शनिवार, सितंबर 12, 2020

जबसे जनमे चन्दर भान

 मैं बाला साहब ठाकरे का प्रशंसक था। ब्लॉग समय में मेरे अनेक मित्रों ने, जिन्होंने दुनिया मुझसे अधिक देखी है, कहा कि मैं गलत हूँ। मैं सीनियर ठाकरे का प्रशंसक बना रहा। दो कारण थे, 

1. जन्मभूमि आन्दोलन चलाने वाली पार्टी के नेता ढांचा गिरने के बाद आंय-बांय करने लगे थे, बाल ठाकरे ने खुलकर कहा कि यह कार्य उनके लोगों ने किया है।

2. मैं बाल ठाकरे को मुस्लिम गुंडागर्दी को एक सक्षम चुनौती देनेवाले केन्द्र के रूप में देखता था।

पहले बिंदु पर बताना चाहता हूँ कि सद्दाम हुसैन, ओसामा जैसे अनेक ऐसे लोग हुए हैं जिनके उद्देश्यों का विरोधी होते हुए भी मैं प्रशंसक रहा हूँ कि वो जो करना चाहते थे या करते थे, उसे कहते भी थे। मनसा-वाचा-कर्मणा में किसी के मन में क्या चलता है, इसकी थाह लेना कठिन है किन्तु इनके कर्मों व कथनों में एकरूपता थी।

दूसरे बिन्दु पर कहूँगा कि वह सूचनाओं के एकपक्षीय प्रवाह का प्रभाव था। तब के समाचार पत्रों/पत्रिकाओं आदि से जो जानकारी मिलती थी, उसकी पुष्टि का कोई साधन मेरे पास उपलब्ध नहीं था। महाराष्ट्र का कोई मित्र भी नहीं था।

कालांतर में बाल ठाकरे चले गए, नए *चन्दरभानों* ने उनका स्थान ले लिया। इधर संचार-क्रांति के चलते सूचनाओं का प्रवाह बढ़ा, महाराष्ट्र के मित्र मिलते गए, इनकी पृष्ठभूमि आदि के बारे में ज्ञान भी बढ़ा। अपनी मूर्खताओं से ये लोग मन से उतर ही रहे थे, अब संगति के प्रभाव से उन पर केवल मुहर लग रही है।

*नाते में मेरे चाचा लगते एक को देखकर मेरे दद्दू कहा करते थे - 'जबसे जनमे चन्दर भान, चूल्हे अग्ग न मन्जी बान।' मन्जी हमारे यहाँ खाट को कहते थे/हैं। किसी अपने का नाम resemble कर जाए तो इसे संयोग मात्र मान लीजिएगा।*

शनिवार, अगस्त 15, 2020

क्योंकि पराजय अंतिम नहीं

समाप्तकर्मा सहित: सुहृ द्भिर्जित्वा सप्तनान् प्रतिलभ्य राज्यम्।

शैलेन्द्र भूयस्तपसे जितात्मा द्रष्टा त्वास्मीति मतिं चकार।।२०।।

(आजगरपर्व, वनपर्व, श्री महाभारते)

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वनवास का ग्यारहवां वर्ष आ चुका था। महाबली भीम, जिसे तथाकथित कलाकर्मियों ने मात्र भोजनप्रेमी और शरीर से बली ही चित्रित किया है, अपने अग्रज युधिष्ठिर को भविष्य के एक वर्षीय अज्ञातवास को ध्यान में रखते हुए अपने तत्कालीन निवास गन्धमादन पर्वतक्षेत्र से स्थान परिवर्तन के लिए प्रवृत्त करते हैं। बुद्धिमान भीम का अभिप्राय जानकर युधिष्ठिर गन्धमादन पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं। वहाँ के भवनों, नदियों, सरोवरों तथा समस्त राक्षसों से विदा लेते हैं। गन्धमादन पर्वत की ओर देखते हुए उस श्रेष्ठ गिरिराज से प्रार्थना करते हैं, "शैलेन्द्र! अब अपने मन और बुद्धि को संयम में रखनेवाला मैं शत्रुओं को जीतकर अपना खोया हुआ राज्य पाने के बाद सुह्रदों के साथ अपना सब कार्य सम्पन्न करके पुनः तपस्या के लिए लौटने पर आपका दर्शन करूँगा।"

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सब प्रकार से समर्थ किन्तु परिस्थितिवश अपने अधिकारजन्य राज्य से निर्वासित एक पक्ष के चराचर जगत के साथ  सामंजस्य, सहअस्तित्व, पर्यावरणप्रेम आदि भाव देखिए। यह भाव, संस्कार बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह छिन गए गौरव, वैभव की पुनर्प्राप्ति में सहायक होंगे।

