रविवार, फ़रवरी 20, 2011

डिफ़रेंट बैंड्स - समापन कड़ी


पिछला भाग

पता नहीं, ध्यान नहीं दिया साथी लोगों ने या फ़िर इग्नोर कर दिया, मैं थोड़ा दूर था, सुना तो मैंने भी और नागवार भी गुजरा। फ़िर उसने दो तीन बार वही जनाना-मर्दाना वाली बात की और कहता ही रहा। जीतू को  जोश आ गया, “आ जा कौन सा खेल खेलेगा, फ़्लैश? आ जा।”

लो जी उतर गया राकेश कुर्सी से और बाकी सब हट गये पीछे। अब वो फ़िर से बिदक गया। “दो लोगों में क्या मजा आयेगा? चाल बढ़ाने वाला कम से कम एक तो और हो।” कोई नहीं माना।  मैं थोड़ा दूर जरूर था लेकिन जब जीतू ने भी कहा कि हां, चाल बढ़ाने वाला तो चाहिये कोई, एक है तो सही लेकिन पता नहीं किसके ख्यालों में खोया हुआ है, तो उठना ही पड़ा। वैसे भी जिसे याद करने की कोशिश कर रहा था, उसका नाम ही स्साला याद नहीं आ रहा था:)  यूँ भी किसी क्षेत्र विशेष के हारे हुये जुये में बहुत लक्की होते हैं,  और यहां तो मर्दानगी का सर्टिफ़िकेट भी अग्रिम में मिल रहा था। अपनी जीत पक्की।

“ले प्यारे, चाल बढ़े न बढ़े, ताल से ताल जरूर मिलेगी।” जीतू के साथ अपना वैसे भी ताल से ताल मिला वाला पुराना आंकड़ा था। नई नई नौकरी थी, पचास पैसे प्वाईंट फ़िक्स करके खेल शुरू कर दिया, स्टैंडर्ड इतना ही था जी हमारा तब(अब उतना भी नहीं रहा)।  बिल्लियों की लड़ाई में बंदर वाली बात करते हुये लगे हाथ एक ओर्डानेंस पास कर दिया हमने कि जीती गई रकम से आज का डिनर और उससे पहले और बाद के सब कार्य संपन्न किये जायेंगे। इस बहाने से सबके स्वास्थ्यवर्धन का हीला भी बनाया गया। पैदल चलने से पुट्ठे पुष्ट हो जायेंगे और बाहर की हवा से फ़ेफ़ड़े खुश हो जायेंगे। बाकी सब बोनस….।  सारे हैप्पी हैप्पी हो गये जी, दर्शक भी और तब के खिलाड़ी भी।

शुरू में बहुत जीता बिहारी बाबू, कह सकते हैं जिताया गया।  जीत्तू हमारा एकदम टिपिकल हिन्दी फ़िल्मों के हीरो की तरह  पहले पिटता रहा, फ़िर जो धुनाई शुरू की तो बस पूछिये मत।  साईड  हीरो तो हम थे ही,  या यूं कहिये मुख्य गायक के साथ संगत देने वाले।  राकेश  जितने जीता था, वो हारा सो हारा,   पल्ले से ढाई सौ रुपये और गंवा बैठा। हमारी उस समय की सैलरी का लगभग पन्द्रह प्रतिशत!   राकेश का चेहरा देखकर दया आने लगी थी और बाकी सब फ़ोकट में तमाशा देख रहे थे।   सब उसकी ऊंची ऊंची बातों से और हर बात में नखरे दिखाने की आदत से  भरे बैठे थे। कोई अमीर है तो किसी को खाने को नहीं देता।    जीतू ने पूछा राकेश से, “देख ले भाई अपनी जेब की गुंजाईश, तुझे तो अभी तनख्वाह भी नहीं मिली है।”  राकेश के आंय बांय करने पर उसने पत्ते पैक कर लिये और डिक्लेयर कर दिया पैक-अप और कंपनी को मार्च करने का आर्डर मिल गया।
लो साहब, चल दी टोली अपनी रोज की आवारगी पर।  शहर में पहुंच गये तो डिनर से पहले का कोर्स पूरा करने को सूप वगैरह की कोई रेहड़ी तो थी नहीं, जूस वाले के पास जाकर जूस का आर्डर किया। पेमेंट की बात आई तो राकेश बाबू कहने लगे कि अभी आप कर दीजिये पेमेंट, फ़िर हिसाब करते हैं। अपने को तो खैर कोई दिक्कत नहीं थी इसमें, काहे कि रैपूटेशन बहुत शानदार थी अपनी। घर से निकलते तो पान वाला,   किराने वाला, सब्जी वाला, फ़ल वाला, जूस वाला, हलवाई, धोबी, नाई कहिये तो हर तबके के लोगों से नमस्ते मिलनी शुरू हो जाती थी(सबके पैसे दाब रखे थे:))     और पिछली वसूली करने के लिये अगली उधारी नहीं बंद होनी चाहिये, हमरी न मानो तो मनमोहना से पूछो। विश्व बैंक, मुद्रा-कोष सब जगह ऐही फ़ार्मूला चलदा है। पिछला कर्जा वापिस लेना है तो नया खाता चालू करो।

