मंगलवार, अप्रैल 02, 2013

अलग-अलग

                                                                          

जासूस ने जब  बताया था कि सामने वाली फ़ौज गिनती में अपनी फ़ौज से कम से कम पांच गुना ज्यादा है, तबसे दिमाग में उधेड़बुन चल रही थी। ऐसा न हो कि सैकड़ों मील घोड़ों की पीठ पर सफ़र करके यहाँ तक आना, रास्ते की मुश्किलें, जीती हुई छोटी बड़ी लड़ाईयाँ सब बेकार चली जायें। सिर झटककर वो अपने खेमे से बाहर निकला और मुकाम का मुआयना करने चल दिया। शाम ढलने लगी थी, जगह जगह मशालों और अलावों की रोशनी आते हुये अंधेरों का मुकाबला करने को तैयार  हो रही थी। बड़ी बड़ी देगचियों में सिपाहियों के लिये खाना पक रहा था।

पेशानी पर फ़िक्र की लकीरें सिर्फ़ उसकी ही नहीं थीं, सिपाही भी घबराये हुये थे। बेशक उनके पास सामने वाली फ़ौज की गिनती के बारे में सटीक जानकारी न हो लेकिन इतना अंदाजा तो उन्हें भी हो चुका था कि ये लड़ाई आखिरी लड़ाई हो सकती है।

कुछ मील की दूरी पर डेरा जमाये दुश्मन फ़ौज के बारे में वो सोचने लगा। उधर देखा तो आसमान में धुंए की बहुत सी लकीरें दिखीं। माजरा समझ नहीं आया तो उसने पीछे चलते जासूस की तरफ़ सवालिया नजरों से देखा। 

"हुज़ूर, दुश्मन फ़ौज के यहाँ रात का खाना बन रहा है, वही धुँआ है।"

हैरान होते हुये उसने पूछा, "तो इतनी लकीरें?"

जासूस ने खुलासा किया, "हुज़ूर, उस फ़ौज में बड़ी गिनती कन्नौज के सिपाहियों की है, लड़ाई में उनकी हिम्मत का लोहा सब मानते हैं। वहीं  खानपान और सफ़ाई के मामले में वो सब बहुत एहतियात बरतते हैं। यहाँ तक कि एक सांझा चूल्हा होने के बावजूद हर कन्नौजिया सिपाही अपना खाना अलग से खुद के चूल्हे पर बनाता है। इसी बात पर इधर एक मसल कहते हैं कि ’आठ कन्नौजिये और नौ चूल्हे’         यही सबब है कि उधर से धुँए की इतनी लकीरें दिख रही हैं।"

उस दूर मुल्क से आये हुये हमलावर के चेहरे से चिंता धुंए की तरह ही उड़ गई,  ’वो गिनती में बेशक हमसे ज्यादा हैं, फ़तह हमारी होगी।’  इतिहास बताता है कि ऐसा ही हुआ। बेशक स्थानीय सेना की हार की यह अकेली वजह नहीं थी लेकिन परिणाम की एक अहम वजह तो जरूर रही होगी।

ये कहावत बहुत पहले सुनी थी, शायद आपने भी सुनी हो। बहुत प्रचलित तो नहीं है लेकिन इसके पीछे की कहानी जानने की उत्कंठा थी। फ़िर कहीं ऐसा कुछ सुना कि पानीपत की पहली या दूसरी लड़ाई से इसका कुछ कनेक्शन है तो सोचा आपसे शेयर किया जाये। हो सकता है कोई अधिक विश्वसनीय संस्करण जानने को मिल जाये, न मिला तो भी सोचने लायक मसाला तो इसमें भी है ही। व्यक्तिगत शुचिता ही नहीं, ज्ञान, बल, रूप जैसे कितने ही तत्व ऐसे हैं जो हमारे लिये अलग चूल्हे का उपक्रम बन जाते हैं और परिणाम बदल जाते हैं।  

नेट पर इस कहावत से संबंधित तो कुछ नहीं ढूँढ पाया लेकिन पानीपत की लड़ाईयों पर एक रोचक लेख जरूर मिला, पढ़िये आप भी।

79 टिप्‍पणियां:

  1. अपना अपना धुँआ सबने उड़ाया है तभी इतनी दुर्दशा हुयी है देश की।

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    1. धीरे धीरे ही सही, देश फ़िर भी आगे बढ़ रहा है प्रवीण जी। कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।

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    3. धीरे-धीरे बढ़ रहा है देश प्रवीण जी, सिर्फ ६६ साल हुए हैं, और १६६ साल में हम पूरी तरह बढ़ जायेंगे, प्रोमिस !
      खुश हैं हम कि हमारी हस्ती की हस्ती है।
      पर,
      सोचने वाली बात ये है हमारी हस्ती की क्या हस्ती हैं :)

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    4. देह विशाल और भार ज्यादा हो + सभी अंगों को साथ लेकर चलनेवाला हो तो धीरे धीरे ही बढ़ेगा जी, हां नहीं तो.

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    1. मुझे भी यही कहना है कि एकता में बल है !!

