मंगलवार, अप्रैल 17, 2012

A syndrome that is called .....(ladies, excuse me please this time) बवाल-ए-बाल


A syndrome that is called ...............................................(ladies, excuse me please this time)
This post contains details about a syndrome that is called 'standing hair syndrome' or 'straight hair syndrome.'   It is quite a common syndrome found almost in every human, but in some cases its intensity is very high and we have confined our study to such cases only. This type of syndrome urges the holder to do one trick or another with a sole intention of trembling the existence of others at any cost. Though this study is at a primary stage uptill now,  but it has capability to gain attention at a higher level in coming future. For further details, please refer to mskpedia(under publication) at some later stage.  In the meantime, this post can be a help.


मास्टरजी ने पूछा, "मिट्टी कितने प्रकार की होती है?" 
सब ने किताबों में पढ़ी बातें दोहराईं काली मिट्टी, पीली मिट्टी, लाल मिट्टी, दोमट मिट्टी वगैरह वगैरह।
फ़त्तू सूनी आँखों से सब देख रहा था। मास्टरजी ने उसे खड़ा किया और ललकारा, "ओ खागड़, सारे ज्ञान बघार रये सैं, तू भी किम्मै बक दे। 
फ़त्तू नरम सी आवाज में बोल्या, "मास्टरजी, यो सब बताण लग रये सैं घोट्या ज्ञान, मैं मेरे तजुरबे से बताऊँ सूँ कि माटी तीन तरह की होई सै इब तक  - खराब माटी, बीरान माटी और रेहरेह माटी।"
सुनकर मास्टरजी ने फ़त्तू की बैकग्राऊंड पे कई लात लगाईं और चौथी प्रकार की माटी ’पलीद माटी’ से भी उसका परिचय करवा दिया।

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बालक के बाल बहुत बड़े हो रहे थे और कटिंग कराते समय गर्दन बहुत हिलाता था| जब कहो कि डर मत तो जवाब मिलता कि डरता नहीं हूँ, गुदगुदी होती है।  छुट्टी के एक दिन उसे लेकर सैलून पर गया और हज्जाम को इशारा कर दिया कि बाल छोटे छोटे कर दे। हिलन डुलन तो पहले की तरह हुई लेकिन दिमाग में एक बात का सुकून था कि अगली बार कुछ ज्यादा दिन के बाद सैलून लाना होगा। घर लौटे तो मालूम चला कि तीन दिन के बाद ही रिश्तेदारी में एक फ़ंक्शन है और सपरिवार जाना जरूरी है। बाकी सब दिक्कतों के अलावा एक दिक्कत उसके खड़े बालों को लेकर भी आई तो टीवी में देखा एक विज्ञापन याद आया और हेयर जैल लाकर खड़े बालों की समस्या का इलाज किया गया। MTV   या fashion TV पर कभी नजर जाती तो अब ध्यान जाता कि इसी जैल का इस्तेमाल करके नई पीढ़ी बाल खड़े भी कर लेती है। अब हमारा दिमाग ठहरा खाली और खाली दिमाग को बताया गया है ’शैतान का घर’ तो इसी सब्जैक्ट पर पुरानी कोई बात और कोई बंदा याद आ गया, झेलो अब।

यूँ तो हर नई कक्षा में पहुँचते पहुँचते हम कई रेज़ोल्यूशन लेते थे (जैसे नये नये विधायक, सांसद गोपनीयता, पद और पता नहीं काहे काहे की शपथ लेते हैं) और जल्दी ही हर रेज़ोल्यूशन को अगले साल के लिये मुल्तवी कर देते थे लेकिन इस बार बात कुछ अलग ही थी। दसवीं के बाद स्कूल वालों ने बढ़िया सा कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट इशू करके हमें बिना डोली के नये घर की ओर रवाना कर दिया था, तो इस बार सुधार के इरादे थोड़े पक्की टाईप के थे। नया स्कूल, सब नये चेहरे और नया एडमिशन सिर्फ़ एक - ये खाकसार। पहले दिन खूब रैगिंग हुई और हमने भी जमकर मजा दिया + लिया। धीरे धीरे अपन भी रम गये उन्हीं अनजान चेहरों में जो अब जाने पहचाने लगने लगे थे। क्लास में हंगामे होते ही रहते थे और गौर किया तो हर हंगामे में एक कॉमन फ़ैक्टर होता था जिसे सब ’खबा’ कहकर बुलाते थे। ’खबा’ अजीब सा नाम था, कुछ दिन के बाद इस बारे में दरियाफ़्त की तो बताया गया कि खबा बोले तो ’खड़ा बाल।’

