रविवार, अक्तूबर 21, 2012

छोटी सी ये दुनिया....

उस शाम घर वापिसी के लिये स्टेशन पहँचे  तो पहले से स्टेशन पर पहुँचा साहनी बहुत खुश दिखाई  दिया। हम सब चिंता में डूब गये|  जिस दिन साहनी खुश दिख जाता था उस दिन या उससे अगले दिन जरूर हम लोगों में झगड़ा होता था। डरते डरते वजह पूछी तो पता चला कि सर्दियों के चलते कोई एक्सप्रेस गाड़ी अपने निर्धारित समय से घंटों देर से चल रही थी और आज हमारी रोज वाली पैसेंजर गाड़ी के टाईम पर वही आ रही है।  चहकते हुये उसने समीकरण बताया  - आज पैसेंजर ट्रेन की जगह एक्सप्रेस में सफ़र करने को मिलेगा + दिल्ली पहँचकर गाड़ी बदलने का झंझट नहीं रहेगा = घर पहँचने के रोज के टाईम से कम से कम डेढ़ घंटा पहले घर पहँचेगा यानि कि  हुण मौजां ही मौजां। मैंने खुद को अगले दिन होने वाली लानत-मलानत के लिये तैयार करना शुरू  कर दिया।

अगला दिन, समय वही और जगह भी वही। हम  सब भी वही,  बस हमारा साहनी अपनी स्वाभाविक मुद्रा से भी ज्यादा स्वाभाविक रूप से रौद्र दिख रहा था। ट्रेन में बैठे, पत्ते बँटने शुरू हुये कि शर्मा ने मुझे इशारा किया और हम शुरू हो गये।

पत्ते बाँटते बाँटते मैंने पूछा, "साहनी साहब, कल तो जरूर भाभी ने पकौड़े बनाकर  खिलाये होंगे?"

"क्यों,  बारात आनी थी उसकी? पत्ते बाँट चुपचाप।"

"अरे, कल तुम्हें  डेढ़ घंटा पहले घर पहुँचा देखकर खुश हो गई होगी, इसलिये पूछा। तुम तो यार ऐसे गरम हो रहे हो जैसे ..।"

भाई का पारा चढ़ने लगा था, "मुझे पता था उंगली किये बिना मानना नहीं है तूने। खेल में ध्यान नहीं लगा सकता क्या? खाना खाते समय और ताश खेलते समय बोलना नहीं चाहिये।"

"अच्छा यार, मैं नहीं बोलता। बिगड़ तो ऐसे रहा है जैसे पता नहीं क्या पर्सनल अटैक कर दिया हो। अच्छा, ये तो बता दे कि कल घर किस समय पहुँचा था?"

":रोज वाले टाईम पर, साढ़े आठ बजे। नहीं बोलूँगा कहकर भी सवाल पूछे जा रहा है। अब मत पूछियो कुछ।"

"बोलने से मना किया था तुमने, पूछने से नहीं।  कल तो एक्सप्रेस गाड़ी थी, फ़िर भी रोज वाले टाईम पर? कहाँ चला गया था?"

"मुझे गुस्सा मत दिला यार, चुपचाप पत्ता फ़ेंक।"

"कभी बोलने से मना करता है तो कभी पूछने से। चल ठीक है यार, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जहाँ और जितना दिल करे, उतने धक्के खा।"

"मैं क्यों धक्के खाऊँगा?  हमारे स्टेशन पर बेंच नहीं है क्या? या उस पर मैं थोड़ी देर बैठूँगा तो रेलमंत्री के पेट में दर्द हो जायेगी? ले, सुन ले सारी बात। सात बजे उतर गया था तेरी उस एक्सप्रेस वाली  गाड़ी से, फ़िर सोचा जल्दी घर पहुँच गया तो बेकार में वो सौ तरह के सवाल पूछेगी इसलिये वहीं बैठ गया। फ़िर जब रोज वाली ट्रेन आई तो मैं भी उठकर अपने घर चला गया। तुम खेलो यार, मेरा मूड नहीं है अब खेलने का।" सबने बहुत समझाया लेकिन साहनी अपनी जबान का पक्का था, उस दिन नहीं ही खेला। अगले दिन से धीरे धीरे उसे फ़िर पटरी पर ले आये।