तो जी हम उस समय कुटिल नहीं थे, हम तो लिखवा ही देते अपने खाते में, लेकिन जीतू अड़ गया। आखिर आधा घंटा पहले ही मर्द होने का अवार्ड मिला था उसे। राशन पानी लेकर चढ़ गया राकेश पर, दोस्तों में जो नहीं कहना चाहिये वो तक कहने लगा। राकेश का पहला बहाना था, हम आने से पहले कपड़े नहीं बदल पाये, पैसे दूसरे कपड़ों में रह गये हैं। जवाब मिला, “ये तेरी सरदर्दी थी, तुझे देखना था। अब जाकर ले आता हूं मैं। तुम सब यहीं रुको।”  राकेश ने रोक लिया,  “अभी हैं भी नहीं इतने पैसे, सेलरी मिली नहीं है न अभी।”  जवाब मिला, “बात तय करने से पहले सोचनी थी अपनी गुंजाईश। क्यों खेला इतना दाँव?”   राकेश बोला, “हम तो मजाक कर रहे थे।”    जीतू के साथ राजा भी कूद पड़ा, “अब हम मजाक करेंगे। तेरा कुर्ता  उतारकर इस जूस वाले के पास रखा जायेगा। पायजामा ढाबे वाले के पास। बनियान पान वाले के पास और फ़िर किसी की कुछ मीठा खाने की इच्छा हुई तो हलवाई के पास भी….।”   फ़ौजी भाई भी अपने पिक्यूलियर नाश्ते की इतनी आलोचना सुन चुका था कि इस योजना को मूक समर्थन दे रहा था। लगे हाथों वो भी कह उठा, “कल नाश्ता भी तू बनाईयो और बंक में ले जाण खातिर रोटी टिक्कड़ की भी तेरी जिम्मेदारी।” 

सबको सीरियस देखकर राकेश गिड़गिड़ाने लगा, “भूल हुई हमसे, इस बार बात जाने दीजिये।”  सबका एकमत से फ़ैसला था, “नो रिलैक्सेशन।” वो रोने को हो आया। हो हुज्जत देखकर बगल के पी.सी.ओ. का मालिक आ गया, चिंटू। हमसे तीन चार साल छोटा था, लेकिन बैडमिंटन खेलता था हमारे साथ और अपना खास बंदा था एस.टी.डी. के चक्कर में:)  सब देखकर मुझसे कहने लगा, “भाई साहब, जान छुड़वा दो बेचारे की। गरीब आदमी है।” हम थोड़ा सा मौका-ए-वारदात से अलग होकर बात कर रहे थे,  मैंने कहा, “वाह बेटे, मोहब्बत हमसे और हिमायत इसकी? ये गरीब दिखा तुझे, जानता नहीं तू इसको। बड़े तगड़े घर से है, आढ़त,  ठेकेदारी, प्रिंटिंग प्रैस, बाग-बगीचे हैं इनके। सिनेमाहाल में भी हिस्सेदारी है इसकी।”  चिंटू बोला, “भाईसाहब, बाकी सब मैं नहीं जानता। हाँ, सिनेमा हाल वाली बात के बारे में जानता हूँ कि इसके पापा वहाँ गेटकीपर हैं। मेरे यहाँ से फ़ोन करता रहता है, इसलिये जानता हूँ।” मैं गया, उसे  घेरे से निकालकर लाया और चिंटू के सामने उससे पूछा, “उस सिनेमा हाल का नाम बताओ जिसमें  तुम्हारे परिवार की हिस्सेदारी है।”  वो फ़ूट फ़ूटकर रोया, “मैं सब बता दूँगा साफ़-साफ़, अभी मुझे इन से बचाईये।” कह दिया जी हमने अपनी टोली से कि इसका बाकी मुकदमा अड्डे पर लौटकर, अब कोई कुछ नहीं कहेगा। मुश्किल से आज मौका हाथ आया था सबके, मन मसोसकर रह गये थे सब। असंतोष था साथियों के मन में, आपस में बातचीत न के बराबर हुई।  उस दिन जैसा बेस्वाद खाना हमने कभी नहीं खाया। सिगरेट भी एकदम मीठी लगी उस दिन, बेस्वाद।