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    2. काजल भाई, मुझे भी फ़िर वही कहना है -
      ’सतवचन हैं जी’ :)

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    3. और हमको कहना है "एकता में बल है" और ये "सतवचन है जी" ;-)

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  3. कहावत तो सुनी है.... यह रोचक कहानी जानकर अच्छा लगा

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  4. मॉरल ऑफ द स्टोरी: ... बदनामी किसी खाते मे तो जानी ही थी, कन्नौज ही सही।

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    1. 1) नहीं, वह एक एक व्यंग्योक्ति थी। :(
      2) कहानी की मौलिक शिक्षा तो वही होती है जो लेखक का उद्देश्य हो,
      3) कहानी को मौलिक उद्देश्य से भटकाना, भटके हुए पाठकों का मौलिक कर्तव्य होता है
      4) खुद बचें दूसरों को बचाएं (उ प्र सड़क परिवहन से साभार)
      5) हम समझते थे अपने को बेहतरीन किस्सागो
      वे आए और अफसाने का लतीफा बना गए

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    2. आप तो जानते ही हैं कि , ब्लॉग जगत के एक बड़े व्यंग्यकार, पहले ही दिक्लेअर कर चुके हैं कि "शिल्प मेहता को "व्यंग्य" समझ ही नहीं आते :) :)

      व्यंग्य ही क्यों - न हमें धर्म की समझ है, न शास्त्रों की, न विज्ञान की । हम तो जी , पढ़े लिखे बौड़म हैं :)

      - तो फिर हमको इस कहानी का मोरल कैसे समझ आ सकता था ?? तो हुआ कुछ यूँ कि , कहानी का मोरल आपने जो बताया , तो हम तो यही समझे कि आप सीरियसली कह रहे हैं :) तो पूछ बैठे ....

      आपने :( यह वाला स्माइली लगा - दिया तब समझ आया कि यह व्यंग्य था ....

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    3. १) स्वीकार है।
      २) साड्डे ते लागू नहीं।
      ३) आज समय कर्तव्य का नहीं बल्कि अधिकार का है, प्लीज़ अपडेट।
      ४) न्यूए चालैगी (मरहूम रेड\ब्लू लाईन बस सेवा से साभार)
      ५) आप बेहतरीन हैं ही, कोई शक नहीं।

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    4. जय हो पढ़े लिखे बौड़म जी की:)

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    5. ये वार्तालाप ज्यादा मजेदार रहा :)

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  5. कहानी के माध्यम से बढ़िया समझाया है मगर समझने में नेतागण को फायदा नहीं है ना !!

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    1. वाणी जी, नेतागण आम जनता से ही तो निकल कर आते हैं।

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  6. रोड मराठा के बारे में पहले से पता था....पर ये सच है कि भारतीयों की अनेकता में एकता के बीच छिपी एकता में अनेकता ने ही देश का बेड़ागर्क किया है....पानीपत की हर लड़ाई हमारी समाज औऱ राजाओं की आपसी मतभेदों की कहानी कहता है..कन्नौज के राजा ने दिल्ली के राजा से चौहान से अपना बदला निकालने के लिए गौरी का साथ दिया....बाबर को भारत में राणा सांगा ने न्यौता दिया...शक्तिशाली मराठा सेना दिल्ली के पास डेरा डाले थी तो खाना देने वाला कोई नहीं था...भूखे प्यासे मराठा लड़े...भरतपुर के वीर जाट राजा सूरजमल ने भी मराठाओं का यूद्ध में साथ नहीं दिया...अब किसे दोष दें...

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    1. खुद के अलावा किसी को दोष देना स्वास्थ्य के लिये हानिकर होता है:)
      हम खुद ही दोषी हैं।

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    2. "खुद के अलावा किसी को दोष देना स्वास्थ्य के लिये हानिकर होता है..." line khase mahatva ki hai ...

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    3. अतिमहत्वपूर्ण बात तो रह ही गई थी, धन्यवाद सुधार करवाने के लिये - खुद के अलावा किसी को दोष देना (अपने)स्वास्थ्य के लिये हानिकर होता है :)

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  7. you are absolutely right. when every individual wants to / craves to prove one's own superiority and blindly separate from the group, the group is bound to disintegrate.

    yes - i have heard this earlier, and no i too do not know the details. but the message is eternal.....

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    1. This disintegration and integration process itself is eternal, one has to face it.

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    2. at the cost of repeating myself. ...

      YOU ARE ABSOLUTELY RIGHT. :)

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    3. :)
      absolute शुक्रिया है जी.

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  8. दूसरे का चूल्हा, दूसरे की देगची,और दूसरे का खाना भी मिल-बैठ कर खाते है,
    कोई पूछे तो खींसे निपोर कर बडे गर्व से कहते है विशाल हृदय की एकता. :)

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    1. अमीष त्रिपाठी की किताबें पढ़ीं, एक जगह इस सहभोज का वर्णन किया है उन्होंने और इसका औचित्य भी बताया, मेरे लिये वो चीजों को देखने का एक नया एंगल था।

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  9. अलग चुल्‍हे से ही अलगाव आता है।

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    1. सही कहा आपने अजित दी, धन्यवाद।

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  10. @ ’आठ कन्नौजिये और नौ चूल्हे’

    damdar 'kahawat' hai.........kam aayenge



    pranam.

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  11. आपस में लड़ने से ही फुर्सत मिलती तब तो दूसरों से लड़ पाते।

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    1. यहाँ तो मजा ही अपनों से लड़ने में आता है सरजी।

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    3. जिनसे लड़ाई हो, उन्हें भी अपना या आपस का कहना/समझना बड़े दिल वालों की बातें हैं। लड़ाई मे कभी-कभी एक पक्ष हारता भी है, और हार की ज़िम्मेदारी भी किसी न किसी की बनती है। जिनके साथ खा नहीं सकते, बैठ नहीं सकते, छू नहीं सकते, समझ के मामूली फेर को बर्दाश्त नहीं कर सकते, उनकी लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर जान दे सकते हैं, यह बात समझना (मेरे लिए) थोड़ा कठिन ज़रूर है।

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    4. वड्डे दिलों को देखकर हमारा दिल भी वड्डा हुआ जा रहा है सरजी:)

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  12. आज की ब्लॉग बुलेटिन दोस्तों आपकी मदद चाहिए - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  13. काफी कुछ नया जानने को मिला ... आभार !