रविवार, जुलाई 05, 2020

निकट न दूर

पिछले बरस आज ही के दिन...
- गूगल मैप्स पर देखा, मेट्रो स्टेशन से दूरी लगभग नौ किलोमीटर दिखा रहा था। उस दिन मेरा face भी शायद index of mind हुआ रखा था, बाहर निकलते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। उनमें से एक ने तिलक लगा रखा था, मैंने उसे जगह बताई तो वो पूछने लगा कि लौटना भी है क्या?
 मैंने कहा, "हाँ, मुझे वहाँ मुश्किल से दस मिनट लगेंगे।"
उसने कहा, "दो सौ रुपए दे देना, सर। वहाँ से आपको वापिस आने के लिए ऑटो आसानी से मिलेगा भी नहीं।" मैं भी कहने को हुआ कि तुम्हे भी वहाँ से सवारी आसानी से नहीं मिलेगी लेकिन चुप रह गया।
चले तो सावधानी के लिए मैंने GPS लगा रखा था। पहले सिग्नल पर लालबत्ती थी तो मैंने कहा कि यार GPS तो राइट टर्न बता रहा है। उसने तुरंत फोन निकालकर किसी से कन्फर्म किया और बत्ती हरी होने पर राइट टर्न लिया। बोला, "सर, मैं गलत एड्रेस समझ गया था। ये तो मेरे सोचे से कम से कम डबल दूरी पर है।" 
मैंने कहा, "मतलब वहीं जाना होता तो तुम मुझसे डबल से भी ज्यादा किराया चार्ज कर रहे होते? खैर, अपना नुकसान मत करो यार। मीटर स्टार्ट कर लो, जितना बनेगा उससे बीस रुपये ज्यादा दे दूँगा।"
अनमना सा वो बोला, "नहीं सर, अब मीटर क्या चालू करना।"
वापिस आकर जब दो सौ रुपए दे दिए तो रिक्वेस्ट सा करते हुए बोला, "सर, बीस रुपये और दे देते तो ..।"
मैंने दे दिए, बेमन से। साथ ही इतना जरूर कहा कि तुम अपनी वेशभूषा के साथ न्याय नहीं कर रहे हो।
- पिछले कई वर्षों से किसी कारण से रास्ते में नाईयों की पंद्रह-बीस दुकानें छोड़कर एक विशेष दुकान पर जाता हूँ। मालिक मर चुका, बच्चे नाई का काम कर रहे हैं लेकिन बेमन से। मैं अब भी वहीं जाता हूँ लेकिन अब मन से नहीं जाता। मरे मन वाले कब तक जिएंगे?
- रात को घर लौटते समय रोज देखता हूँ कि तथाकथित सम्भ्रान्त दिखने वाले/वालियाँ उन लोफरों की ठेलियों से सब्जी खरीद रहे हैं जो महिलाओं को देखकर जानबूझकर आपस में भद्दी भाषा बोलने लगते हैं, अश्लील इशारे कर रहे होते हैं लेकिन महिला ग्राहकों के साथ 'आप' तो ले ही लीजिए', 'जो मर्जी दे दीजिए' जैसे वाक्य बोलते हैं। ग्राहक खुश होती हैं कि  कि लड़के बदतमीज हैं लेकिन हमारी तो इज्जत करते हैं, सब्जी भी सस्ती देते हैं और वैसे भी गाली गलौज हमसे थोड़े ही करते हैं...
- कुछ दिन से मैं देख रहा हूँ कि डेयरी प्रोडक्ट्स की एक नई रिटेल चैनशॉप्स दिखने लगी हैं। जबरदस्त डिस्काउंट और ऑफर्स, और सरनेम राजपूतों का है। जरूर चल निकलेगी। थोड़ी सी छूट देकर तो हमें कोई भी अपना गुलाम बना ले। दूध, घी, पनीर में कुछ रुपए बच जाएं तो कुछ बुरा है? समझेंगे कि मूवी देखने जाएंगे तो एक पॉपकॉर्न  इस बचत का। ए बचत, तुझे सलाम। पासपोर्ट प्रकरण के बाद तो समझ आना चाहिए कि संविधान अपनी पसंद का नाम/कुलनाम लगाने की छूट देता है भाई, तू कायकू इतना सोचेला है? 
हाहाहा इतना तो तुम भी मानोगे कि राजपूती नाम तुमसे बहुत ऊँचा है।
- प्रभाष जोशी ने एक बार भारत पाकिस्तान के हॉकी मैच के बारे में, जिसमें भारत पूरे मैच में आगे चल रहा था लेकिन अंतिम क्षणों में धड़ाधड़ गोल खाकर हार गया था, लिखते समय परिणाम को  दोनों टीम की किलर इंस्टिंक्ट से जोड़ा था। और, उस किलर इंस्टिंक्ट को अलग-अलग कौम की 'आत्मा के आवागमन'  और 'बस, यही एक जिंदगी' मान्यताओं से जोड़ा था। उनके लिखे को सही या गलत बताने वाला न्यायकार मैं नहीं लेकिन तब वो लेख मेरी अपनी सोच को व्यवस्थित ढंग से लिखा हुआ लगा था। जिन्हें समझ आता है कि यह चक्र अनन्त है वो समय के साथ प्रवाहमान हो लेते हैं और जिनके लिए यह 'करो या मरो' है वो नियम/नैतिकता सब ताक पर रखकर हासिल करने में जुट जाते हैं।
- - मैं दूर तक देखने की कोशिश करता हूँ तो पास का सब ओझल होता दिखता है। I hope कि जो पास का देखते हैं, उन्हें दूर का भी सब साफ दिखता होगा.....

