रविवार, अप्रैल 06, 2014

छोड़ो...

एक दिन मुझे और मेरे प्रशासनिक कार्यालय से आई फ़ील्ड ऒफ़िसर को  बैंक के काम से शाखा से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर एक गाँव में जाना था। मोटर साईकिल पर जाना खुद को ही ठीक सा नहीं लगा तो  पहली बार ऐसी सुविधा के लिये कुछ संकोच के साथ एक ग्राहक को जो ग्राहक होने के साथ मित्र श्रेणी में भी आ चुके थे, फ़ोन करके पूछा। कुछ ही देर में वो मित्र कार लेकर प्रस्तुत हो गये। जहाँ तक हो सके अपने राम उपकार और बंधन दोनों से बचते हैं लेकिन समाज में रहते कभी किसी कारण से और कभी किसी बाध्यता से दोनों को ही स्वीकारना पड़ता है। कार में बैठते समय यही सब सोच रहा था। मित्र जब तक कार स्टार्ट करें, मैं सीट-बेल्ट बाँधने का उपक्रम करने लगा। जैसे ही उनका ध्यान गया उन्होंने ग्राहक की विनम्रता से और मित्र की आश्वस्तता से मेरा हाथ पकड़ लिया, "न, सरजी। मैं चालीस-पचास से ऊपर कभी भी नहीं चलाता।" अब ऐसे मित्र तो मन को अच्छे ही लगते हैं जो बंधन से बचायें फ़िर भी मैंने प्रतिवाद किया, "उस डर वाली बात नहीं लेकिन हाईवे है, चैकिंग वगैरह..।"  वो बोले, "उनकी ..(बीप...बीप...बीप) सरजी। हमें बेल्ट लगानी पड़ी तो ये हमारी तौहीन है।" मित्र राजनीति में भी दखल रखते हैं और सामाजिक गतिविधियों में भी काफ़ी सक्रिय हैं, रास्ता भी लंबा नहीं था। हुआ कुछ वैसा ही कि कुछ तो बुआ के मन में जाने की ललक थी और कुछ फ़ूफ़ा लेने आ गये, हमारी सीट-बेल्ट नहीं बंधी।

हाईवे पर कुछ दूर गये थे कि साथ से गुजरती एक कार के शीशे पर लिखे एक जातिसूचक स्लोगन की तरफ़ दिखाकर मित्र ने ज्ञानवर्धन किया, "यहाँ ये और ऐसे स्लोगन चलते हैं सरजी। हमारा ड्राईविंग लाईसेंस, रजिस्ट्रेशन, इंश्योरेंस, सीट-बेल्ट सबकुछ यही है।" मुझे हँसी आ गई, "आई सी, पोल्यूशन भी यही है न?" वो भी हंसने लगे, "सब कुछ यही है जी।" अवसरानुकूल उन्होंने एक सच्चा किस्सा और सुनाया, कोशिश करता हूँ उन्हीं शब्दों में दोहराने की।

"कुछ दिन पहले की बात है, इसी शहर के एक व्यापारी बंधु अपनी कार से दिल्ली से लौट रहे थे। बार्डर पर भीड़ तो आपने देखी ही होगी, जाम लगा हुआ था और इनके ड्राईवर ने मौका मिलते ही एक दूसरी कार के आगे अपनी गाड़ी फ़ंसा दी और इस तरह उस दूसरी कार से पहले बार्डर पार कर लिया। जाम में फ़ँसे होने पर यही चलन है, जिसका मौका लगे वही कार का अगला हिस्सा फ़ंसा देता है और निकल लेता है।  चूँकि इन्हें उस जाम में थोड़ा सा मार्जिन मिल गया था तो इनकी कार बार्डर से करीब तीस किलोमीटर आगे पहुँच चुकी थी जब उस दूसरी कार ने इन्हें ओवरटेक करके रोका। कुछ समझने से पहले ड्राईवर और उसे बचाने और वजह समझने तक व्यापारी बंधु दुनियाभर की गालियाँ और लात घूँसे खा चुके थे। मौखिक और शारीरिक क्रियाओं के विश्लेषण से अंतत: वो समझ गये कि गाड़ी के पीछे लगे बड़े से स्टिकर ’गुप्ताजी’ने उनकी जाति और उनकी कार की पहचान तो पक्केकी करवा ही दी थी, जवानों के जातीय अभिमान को उकसाया भी था कि बनिया होके हमारी गाड़ी से जबरदस्ती आगे निकलेगा, ये मजाल? घर लौटते ही गुप्ताजी ने फ़टे कपड़े बाद में बदले, मरहम-पट्टी भी बाद में करवाई पहले वो स्टिकर खुरच खुरच कर उतारा जिसने ये हालत करवाई।"

पिटने वाले हम नहीं थे इसलिये किस्सा सुनकर बहुत हँसी आई, ऐसा ही चलन है जी आजकल। मैं पिटा तो बिना कारण और मैंने पीटा तो कुछ तो कारण रहा ही होगा।  बता चुका हूँ कि मित्र पोलिटिकल रुचि वाले हैं तो इस बारे में और पहलुओं पर भी चर्चा हुई। परंपरागत प्रचलित वर्णव्यवस्था में जो क्रम हैं, उसके अनुसार प्रस्तुत घटना में पीटने वाले और पिटने वालों की जाति बदल दी जाये तो केस बहुत मजबूत हो जाता और मारपीट के अलावा और कई गैरजमानती धारायें जुड़ जातीं। मगर ये हो न सका और गुप्ताजी स्टिकर खुरचकर चुपचाप गम पी गये।

ऐसे ही मेरा एक साथी था जो बैंक के समीप एक फ़ोटोस्टेट की दुकानवाले को हमेशा ’ओ बाहमण के’ कहकर पुकारा करता था। 

एक दिन मैंने पूछा, "ऐसे क्यों बुलाते हो?" 