आपको यकीन नहीं होगा लेकिन यह उपाधि सुन तो रखी थी लेकिन इसका मतलब नहीं मालूम था। जब साथियों से पूछा तो सब बहुत हँसे लेकिन किसी ने बताया नहीं। यही कहा कि कुछ दिन इस बंदे के कारनामे देखता रह, समझ आ जायेगा। अब करते हैं ’खबा’ की बात। भावहीन, सपाट चेहरा, और बोलता भी बहुत कम था। ये अलग बात है कि क्लास में रोज कम से कम दो छात्रों की डांट फ़टकार होती, पहला कोई भी हो सकता था लेकिन दूसरा हमेशा ’खबा’ ही होता था। टीचर पढ़ा रहे होते और वो चुपचाप बैंच के नीचे झुककर किसी के जूतों के तस्मे आपस में बाँध देता, किसी की कुर्सी खींच लेता। किसी की कोई किताब किसी दूसरे के बैग में पहुँच जाती, कोई सवाल जवाब के लिये सीट से उठता तो बैठने से पहले उसकी सीट पर पेन, कंपास या कोई संतरा, अंगूर जैसी रस छोड़ने वाली चीज रख देता। कितना ही सावधान रह लिया जाये, वो कमजोर कड़ी ढूँढ ही लेता। और फ़िर रोज वही ड्रामा, टीचर के सामने डांट फ़टकार और बाद में मुक्का लात, अगले दिन से या कहिये कई बार अगले पीरियड से ही फ़िर वो किसी कर्मयोगी की तरह अपने काम में मनोयोग से जुट जाता।

एक क्लास में थे तो कई बार एक ही बस में सवार भी होना पड़ता। अपना ध्यान इसी बात में लगा रहता कि वो क्या करेगा और उसने हमारा अंदाजा कभी गलत होने भी नहीं दिया। सवारियों में ही किसी का रुमाल निकालकर जूते साफ़ करके उसे लौटा देता तो कभी और भी हाई(लो) क्लास की हरकत। एक बार हम लोगों ने उसे प्रस्ताव दिया कि तू एक दिन क्लास में किसी स्टुडेंट से शरारत न कर, छुट्टी के बाद आज हमारी तरफ़ से कचौड़ी की दावत तो कुछ नहीं बोला। हाँ, एकाऊंट्स के मास्साब जब बोर्ड पर कुछ लिख रहे थे तो चॉक के तीन टुकड़े दनादन उनके सिर पर जाकर ऐसे लगे जैसे अमेरीका द्रोन हमले करता है। मास्साब भी पुराने थे, और किसी से पूछा ही नहीं, सीधे उसे क्लास से बाहर का आर्डर दिया। खड़ा होकर बोला, "मैंने मारा तो मेरी तो सजा बनती ही है लेकिन जिसने शर्त लगाकर उकसाया था, उसे भी बाहर कीजिये।" नतीजतन दोनों जनों को बाहर जाकर कचौड़ी पर विमर्श करना पड़ा कि कचौड़ी पर हक बनता है कि नहीं। उसका कथन था कि किसी स्टूडेंट को तो कुछ नहीं कहा, मतलब साफ़ था कि ’अ’ को कुछ कहने से समझाया\सुझाया जायेगा तो वो ’ब’ को निशाना बनायेगा। छह महीने के अंदर अंदर मुझे ’खबा’ के ’खबा’ होने का और इस एब्रिवियेशन का मतलब समझ आ गया।

इतना जरूर हुआ कि जिससे परेशान होकर कभी लोग पूछते थे कि ’खबा’ है क्या?’ हमारे सौजन्य से  अब उसे यूँ कहा जाने लगा कि इनसे मिलिये, ये इस स्कूल के ’खबा’ हैं:)