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    1. नया कहाँ भाई, है तो पुराना ही:)

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    1. फत्तू अपना अकेले का संघ अलग बनाने में लगा है - किसी ने बता दिया कि शक्ति चाहिए तो संघ बना

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  15. का बात करते आप भी ,बचपन से कहानी सुनते आ रहे है एक अकेली लकड़ी को तोड़ना आसन है गठ्ठर की लकड़ी को तोड़ना मुश्किल जब इतनी सीधी सी कहानी से नहीं समझे तो इतनी उलझी कहानी से कैसे ये सिख ले सकते है , क्योकि जो ये कहानिया अपने बच्चो को सुनाते है वो खुद इस सिख को नहीं सिख पाते है तो बच्चे क्या खाक सीखेंगे , पहले खुद को ही देख ले हम सब धर्म, जात पात , क्षेत्र को लेकर कैसी सोच है हमारी फिर दूजे को गाली दे ।

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    1. सीखने सिखाने पर वो बात याद आती है -
      इतिहास से हमने सीखा कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा :)

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  16. कभी कभी हमारी खासियत हर जगह काम नहीं आती और वह हमारे बुराई कहूँ या पतन का कारन बन जाती है तभी तो समयानुसार आचरण का औचित्य होता है

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    1. पूरी तरह सहमत हूँ।
      समयानुसार अगर आप नहीं बदले, तो समय आपको बदल ही देगा ..

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  17. आपकी इस पोस्ट को थोडा सा और विस्तार दे रही हूँ :)

    हम काहिल, अहमक, आलसी, स्वार्थी, बिन पेंदी के लोटे, कौम हैं। अहिंसा का लाबादा ओढ़ कर हम अपनी जिम्मेदारियों से पहले भी भागते रहे, आज भी भाग रहे हैं और आगे भी हम धावक बने रहेंगे। हम लोग सिर्फ दर्शक दीर्घा वाले लोग हैं (उदाहरणतः सड़क पर जब किसी लड़की के कपडे उतारे जाते हैं, तो हाथ बाँधे खड़े लोगों की कतार देखने लायक होती है, तमाशा ख़तम होता है और लोग हाथ झुलाते घर लौट आते हैं, इस बात का यहाँ वाली एकता से कोई लेना देना नहीं है, बस हम आपको दर्शकों का दर्शन कराना चाहते थे ) हाँ तो वापिस आते हैं अब हमरी टिप्पणी पर, सब अपनी डफली अपना राग बजाते रहे हैं और बजाते रहेंगे। आज़ादी से पहले भारत ५६५ टुकड़ों में बंटा हुआ था। सभी राजे-महराजे एक दुसरे की बैंड ही बजाते रहते थे। एकता नाम की कोई चीज़ नहीं थी। वो तो भला हो अंग्रेजों का जिन्होंने बेशक अपने स्वार्थ के लिए ही सही, सब को एक इकठ्ठा किया, वर्ना आज भी भारत इतने टुकड़ों में होता कि आप हम गिन भी नहीं सकते। इन्हीं टुकड़ों में बंटे होने के कारण तो इतनी लम्बी गुलामी का इतिहास है हमारे पास, वर्ना दो हज़ार साल तक कोई गुलाम रहता है ? आज हम अपने गौरवशाली इतिहास के गुण गाते नहीं थकते, लेकिन भूल जाते हैं हम , कि इतिहास में गुलामी भरे दिन भी शुमार हैं। आज भी हमारी आज़ादी एक मृगतृष्णा है, जिसे देख देख कर हम खुश होते हैं, परन्तु सच्चाई ये हैं कि अब हम मुट्ठी भर गुंडों के गुलाम है और आगे भी रहेंगे क्योंकि हमें गुलामी की आदत हो चुकी है। सबको खुश करना और अपने फायदे के लिए चापलूसी करना हमारी आदर में शुमार है, और इसके लिए देश और अपने ही लोगों की खरीद-फरोख्त हमारा पेशा। कहाँ जायेगी ये आदत जो रक्त में ही घुसी हुई है ? आज भी कहीं भाषा की लड़ाई तो कहीं संस्कृति की लड़ाई चालू आहे ..:) जितना जी में आये कर लीजिये आप एकता की बात। भारत में सिर्फ एक ही एकता है ....एकता कपूर :)

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    1. सब को एक इकठ्ठा किया = सब को एक साथ इकठ्ठा किया

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  18. @ हम काहिल, अहमक, आलसी, स्वार्थी, बिन पेंदी के लोटे, कौम हैं।
    disagree - some people may be - all are not. PLEASE don't paint the whole population with one brush.

    @ अहिंसा का लाबादा ओढ़ कर हम अपनी जिम्मेदारियों से पहले भी भागते रहे, आज भी भाग रहे हैं और आगे भी हम धावक बने रहेंगे।
    disagree - some people may be doing so, being nonviolent does not mean that, and all of the nonviolent persons don't do that..

    @ हम लोग सिर्फ दर्शक दीर्घा वाले लोग हैं (उदाहरणतः सड़क पर जब किसी लड़की के कपडे उतारे जाते हैं, तो हाथ बाँधे खड़े लोगों की कतार देखने लायक होती है, तमाशा ख़तम होता है और लोग हाथ झुलाते घर लौट आते हैं, इस बात का यहाँ वाली एकता से कोई लेना देना नहीं है, बस हम आपको दर्शकों का दर्शन कराना चाहते थे )
    disagree - some people may do so - all do not. there are thousands of people here who took police water canons in the cold of delhi december nights to fight for an unknown girl damini in a hospital bed....

    @ सब अपनी डफली अपना राग बजाते रहे हैं और बजाते रहेंगे।
    disagree

    @ सभी राजे-महराजे एक दुसरे की बैंड ही बजाते रहते थे। एकता नाम की कोई चीज़ नहीं थी।
    disagree - many of the kings might have been doing so, many may not have been. i remember names like shivaji rao also, who was very concious of his duties. i remember guru gobind singh ji too who lost all his sons to a cause. i remember many other names. PLEASE Don't belittle great people because you remember only the other side.