इस बात से साल भर पहले हमारी भाभीजी ने एक बार अपने लिये चप्पल मँगवाई थी। शाम को लौटते समय साहनी ने कहा कि मेरे साथ बाजार चलो, सात नंबर की लेडीज़ चप्पल लानी है। शर्मा कहने लगा, "कौन सी कंपनी का सात नंबर? हर कंपनी का अपना अपना स्केल होता है, बाटा का सात अलग होता है और लखानी का अलग। मुझे तो कभी  चप्पल खरीदनी होती है तो नंबर की बजाय हाथ से अपनी मिसेज के पैर का साईज़ नाप लाता हूँ। एकदम सही साईज़ मिलता है फ़िर, नंबर का झमेला ही नहीं।" साहनी को बात जम गई  और चप्पल खरीद एक दिन के लिये मुल्तवी हो गई। अगले दिन बाँया हाथ-दायां हाथ का कन्फ़्यूज़न हुआ, पैमाईश का नया फ़ार्मूला धागे वाला निकला और शॉपिंग एक दिन और टल गई। तीसरे दिन  हम पाँच बंदे एक जोड़ी चप्पल खरीदने गये। दुकानदार को धागा दिखाकर साईज़ समझा दिया गया और साथ ही सिफ़ारिश भी कर दी गई कि रेट बेशक अपनी मर्जी का लगाये लेकिन चप्पल ऐसी होनी चाहिये कि जोर से भी लगे तो आवाज कम  से कम आये। दुकानदार ने वताया  कि आजकल  ऐसी लेडीज़ चप्पल ही ज्यादा बिकती हैं, ज्यादा आवाज और कम चोट वाली तो जेन्ट्स चप्पल आती हैं।  पुरुषत्व के सुपीरियरीटी कॉम्प्लेक्स के चलते  साहनी  समेत हम सब बहुत खुश हुये। साहनी भी खुश हुआ था नतीजतन हमेशा की तरह अगले दिन फ़िर हम लोग किसी बेकार सी बात पर बहुत उलझे।

ये तो हुई भूमिका, अब आते हैं मुख्य घटना पर।  एक दिन शाम को स्टेशन पर पहुँचे और गाड़ी के आने का सिग्नल भी हो चुका था। दूर से गाड़ी आती दिखने लगी। स्टेशन से थोड़ा पहले ही हार्न बजाती हुई गाड़ी रुक गई और देखते देखते इंजिन के पास भीड़ इकट्ठे होने लगी। हम प्लेटफ़ार्म पर ही ताश खेलने में मस्त रहे, साहनी भीड़ का हिस्सा बनने चला गया। काफ़ी देर के बाद लौटा, जैसा कि अंदेशा था उसने बताया कि कोई बेचारा गाड़ी के नीचे आकर मर गया है। कोई जवान लड़का था, सामने से रेल आते देखकर भी जल्दबाजी में साईकिल लेकर पटरी पार करने लगा और...।  साहनी बता रहा था कि एकदम नई साईकिल थी बेचारे की। हमें अफ़सोस हुआ लेकिन उतना ही, जितना अखबार में ऐसी कोई खबर पढ़कर होता है। ट्रेन आई और सब फ़िर से  महती कर्म में जुट  गये। साहनी ने फ़िर से उस लड़के की बात छेड़ी, "बेचारा जवान लड़का था। घर से पता नहीं किस काम से निकला होगा लेकिन मौत पर किसी का बस नहीं  चलता है। साईकिल भी एकदम नई थी जैसे अभी ही खरीद कर लाया हो।"  एक बार फ़िर से सबने दुख प्रकट किया। साहनी चूँकि मौके पर देखकर आया था वो उस मंजर को भुला नहीं पा रहा होगा, कुछ देर बाद  फ़िर से उसने वही बात छेड़ी और साथ ही नई साईकिल की बात भी। बेध्यानी में मैं कह उठा, "यार, तू ऐसा कर कि अगले स्टेशन पर उतर जा और दूसरी ट्रेन से वापिस चला जा। साईकिल वहीं रखी होगी, तेरा ध्यान उस साईकिल में ही फ़ँसा है तो ले आ जाकर।" साथी लोग जोर जोर से हँसने लगे, साहनी सन्न रह गया और मैं ...।