शुक्रवार, जून 26, 2020

कोरोना काल की डायरी

लॉकडाऊन काल के मेरे अनुभव तो अच्छे ही रहे, विशेषरूप से लॉकडाऊन १ और २ के। वेतन नियत समय पर और बिना कटौती के मिलना तय था तो आर्थिक रूप से कोई प्रत्यक्ष हानि नहीं हुई, अप्रत्यक्ष लाभ ही हुआ होगा। आवश्यक सेवाओं के अंतर्गत आते हैं इसलिए घर से निकलना पड़ता था और मेट्रो सेवाएं बन्द थी तो अपने दुपहिया पर जाना होगा, यह सोचकर कष्ट था किन्तु सीमित ट्रैफिक और सिग्नलरहित सड़कों के कारण आनन्द ही रहा। पुलिस कर्मियों की डण्डेबाजी भी नहीं झेलनी पड़ी, रोके जाने पर सभ्यता से आईकार्ड दिखाने से ही काम चल गया यद्यपि ऐसी स्थिति भी दो-चार बार ही आई। समय के सदुपयोग की बात की जाए तो महाभारत का प्रथम खण्ड पिछले वर्ष पढ़ना आरम्भ किया था, कतिपय कारणों से वह बाधित था, उसे सम्पन्न करने का मन बनाया। पिछले अनुभव से नियमित न रहने को लेकर कुछ शंकित अवश्य था। लक्ष्य बनाया कि भले ही कम पढ़ा जाए लेकिन नियमित रूप से दो से तीन पृष्ठ भी प्रतिदिन पढ़ पाया तो २०२० में यह सम्पन्न हो जाएगा। मई समाप्त होते तक  उस स्थिति तक पहुँच गया कि बचे हुए दिनों में यदि दस पृष्ठ प्रतिदिन पढ़ सका तो लक्ष्य  जून 2020 तक प्राप्त हो सकेगा। आरम्भ में प्रतिदिन के 3 पृष्ठ भारी लग रहे थे, अब दस पृष्ठ तक achievable लग रहे थे। 
अब एक अन्य बात पर ध्यान गया, यदि यह खण्ड पढ़ लिया तो उसके बाद? द्वितीय खण्ड उपलब्ध नहीं है, यदि उसकी प्राप्ति में समय लग गया तो बना हुआ momentum समाप्त होने की आशंका आदि आदि..... ऐसे समय में संकटमोचक रहते हैं 'छोटे पण्डित', काम बता भर दो और काम उसका हो जाता है। कोरोनाकाल की एकमात्र अड्डेबाजी में यह बात छेड़ी, उसने लपक ली। इसी बीच 'लालबाबू' बोले कि ऑनलाइन भी मंगवा सकते हैं। एक रविवार को मैंने चैक किया तो पाया कि वास्तव में गीताप्रेस की online पुस्तक सेवा है। ऑर्डर कर दिया, पेमेंट भी कर दी। अगले दिन कन्फर्मेशन के लिए फोन किया(मेरे लिए दुनिया के कठिनतम कार्यों में से एक) तो पता चला कि जो सज्जन यह सब देखते हैं वो अगले दिन आएंगे, वाराणसी में वहाँ भी 'आज मैं तो हरि नहीं, कल हरि होंगे मैं नांय' अर्थात alternate day duty सिस्टम चल रहा है। अगले दिन हरि ने कन्फर्म किया कि पेमेंट प्राप्त हो गई है और पैकेज तैयार है। अब लोचा यह आया कि दिल्ली के लिए डाकविभाग 30 जून तक स्पीडपोस्ट/रजिस्टर्ड पोस्ट स्वीकार नहीं कर रहा। मैंने अपना लॉजिक दिया कि प्रथम खण्ड समाप्त होने के पूर्व मुझे द्वितीय खण्ड क्यों चाहिए। सामने से विकल्प दिया गया कि कुरियर से भेज सकते हैं लेकिन वो महंगा पड़ेगा। डाक विभाग जो कार्य ₹80/- में करता, निजी कुरियर उसके लिए कम से कम ₹200/- अतिरिक्त लेगा।  "भेजिए, मैं अतिरिक्त राशि ट्रांसफर कर रहा हूँ।"
अगले दिन हरिजी ने कुरियर की रसीद व्हाट्सएप्प कर दी। चार-पाँच दिन और व्यतीत हो गए, कुरियर नहीं आया। अब अपने तुरुप के पत्ते 'बाबा' को गुहार लगाई गई कि किसी चेले को कुरियर ऑफिस भेजकर पता करवाएं, उन्ने अगले दिन का आश्वासन दे दिया। तभी कुरियर वाले का फोन आ गया कि लोकेशन बताईये, आपका कुरियर आया है। 
सार यह है कि आज छब्बीस जून २०२० है और प्रथम खण्ड सम्पन्न हो गया है। लॉकडाऊन तेरी सदा ही जय हो।
#कोरोना_डायरी