    @ वो तो भला हो अंग्रेजों का जिन्होंने बेशक अपने स्वार्थ के लिए ही सही, सब को एक इकठ्ठा किया, वर्ना आज भी भारत इतने टुकड़ों में होता कि आप हम गिन भी नहीं सकते।
    true - the britishers did unify many kingdoms to one entity... i am not sure that is the kind of unification which did much good to us in the long run.

    @ टुकड़ों में बंटे होने के कारण तो इतनी लम्बी गुलामी का इतिहास है हमारे पास, वर्ना दो हज़ार साल तक कोई गुलाम रहता है ?
    true

    @ आज हम अपने गौरवशाली इतिहास के गुण गाते नहीं थकते, लेकिन भूल जाते हैं हम , कि इतिहास में गुलामी भरे दिन भी शुमार हैं।
    true. but having a bad phase in history does NOT mean that the golden phase can't be sung or taken pride upon.

    @ आज भी हमारी आज़ादी एक मृगतृष्णा है, जिसे देख देख कर हम खुश होते हैं, परन्तु सच्चाई ये हैं कि अब हम मुट्ठी भर गुंडों के गुलाम है और आगे भी रहेंगे क्योंकि हमें गुलामी की आदत हो चुकी है।
    disagree - some people may be - all are not. all of us in india are not slaves , may be the living conditions of NRI's are better than RIs but that doesn't go to say that all 100 crores staying here are slaves. neither bodily, nor mentally is what i am saying.

    @ सबको खुश करना और अपने फायदे के लिए चापलूसी करना हमारी आदर में शुमार है, और इसके लिए देश और अपने ही लोगों की खरीद-फरोख्त हमारा पेशा।
    disagree - some people may be like that- all are not.

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    For example I have never sucked up to people - and there are millions in india like me who never do that. i don't think most of the bloggers commenting here fall in that category either.

    i do NOT think the people above (whom i personally know as bloggers - i dont read many blogs and i do not know all the individuals here , but i am talking of those i do read and know a bit about) - respected sugya ji, respected anurag ji, respected sanjay ji, respected swapna manjusha ji, or even me myself - any of us fall into the generalised descriptions you have affixed on the whole population.

    when you say " "ham" aise hain vaise hain" and put a "smiley" - it does not make the comment any the less untrue, and any the less generalization, and any the less insulting.

    first person pronouns like "ham, main, mere" etc are not things that cancel out any of the things said about a whole community in general.

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    1. हम वैचारिक जागृति के वाहक (लेखक,साहित्यकार, ब्लॉगर) चाहे हमने अहिंसा का मात्र लबादा ही ओढ रखा हो, किसी धधकती प्रतिशोध अग्नी में अंधे हो रणमैदान में कूद नहीं सकते, क्योंकि विद्या हमें विवेक प्रदान करती है। आरोप जडना आसान है कि हम 'अहिंसा को ढाल बनाकर पलायन' करते है। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि प्रतिशोध और अशान्ति की शृंखला का सर्जन हमारा उद्देश्य ही नहीं हो सकता। विचारक और विद्वान सदैव अहिंसक समाधान को ही प्राथमिकता देते है और उसी को समाज में प्रसारित करते है। उनकी दूरगामी दृष्टि स्पष्ट होती है। हिंसा का न्याय कभी भी हिंसा से नहीं हो सकता, खून सना कपडा खून से ही धोने पर कभी साफ नहीं होता, वह तो पानी से धोने पर ही साफ होता है।

      जो कोई भी अत्याचार का विवेकबुद्धि युक्त प्रतिकार नहीं कर पाते, अपनी हार या गुलामी का ठीकरा अहिंसा के मत्थे मढ़ते है। जबकि अहिंसा जिनके लिए मात्र लबादा नहीं है, अहिंसा जिनके हाड-मांस-मज्जा में समायी हुई है वे हिंसा के कुचक्र और अशान्ति के कारको को भलि-भांति जानते है।

      गुलामी एकमात्र हमारा ही इतिहास नहीं है। श्री अनुराग शर्मा जी का एक कथन है- " विश्व में ऐसी एक भी कौम नहीं रही जो सदा अजेय रही हो" अर्थात ऐसी कोई कोम नहीं है जिसने पराजय का स्वाद न चखा हो। आक्रमक, हिंसक और प्रतोशोध भरी कौमों के हिस्से में भी गुलामी रही है। अंगेजों से पहले भी चन्द्रगुप्त आदि ने एकल सामाज्य स्थापित किए ही थे। किन्तु फिर भी ऐसी क्षेत्रिय एकताएं साम्राज्यवाद के स्वार्थ प्रेरित होती है। उनका भला क्यों हो?, अंग्रेज तो उलट शासन को टुकडों में बांट बिखेर गए थे। भला तो हो सरदार आदि भारतीय महापुरूषों का जिन्होंने अंगेजों की बुरी मंशा को भांप कर भारत को पुनः संयुक्त राष्ट्र बनाने का भागीरथ पुरूषार्थ किया। इन सबके उपरांत भी क्षेत्रिय एकता के कोई मायने नहीं है। एकता तो मन में बसती है। जब सिकुडती है तो पारिवारिक जिम्मेदारी तक और जब फैलती है तो वसुधैव कुटुम्बकम तक।

      भारतीय कौम के इतिहास में गुलामी तो मात्र 2000 साल रही, उससे पहले तो लाखों साल का सम्प्रभुता भरा विकसित सभ्यता का युग रहा है। किस बात की हीनता ग्रंथी पालें, और क्यों न गर्व लें गौरवशाली इतिहास का। अपने मानकों पर ठहरने की प्रेरणा भी तो यही गौरव देता है।

      इसलिए गुलामी का कारण न तो अहिंसा है न क्षेत्रवाद। वस्तुतः स्वार्थी लोगों का व्यक्तिगत स्वार्थ ही उन्हें गुलामी की ओर धकेलता है। यही वह सोच है जो निजी लाभ के लालच में परवश करती है। दुर्भाग्य से जब जब ऐसा स्वार्थ फैला, कोई प्रखर नेतृत्व उपलब्ध नहीं रहा जो लोगों की निजी स्वार्थ दृष्टि को निस्वार्थ सामुहिक निष्ठा में मोड़ पाता, प्रसारित कर पाता।

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    2. @ एकता तो मन में बसती है। जब सिकुडती है तो पारिवारिक जिम्मेदारी तक और जब फैलती है तो वसुधैव कुटुम्बकम तक।

      saadhu saadhu |

      bas ham apne parivaar se aage badh paayein - to saari samasyaa hi hal ho jaaye ....