अगला स्टेशन आने पर  उसने अपना बैग उठाया और कोच से उतर गया। उस दिन के बाद उसने हम लोगों के साथ आना जाना, बोलना खेलना सब छोड़ दिया। शुरू में दो चार दिन हम लोगों ने उसे साईकिल का नाम लेकर उकसाने की कोशिश भी की लेकिन वो चुपचाप वहाँ से चला जाता। फ़िर धीरे धीरे उसके और हमारे रास्ते अलग अलग हो गये।  जिन्दगी अपनी रफ़्तार से उसकी भी चलती रही और अपनी भी,  लेकिन एक बोझ सा सीने पर रहा ही। 

पिछले सप्ताह मेट्रो से उतरकर बैंक जा रहा था तो "अबे, संजय है क्या?" कहकर उसने आवाज लगाई तो एक बार तो मैं भी पहचान नहीं पाया। शायद पन्द्रह साल बाद मिले होंगे, दुनिया सच में बहुत छोटी हो गई है।  पांच सात मिनट वहीं बस स्टैंड पर खड़े खड़े ही बातचीत हुई। मैंने कहा कि यार उस दिन मुझसे गलती हुई, मुझे ऐसा नहीं बोलना चाहिये था तो वो मुस्कुराने लगा।    

हालचाल पूछने के बाद बताने लगा,  "आज ड्यूटी से छुट्टी कर रखी है। नया स्कूटर खरीदने जा रहा हूँ।" 

मन तो किया कि कह दूँ, "क्या फ़ायदा होगा  तेरे नया स्कूटर खरीदने से?  घर तो वही पुराने टाईम पर जायेगा।" लेकिन हाथ मिलाकर इतना ही कह पाया, "यार, ध्यान से चलाना, ट्रैफ़िक बहुत है आजकल।" 

सैकड़ों हजारों पत्थरों में से एक पत्थर और उतरा, चलो कुछ तो बोझ कम हुआ। सौ टके का सवाल ये है कि बेशक  छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं, क्या ऊपरवाला हमेशा और हर बार इतनी मोहलत देता है कि अपनी गलती मान सकें? जवाब अगर हाँ है  तो कीप मिस्टेकिंग  को कीप इट अप रखेंगे और अगर जवाब न में है तो क्विट। 

हमने ये भी सोचा कि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू तो आप सबके सामने इतनी बार बन चुके, एक अध्याय ऐसा भी सही। :)

गाना सुनो यार, बहुत दिन हो गये उल्टा सीधा लिखते पढ़ते हुये..
                                                                          
                                   
                                                             

77 टिप्‍पणियां:

  1. बाऊ जी नमस्ते!
    अब लगता है गड्डी राईट है! टाईम वी ते ट्रैक वी!
    जो भी ऊँगली आप करते हो साहनी के या सिंधवानी के, बीमा करा लो उसका!

    --
    ए फीलिंग कॉल्ड.....

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    1. हमारी गड्डी ट्रैक पर\से चढ़ती उतरती ही रहती है:)

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  2. ओह्ह्ह ..

    किन्तु आपके मन पर इतने वर्षों अपने मुंह से अनजाने निकली एक बात का बोझ रहा न ? 15 साल बाद भी मिलने पर आपने उनसे अपनी गलती स्वीकार की न ? does that not say something about you as a person ? बेध्यानी में बहुत कुछ हो जाता है , मुंह से कुछ निकल जाता है, और फिर बस हम मन मसोसते रह सकते हैं, कुछ कर नहीं सकते ।

    वैसे तो लोग जानते बूझते दूसरों को चोट पहुंचाने के लिए बातें कहते हैं, और माफ़ी माँगना तो खैर दूर रहा, मन में भी उन्हें कभी नहीं लगता कि उन्होंने कुछ गलत किया है । आपसे तो फिर भी ग़लती से गलती हुई थी । वह भी अभी से 15 साल पहले, meaning आप तब उतने mentally matured न रहे होंगे, बोले तो बचपना :(

    मैं हमेशा यही सोचती हूँ कि , जो शत्रु बने होते हैं, वे तो व्यक्ति को सिर्फ बाहरी पीड़ा ही पहुंचा सकते हैं । किन्तु जो मित्र हो जाते हैं, उनकी पहुँच तो मन तक हो जाती है - उनकी दिए घाव बड़े गहरे होते हैं । क्या किया जाए - वह कहते हैं न - दुनिया है, होता है, चलता है ......