बुधवार, जून 10, 2020

समय का फेर

लगभग दस वर्ष किराए के मकानों में रहना पड़ा, कुल 5 मकानमालिक मिले। ऐसा नहीं हुआ कि इनमें से किसी मकानमालिक से मतभेद के चलते एक रात्रि भी उस मकान में बितानी पड़ी हो। एक के साथ ऐसी स्थिति बनी भी तो दो घण्टे में रूम बदल लिया था। हुआ यूँ था कि मेरा एक मित्र अस्थाई ट्रांसफर पर अपने गृहस्थान में एक लम्बा काल बिताकर एक सुबह अचानक मेरे रूम पर प्रकट हुआ, "वापिस आ गया। नया मकान मिलने तक यहाँ रुक सकता हूँ न?" पूछने वाले ने अपने तरीके से सूचना ही दी थी। मैं उन दिनों अकेला रहता था और उसे उसे अपनी पत्नीश्री को भी लाना था, तो उनके लिए मकान देखने में हमें कुछ अधिक सेलेक्टिव भी होना पड़ रहा था।
मेरे मकानमालिक के पूरे परिवार से अपने सम्बन्ध अच्छे थे लेकिन प्रोटोकाल को लेकर मैं असावधान नहीं रहता था, मैंने भी मकानमालिक को यह सूचना दे दी। उनकी ओर से लेशमात्र भी ऑब्जेक्शन नहीं हुआ। अब हुआ यूँ कि हमारे उस मित्र को संयोगवश उन दिनों बहुत जुकाम लगा हुआ था। कुछ उसका भयंकर जुकाम, कुछ मकान ढूंढने में हमारे अतिरिक्त पैमाने और कुछ यह आश्वस्ति कि कुछ दिन अतिरिक्त लग भी गए तो हम सड़क पर नहीं हैं, इस सबमें सप्ताह भर लग गया। एक दिन ऑफिस से लौटे तो मकानमालिक के बड़े लड़के ने मुझे बुलाया कि चलो कुछ दूर टहल कर आते हैं, बहुत दिन हुए हमारी चर्चा भी नहीं हुई। वह अच्छा पढ़ा-लिखा अधिकारी आदमी था, विभिन्न विषयों पर उससे चर्चा हुआ भी करती थी। मेरे मित्र के बारे में उसने बोला कि इनकी तबीयत ठीक नहीं लगती, ये आराम कर लें। 
हम निकल लिए। उस दिन वो कुछ असहज था। कुछ देर बाद मेरे मित्र का नाम लेकर बोला, "उसे बहुत भयंकर जुकाम लगा हुआ है। कोई गम्भीर बीमारी है?"
मैंने बताया कि ऐसा कुछ नहीं है, जुकाम है तो जाने में समय लगता ही है। फिर घर से बाहर रहते हैं तो घर जैसी केयर भी नहीं मिल पा रही होगी।
कुछ देर चुप रहकर वो बोला, "यह छूत की बीमारी जैसा होता है, आपको भी रिस्क है।"
मैंने बात टाली कि ऐसा कुछ नहीं है।
उसने कई प्रकार से समझाया कि मित्रता आदि अपने स्थान पर ठीक है लेकिन इस कारण मुझे स्वयं को खतरे में न डालते हुए उस मित्र को कहीं और शिफ्ट कर देना चाहिए। मैंने यह कहते हुए मना कर दिया कि उसके स्थान पर मैं अस्वस्थ होता तो मेरा वो मित्र मुझे नहीं छोड़ता, मैं भी अस्वस्थ होने का रिस्क लेकर भी उसे कभी बाहर नहीं करूँगा।
वो चलते-चलते रुक गया, बोला, "रिस्क आपको भी लेना नहीं चाहिए लेकिन मैं समझा ही सकता था। तो अब ऐसे सुनो कि मैं मेरे व मेरे घर के सदस्यों के लिए रिस्क नहीं ले सकता। अब?"
मैंने कहा, "अब? वापिस चलते हैं।"
दोनों चुपचाप लौट आए। घर पर गेट खोलकर जब वो अंदर जाने लगा, मैंने कहा, "भाईसाहब, आज रात से आप व आपके परिजन हमारी ओर से रिस्कफ्री होंगे।"
दो घण्टे में पूरी मण्डली ने टीन-टप्पर ढो-ढाकर नए अड्डे में जा टिकाया। यहाँ अकेले थे, नए अड्डे में पूरी मण्डली पुनः जुड़ गई।
कुछ घटनाओं में मैं किसी एक पक्ष को ठीक या गलत नहीं सिद्ध कर पाता, सभी पक्ष ठीक ही लगते हैं। यह भी ऐसी ही घटना रही। पूर्व मकानमालिक और उनका लड़का बाद में भी यदाकदा मिलते थे, बात होती थी और हम हँस देते थे। वो भी कहता था कि अपनी अपनी जगह हम दोनों ही ठीक थे, और मैं पहले से ही यह मानता था☺️
वही मित्र आज ऑडिट के चक्कर में अपने गृहस्थान से हमारे ऑफिस वाली बिल्डिंग में आया था। संयोगवश जिन सीनियर के साथ आया था, वो हम दोनों के कॉमन मित्र रहे हैं। वही सीनियर मुझे मिलने आए तो उन्होंने बताया कि अमुक भी आया हुआ है। आज भेंट होती तो सम्भवतः चौबीस वर्ष बाद आमने-सामने मिलते, एक ही बिल्डिंग में अलग-अलग मंजिल पर बैठे रहे। कोरोना, दूसरे शहर से आने के प्रोटोकॉल, पहले से परिपक्व हो गए हम☺️ फोन पर बात हुई तो हँसते हुए कल मिलने का तय हुआ है। अपनी-अपनी जगह सब ठीक हैं।
ऐसी बातों के लिए भी कोरोना काल याद रहेगा।☺️