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    3. सबसे पहले मैं इस वार्तालाप में देरी से आने के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ। मेरे ही यहाँ इतनी रोचक बातें चल रही हैं और मैं ही देर से आया हूँ, फ़िर से एक बार सब मित्र वो गाना याद कर लें - मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है :)

      अब अपनी बात कहता हूँ। अजीब सी बात लग सकती है लेकिन मैं दोनों विदुषियों की बात से काफ़ी हद तक सहमत भी हूँ और असहमत भी।
      जैसा स्वप्न मञ्जूषा जी ने कहा, एकदम से उतना तो नहीं लेकिन हम में से बहुत से लोग ऐसे ही बिहेव करते हैं। और इसी प्वाईंट से मेरी असहमति शुरू होती है। अगर बहुत से या अधिकतर लोग ऐसे बिहेव कर रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि सबको फ़ाँसी दे दी जाये या सबको एक ही लाठी से हाँक दिया जाये। इसकी वजह ढूँढी जानी चाहिये। सकारात्मक बातों को आगे लाकर औरों को भी उसका अनुकरण करने को प्रेरित किया जा सके तो अपनी जिम्मेदारी समझने वालों की प्रतिशत में वृद्धि होगी ही।
      शिल्पाजी ने some people may be - all are not.’ वाली बात कही, मैं भी सहमत हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि स्वप्न मञ्जूषा जी का अपनी बात में ’हम’ का प्रयोग उनके खुद के इस सोसायटी के एक विचारशील हिस्सा होने की ही स्वीकारोक्ति और संस्कृतिप्रदत्त अधिकार का ही सूचक है।
      हम सबको अपनी कमियों और अपनी शक्ति दोनों को ही जानना बहुत जरूरी है।

      एक बार फ़िर सुज्ञ जी ने सार प्रस्तुत कर दिया। कर्तव्य और अधिकार का घटता बड़ता प्रभुत्व कब स्वार्थ को कम ज्यादा कर देता है, इस कोण को देखना बहुत जरूरी है। व्यस्तता के चलते मैं इधर बहुत सक्रिय नहीं रह पा रहा हूँ वरना इस पोस्ट की जगह कर्तव्य और अधिकार पर ही एक पोस्ट लिखने की सोच रखी थी।

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  19. सिर्फ एक प्रश्न :
    पूरे हिन्दुस्तान में कितने हिन्दुस्तानी हैं, जो गर्व से कह सकते हैं, उन्होंने अपने जीवन काल में कभी घूस नहीं दिया ?

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    1. क्या यह प्रश्न मुझसे भी / ही / पूछा गया था?

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    2. मेरा पिछला कमेंट आपको संबोधित नहीं था, फिर भी आपने अपना कीमत समय निकाल कर इतना आआआ लम्बा जवाब देने का कष्ट उठाया, फिर इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए मुझसे क्यों पूछ रही हैं ?

      आपको तो अपने आप ही उत्तर दे देना चाहिए।

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    3. आपको तो अपने आप ही उत्तर दे देना चाहिए।

      तो ठीक है - लीजिये ।

      १. कम से कम मैं तो "गर्व से" यह बात बिलकुल नहीं कह सकती - मैंने तो घूस दी है - और एक नहीं - अनेक बार दी है .... ।

      लेकिन हाँ यह गर्व से अवश्य कह सकती हूँ कि अपने देश से इस "घूस" कुप्रथा को हटाने के प्रयत्न मैंने अवश्य किये हैं । क्या आप भी यही बात कह सकती हैं ? घूस की बुराई करना बहुत आसान है - वह क्यों हो रहा है और उसे कैसे हटाया जाए यह बड़ा मुद्दा है ।कोइ भी समस्या सिर्फ पॉइंट करने से सोल्व नहीं हो सकती । उसकी जड़ ढूंढनी पड़ती है । और फिर उस जड़ का इलाज करना पड़ता है - पौधा स्वस्थ्य हो जाएगा । जड़ "काट देना" कहना भी कुछ uncomfortable करता है मुझे - क्योंकि जड़ काटना बीमारी का इलाज नहीं - वह दबी हुई हिंसा ही है ।

      २. संजय जी आपसे क्षमा प्रार्थी हूँ आपके ब्लॉग पर इस बहस में पड़ी हूँ । दिल से क्षमाप्रार्थी हूँ - पर इस तरह की बातों पर मैं चुप नहीं ही रह पाती ।

      ३. व्यंग्यात्मक प्रश्न दूसरों की और उछाल देना बहुत आसान है, अपमानजनक बातें एक पूरी कौम के लिए ब्रह्मवाक्य की तरह कह देना बहुत आसान है । इस सब से ब्लॉग पर विजिट्स तो खैर बढती ही हैं ।

      लेकिन सच तो यह है कि प्रश्न उछालने में हमारी बड़ाई नहीं है - बड़ाई है प्रश्नों के उत्तर खोजने में । या कम से कम खोजने के प्रयास करने में ।

      मेरा एक बहुत पसंदीदा पोस्टर है जो मेरे पति के ऑफिस में लगा हुआ है -"are you here with a question or an answer?" वे मुझे हमेशा यही कहते हैं - तू अपना टाइम बेकार की बातों में क्यों खराब करती है - बी ऑलवेज पॉजिटिव एंड प्रोडक्टिव । बात कम किया कर - काम ज्यादा किया कर - लेकिन मैं फिर भी .... :)