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    1. मित्रों को शुक्रिया ही कहना चाहिये जी, mental maturity लाने में सहायक होते हैं।

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    2. यह भी ठीक है - तो ऐसे सभी मित्रों को आपके ब्लॉग के माध्यम से ही धन्यवाद कर देती हूँ जिन्होंने मेंटल मच्युरिटी दिलाने में सहायता पहुंचाई ... वे जानते ही होंगे कि वे कौन हैं :)

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  3. पैर की चप्पल, चप्पलवाली को साथ ले जाया जाय। आदतें बदलने में बहुत खतरा है।

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    1. चप्पलवालियों को अपने फ़ैसले\अपनी शॉपिंग खुद ही क्यों न करने दिये जायें? :)

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  4. हम तो सोच रहे थे आप सुनाओगे "वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गई"

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    1. वो भी सुनायेंगे पी.एन. सर कभी न कभी।

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  5. रचना भी बढिया और गाना भी क्योंकि आज 3जी था तो सुन लिया नही तो कहां इतनी स्पीड की गाना सुन सकें

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    1. 3जी तक भी हमारा धन्यवाद पहुँचे मनु भाई।

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  6. अब लग रहा है कि दुनिया गोल है. वाकई!

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  7. संजय भाई!! क्यों ऐसा लगता है हर बार तुम्हारी पोस्ट पढकर कि अपनी ज़िंदगी की बीती किताब पढ़ रहा हूँ.. क्यों लगता है कि मैं बादशाह अकबर हूँ और तुम अबुल फज़ल.. आज तुम्हारी सीने का बोझ उतरता देखा तो अपने सीने का पत्थर और भारी लगने लगा.. मिला भी, समय भी था, कोई आस-पास भी नहीं था.. लेकिन हौसला नहीं हो पाया.. शायद यह बोझ कभी उतर ही नहीं पाए इस सीने से..
    पोस्ट पढकर 'वाह क्या बात कही है' कहना तो बहुत आसान है, लेकिन दिल के बोझ को दूना कर गया यह सोच पाना बहुत मुश्किल है..
    सुनके वो शहजाद के अशआर सिर धुनता रहा,
    थामके हम दोनों हाथों से जिगर देखा किये!

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    1. ऊपर वाला देखता है कि कौन बोझ उठाये रख सकता है और कौन नहीं, शायद इसलिये मुझपर मेहरबान भी रहता है।
      हम सब समझते हैं कि बर्नाड शॉ की तरह ये आपका सामने वाले को रिलेक्स करने का फ़ार्मूला है, वरना आप किसी को गलत बोल ही नहीं सकते। हमारे इश्टाईल में बोले तो ’U R incompetent to talk nonsense' :)

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    2. (:(:(


      aap sath hi salil bhaiji........suruat bare bindas cha interesting shaili me dete hain......lekin ant aate-aate
      ek gahri 'uchhavas'/'tis' ke saath chor jate hain...


      'always feel a face reading to you'.......


      pranam.

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  8. वाह!
    आपकी इस ख़ूबसूरत प्रविष्टि को कल दिनांक 22-10-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1040 पर लिंक किया जा रहा है। सादर सूचनार्थ

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  9. किस्सागोई का धर्म निभाना कोई आपसे सीखे!

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  10. इस चटपटी पोस्ट में आवाज कम और चोट तेज है बाऊ जी !
    शुभकामनायें !