एक बार कहने लगा कि उसके पडौस में एक हास्य कवि सम्मेलन है, सबको चलना होगा। गर्मियों का समय था, प्रोग्राम बन गया। रात का कार्यक्रम था, पहुँच गई हमारी टोली। आयोजन स्थल एक मंडी में था और फ़्री का तमाशा देखना यूँ भी हम हिन्दुस्तानियों का पुराना शगल है तो बहुत से रिक्शा ठेली वाले भी भीड़ में खड़े होकर कविता पाठ का नजारा ले रहे थे। ’खबा’ को पता नहीं क्या सूझी, हमें लेकर पास की ही एक नाई की दुकान पर ले गया। फ़व्वारा लेकर पहले तो सबके सिर ठंडे किये, बाल सैट किये और फ़िर नाई से कहने लगा, "ताऊ, एक पुराना ब्लेड दे दे।" ताऊ ने भी सोचा कि सस्ते में मुसीबत टल रही है, खुश होकर दे दिया। हम सब हैरान थे कि ब्लेड से किसकी जेब काटेगा? पूछो तो कुछ बताना यूँ भी उसका स्वभाव नहीं था। आदमी उसूलों वाला था, work more talk less. भीड़ में जाकर खड़े हो गये और श्रद्धानुसार दृष्य-श्रव्य आनंद लेने लगे कि एकदम से नजदीक में कुछ हलचल हुई, देखा तो एक आदमी जो बनियान और पायजामें में था वो अपना पायजाम संभाल रहा था जोकि घुटनों तक गिर चुका था। भीड़ हंस रही थी और वो सकपका रहा था कि "ससुर नाड़ा टूट गवा"।  दो ही मिनट बाद ’खबा’ कवर प्वाईंट से फ़ाईन लेग पर पहुँच गया और अगले ही पल एक और का "ससुर नाड़ा टूट गवा" ।   जगह बदलती रही और पायजामे गिरते उठते रहे। हाथ में वो सफ़ाई थी कि जेबतराशी के धंधे में जाता तो बंदा छा ही जाता।

एक उसका पड़ौसी लड़का भी हम लोगों के साथ था, उसने बताया कि रविवार को जब टीवी पर रामायण आती है तो सारी दुनिया टीवी देखती है और ये हजरत उस समय पतंग उड़ाते हैं। मैंने लॉजिक पूछा तो उसने बताया कि पतंग उड़ायेगा तभी तो किसी के एरियल में फ़ँसेगी। मैं सोच रहा था कि कितनी मेहनत का काम करता है बेचारा, पतंग उड़ायेगा, उसे झोंका देकर किसी के एरियल में उल्झायेगा फ़िर एरियल को जोर जोर से हिलायेगा तब कहीं जाकर संबंधित टीवी में तस्वीर हिलेंगी। धन्य हो प्रभु।

स्कूल छूटा, साथ छूटा। कभी कभार उसके बारे में खबर मिलती रही कि पढ़ाई छोड़ दी उसने, कभी ये काम कर रहा है तो कभी वो काम। हम सब जिन्हें वो परेशान करता था और जिनका मनोरंजन भी करता था, सब कहीं न कहीं सैट हो गये और वो अपनी आदत के चलते अपनी ही दुनिया में मगन रहा। कहाँ समझ पाया कि आज उस की हरकतों से हँसने वाले हम जैसे बहुत खुदगर्ज लोग हैं, मतलब निकालेंगे और निकल लेंगे। और तो और, ये न हों तो दूसरों को अच्छा कौन कहेगा? यूँ भी कोई शहद से मरता हो तो उसे जहर कौन देता है? हाँ में हाँ मिलाये जाओ और दूसरों को टार्गेट बनवाये जाओ।

एक बात और, औरों की तरह उसकी भी शादी हुयी और कुछ दिनों के बाद पता चला कि शायद छत्तीस गुण मिलाकर ही रिश्ता हुआ होगा, वो उससे भी इक्कीस निकली। वो निकल ली और ये फ़िर भी नहीं बदला। पहले  शायद वो शौक से शरारतें करता होगा, अब फ़ितरत हो चुकी होगी।