      ४. आपका पिछला प्रश्न मुझसे संबोधित नहीं था (???)
      - प्रथम तो मुझे लगता है वह "प्रश्न" कम और हम सभी के (सभी में मैं भी आती हूँ) लिए एक बहुत ही जनरलाइज्ड स्टेटमेंट अधिक था । हर भारतीय को "हम काहिल, अहमक, आलसी, स्वार्थी, बिन पेंदी के लोटे, कौम हैं।" जब कहा गया तो यह मेरे लिए "भी" कहा "ही" गया था । कम से कम मैं तो "हिन्दुस्तानी कौम" के साथ पूरी तरह आइदेंतिफाय करती हूँ ।

      आप जब पूरी कौम को "हम" कह कर इल्जाम दे रही हैं तो उसका उत्तर हर एक देने को स्वतंत्र है - हर एक को अपना निर्णय लेने होंगे कि वह उत्तर दे या न दे - लेकिन आपकी कही बातें हर उस व्यक्ति के लिए थीं जो "हिन्दुस्तानी कौम" का मानता है अपने आप को ।

      ऐसी बातें / यही बुराइयाँ हमारे समाज के छोटे प्रतिरूप हमारे परिवार में भी होती ही हैं । तो क्या हम अपने परिवार के बारे में भी ऐसी ही बातें ब्रह्मवाक्यों की तरह कहते नज़र आते हैं ? नहीं । क्योंकि "परिवार" से हम प्रेम करते हैं, और उनके बारे में ऐसी बातें खुद कहना तो दूर - कोई और भी कहे तो हमें चोट लगती है ..... लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि "हिन्दू" और " हिन्दुस्तानी" हम अपने आप को कहते तो हैं, लेकिन इस विषय में कही गयी बातों से तनिक भी अपमानित नहीं महसूस करते ।

      उल्टा आजकल अपने ही बारे में ऐसी अपमानजनक बातें / कहना / लिखना / ब्रह्मवाक्य की तरह दर्शाना बहुत ही फैशनेबुल है - ऐसी व्यंग्यात्मक बातें स्माइली के साथ अनेक जगह पढ़ती रहती हूँ ब्लॉगजगत में । यह कहने/ करने / लिखने वाले यदि परिस्थितियों को बदलने के प्रयास करते हुए यह सब कह रहे हों तो बात और है । लेकिन अक्सर ये सिर्फ "जोक" और "सेन्स ऑफ़ ह्यूमर" का पहचानपत्र सा दिखता है - की कौन कितना मजाक उड़ा सकता है अपनी "कौम" की कमियों का - वह उतना मॉडर्न ।

      ५. @@@ कीमती समय
      - हाँ समय तो कीमती है ही - आपका भी है, मेरा भी । हम सभी बिजी लोग हैं । इसी "समय की कमी" के चलते कई लोग यहाँ उत्तर न दे पाए होंगे - चाहे उन्हें इस बात से चोट पहुंची भी होगी । और कई लोग "कौन पचड़े में पड़े" के चलते चुप रह गए होंगे - मैं भी अक्सर ऐसा करती हूँ ।

      समय कीमती ही होता है स्वप्ना जी -सभी का समय ।

      लेकिन "भारतीय कौम" के बारे में कही जाने वाली बातों का उत्तर लिखना मुझे आवश्यक लगा । कई चीज़ें आवश्यक होती हैं - तो समय निकालना आवश्यक लगता है ।

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    4. जो लोग आपको आईना दिखाते हैं आप उनको अपना दोस्त समझिये क्योंकि वही हैं जो सच्चे अर्थों में आपका भला चाहते हैं। भारत जितना आपका है, उतना ही मेरा भी। मैं भी भारत की मुसीबतों को दरकिनार करके जी सकती हूँ, क्योंकि रोज दो-चार मैं नहीं हो रही, शायद भविष्य में भी मुझे इनसे दो-चार नहीं होना होगा, लेकिन मुझे भारत से प्यार है और जिनसे प्यार करती हूँ वो भी भारत में हैं, इसलिए इतनी बात कहती हूँ। जो भी कहती हूँ वो मैं भी भुगतती हूँ, क्योंकि मेरे अपने भुगतते हैं।

      जहाँ तक स्माईली का प्रश्न है ...तो ऊ तो अपुन का ईश्टाइल है, आदत लगा लीजिये क्योंकि हम ये आदात नहीं छोड़ने वाले :)

      हाँ नहीं तो !

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    5. शिल्पा बहन,
      क्षमाप्रार्थी होने की बात कहकर शर्मिंदा मत करें। I really feel honored after reading your views (most of the times :))

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    6. श्रीमति हाँ नहीं तो जी,
      घूस न देने वाली बात गर्व से हम भी नहीं कह सकते, इतना जरूर कह सकते हैं कि घूस मिलने के बहुत चांस मिलने के बाद भी ली जरूर नहीं। और मैं अपवाद नहीं, बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें मैं जानता हूँ और आप भी जरूर जानती होंगी। वो लोग लाईमलाईट में नहीं आते तो दोष उनका नहीं है। सही बात तो ये है कि कुछ ही लोगों पर वो सब बोझ है, जो सबके हिस्से का है। हर नागरिक अगर थोड़ा थोड़ा भी बोझ उठाये तो पूरे समाज का भला होगा। ऐसा क्यों है, इस पर फ़िर हम लोगों के विचार अलग अलग हो सकते हैं। आपको दुश्मन नहीं मानते हैं, गलतफ़हमी मन से निकाल दीजिये। वो तो हम आपको आईना दिखाने के चक्कर में रहते हैं, हाँ नहीं तो!! :)