लौटकर फ़िर से वही पैसों के हिसाब किताब की बात छेड़ी जीतू-राजा ने और अब मुझे चुप रहने की हिदायत देकर सारे कपड़े और बैग झाड़ा उसका, चिल्लर वगैरह मिलाकर एक सौ सत्तर-अस्सी रुपये निकले। बकाया रकम के बराबर की जली कटी सुनाई गई और वो आंसू टपकाता रहा। सुबह ऑफ़िस के लिये निकले तो अपना इकलौता बैग उसके कंधे पर था। लंच से पहले उसके पैसे उसे लौटा दिये मेरे दोस्तों ने, दिल के बुरे नहीं थे|    दोस्तों में अपना इतना कहना काफ़ी था कि बहुत हो गया ड्रामा अब इसके पैसे इसे लौटा दो, नहीं तो मैं अपने पास से दे दूंगा। सबक सिखाना जरूरी भी था और आज तक उन सबको ये नहीं मालूम कि उसके घर के असली हालात क्या थे। राकेश ने आंख नहीं मिलाई लेकिन पैसे ले लिये। अपनी तरफ़ से भाषण दे दिया उसे कि झूठी शान कभी कभी महंगी पड़ जाती है। और जुए जैसी चीज तो जो न करवा दे वो थोड़ा।

दोस्तों में  किसी को याद भी नहीं होगी अब उसकी, हफ़्ते दस दिन के लिये ही आया था हमारी जिन्दगी में।  बाई चांस कुछ दिन में ही उसका ट्रांसफ़र हमारे हैड आफ़िस से एक ब्रांच में हो गया था तो रोजाना का इंटरैक्शन भी खत्म हो गया। मेरे पास कभी कभी फ़ोन जरूर आ  जाता था। उस ब्रांच से जब कोई स्टाफ़ आता था तो अपने बिहारी बाबू का हालचाल जरूर पूछते थे हम। और जब सामने वाला बताता था कि यार, है तो वो बहुत तगड़े घर से, आढ़त,  ठेकेदारी,  प्रिंटिंग प्रैस,  बाग-बगीचे , ट्रांसपोर्ट और पता नहीं क्या-क्या  हैं उसके परिवारवालों के, सिनेमाहाल में भी हिस्सेदारी है  बस हरकतें टुच्ची सी हैं उसकी,      तो मेरे यार बहुत हँसते थे। अच्छा! ट्रांसपोर्ट भी खोल ली उसने?      मैं शायद उदास हो जाता था(बहाना भी तो चाहिये होता है गमजदा होने या दिखने के लिये:) ),   हम दुनिया वालों ने ही सिखाया होगा न उसे कि खुद को एक ब्रांड की तरह न दिखाये तो उसकी कदर नहीं होगी।  

ये सब लिखने का मतलब राकेश या उस जैसे लोगों की आलोचना नहीं, सबके अपने सच हैं और अपने विश्वास। और अपना तो यही मानना है कि वो आसानी से बदलते भी नहीं।  सबको अपने अपने सच, अपने यकीन, अपने मूल्य और अपनी मान्यतायें मुबारक। मैं लिख रहा हूँ तो अपने नजरिये से लिखा मैंने, राकेश बाबू कहीं लिख रहे होंगे तो अपने नजरिये से हमें बेवकूफ़ बनाने के किस्से लिख रहे होंगे या सुना रहे होंगे।