देखा जाये तो ऐसी फ़ितरत वाले लोग हर जगह मौजूद हैं, इल्मी दुनिया हो या फ़िल्मी दुनिया, ये दुनिया यो वो दुनिया। दूर क्यों जाया जाये, अपने आसपास ही देख लीजिये, कई मिल जायेंगे। गिनती में बेशक कम हों लेकिन अपनी सशक्त मौजूदगी दर्ज कराते हुये।  और लोग ही क्यों कई ग्रुप, संगठन, राष्ट्र भी इसी मानसिकता से पीडि़त हैं। जरूरत है तो ये  बात समझने  की कि ये ऐसा करते क्यूँ हैं? और हम कैसे रिएक्ट करते हैं? एक बात सबको समझ लेनी चाहिए कि किसी को पसंद करना ना करना अपने अख्तियार हो भी सकता है लेकिन असहमति सभ्य तरीके से भी दी जा सकती है। अब असहमति वाले नाराज न हो जाएँ, इसलिए अभिव्यक्ति वालों को भी सलाह दी जा सकती है कि अभिव्यक्ति भी सभ्य, शालीन तरीके से की जा सकती है। हो सकता है कि दोनों तरह के लोग समझ जाएँ, और ये भी हो सकता है कि दोनों तरह के लोग बिगड़ जाएँ, इसलिए इस सलाह को  हम अपना नजरिया बताये दे रहे हैं।  किसी को बुरी लगे हमारी बात तो हमें माफ़ कर दे और दो रोटी ज्यादा खा ले,  कित्ता सिंपल फार्मूला बता दिया है, है न?


सकारात्मक विचार आ रहे हों तो हम भी ये सोच लेते हैं कि ऐसे दो चार न होते तो हमारी जिंदगी कितनी नीरस हो गई होती और नकारात्मक विचार आ रहे हों तो हम सोचते हैं कि सारी लाईमलाईट तो ये ले गये:)   अब देखिये न, पिछले दिनों ब्लॉगजगत में इत्ती हॉट वेव्स चल रही थीं और हमारा नेट ही मौके पर धोखा दे गया, हम रह गये वैसे ही ठंडे के ठंडे,  अब आये हैं तो कारवां गुजर गया, गुबार भी देखने  को नहीं मिल रहा है। कोइ पोस्ट डिलीट हो गयी, कोई अदल गयी तो कोई बदल गयी :(        कोई बात नहीं,  यहाँ के ’खबा’ लोगों पर अपने को पूरा भरोसा है। बाल-बवाल खड़ा करना कौन सा कुंभ का मेला है जो बारह साल बाद आयेगा, थोड़े दिन इस गर्दो गुबार को बैठे हुये होंगे कि फ़िर से कोई खड़ा हो जायेगा, तब देख लेंगे।   

खैर, कुछ हमने खोया तो कुछ आपने भी खोया है। इत्ती महंगाई में पहली बार ए.सी. खरीदा है, माईक्रोवेव खरीदा है, एक इस्त्री(इस्त्री ही पढ़ा जाये, कहीं कोई एलोवैरा वाली से कन्फ़्यूज़ न हो जाये ) खरीदी है, एक फ़ूड प्रोसेसर भी खरीदा है और इन सब के साथ अलग अलग कोण से फ़ोटो खिंचवाकर ब्लॉग में लगाने का इरादा था लेकिन मेरी बात रही मेरे मन में। वैसे अपने को पूरा यकीन है है कि आप सबने जो खोया, उसके लिये अफ़सोस जरूर हो रहा होगा।   बहरहाल, चिंता की कोई बात नहीं, अंडरवियर खरीदने का प्रोग्राम बना रिया हूँ, तब सही। अंडरवियर के साथ अपनी तस्वीर आपको पेश करूँगा क्योंकि थोड़ी बहुत बोल्डनेस तो आ ही चुकी है और अगर किसी सज्जन या .....  को एतराज हो तो पहले बता दे, हम दूसरे विकल्प(बिना ....)  पर विचार कर लेंगे, क्योंकि हमारा स्वभाव तो आप जानते  ही  हो, भुरभुरा सा है।