गुरुवार, मई 07, 2020

उतने पाँव पसारिये.....

उन दिनों बिजली की आपूर्ति बहुत अनियमित थी, सार्वजनिक उपक्रम के हाथों में थी। घर में छोटे बच्चे भी थे, आवाज उठी कि इन्वर्टर होना चाहिए। क्रय के मामलों में मैं था निपट अनाड़ी, मेरा एक प्रिय मित्र इनमें विशेषज्ञ था तो उससे बात छेड़ी। उसने बताया कि उसने भी इसी सप्ताह नया इन्वर्टर लिया है। साथ ही यह भी बताया कि जिस विक्रेता से इन्वर्टर क्रय किया है, उसने बिना ब्याज और/या किसी अतिरिक्त कीमत के ही छह मासिक किस्तों में इन्वर्टर दिया है क्योंकि बातचीत करते समय वो लोग एक ही कॉलेज के सीनियर-जूनियर निकल आए थे। मेरा वह मित्र वैसे भी बहुत सुदर्शन व्यक्तित्व का स्वामी रहा तो पहली भेंट में ही लोग उसके व्यवहार से प्रभावित होते मैंने स्वयं देखे थे, इसलिए इस सुविधा के मिलने पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मित्र ने उत्साहित होते हुए मुझे भी कन्विंस किया कि जब कोई अतिरिक्त कीमत नहीं चुकाई जानी है तो एक साथ भुगतान करने की अपेक्षा मुझे भी ऐसे ही छह किस्तों में भुगतान की सुविधा लेनी चाहिए।
सारी पटकथा सैट होने के बाद अब बिल्ली के गले घण्टी बाँधने की वेला आ गई थी।
घर के मुखिया पिताजी थे, उनसे बात आरम्भ हुई। 
"आजकल बिजली बहुत जा रही है, गर्मी में छोटे बच्चों को रातभर परेशानी होती है।"
"हाँ, क्या कर सकते हैं?"
"बैटरी वाले इन्वर्टर मिलते हैं, पंखे वगैरह को आठ-दस घण्टे का बैकअप मिल जाता है। लाईट जाते ही ऑटोमैटिक इन्वर्टर पर शिफ्ट हो जाते हैं, सोच रहा था कि हम भी ले लेते हैं।"
"ले लो। कितने का आता है?"
"पन्द्रह हजार के आसपास आएगा।"
"ठीक है। हैं पैसे?"
"पैसों का तो हो जाएगा, पहले तो आपकी परमीशन ही लेनी थी। वो सुनील है न, उसने भी इसी सप्ताह नया इन्वर्टर लिया है। ढाई हजार कैश और हर महीने ढाई हजार के हिसाब से पाँच चैक लिए हैं दुकानदार ने, कह रहा था कि मेरा भी ऐसे ही करवा देगा।"
"ऐसे कोई कैसे उधार पर दे देता है?"
"सबको नहीं देते हैं। सुनील के घर भी दुकानदार ने अपना लड़का भेजा था, वो आकर घर देख गया। बल्कि जो लड़का आया था, वो सुनील का घर देखकर बहुत इम्प्रेस्ड भी था।"
"हम्म, जो लड़का यह देखने आया था कि यह बन्दा उधार लायक है या नहीं, उसकी खुद की तनख्वाह कितनी होगी तेरे ख्याल से?"
अब मैं कुछ सोच में पड़ गया, "मिलते होंगे डेढ़-दो हजार उसे, हमें क्या मतलब?"
अब आया क्लाइमैक्स, "भैंचो डेढ़-दो हजार महीने के लेने वाला यह वेरीफाई करने हमारे भी घर आएगा कि हम उधार के लायक हैं या नहीं। ऐसा है, पैसे हैं तो इन्वर्टर खरीद लो नहीं तो चुपचाप बैठ जाओ।"
कुछ देर हम दोनों चुपचाप बैठे रहे। फिर पिताजी बोले, "चल जा, मेरी चेकबुक ले आ।"
"नहीं, पैसे तो हैं मेरे पास। तभी तो खरीदने को तैयार हुआ था, सुनील से तो आज ही बात हुई तब उसने छह महीने वाली बात बताई। हाँ, सुनकर मैं भी थोड़ा लालच में जरूर पड़ गया था क्योंकि इसमें कोई नुकसान नहीं दिखा था।"
"देख ले, पैसे नहीं हैं तो मेरे बैंक खाते से निकाल ले। छोटे बच्चों को बिजली के कारण परेशानी तो होती होगी।"
"न, हैं अभी मेरे पास। जरूरत होगी तो आपसे ले लूँगा।"
"ठीक है। कैश मीमो मेरे को चैक करवाईयो।"
"अच्छा जी।"
अगले दिन इन्वर्टर आ गया। कैश मीमो चैक करवाने गया, उन्होंने देखी भी नहीं और सम्भाल कर रखने के लिए कह दिया। 
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एक समय था जब उधार लेने के नाम पर ही मध्यमवर्गीय लोग उछल पड़ते थे जैसे करंट लगा हो। जब तक अपरिहार्य न हो जाए, उधार लेने की अपेक्षा अपनी आवश्यकताएं सीमित कर लेना प्राथमिकता हुआ करती थी। 'पैर उतने ही पसारने चाहिएं, जितनी चादर हो' - पिछली पीढी तक यह भौतिक जीवन का मंत्र था।
यद्यपि मैंने ऊपर जो लिखा, वह एक बहुत सामान्य घटना है। सामान्य लेकिन सरल नहीं, अपितु बहुत जटिल। कम से कम मेरे लिए बहुत जटिल, जिसकी स्वयं की आजीविका भी इस अंधी दौड़ पर निर्भर करती है।
मैं स्वयं यह भी कह रहा हूँ कि प्रत्येक काल में इसे प्रासंगिक नहीं मान सकते। समय परिवर्तनशील है, विलासिता की वस्तुएं धीरे-धीरे आवश्यकता बन जाती हैं। 
जो देखा है, उसके आधार पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि सुख पाने के चक्कर में हम अनजाने में दुख को भी न्यौता दे रहे होते हैं। 
आवश्यकताएं आज भी बहुत कम हैं पर ये दिल मांगे मोर कि कर लो दुनिया मुट्ठी में ....
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 निशांत भाई की फेसबुक पोस्ट ने यह सब लिखवा दिया☺️