खैर, हमारा साथी तो नहीं ही बदला लेकिन मैं बदल गया। आजकल जमीन से थोड़ा ऊपर होकर चलता हूँ,  बात-वात करने का अहसान तो कर देता हूं दूसरों पर,  कोई  पास आने की कोशिश करे या हँसी-मज़ाक करने की कोशिश करे तो वहीं हूल दे देता हूँ उसे – ओये,  होस में रहकर बात कर। जानता नहीं है किससे मजाक कर रिया है? अब हम पैले वाली नईं रै गये, अब हम से बड्डे बड्डे नैसनल, इंटरनैसनल लैवल के बिलॉगर,  धरम करम वाले, लाज शरम वाले,  दवा-मरहम वाले  मजे लेते हैं:))  

चलो जी हटाओ ये सब, आज सुनो एक और फ़ेवरेट गज़ल

35 टिप्‍पणियां:

  1. pahle shayad kabhi aana nahi hua...aaj aakar achha laga...aapki samvedna namneey hai....sadhuwaad

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  2. 'जिस कुएं में बाल्‍टी गिरी है, उसीमें कांटा डालो' सिद्धांत का पालन करने वालों की कमी नहीं और फिर-फिर पहुंच जाते हैं वहीं.

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  3. राकेश की तरह झूठी शान में जीने वाले बहुत मिल जाते हैं। स्वाभाविक तौर पर इनसे नफरत भी होती है और गुस्सा भी आता है।
    आप के संस्मरण में सबसे अच्छा आप का निष्कर्ष लगा। सच है जब इनकी पोल खुल जाती है और असलियत सामने आ जाती है तो ये एकदम से दयनीय हो जाते हैं। एक किस्म की मानसिक व्याधि और हीन भावना है जो ये अपने इर्द गिर्द एक आभासी दुनिया रच लेते हैं।
    सलाम आपकी कलम, आपके अनुभव और आपकी सोच को।

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  4. लोगों के अपने अपने नजरिये होते हैं जिसके अनुसार ही उनका व्यवहार हो जाता है...

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  5. अभी भी यह समझ नहीं आया कि अंग्रेज़ी कहावत में में नाइस गाईज़ फिनिश लाइन में लास्ट क्यूं रह जाते हैं|

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  6. राकेश जी के ब्लॉग का पता बताना| और कुछ नहीं तो एक धाँसू टिप्पणी तो लिख ही आयें!

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  7. मेरा व्यक्तिगत अनुभव है की पढ़े-लिखे लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों की आम तौर से अपने घर बार के विषय में बहुत बढ़ा चढ़ा के बातें करने की आदत होती है. खुद के बारे में इस प्रकार से बढ़ा चढ़ा के बात करने वाले लोगों के लिए मेरी मित्र मंडली में एक जुमला अक्सर उछाला जाता है की इन भाई साहब के गाँव में इनकी ५२ बीखे में पुदीने की खेती है. हो सकता है की उनका एहसास- ए- कमतरी उन्हें इस तरह की बात करने के लिए मजबूर करता हो. खैर अपने विषय में कोई कितनी भी डींगे मार ले सत्य तो कभी न कभी सामने आता ही है. अंत में अनुराग जी से सीखी एक बात यहाँ लिख दूँ सत्यमेव जयते, नानृतम.

    नोट : मेरे उपरोक्त विचार आपके लेख को पढ़ कर ही उत्पन्न हुए हैं जिन्हें मैं "तेरा तुझको अर्पण" वाली तर्ज पर यहाँ टिपण्णी रूप में दर्ज कर रहा हूँ. इस टिपण्णी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य नहीं है. आप इसे उधार में दी गयी टिपण्णी समझ कर प्रतिउत्तर में मेरे ब्लॉग पर टिपण्णी करने के लिए बाध्य नहीं हैं.

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  8. आज तो प्रेमचंद की कहानी ग़बन का पात्र निकलकर आ गया...ऐसे ही बड़बोलेपन और एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों की बदौलत अपनी ज़िंदगी क्या से क्या बना ली थी... राकेश जैसे लोग दरसल सहानुभूति के पात्र होते हैं... पिताजी बताते थे एक टिम्बर मर्चेंट की कहानी, जो पता चला कि स्टेशन पर दातून बेचता था... नीम के टिम्बर का व्यापारी!!