आपकी शुभेच्छाओं का अभिलाषी - मो सम कौन कुटिल खल कामी..

p.s - फ़त्तू को प्रोमोट करके पोस्ट के ऊपर ले आये हैं। कोई हमारी कैटेगरी का विद्वान इस बात पर टोक सकता है कि पोस्ट बालों पर तो फ़त्तू को काहे माटी में लपेट रखा है तो उसका जवाब ये है कि बालों से संबंधित बात भी कही जा सकती थी लेकिन अभी इतनी भी बोल्डनैस नहीं आई है, थोड़ी सी शर्म बची हुई है आँखों में..

सुनिए हमारा एक पसंदीदा गाना,  ना  प्रेम गीत और ना नफरत गीत 
                                 

41 टिप्‍पणियां:

  1. वाह मियां लौटे हो तो पूरे दमखम के साथ। छा रिये हो मियां।

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  2. जेब्बात! फत्तू और गाने की वापसी के बीच खड़े बाल की रेतवाली चुड़ैल (सैंडविच) देर से ही सही मगर अच्छे टेस्ट में है! कमाल है संजय!! तुम्हारा ये अन्दाज़ देखने को तरस जाते हैं हम.. और जब सबसे ज़्यादा कमी खलती है तभी जाल डाल (नेट डाउन)देते हो. वैसे अब समझ में आया कि बदला ही नहीं तुम्हारी पोस्ट भी वो पुलाव है जो बासी होने पर ही मज़ा देती है!! छा गए!!

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  3. हा हा हा ...
    सच में, बहुत इंतज़ार करवाते हैं आप
    बड़ी 'बोल्ड' पोस्ट लिख दी..हम तो डिस्क्लेमर देख कर सोचने लगे थे, कुछ पल के लिए, लेकिन मन में विश्वास था, डर की कोई बात हो ही नहीं सकती...
    आपसे एक बात आज कह देते हैं, इस ब्लॉग जगत के लिए आप 'आक्सीजन' हैं...निर्मल ताज़ी हवा का झोंका...कहीं कोई संशय, झूठ, फ़रेब नहीं...सबकुछ निष्कलंक...हम जैसे ब्लोगर्स की खुशकिस्मती है, कि आप ब्लॉग जगत से जुड़े हैं...आप पर अभिमान होता है..माफ़ी चाहूँगी, थोड़ी भावुक हो गईं हूँ आज...बहुत दिनों के बाद, मुस्कुराने का मौका दिया आपने...वर्ना इधर कुछ दिन बहुत भारी पड़े थे...
    आपका स्वागत है, संजय जी..
    सादर..

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  4. संजय भाई आज तो आपकी जय बोले बिना काम कोनी चालेगा, खडा बाल देखते ही हँसी रुकती ही नहीं है, जबरदस्त विस्फ़ोट, महीने भर इसे पढते रहेंगे और और बाकि कहे बिना समझ जाओ।

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    1. हमारी जय बोलने वाले की हम दो बार जय बोलेंगे, तभी तो गुलशन का कारोबार चलेगा:)
      जाट देवता की जय जयकार।

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  5. इस ब्लॉग जगत के लिए आप 'आक्सीजन' हैं...निर्मल ताज़ी हवा का झोंका...कहीं कोई संशय, झूठ, फ़रेब नहीं...सबकुछ निष्कलंक...

    अदा जी के कथन से मैं भी सहमत हूँ ....
    कहाँ गायब रहते हो ??

    शुभकामनायें ....

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    1. यहीं रहते हैं भाईजी आपकी नगरी के आसपास, कभी आपके उत्तर में तो कभी आपके पश्चिम में।

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  6. BHAI SAHAB AAPANE BAATO HI BAATON MEN BADE PATE KI BAAAT KAH DI .
    S.AMJHANE WALE SAJHA GAYE NA SAMAJHE WO ANARI HAIN

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  7. देर आयद, दुरुस्त आयद. ये हॉट वेब्स थीं किधर. मुझे भी पता नहीं चला. लेकिन खबा वाला किस्सा हमेशा याद रहेगा.