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    7. @अजी आप का दिखियेगा आईना हमको, आपको तो खुद अपनी शक्ल देखने की फुर्सत नहीं है :)

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    8. इतना लम्बा कमेंट हमसे पढ़ा नहीं जाता, फिर भी कोशिश कर रही हूँ .. यहाँ जब भी हम 'हम' लिखते हैं तो हम खुद को भी शामिल करके ही लिखते हैं। आपको लगता होगा हम कनाडा में रहते हैं लेकिन हमको लगता है हम भारत में रहते हैं।

      जहाँ रहती हूँ वहां घूस जैसी बात कोई जानता भी नहीं है। इसलिए इस मामले में खुशकिस्मत हूँ।यह भी एक वजह है कि कोफ़्त होती है आखिर क्या कारण है हम ऐसे हैं, जबकि दुनिया में ऐसे भी मुल्क हैं जहाँ ऐसे काम इतनी अधिकता में नहीं होते हैं। सच्चाई कडवी ही होती है , चोट लगना लाजिम है। गन्दगी, भ्रष्टाचार में भारत का नाम आता ही है। और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। और ज़बरदस्ती छवि को बिना कोई कोशिश किये हुए सुधारने की कोशिश करना भी बेवकूफी है। घाव पर मेकअप लगा कर सुन्दर दिखाने से बेहतर है ओपरेशन करना। मेरी बातें बुरी लगतीं हैं क्योंकि मैं शुगर कोटिंग नहीं करती और आगे भी नहीं करुँगी।

      हाँ मैं बिलकुल कह सकती हूँ कि मैंने घूस की प्रथा बढ़ावा देने कोबिलकुल इनकार कर दिया है। बल्कि एक बार नहीं कई बार और इसका नुक्सान भी उठाया है। सर्व शिक्षा अभियान का एक प्रोजेक्ट पंजाब में मुझे मिला था। प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही मुझसे घूस माँगा गया। मैंने साफ़ मना कर दिया, परिणाम मेरा contract कैंसिल हो गया और जिसने घूस दिया उसे मिल गया। मुझे इसका कतई अफ़सोस नहीं। अभी एक प्रोजेक्ट करने जा रही हूँ भुवनेश्वर में, जिसके लिए मुझसे घूस माँगा गया है, अगर बिना घूस दिए हुए ये काम नहीं हुआ तो बिलकुल नहीं होगा ये काम ...

      जड़ को अगर काटना है तो यही हो सकता है, कुछ भी हो जाए घूस नहीं देना है, उसका परिणाम भुगतना होगा। और परिणाम यह होगा कि आसानी से काम नहीं होंगे। बच्चों के एडमिशन में अगर डोनेशन नहीं दीजियेगा तो एडमिशन नहीं होगा। लेकिन क्या ये परिणाम भुगतने के लिए लोग तैयार हैं ??

      किसने कह दिया कि मेरे प्रश्न व्यंगात्मक है ? ये बिलकुल सीधे प्रश्न हैं, और इसका जवाब भी बिलकुल सीधा है, सबको इस रास्ते से गुजरना ही पड़ता है क्योंकि ये हमारे द्वारा ही बनाया गया सिस्टम है। हमारे यहाँ सरकारी तंत्र के काम इतने जटिल हैं कि हर इंसान उसकी जटिलताओं से बचना चाहता है। एक बर्थ सर्टिफिकेट, या मृत्यु प्रमाण पत्र लेने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, यह मैं भी जानती हूँ। सिस्टम में सुधार बहुत ज़रूरी है। वर्ना हर नागरिक इसकी असुविधाओं से बचने की कोशिश में घूस देता ही रहेगा। सरकारी तंत्र में बैठे लोग अपना काम ईमानदारी से करें, यह भी एक उत्तर हो सकता है।
      डेढ़ बिलियन लोग समाधान नहीं ढूंढ पा रहे हैं समस्याओं की, सोच कर हैरानी भी होती है। डेढ़ बिलियन बहुत बड़ी आबादी है, इस आबादी को लोग समस्या कहते हैं, इसे अपनी ताक़त क्यों नहीं कहते हैं ?आज तकनिकी इतनी आगे बढ़ चुकी है लेकिन, संजय जी खुद बैंक में काम करते हैं, पहले जब वो सारा काम हाथ से करते थे तो ५ बजे घर आ जाते थे, अब कम्प्यूटराईज्ड हो जाने के बाद दस बजे तक काम करते हैं, ये मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ, मेरे बहुत से अपने बैंक में ऊँचे ओहदों पर हैं। अगर ये सच नहीं है तो संजय जी खुद कहें। बैंकों को कम्प्यूटराईज्ड हुए छ सात साल हो चुके हैं, लेकिन कोई काम सुचारू रूप से नहीं हो रहा है, बैंक के कर्मचारी परेशान रहते हैं, अब तो ये हाल है कि बैंक में काम करने वाले लोग अपनों को बैंक की नौकरी लेने से हतोत्साहित कर रहे हैं, ऐसा क्यों है ??? क्योंकि सॉफ्टवेर बनाने वालों ने सही तरीके से काम नहीं किया। काम के बाद आफ्टर सेल सर्विस ठीक नहीं है, बिजली नहीं होती, नेटवर्क नहीं होता ...आखिर क्यों ? क्या लोग बिजली का बिल नहीं भरते ? अगर भरते हैं तो बिजली क्यों नहीं होती ? और अगर नहीं भरते हैं तो ईमानदारी से बिल क्यों नहीं भरते ? बहुत साधारण से सवाल हैं ये ...किसी भी सिस्टम में अगर हर पुर्ज़ा अपना काम सही तरीके से करेगा तो भला दिक्कत क्यों होगी !