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  9. चलते चलते विडिओ के विषय में भी लिख दूँ की इस बार ये बहुत ही साफ़ और बड़ा बड़ा दिख रहा है और ग़ज़ल के हीरो को देख कर मन में यही विचार आता है की इतने सुन्दर और भाव प्रवण चेहरे-मोहरे वाला लड़का कहाँ खो गया जबकि इमरान हाश्मी जैसा बदसूरत अभी भी फिल्मों में डटा हुआ है.



    नोट : मेरे उपरोक्त विचार आपके लेख को पढ़ कर ही उत्पन्न हुए हैं जिन्हें मैं "तेरा तुझको अर्पण" वाली तर्ज पर यहाँ टिपण्णी रूप में दर्ज कर रहा हूँ. इस टिपण्णी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य नहीं है. आप इसे उधार में दी गयी टिपण्णी समझ कर प्रतिउत्तर में मेरे ब्लॉग पर टिपण्णी करने के लिए बाध्य नहीं हैं.

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  10. अजीब सा लगा, वैसे उतना अजीब नहीं है शायद। राकेश बाबू जैसे लोग सबको कहीं न कहीं मिल ही जाया करते हैं। पर फिर आप ठीक ही तो कहते हैं, हम दुनिया वालों ने ही सिखाया होगा न उसे कि खुद को एक ब्रांड की तरह न दिखाये तो उसकी कदर नहीं होगी।
    सच है, सबके अपने सच हैं और अपने विश्वास।
    पर कुछ सच ज्यादा ही सच होते हैं। :)


    "All animals are equal but some animals are more equal than others.." courtesy George Orwell, "Animal Farm"

    आज की इस पोस्ट के लिए (जारी बिना :)) बहुत सारा आभार।

    PS: अनुराग जी की बात पर याद आया, किसी ने कभी New Zealand के fair play award जीतने(लेकिन series हारने) पर उनके cricket captain Daniel Vettori से पूछा: "Why do nice guys usually finish last?"

    जवाब था: "I think someone has to clean up the mess. The next generation needs a hygienic world to live, not just record books. But then, no business is finished till you hang your boots." :)
    ऐवे ही याद आ गई बात।

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  11. आज मैं सीरियसली सिरिअस हूँ...
    आपके आलेख की जितनी भी तारीफ़ करूँ कम ही होगी....सबकुछ पढ़-समझ कर यही लगता है..आप एक सच्चे हृदय के इन्सान हैं...
    आज आपने मेरी मन पसंद ग़ज़ल लगाई हैं...
    कुछ शेर इस ग़ज़ल के बहुत ही खूबसूरत हैं..

    झूठवाले कहीं से कहीं बढ़ गए
    और मैं था कि सच बोलता रह गया
    जाने क्यूँ ये शेर मुझे बहुत पसंद है....

    आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
    ये दीया कैसे जलता हुआ रह गया ...
    और ये भी...
    हृदय से आभारी हूँ आपकी..

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  12. अपनी अपनी समझ के अनुरूप ही लोग व्यवहार करते हैं.

    रामराम.

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  13. राकेश जी जैसे लोगो पर तरस आता है, अपनी झूठी शान के लिए ये लोग क्या क्या नही करते है,
    आपकी दयालुता को नमन
    मजे ले रहे हो आप भी, लेते रहो

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  14. @ योगेंद्र मुदगिल जी:
    दादा, आपनै आड़ै देखके जी स्या आ गया। आभार आपका।

    @ राहुल सिंह जी:
    राहुल जी, बाल्टी निकालनी भी तो होती होगी, मजबूरी है:)

    @ सोमेश सक्सेना:
    नफ़रत नहीं होती सोमेश, प्राय: दया ही आती है(क्योंकि देर सवेर सच सामने आ ही जाता है)। अभी आज ही एक टैंपो के पीछे लिखा देखा एक स्लोगन्म जिसका हिंदी तर्जुमा कुछ ऐसा था कि ’हमारे सलाम दिलवालों के लिये हैं, अकड़ वालों का कुछ काम नहीं।’ आधी से ज्यादा बार तो सलामें लेने के लिये ही हम लोग एक छद्मावरण ओढते हैं।
    मिल गया तुम्हारा सलाम:)

