35. Behtreen najm se parichay karane k liye abhar ................

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  36. @ आकांक्षा जी:
    आपके पधारने का शुक्रिया।

    @ अविनाश चन्द्र:
    कुछ मामलों में तंगदस्ती भी अच्छी होती है:) सीधे तो हाईवे और एक्सप्रैसवे ही अच्छे लगते हैं, पगडंडियां और stakeholders, दोनों ऐसे ही भले।
    जान तो दोस्त सबकी होती है, किसी की तोते में और किसी की गुड़िया में - अब हमारी तो पीसी में ही है। लगता है लौट आये हो घर से, खुशामदीद।

    @ अमरेन्द्र ’अमर’:
    आप नज़्म से परिचित हुये, आभार आपका है जी।

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  37. एक टिप्पणी लिखी थी मगर लगता है "पोस्ट" का बटन दबाना भूल गये। कहानी पहले पढी तो नहीं परंतु इसके पात्र, विषयवस्तु, काल आदि मुंशी प्रेमचन्द के नाम की चुगली करते से लग रहे हैं। अदनान सामी को सुना तो है परंतु देखने से बचता हूँ ज़रा।

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  38. @ दीपक ’मशाल’:
    शुक्र है, याद आई:))

    @ स्मार्ट इंडियन:
    सर, मुझे लगा था कि मुझे ही भूल गये है:))
    चुगली गलत है इस बार। खोजकर कभी सही नाम जरूर बताऊंगा।

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  39. kahani ka plot bahut hi sundar hai. media house ko takar deta blog.

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