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  11. इतनी ईमानदारी से अपनी गलती को कबूल करना भी बड़ी बात है . वो भी बरसों बाद आँख में बालू कसकता है २० एम् एम् की गिट्टी नहीं

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    1. आँख में बालू कसकता है २० एम् एम् की गिट्टी नहीं - क्या कहने इस पंक्ति के।

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  12. बहुत खूब!
    मीत हमारे हाथ छुड़ाकर
    दूर कहाँ जा पायेंगे
    दुनिया छोटी हुई जा रही
    किसी मोड़ मिल जायेंगे

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  13. कभी कभी मजाक मजाक में हम किसी के दिल को भारी ठेस पहुंचा देते हैं... उसका एहसास हमे तुरंत हो जाता है.. लेकिन कहते हैं न तीर कमान से और शब्द जुबान से निकल गये तो बस निकल गये....
    सामने वाले से क्षमा मिलने पर ही थोडा सा ठीक ठीक फील होता है वरना तो आप समझते हैं....

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    1. @ कभी कभी मजाक मजाक में हम किसी के दिल को भारी ठेस पहुंचा देते हैं...
      हाँ - ऐसा हो जाता है । पर उनका क्या जो मज़ाक में नहीं, जानते बूझते अपनी सुपीरियोरिटी के गुमान में यह करते हैं, और लगातार करते रहते हैं ?

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    2. ऐसे लोग तो क्षमा ही नहीं मांगते होंगे... और उन्हें क्षमा किया भी नहीं जाना चाहिए...

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    3. ऐसे लोगों को उनके घर\घेरे में जो करते हैं, करते रहने दिया जाये:)

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  14. मिलेगा कभी मौका! बस यही आस है...

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    1. अभी तक तो गलती सुधारने का मौका मिलता रहा है, आगे भी मिले तो अच्छा ही है।

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    1. देर से आना फायदेमंद रहा पोस्‍ट पर टिप्‍पणियों की रोचक सजावट भी मिल गई.

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  16. @ कीप मिस्टेकिंग

    बिलकुल असहमत , गलतिय सबक लेने के लिए होती है दोहराए जाने के लिए नहीं ,जब अपनी गलती मान ली यानि बात समझ में आ गई तो कभी भी गलतियों को दोहराना नहीं चाहिए , आगे से हर बात के लिए ज्यादा सावधान होना चाहिए , कहते है न दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है । दूसरी बात 15 साल लगा दिये एक छोटी सी बात कहने के लिए तब तक इंतजार क्यों किया की गोल दुनिया में दोस्त घूम कर फिर आप से मिले । इस किस्से को पढ़ कर पता चला रहा है की आप की कहानियो का नायक क्यों छोटी सी दिल की बात को कहने के बजाये इतना लम्बा इंतजार करता है और कभी कभी तो कहता ही नहीं है ।

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    1. असहमति के लिये धन्यवाद, ’असहमति अच्छी हैं’ :)
      पन्द्रह साल का ए़क्सक्यूज़ आगे अदाजी के कमेंट पर देता हूँ, फ़िलहाल किस्सा\कहानी\नायक\छोटी सी बात\लंबा इंतजार पर हमारा एक्सप्लेनेशन ये है कि बिना कहे भी जब बात पहुँच जाती है तो कहने की जरूरत क्या है? वैसे भी हम कोई सनदयाफ़्ता लेखक थोड़े ही न है जो एकदम परफ़ेक्ट लिखेंगे:)

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    2. कहने का अर्थ ये था की आप की कहानी का नायका भी छोटी बातो को कहने के लिए भी इतना विचारता है क्योकि उन्हें लिखने वाला भी इतना सोचता है , कहानी के परफेक्ट होने न होने की बात नहीं की है , ऐसा आप को लगा हो तो फिर से माफ़ी :)

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    3. हे राम!!
      सबको सन्मति दे भगवान :)

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  17. दुनिया वाकई बहुत छोटी है...सब बदलता रहता है...और हम उसी जगह अटके रहते हैं जहाँ पर जिसको छोड़ा है...