    @ भारतीय नागरिक:
    सही कहा सर जी। आपका ब्लॉग नहीं खुल पा रहा है परसों से ही। कभी malware लिखा आता है और कभी ’for invited guests only' -कुछ करिये।

    @ स्मार्ट इंडियन:
    नाईस ब्वाय्ज़ वाली बात का जवाब वैरी वैरी नाईस ब्वाय ने दे दिया है:)
    ब्लॉग एड्रैस मालूम नहीं जी उसका, पता नहीं है भी कि नहीं। और होता भी तो क्यों देता जी आपको? ऐसे बंदों की कंविंसिंग क्षमता बहुत होती है, आपको भी हाईजैक कर लेता वो तो हमारा क्या होता? :)

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  15. @ विचारशून्य:
    आपका व्यक्तिगत अनुभव बहुत महत्व रखता है। अनुरागजी से जो सीख ली है, वो भी सराहनीय है। गज़ल के हीरो के बारे में जो शंका जाहिर की है, उसके पीछे कोई भी कारण हो सकता है, यहां तक कि रिलेशन मैनेजमेंट, गुटबंदी, तकदीर, तदबीर कुछ भी।
    और बंधु ये नोट लिखने के पीछे क्या लॉजिक है? ये आपके हस्ताक्षर हैं या सिर्फ़ मेरे लिये ही है ये संदेश? वैसे बाध्यता से मुक्त करके मनों, टनों भारशून्य कर दिया है आपने, देखते हैं:))

    @ चला बिहारी....:
    सलिल भैया,सौ प्रतिशत सहमत हैं आपसे। वैसे हौंसलों की उड़ान भी तो परिलक्षित होती है ऐसे व्यवहार से, कम से कम पता तो रहता है कि बंदा क्या बनना चाहता है। ये भी एक एंगल है, क्या ख्याल है आपका, जानेंगे आपसे..।

    @ Avinash Chandra:
    अनुज कहता हूँ तो मेरे हिस्से का उत्तर देने के लिये आभार तो नहीं
    ही कहना बनता। कहा होगा विट्टोरी ने, हमें शायद उसकी कही बातों में उतना बढ़िया न लगता। लेकिन जो तुम्हें ’ऐवे ही याद आ गई बात’ तो ये बहुत जमी:)
    सैल्यूट टू डैनियल विट्टोरी(अविनाश के लिये तो बहुत बहुत स्नेह ज्यादा बढ़िया काम करेगा)।

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  16. आपकी ब्लॉगिंग का अंदाज़ बाक़ी से जरा हट के है।
    राकेश का चित्र अभी भी आंखों के सामने झूल रहा है।
    ...और ग़ज़ल के क्या कहने, जगजीत सिंह जी तो मखमली सुरों के मालिक हैं।

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  17. संजय जी,
    अच्छा आलेख. सामान्य मानव स्वभाव का स्वाभाविक चित्रण.
    राकेश जैसे लोग प्रायः टकराते रहते हैं. कोई हीनता ग्रंथि ही होती है इसके पीछे.

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  18. हम भी ऎसे रईसो को उनकी हद तक पहुचाते है .और रुपय वापिस करने का कोई सवाल भी नही अपन तो शठे शाठयम समाचरेत को मानने वाले है

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  19. मेरे पति के अंडर में एक व्यक्ति काम करता है उसका कहना है की शोलापुर में कही उसकी करोडो की जमीन है उस लिहाज से वो करोड़पति है किन्तु सब पट्टीदारो के साथ क़ानूनी पचड़े में फंसा है इसलिए यहाँ उसे मामूली सी कुछ हजार की नौकरी करनी पड़ती है उसका व्यव्हार भी वैसा ही होता है किसी को कुछ समझता नहीं है | मेरे पति के अलावा वो एम डी के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करता है की मेरे सामने तुम लोगो की कोई औकात नहीं है | मुझे नहीं मालूम की ये लोग ऐसे व्यक्ति को कैसे झेलते है | होता ये है की कुछ लोगो की अपने शहर गांव में काफी नाम या पहचान होती है उस बल पर सम्मान मिलाता है किन्तु जब वो कही और जाते है तो उन्हें कोई पहचानने वाला नहीं होता ऐसे में वो इस तरह की शान बघार कर उस सम्मान और पहचान को पाना चाहते है |

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  20. लीजिये हुकुम !
    हम भी टपक पड़े डाइरेक्ट बिहार से एक्सक्लुसिवली लाइव :P
    जरा कारोबारी सैर-सपाटे पर थे पिछले दिनों, सो गायब थे।

    पढा, धुना और गुना ! और गज़ल से सारी थकान गुल हो गयी …… "क्या कहें। और कहने को क्या रह गया " :)

    नमन !