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10218815007019166&id=1020718001

रविवार, मार्च 22, 2020

जनता कर्फ्यू में यही सोचा ☺️

समय के साथ, वय के साथ समझ बदलती है। 
'मेरा नाम जोकर' जब पहली बार देखी तो पूरी फिल्म में सिम्मी ग्रेवाल, पद्मिनी और सर्कस वाली रूसिन पर ही फोकस अटक कर रह गया था।
एकाध वर्ष पूर्व सहसा इस फिल्म की बात चली तो लगा कि सौन्दर्य दर्शन के चक्कर में कहीं न कहीं जोकर(एक पुरुष) के vision की उपेक्षा हो गई।
अनजाने में हुए इस अन्याय के प्रायश्चित के लिए सोचा कि सम्भव हुआ तो अपन भी कभी वो ट्राई करेंगे अर्थात कुछ विशिष्ट जोड़ों को बुलाकर एक gathering सी कर लेंगे। विश्वास था कि gathering सम्भव भी हो सकेगी क्योंकि सामने वालियों की(और उनके वालों की भी) समझ भी तो आयु के साथ बदली होगी और इसे friendly spirit में लिया जाएगा।
समय के साथ और भी बहुत कुछ बदलता है यथा तकनीक, सुविधाएं, रुकावटें। उदाहरण के लिए जब यह मूवी आई थी तब aids नहीं था। वो बाद में ही आया किन्तु aids बेचारा एक मामले में फिर भला था कि उसमें प्रायः जो करता था वो भरता था। अब नई नई बीमारियाँ आ गईं, अब आवश्यक नहीं कि करने वाला ही भरेगा। 
फिर सोची कि नर हो न निराश करो मन को। रोने वाले हर बात में रोने के बहाने ढूँढ लेते हैं, हम क्या उनसे गए बीते हैं? तकनीक भी तो बदली है, प्लान इम्प्लीमेंट करने के लिए आवश्यक हुआ तो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का सहारा ले लेंगे। 
कोरोना आए या उसके फूफा-फूफी, हार नहीं माननी है।