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    1. हम अटके रहते हैं और दूसरा पूरी दुनिया घूमकर फ़िर से हमें पा लेता है, वहीं जहाँ छूटे थे।

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  18. मन तो किया कि कह दूँ, "क्या फ़ायदा होगा तेरे नया स्कूटर खरीदने से? घर तो वही पुराने टाईम पर जायेगा।" लेकिन हाथ मिलाकर इतना ही कह पाया, "यार, ध्यान से चलाना, ट्रैफ़िक बहुत है आजकल।"
    अंदाज़ अच्छा लगा |

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    1. आपका आना अच्छा लगा मीनाक्षी जी, धन्यवाद।

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  19. इन्टरनेट पर तो दुनिया विशेष रूप से छोटी ही लगती है !
    पंद्रह सालो बाद भी आपको याद रहा की आपने किसी का दिल दुखाया था , वर्ना तो लोग सिर्फ अपना दुःख याद रखते हैं !
    रोचक लेखन !

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    1. ये अपना ही तो दुख था, इसीलिये याद रहा।

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  20. पिंगल बोलना आसान है सहना मुश्किल। बोलना उसी को चाहिए जो सहने की कूबत रखता हो। दोस्तों को मजाक में कही बात का बुरा नहीं मानना चाहिए लेकिन अगर वह बुरा मान जाय तो लाख काम छोड़कर उसे मना लेना चाहिए। बोझ तो तभी उतरेगा जब रूठे यार को मना लिया जाय।

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    1. चढ़दी कलां में होते हैं तो ये सब कहाँ याद रहता है, देवेन्द्र भाई? गुब्बारे की तरह फ़ूल जाते हैं तब तो हम।

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    2. सही बात है। उपदेश देना सरल है।

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  21. चप्‍पल का नाप नापना अजूबा है। हम तो पैर को कागज पर रखकर पेन से निशान बना लेते हैं। वैसे अच्‍छा ही है हाथों से नापना। हा हा हा हा।

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    1. यानि कि आप भी खुद नहीं खरीदतीं? जय हो..:)

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    2. संजय जी, ऐसा सौभाग्‍य ही नहीं मिला कि कोई हमारे लिए कुछ खरीदारी करे। हम ही लोगों के लिए खरीद देते हैं।

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  22. आपका संस्मरण पढ़कर मुझे भी एक आत्मालोचना करने का भाव जगा।
    धर्म व ईश्वर में न मानने वाले एक बंधु अपनी बेटी के लिए शुभकामनाएँ बटोर रहे थे। मैं कह बैठा, "जब आप धर्म कर्म-फल और ईश्वर में नहीं मानते तो इन मात्र शब्द रूपी शुभकामनाओं से आपकी बेटी का क्या भला होने वाला है?" अब महसुस कर रहा हूँ यह कहना वास्तव में कटुवचन था। मलीन विचार का बोझ कुछ कम कर देता हूँ।
    सच है- ऊपरवाला हमेशा और हर बार इतनी मोहलत नहीं देता है कि अपनी गलती मान सकें। और यह बात भी कि गलतियाँ तभी करो अगर काल को आपने वश कर लिया हो, अन्यथा गलतियाँ दोहराने की मानसिकता से निकल जाओ। इस बेशकीमती सदवचन के लिए संजय जी आपका बहुत बहुत आभार।

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    1. आभार तो आपका है सुज्ञजी। विवेकी मन ’थोथा देय उड़ाय’ का पालन करते हुये आप हमेशा की तरह सार-सार चुन लिये।
      दूसरा आभार बलशाली भीम द्वारा अपने बड़े भाई को काल को वश में करने का कटाक्ष करते हुये शुभ करमों हेतु उद्यत करने वाला प्रसंग आपकी टिप्पणी के माध्यम से याद दिलाने के लिये।

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    2. @’थोथा देय उड़ाय’
      नही, नही, थोथा कुछ भी नही है. दही से नवनीत निकालने की तरह, मंथन दही का ही होता है, मख्खन पा लेने के बाद भी छास गुणवान रहती है. :)

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  23. .
    .
    .
    हाँ आपसी मजाक व चुहलबाजी में हम सभी कई बार कुछ ऐसा कह जाते हैं कि अगले के लिये वह असंवेदनशील होता है और कई बार वह इस बात को दिल से लगा लेता है... कभी ऐसा हो जाये तो 'मत चूकिये चौहान' की तर्ज पर 'सबसे पहले उपलब्ध मौके' पर ही माफी माँग लेना बेहतर है... मेरी तो यही कोशिश भी रहती है... यह हकीकत है कि जिंदगी माफी माँगने के ज्यादा मौके नहीं देती किसी को भी...