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  21. @ अदा जी:
    अरेरेरे...आप तो सीरियस हो गईं:)
    देवीजी, बड्डे बड्डे, नेशनल इंटरनेशनल ब्लॉगर्स वाली बात मजे में ही कही थी(लक्ष्य जरूर आप, अनुराग सर, दीपक ही थे):))
    सीरियस होने में सीरियस बात ये है कि फ़िर हमें भी ऐसा ही होना पड़ेगा, सीरियसली सीरियस:)
    सच्चे हृदय जैसी कोई बात नहीं, हम भी इसी दुनिया के हैं जी। आप का बहुत शुरू से ही सपोर्ट मिला है, सच में आभारी तो मैं हूँ आपका। आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतर सका,बहुत बड़ी बात होगी मेरे लिये।
    गज़ल की बात कहें तो, आप इतना खूबसूरत लिखती हैं, गाती हैं - आपकी गज़ल आपकी आवाज में सुनने की फ़रमाईश पहले भी कर चुके, फ़िर से करते हैं। हम लिख नहीं पाते, गा नहीं पाते तो सुनकर अपने शौक पूरा कर लेते हैं। आपको पसंद आई, तो हमारी पसंद पर मुहर लग गई। बहुत बहुत शुक्रिया।

    @ ताऊ रामपुरिया:
    ठीक सै ताऊ, जिसकी जैसी गुंजाईश उसकी वैसी सोच।
    रामराम।

    @ Poorviya:
    कौशल जी, गज़ल पसंद करने के लिये शुक्रिया।

    @ Deepak Saini:
    ठीक किया न दीपक? दयालुता... ले लो मजे तुम भी:)

    @ mahendra verma ji:
    आप जैसों के पास अनुभव है, ज्ञान है। अपने पास यही आपबीतियां हैं सर, ठेल देते हैं। आप लोग झेल लेते हैं, आभार व्यक्त करता हूं।

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  22. झूठी शान कई बार ऐसे निकलती है ,मगर लोग सुधरते कहाँ हैं ...!

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  23. "मैं लिख रहा हूँ तो अपने नजरिये से लिखा मैंने, राकेश बाबू कहीं लिख रहे होंगे तो अपने नजरिये से हमें बेवकूफ़ बनाने के किस्से लिख रहे होंगे या सुना रहे होंगे"

    असली बात तो यही है सरजी. हम ट्रेन में बैठे होते हैं तो अपनी ट्रेन भी चले तो कई बार बाजू वाली ट्रेन चलती दिखाई देती है. वैसे ही है, आपने मान लिया लोग मानते नहीं हैं. बढ़िया रही डिफरेंट बैंड्स की बात. आप का बदलाव सही डायरेक्शन में है :)

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  24. confused hoon....mixed reactions....shuru mein hansi aayi thi, phir bura laga aur phir swabhavik bhi. ghalat hai is tarah jhoothi shaan dikhana, kyunki kabhi na kabhi pil zarur khulti hai, aur tab bahut buri halat hoti hai. par is aadat se baaz aa pana bhi aasaan nahin, jab zindagi le aati hai aise logon ke beech, jo for natural reasons hamse behtar hain, to aasaani se apni heenta sweekar nahin hoti....i dunno wut to say honestly, mujhe nahin pata main kya bak bak kar rahi hoon ;)

    im jus gonna shut up now....hihi

    और पिछली वसूली करने के लिये अगली उधारी नहीं बंद होनी चाहिये, हमरी न मानो तो मनमोहना से पूछो।

    ahhaa..... ;)

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  25. कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं होती
    ऐसे ही राकेश अब भी वही डींगें मार रहा होगा
    कभी-कभी मैं भी कोशिश करता हूँ ऐसे ही :)