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  8. फत्‍तू लाजवाब. संयोग है (अली सैयद जी प्रकाश डालना चाहेंगे?) ''खबा'' से मेरी मुलाकात हुई, फोटू भी उतारी हुई है जी, खाली-पीली बात नहीं है, वह मेल से भेज रहा हूं आपको.

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  9. वाह खबा क्या चीज हो, सहता जग परिहास ।
    कितना भी चैतन्य हो, तुम लेते हो फांस ।

    तुम लेते हो फांस, शर्त की खाय कचौड़ी ।
    नाड़ा देते काट, दूर की लाते कौड़ी ।

    जौ-जौ आगर जगत, मिले ना तेरा अब्बा ।
    खब्ती-याना दूर, गोल कर दे ना डब्बा ।।

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    1. भाई रविकर छा गये! क्यों न हो? जहाँ न पहँउचे रवि वहाँ पहुंचे कवि, और जब रवि ही कवि हो तो क्या बात है!

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    2. कुश भाई, सही पकड़ा रवि कवि वाला प्वाईंट। रविकर जी की आशुकवितायें गज़ब हैं।

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  10. खबा से परिचित हुए...क्या -क्या नया ख़रीदा , यह भी जान लिया , बस तस्वीरें ही रह गयी ...
    हॉट सीज़न की कसक रह गयी , कोई गल नहीं जी , कुछ लोंग सक्रिय होते हैं तो गर्मी बनी ही रहती है , फिर मौका मिलेगा :)
    और गीत तो शानदार है ही ...जो अच्छा लगे , अपना लो , बुरा लगे उसे जाने दो ..
    कम्प्लीट पैकेज !

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  11. एक पोस्ट में इतनी सारी बातें पढ़कर छूटी कसर पूरी हो गयी।

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  12. ha..ha...ha....

    ise kahte hain "der aayad durust aayad"...........

    man kilkit...pulkit....pramudit bhaya......

    "jis ke kalam me dhar kam o mudde ko kalam karne me lage rahte hain jabariya link dekar"........

    pai lagoon.

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    1. अबकी बार चंडीगढ़ आना हुआ तो गले लगना नामराशि, पिछली बार तो सक्रियता औजार काम ही नहीं कर रहा था:)

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  13. yeh khaba ki nai subah hai...aaj kal hai kaha khada baal...


    jai baba banaras...

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  14. मस्त!!!

    एक 'खबा' अपने जीवन काल में लाखों को 'सबु' बना देता है। सबु? अरे भई 'सजग-बुद्धि'

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  15. बहुत ही शातिर शिकारी है 'खबा'... चाहे क्लास हो या घर, किसी की छत हो या फिर मंडी, हर जगह आसानी से अपने शिकार खोज लेता है!

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  16. हे भुरभुरे स्वभाव वाले संजय :)
    ताऊ के बाद एक आपका ही ब्लॉग है जिसके अपडेट होने का बेसब्री से इंतजार करता हूं। वर्ना आज हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में रखा क्या है........... :)

    नीचे p.s. देकर फत्तू को बालों तक खींच ही लिया और बिना सुनाये भी दूसरे चुटकले पर भी हंसा ही दिया।

    कई बार बाल-बवाल पूरी स्क्रिप्ट लिखकर साजिश के तहत भी हुये हैं। ये भी एक फार्मूला है ;)

    प्रणाम स्वीकार करें

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  17. अब इत्ता बढ़िया-बढ़िया चीज खरीदेंगे तो घर का माहौल कूल कूल होइये जायेगा ! मूड बढ़िया हो जाय तो बढ़िया लिखा ही जायेगा। इत्ते दिन बाद इत्ता खरच कर के एक पोस्ट बढ़िया लिख लिये तो कौन बड़ा तीर मार लिये ? दू चार और ऐसी ही पोस्ट लिख के दिखाइये तब माने की आप पूरे रौ मे आ गये हैं:)

    वैसे इसकी बधाई दे दें वरना आप हमें कंजूस समझेंगे।..बहुत बधाई।

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  18. भाई! नुक्क म्हारे ’खबा’ के parallel वाले के किस्से लिखे न जा सकें हैं..! नईं तो कसम से मजे की तो क्या मजाल है? ’मज़ा सा’ आ जात्ता..!