    ...

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    1. ’मत चूको चौहान’ वाली लाईफ़लाईन तो प्रवीण भाई हम शुरू में ही इस्तेमाल कर लेते हैं, मजे लेते समय:)
      आप एक परिपक्व मनुष्य हैं,जैसा आपने सुझाया है जरूर आप ऐसी ही कोशिश करते होंगे।
      धन्यवाद।

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  24. आपके दोस्त ने आपको आवाज़ देकर बात करने की पहल की ये उनका बड़प्पन है और आपको माफ़ी मांगने का मौका दिया ये भी उनका बड़प्पन है, वर्ना ये पत्थर अगले 15 सालों तक शायद अपनी जगह से नहीं हटता ...इतना लम्बा इंतज़ार ठीक नहीं होता, अगर हमारी गलती हो तो हम तो बस माफ़ी मांग लेते हैं फटाफट ...
    होना तो ये चाहिए था, अगर आपको पता चल ही गया था कि आपकी बात बुरी लगी है आपके दोस्त को तो ज्यादा वक्त नहीं गवाँ कर, समय निकाल कर माफ़ी मांग लेते ...खैर देर आये दुरुस्त आये ...
    अच्छी प्रस्तुति, आपका आभार।

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    1. shayad ye train ke / up down vale dost the aur sanjay ji ke paas unka contact n rahaa ho ?

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    2. ये बड़प्पन,कभी वो बड़प्पन
      दोस्तों के अब तक छप्पन।
      दोस्तों के बड़प्पनों के तो हम कायल हैं। आपकी बात सही है कि इतना लंबा इंतज़ार ठीक नहीं होता लेकिन इस वाकये में ऐसा हुआ कि शुरू के कुछ दिन लगा कि हमेशा की तरह वो मान जायेगा। फ़िर उसे बुलाते भी तो वो हाथ मिलाकर खिसक लेता। जब तक समझ आई कि बात बढ़ गई है तब तक हमारी ईगो निगोड़ी भी बढ़ गई और तरह तरह के बहाने सूझने लगे। शुरू में लगा कि मेरी कोई गलती ही नहीं है, फ़िर कुछ दिन बाद लगा अकेली मेरी गलती नहीं है, फ़िर लगा कि इतनी बड़ी गलती नहीं है। फ़िर उसका ट्रांसफ़र और फ़िर मेरा ट्रांसफ़र और देखते देखते पन्द्रह साल बीत गये। दिल साफ़ हो गये तो अब लगता है कि पन्द्रह साल होते ही कितने हैं? जस्ट लाईक पन्द्रह मिनट :)
      अच्छी टिप्पणी, आपका आभार:)

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    3. शिल्पा जी एवं संजय जी,
      आप दोनों का समवेत स्वर में जवाब अच्छा लगा ...
      शायद मुझसे भी भूल हो ही गई ...
      लेकिन चिंता की कोई बात नहीं, वैसे भी ये पोस्ट 'माफ़ी विशेषांक' है ...
      संजय जी, शिल्पा जी, आप दोनों का भी बड़प्पन है जो अभी के अभी मुझे माफ़ी मांगने का अवसर दे दिया चलिए हम, आप दोनों से माफ़ी मांग लेते है, काहे से कि 15 साल तक पत्थर ढोना अपने वश की बात नहीं है :) उतनी तो शायद अब उम्र भी बाकी ना हो :)
      आशा है मेरी इस टिप्पणी से जो ठेस आपदोनों को पहुंची है उसकी माफ़ी मुझे मिल जायेगी।
      'शायद', 'इसलिए', 'उसलिये', 'फिर' जैसी बातों के लिए मैं कोई स्थान नहीं छोड़ना चाहती, करवद्ध विनती है कि माफ़ कर दीजियेगा ।
      सारे जवाब अच्छे लगे,
      आप दोनों का आभार :)
      आप दोनों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें ।

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    4. अदा जी

      धन्यवाद !