शुक्रवार, फ़रवरी 07, 2020

अव्यवस्थित

कुछ परिवर्तन के लिए इस बार हिंदी फिल्म देखनी आरम्भ की। मैं एक स्पैल में फिल्म न देखकर टुकड़ों में ही देख पाता हूँ और यह suit भी करता है, अच्छी लगी तो long relish हो गया और अच्छी नहीं लगी तो the end से पहले ही the end की सुविधा। तो इस बार फिल्म चुनी गई, 'बाला'
फिल्म देखते समय मुझे कुछ स्थान पर लगा कि मैं भी नायक की भाँति सोचता हूँ, विशेषकर जब अपने झड़ते बालों वाली समस्या को नायक बचपन में अपने गंजे शिक्षक का उपहास करने से जोड़ता है। 
मैं कर्मफल के सिद्धांत में विश्वास रखता हूँ और यथार्थ में सम्भवतः कुछ करता कम और सोचता अधिक हूँ, इसलिए प्रायः अपनी किसी असफलता या अपने प्रति हुए अन्याय के समय पूर्व में मेरे द्वारा किसी अन्य के साथ किया ऐसा व्यवहार स्मरण करता हूँ और कोई घटना पा भी लेता हूँ। इस सोच को स्वस्थ माना जाए या दिल बहलाने की बात, मेरी असंतुष्टि मिटती है और भविष्य के लिए अपने को सुधारने का एक लक्ष्य मिल जाता है। पढ़ने में यह बात आकर्षक लग भी सकती है किन्तु इसे अपनाने में अपने प्रति कुछ  निर्मम अवश्य होना पड़ता है, आसपास वालों की दृष्टि में aaceptable, presentable और respectable बनना कठिन होता जाता है और अन्य के साथ व्यवहार भी पहले जैसा jolly नहीं रहता।
माफ करना, बड़े लेखकों की नकल करने के चक्कर में मैं भी थोड़ा इधर-उधर निकल जाता हूँ।☺️ उस बात पर आता हूँ, जिसके लिए इतनी भूमिका बाँधी।
प्रतिदिन लगभग सदा ही सार्वजनिक वाहन में यात्रा करता हूँ। ट्रेन में चलता था तो त्रैमासिक सीज़न टिकट रखता था और अब मेट्रो में चलना होता है तो हजार-पांच सौ का रिचार्ज करवाया और कुछ दिन की छुट्टे नोट की समस्या से मुक्ति मिल जाती है। कुछ माह से मेट्रो स्टेशन से कार्यालय और कार्यालय से मेट्रो स्टेशन आते हुए शेयरिंग ई-रिक्शा  का सहारा लेता हूँ। सांयकाल में तो ऐसी कोई शीघ्रता नहीं होती किन्तु सुबह के समय हर एक मिनट कीमती लगता है। प्रायः देखता हूँ कि अनेक लोग ऐसे हैं जो रिक्शा में बैठते ही चलने की जल्दी मचाते हैं किंतु जब रास्ते में उतरते हैं तो किराए के पैसे देते समय इतनी प्रकार और स्टाइलों से अपनी देह को घुमाकर/मरोड़कर, इधर-उधर हाथ डालकर wallet निकालते हैं, सौ या पचास का नोट निकालकर रिक्शावाले को देते हैं, फिर लौटाए गए नोट या सिक्कों को कसौटी पर कसकर लेनदेन सम्पन्न करते हैं। मुझ जैसे अनेक बार समय देखकर सुलगते रहते हैं कि ये लोग हमें देर करवा रहे हैं और वो भी ऐसे कारणों से, जिन्हें इस एक छोटी सी आदत से बदला जा सकता था कि आवश्यक खुले पैसे अपने पास रखे जाएं।
 In short, लोगों की इस आदत से मैं बहुत त्रस्त रहता हूँ और इस पर विस्तृत और उपयोगी चर्चा निंदक जी से भी हो चुकी है, यदि उन्हें स्मरण हो। 
मैं स्वयं बहुत पहले से इस मामले में particular रहा कि जेब में आवश्यकता योग्य फुटकर नोट अवश्य रहें। एकाध बार तो ऐसा भी हुआ कि संयोग वश खुले पैसे नहीं थे तो ऑफिस से निकलते समय मैंने एक स्टाफ से दस रुपए उधार भी लिए कि यार दस रुपए दे दो, मैं कल लौटा दूँगा। लौटाए नहीं, यह अलग बात है किन्तु भावना यही थी कि अपने कारण दूसरों का समय व्यर्थ करने का पाप नहीं करना। अपनी इस उपलब्धि का मैंने अहंकार भी किया है और अनेक मित्रों के सामने गाया भी बहुत है। 
आज कार्यालय से लौटते समय भी यही सब देखता और कुढ़ता आया। गंतव्य पर पहुँचते तक रिक्शा में दो सवारी बचीं, रिक्शा वाले ने भी रिक्शा लगभग सड़क के बीच ही रोक दी। जेब में हाथ डाला तो ₹२००/- वाले दो नोट  ही निकले। मेरी हालत सच में बुरी हो गई, दूसरे यात्री ने तब तक बीस का नोट देकर दस रुपए वापिस सम्भाल लिए थे। सड़क के बीच ई-रिक्शा रुकवाना और झिकझिक करना, मेरे पसीने छूट गए। मैंने उस लड़के से अनुरोध किया कि यदि वह मेरे बदले भी दस रुपए रिक्शा वाले को दे देगा तो मैं उसे अभी खुले करवाकर लौटा दूँगा। लड़का पता नहीं क्या समझा होगा क्योंकि मेरा सम्प्रेषण भी उतना स्पष्ट नहीं रहता किन्तु उसने दस रुपए रिक्शा वाले को दे ही दिए। 
आगे कहानी यह हुई कि वो अपरिचित लड़का बिना इस बात की प्रतीक्षा किए कि उसके दस रुपए मैं लौटा सकूँ, "कोई बात नहीं,  छोड़िए अंकल जी।" कहते हुए दूसरे रिक्शा में बैठकर चला गया। 
चार घण्टे होने को आए हैं, मुझे अब तक लग रहा है जैसे मैं कोई भिखारी हूँ।
घटना साधारण भी लग सकती है और अस्वाभाविक भी, किन्तु सौ प्रतिशत सत्य है। 