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  19. Struggled with this syndrome for so many years in the past, and those were DD days, with no set-wet (or call it my ignorance). Can I please get a feed or notification subscription of mskpedia (hardly matters when it launches)? :)

    जबरदस्त!
    लौटा है फत्तू! जलवे भी दिखायेगा, २-४ लातों से उसका नहीं बिगड़ना कुछ।
    खबा की बातें बहुत मजेदार है, खबा के सौजन्य से कही बातें भी। अच्छा है जो आप ऐसे लिखते हैं, स्वाद देर तक घुला रहता है।

    यदि ऐसा ही होता है तो भुरभुरा स्वभाव ऐसा ही रहे, आमीन!

    P.S. लेबल में बाल नहीं है, और माटी है! वाह रे फत्तू के जलवे! :)

    P.P.S. कल बड़े भाई कह रहे थे, quantity is important. At least here, I agree! :)

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    1. वैसे बड़े भाई का quantity वाली बात का कहना तुम्हारी पोस्ट के लिये था and still I stand on my point at least there:)

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  20. आपकी पोस्‍ट का करेक्‍टर- "खबा", इसे पेटेन्‍ट करा लीजिए, किसी फिल्‍म वाले की निगाह पड़ गयी तो यह फिल्‍मी करेक्‍टर बनते देर नहीं लगेगी। क्‍या खाका खींचा है! कुछ पोस्‍टों के बिना ब्‍लाग जगत सूना सा लगता है, मन में उदासी सी छायी रहती है। आज सारे ही बल्‍ब जल गए हैं, कुछ लिखने का भी मूड बनने लगा है। एकाध और ठोक दीजिए ऐसा ही कुछ, तो पूरा मूड बन जाए, हम भी लौट आएं अपने पुराने ढर्रे पर। बहुत उम्‍दा, बधाई।

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    1. अजीत दी, अभी कुछ दिन पहले ही एक सहकर्मी कह रहा था कि ’संजय जी, आप कोई फ़िल्म डाईरेक्ट करोगे तो सच में बहुत कामयाब होवोगे’(मेरे बैंक में कोई नहीं जानता मेरी इस ब्लॉग लिखाई के बारे में) - उसको तो ट्रीट दे दी, अब आप कभी दिल्ली आयें तो दर्शन दीजियेगा।

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  21. sir, aapko pad ke maza aata hai.
    @antar sohil, aapne sahi kaha.

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  22. शुक्रवारीय चर्चा-मंच पर

    आप की उत्कृष्ट प्रस्तुति ।

    charchamanch.blogspot.com

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  23. ये सबा तो एक छात्र को क्लास से निकवाकर अपनी शर्त हार गया। एयर कंडिशंड पोस्टों का इंतज़ार है।

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  24. :) :) :) :)
    वैसे - कमाल है - आप बोल्ड नहीं हैं ? पता नहीं यह "बोल्डनेस" पर कित्ते दिनों तक हवा चलती रहेगी यहाँ ?

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  25. सार्थक चिंतन ... खबा से परिचय मज़ेदार रहा

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  26. बाऊ जी,
    नमस्ते!
    फत्तू का पिछवाड़ा और आँखों की शर्म!!!
    हा हा हा...
    आशीष
    --
    द नेम इज़ शंख, ढ़पोरशंख !!!

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  27. रेगिस्तान में नख़लिस्तान सा आनंद।

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  28. khaba se milkar achchha laga , lekin bade hokar log shararat ko shararat nahin samajhte.

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  29. बिन्दास !
    दुआ है कि खबा को उसकी निकली हुई बीबी वापस मिले। भले ही बाद में एक बार फ़िर से निकल ले।

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  30. अच्छे खासे खबा से पाल पड गया.तबीयत मस्त मस्त ...

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  31. हमारा भतीजा भी खबा बनने की बात कर रहा था - जय हो जेल्ली की

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