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    5. अरे !!! यह मुझसे किस गलती की माफ़ी मांगी जा रही है अदा जी ??? मेरे प्रति तो आपने कभी भी कुछ भी गलत नहीं कहा / लिखा ??? जो लिखते हैं , वे तो माफ़ी मांगते नहीं :) :) :)

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  25. विजयादशमी की बहुत बधाईयाँ और शुभकामनायें

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    1. धन्यवाद,आपको भी इस पर्व की बहुत बहुत बधाईयाँ और शुभकामनायें।

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    2. ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬●ஜ
      ๑۩۞۩~विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!~۩۞۩๑
      ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬●ஜ

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  26. @सौ टके का सवाल ये है कि बेशक छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं, क्या ऊपरवाला हमेशा और हर बार इतनी मोहलत देता है कि अपनी गलती मान सकें? जवाब अगर हाँ है तो कीप मिस्टेकिंग को कीप इट अप रखेंगे और अगर जवाब न में है तो क्विट।

    सौ टके की बात है ये।

    विजयादशमी की शुभकामनाएं।

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  27. सही बात है, कई बार कोई छोटी सी बात भी कहीं गहरे बैठ जाती है.

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  28. kuch aaisa hi kissa hamara dhobi ke saath hua tha...


    jai baba banaras....

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  29. होता ये है कि कई बार अनजाने में कही गई बात को कोई अपने दिल पर ले लेता है औऱ आपको पता ही नहीं चलता। कई बार ऐसा होता है कि बात सही कही जाती है पर गलत समय पर कह दी जाती है। कई बार सामने वाला आपको अपना इतना करीब नहीं मानता जितना आप उसे अपने करीब समझते हैं..तो इस तरह की बात हो जाती है। आपने एक बात कही..जब आपको लगा की गलती हुई है तो आपने पहला मौका मिलते ही माफी मांग ली। वैसे ज्यादा सही बात ये लगती है कि आपके दोस्त समझ कर जो कहा वो सच था....मगर इस बात से एक दोस्त कम हो गया...इस बात का आपके जमीर पर असर पड़ा था.....और आप बात को इस तरह ले रहे थे जैसे आपने कुछ कर गलती कर दी....जबकी दोस्ती में इस तरह की बातें होती रहती हैं..हां मना करने पर आप का पूछना जरुर उससे खराब लगता होगा और उस दिन की बात उसके लिए इक्कठे बारुद पर चिंगारी का काम कर गई सो वो नाराज होकर दूर चला गया...और आप काफी समय बाद इस बात को समझ पाए कि एक दोस्त कम हो गया..दरअसल अक्सर बातचीत करने वाले लोग कभी भी दोस्त से क्षमा मांगने में देर नहीं करते...न ही वो ये बर्दास्त करते हैं कि एक दोस्त कम हो जाए..पर कई बार ऐसा भी होता है कि लोग माफी मांगने के बाद भी आपसे नाराज रहते हैं...तो ऐसे लोगे के लिए एक ही लाइन है....दो पहलू के साथ ..पहला कि भाड़ में जाओ...दूसरा पहलू कि तू अपने घर खुश मैं अपने घर...जय हिंद

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  30. छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं, क्या ऊपरवाला हमेशा और हर बार इतनी मोहलत देता है कि अपनी गलती मान सकें? जवाब अगर हाँ है तो कीप मिस्टेकिंग को कीप इट अप रखेंगे और अगर जवाब न में है तो क्विट।

    एक दम सही बात है !!

    पोस्ट
    चार दिन ज़िन्दगी के .........
    बस यूँ ही चलते जाना है !!!

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  31. शायद हर बार मौका न मिले... इसलिए डोंट कीप मिस्टेकिंग होना चाहिए.

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  32. संजय जी काफी दिन से लिखा नही । इन्तजार है आपकी अगली पोस्ट का

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  33. हिसाब बराबर होने की बधाई!

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  34. jane anjane me dil ko thes pahuchane ke ehsaas ke sath 15 saal nikal dena.......offffffff kya kahe
    ya likhe ?

    Mitr se mulakat ke baad kaisa mahsoos ho raha hoga soch kar hee accha lag raha hai...

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