रविवार, जनवरी 26, 2020

तुम ले के रहना आज़ादी

15 अगस्त,1947 से कुछ माह पहले तक यह स्पष्ट होने लगा था कि धर्म/भाषा के आधार पर देश का विभाजन होगा। इस अनुमान की स्पष्टता सबसे अधिक उन लोगों के समक्ष थी जो राजनीतिक स्तर पर सक्रिय या कहें कि जागरूक थे, उनके बाद उन लोगों के समक्ष जो आज के भारत-पाक बॉर्डर के निकटवर्ती क्षेत्रों के निवासी थे। विभाजन से प्रभावित हुए सब लोग राजनीतिक स्तर पर बहुत जागरूक नहीं थे, सब लोग इन क्षेत्रों के निवासी भी नहीं थे। अधिसंख्य हिन्दू मोहनदास करमचंद गाँधी के आभामण्डल से इतने सम्मोहित थे कि मन ही मन 'विभाजन मेरी लाश पर होगा' को ब्रह्मवाक्य माने बैठे थे। यह सम्मोहित होना एक प्रकार की निर्भरता का प्रतीक है कि हमने तुमपर अपना दायित्व सौंपकर अपना कर्तव्य कर दिया है। गाँधी की यह छवि सबको suit भी करती थी, अंग्रेजों और मुसलमानों को भी। विभाजन हुआ और कितना शांतिपूर्ण या रक्तरंजित हुआ, यह हम जानते हैं।
धर्म के आधार पर अलग जमीन किसकी माँग थी? वह माँग पूरी होने के बाद भी कौन  सा पक्ष असन्तुष्ट रहा और कौन सा पक्ष इसे एक दुःस्वप्नन मानकर आगे बढ़ने को प्रतिबद्ध रहा? 
मुझे लगता है कि अभी तक हठधर्मिता दोनों पक्षों की लगभग एक समान रही है। वो सदा असन्तुष्ट रहने पर अड़े रहे हैं और हम लुट पिटकर भी सन्तुष्ट होने पर अड़े रहे हैं। दोनों पक्षों की भीड़ की इस मानसिकता, मनोविज्ञान को सबसे अधिक उन लोगों ने समझा है जो जानते हैं किन्तु मानते नहीं। जानते हैं कि दोनों पक्षों में अपेक्षाकृत उत्तम कौन है इसलिए उसे त्यागते नहीं, जानते हैं कि दोनों पक्षों में अपेक्षाकृत निकृष्ट कौन है इसलिए उसे अप्रसन्न नहीं करते। उस पक्ष के लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुखौटा चढ़ाकर AMU में हिंदू की कब्र खुदने की बात कहते हैं, खिलाफत 2.0 के आगाज़ के नारे लिखते हैं, असम को देश से काटने की बात कहते हैं, देश के कानून को न मानने की बात कहते हैं, कश्मीर की आज़ादी मांगते हैं, बंगाल की आज़ादी मांगते हैं और हमारे बीच के 'जानने किन्तु न मानने वाले' हमें बताते हैं कि इन्हें प्यार से समझाया जाना चाहिए, बैठाकर इनसे बात की जानी चाहिए। 
हर नए दिन यह और अधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि अंततः हठधर्मिता हमें ही त्यागनी होगी, हम ही त्यागेंगे। तुम अपने नारों, बयानों पर टिके रहना। इस बार तुम्हारी ताल से ताल मिलाई जाएगी -
तुम ले के रहना आज़ादी,
हम दे के रहेंगे आज़ादी...