    प्रणाम

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  26. @ prkant:
    कोई भी परफ़ेक्ट नहीं है, हम भी नहीं। और ये बहुत सामान्य लक्षन हैं। जब तक ऐसे लोग हावी होने की कोशिश न करें तब तक कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत तब ही होती है जब ऐसे लोग दूसरों को नीचा दिखाने की या इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।

    @ dhiru singh ji:
    आप की तो बात ही क्या है, बड़े भाई हैं आप हमारे:)

    @ anshumala ji:
    हमने तो ऐसे भी देखे हैं जो A स्थान पर जाकर B स्थान की अपनी झूठी सच्ची गुडविल और फ़िर B स्थान पर जाकर A स्थान की गुडविल भुनाते हैं। एक उदाहरण तो हम खुद ही हैं। यहाँ ब्लागजगत में बाहर के किस्से सुनाकर खुद की दयालुता, भलमानसहत, चातुर्य की हां भरवा लेते हैं आप जैसों से, बाहर जाकर इन टिप्पणियों को एन्कैश कर लेते हैं:))
    बाई द वे, कहीं पढ़ा था कि कुछ लोग रविवार को कम्प्यूटर से दूर रहते हैं:))

    @ रवि शंकर:
    आओ अनुज, खुशामदीद। कारोबारी सैर-सपाटा - बोले तो ऐश विद कैश। तुम घूमो फ़िरो बिरादर, जो यहाँ रह गया, रह गया।

    @ वाणी गीत:
    वाणी जी, जो सुधर गई वो आदत ही क्या?

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  27. अभावों में जी रहा व्यक्ति कभी कभी सपने बुन लेता है और उन्ही सपनों में जी लेता है.
    मुझे तो सच में दया आती है राकेश जैसे पात्रों पर.

    बहुत ही उम्दा शैली में आपने कहानी कही.
    बधाई.

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  28. दिक्कत ये है कि वह खुद ही खुद को बड़ी स्क्रीन पे प्रोजेक्ट करने का यत्न करके अपने कांच वाले फ्रेम से बाहर आ गया है ! अब कांच तो कांच ही है ना जहां सामने वाले में रौशनी देखी खुद को चमका लिया !

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  29. @ Abhishek Ojha:
    चाचू, मजे लेने वाले ईंटरनेशनल ब्लॉगर्स में आप भी शामिल हो, बदलाव तो आया ही है:)

    @ saanjh:
    confused ho, iska matlab intelligent ho.
    अभी कुछ दिन पहले ऐसा एक बहुत अच्छा कमेंट पढ़ा था, हम तो खुद को इंटैलीजेंट समझने लगे हैं तबसे:)

    @ अन्तर सोहिल:
    तुम अकेले नहीं यार, हम सब ऐसे ही हैं, कोई कम कोई ज्यादा।

    @ sagebob:
    सपने देखना तो अच्छी बात ही है,नींव में अगर सच हो तो फ़िर ईमारत बनने में कोई शंका नहीं। आपको पसंद आया तो हमारा लिखा सार्थक हो गया। धन्यवाद।

    @ अली साहब:
    सही पहचाना आपने रोशनी और रोशनदान को:)

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  30. बहुत सुंदर ... .उम्दा शैली में आपने कहानी कही.
    बधाई.

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  31. पैर उतना ही पसारना चाहिए जितनी चादर हो ... रोचक रही कथा ... खैर आल इस वेल !

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  32. tippani panhuchi nahi.....ab samajh aa raha hai...

    koi baat nahi 'dil to toota hai' par kabhi...kahin...aur 'impressed' ho lena ......sah-rashi hone par itna to bharosa kar sakte hain...

    pranam.

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  33. @ शिवकुमार (शिवा):
    अच्छी कहानी बताने का आभार।

    @ इन्द्र नील भट्टाचार्य:
    चाहिये तो ऐसा ही जैसा आपने कहा, लेकिन लंबे पैरों का क्या करें सरकार:)

    @ प्रवीण पाण्डेय:
    एकदम टैक्नीकलर है जी:)

    @ संजय झा:
    समझा नहीं बंधु, थोड़ा क्लियर करते। भरोसा है, उसकी कोई कमी नहीं, बेफ़िक्र रहो:)

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