      जैसे जैसे समय गुजरता है, समस्याएं कम होनी चाहिए, न की सुरसा के मुंह की तरह विकराल।

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    9. फिर आप भी हमें विदुषी कहने लगे बड़के भैया ? :(

      :)

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    10. @@ इतना लम्बा कमेंट हमसे पढ़ा नहीं जाता

      हाँ जी - आपसे क्या पढ़ी -जायेगी हमसे ही अपनी खुद की ही टिप्पणी नहीं पढी जाती :) :) :)

      {{{
      वैसे स्वप्ना जी - हमारा एक स्टूडेंट था आशीष - अभी मुंबई में रहता है - 2002 में पास हुआ ।

      उसकी राइटिंग बहुत बुरी - थी मैं उसे हमेशा कहती कि तुम्हारा आंसर बिलकुल सही होते हुए भी मार्क्स कम मिलते हैं कि पढने लायक नहीं होता ।

      एक दिन कहता है - -मैडम आपके सब्जेक्ट में अच्छा लिखता हूँ - सब में नहीं । तो राइटिंग खराब होने का एक फ़ायदा भी है कि टीचर्स मार्क्स ज्यादा न दें तो फेल भी नहीं -करते कि कहीं जो पढ़ नहीं पाए वहां कुछ काम की बात तो नहीं लिखी :)
      }}}

      तो हमारी लम्म्म्म्म्म्म्ब्ब्बीईईई टिप्पणी हम छोटी कर ही नहीं पाते - उससे मुफ्त में विदुषी कहलाने लगे हैं :) यह वाली टिप्पणी भी तो लम्बी हो गयी न ? :)

      हर क्लाउड पर एक सीवर लाइनिंग होती है , नहीं ?

      हाँ नहीं तो ..... :) :) :)

      हटाएं
  20. @ पूरे हिन्दुस्तान में कितने हिन्दुस्तानी हैं, जो गर्व से कह सकते हैं, उन्होंने अपने जीवन काल में कभी घूस नहीं दिया ?

    - ओनेस्टली, उतने नहीं हैं जितने होने चाहिए. उतने शक्तिशाली भी नहीं हैं, जितने होने चाहिए. लेकिन यह भी सच है की हिन्दुस्तान को हर कठिन वक़्त से इसी समूह ने निकाला है. मगर सवाल यह है कि इंसानियत ज़िंदा रखने वाला समूह क्या हिन्दुस्तान तक सीमित है? बल्कि उससे बड़ा सवाल यह है की बड़े दिल वाले क्या सत्कार्य को किसी ज़मीन या मज़हब के लिए मर्यादित करेंगे? जननी जन्मभूमि का उद्घोष करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम क्या अयोध्या के नाम पर लंका और किष्किन्धा को अपने हाल पर छोड़ देते? बांटने वाली विचारधारा हमारी नहीं, हम उसके नहीं. हमारे आदर्श तो वही हैं जिन्होंने "सबै भूमि गोपाल की ...", या "पुत्रोहम पृथिव्या ... ", कहा था. उसके विपरीतगामी अपने झंडे का रंग कैसा भी करें, रहेंगे कूप-मंडूक ही. चोला बदलने से इंसान नहीं बदलता, धर्म परिवर्तन करे या नागरिकता परिवर्तन. [सभी भाई बहनों से क्षमा याचना सहित]

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    1. अनुराग जी,

      हिन्दुस्तान में घूस देना एक आम बात है। घूस देने का अर्थ ही होता है स्वार्थ, अपना काम सिद्ध करना। वो वहां के सिस्टम से लड़ नहीं पाते, ये उनकी कमजोरी है। घूस नहीं लेना उसके कारण कई हैं जो बाद में बताउंगी लेकिन घूस दिए बगैर कोई काम हो जाना, लगभग असंभव है भारत में।

      कुछ लोग ऐसे पोजीशन में होते हैं कि वो घूस ले सकते हैं फिर भी नहीं लेते, वो अच्छे लोग है, लेकिन अधिकतर जो घूस नहीं लेते वो इसलिए नहीं लेते क्योंकि उनको घूस लेने का मौका ही नहीं मिलता। घूस देकर आये हुए लोग फिर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। मेरे सारे प्रश्नों या आलोचनाओं का एक ही उद्देश्य होता है, लोगों में कुछ बदलाव लाने की कोशिश। अच्छी अच्छी प्यारी प्यारी बातें मैं भी कर सकती हूँ, लेकिन उससे होगा क्या ? क्या कुछ बदल जाएगा ? एक उदाहरण देती हूँ अभी हाल ही में मैंने नदियों के संरक्षण की बात कही थी। आपको ज्ञात हो की मेरी कुछ सहेलियों ने नदियों में फूल पत्ती नहीं विसर्जित करने, अपनी मूर्तियों को नहीं विसर्जित करने का प्रण ले लिया। आप और मैं तो बहुत अच्छी स्थिति में हैं, हम हिन्दुस्तान को भी जानते हैं और दूसरी जगहों को भी। जो कमियाँ हैं अगर उन्हें हम नहीं बताएँगे तो कौन बतायेगा। हम कहीं भी रहे, भारत का भला हम चाहेंगे ही। सब अपने-अपने घरों को बदलना शुरू करेंगे तब ही यह बदलाव संभव है। झूठ-मूठ ये पिक्चर दिखाना लोग बंद करें की सबकुछ ठीक है , जबकि कुछ भी ठीक नहीं है। जब तक लोग आत्मुग्धता से बाहर नहीं आयेंगे , बदलाव नहीं आएगा।

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  21. sanjay ji - my comm is in spam - if u feel it offensive - please let it stay there. if u feel it printable - please release it from the spma chain :)

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  22. बड़ी देर से आया लेकिन...अच्छा किया जो देर से आया... नही तो इतने अच्छे प्रवचन नही पढ़ पाता... हम तो सब से हीं सहमत हैं भई... असहमत होने का सवाल हीं नही पैदा होता है... :)
    फिर भी, अभी अपना वैचारिक मंथन चालू है... देखते हैं क्या निकल के आता है...

    सादर

    ललित

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