उसने मुझसे प्रतिप्रश्न किया, "क्यों, ये बाहमण का है नहीं?"

क्या बहस करता उससे? फ़िर प्यार से समझाया कि इसका कोई नाम भी तो है, नाम से पुकार लिया कर। तेरे तर्कों पर चलेगा तो ये भी तो तेरी भाषा में जवाब दे सकता है कि ’हाँ, बोल ....... के। उस स्थिति में क्या होगा?" साथी का चेहरा एक बार तो जोर से तमतमाया लेकिन फ़िर सहज हो गया, मामला सुलट गया।  खैर, आभारी हूँ ऐसे साथियों का जो कटु लगने वाली बातें भी सह लेते हैं और मेरे द्वारा कुछ गलती करने पर मुझे भी कह लेते हैं।

ऐसे सवाल कुछ सोचने पर मजबूर तो करते ही हैं कि कब ऐसा होगा जब हम इन बातों से ऊपर उठ सकेंगे। अभी के हालात तो ऐसे ही हैं कि एक की गुंडागर्दी को रोकने के नाम पर परिवर्तन लाने के प्रयास होते हैं और कानून या समाज से समर्थन मिलने पर दूसरा वही गुंडागर्दी करने लगता है। जो शोषित है, अवसर मिलते ही वो शोषक की भूमिका निभाने लगता है।  इस बात में कोई शक नहीं कि अभी वांछित परिवर्तन नहीं दिखता लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा है।  बसपा जैसी जाति आधारित पार्टी अब उतनी कट्टर नहीं दिखती, कभी सवर्णों की पर्याय और ब्राह्मणों के द्वारा नियंत्रित कही जाने वाली भाजपा का शीर्ष नेतृत्व देखिये तो पता चलेगा कि परिवर्तन आ रहा है।       

जो भी हो, उस समय के आने की आस लगाना गलत तो नहीं कि हर नागरिक के पास बिना किसी विशेष जाति, धर्म, लिंग. वर्ग के प्रमाणपत्र के भी स्वयं को सिद्ध करने के पर्याप्त अवसर होंगे। जब हम देश और समाज से सबकुछ पाने की जगह अपनी तरफ़ से कुछ योगदान करने के लिये तत्पर होंगे। 

आप भी कहेंगे कि चुनावी मौसम में कैसे बेमौसमी तराना छेड़ दिया लेकिन ये एकदम बेमौसमी तराना नहीं है। नेता लोग भी हमेशा तो आग उगलने वाली बात नहीं कहते, कभी कभी ये सब भी भाषण में कहते ही हैं :) 

गाना सुनिये, काफ़ी पुराना है और जाहिर है कि देखे हुये ख्वाबों की मंज़िल अभी भी दूर ही है लेकिन सकारात्मकता का संचार तो करता ही है।

                                                                        

22 टिप्‍पणियां:

  1. यहाँ नाम तो व्यर्थ रखे जाते हैं...लोग शर्मा वर्मा से ही काम चला लेते हैं...

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    1. मशहूर था कि सरकारी द्फ़तर में किसी को न भी जानते हों तो ’शर्मा जी’ या ’वर्मा जी’ बुलाकर पहचान बढ़ाई जा सकती है।

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  2. वस्तुतः दूसरों के प्रति शालीनता का व्यवहार न करना , हीन - भावना का परिचायक है । इससे बचना चाहिए किन्तु इन भावनाओं से हम तभी उबर सकते हैं जब हम सब के प्रति संवेदन-शील हों , सब के सुख-दुख की हमें चिन्ता हो । वर्तमान को जागृत करती सुन्दर अभिव्यक्ति ।

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    1. जी सही कहा आपने, एक कॉम्प्लेक्स ही है यह।

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  3. लोगों की मानसिकता से ठेठपना जाता नहीं , जड़ें जमाए बैठा है. ऊपर से खाद-पानी देनेवाले भी सक्रिय हैं .

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    1. ठेठपना भी, अवसर मिलते ही खुद को श्रेष्ठतर सिद्ध करने की मानसिकता और भी बहुत कुछ शायद।

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन उपलब्धि और आलोचना - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. एक बार अपने मित्र के घर गये और पुकारने के लिये उसका नाम ही याद न आया. क्योंकि हर समय उसके सरनेम से ही बुलाते थे, और अगर घर पर आवाज लगाते ओये साले...... ... तो सारे के सारे वही थे...... :) क्या करें ऐसा भी हो जाता है....

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    1. ऐसा न हो, यही सोचकर एक मित्र के घर गये और उसकी माताजी से उसके औपचारिक नाम ’रविन्द्र’ बताकर उसका पता पूछा, जवाब मिला, "पता नहीं।’ फ़िर कॉलेज का नाम वगैरह बताकर पूछा तो कुछ सोचने लगीं, एकदम बोलीं, "कौन गुल्लू? ’वो तो मेरा ही छोरा सै...रे गुल्लू, बाहर आ जा’ :)

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  6. ये बेमौसमी तराना हरगिज नहीं संजय भाई, चुनाव के समय तो जाति बोध और भी गहरा जाता है। चूती छत की मरम्मत का सही समय बरसात ही है...!

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    1. जय हो प्रोफ़ैसर साहब की, खुशामदीद X 6 :)

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  7. ये बेमौसमी तराना हरगिज नहीं संजय भाई, चुनाव के समय तो जाति बोध और भी गहरा जाता है। चूती छत की मरम्मत का सही समय बरसात ही है...!

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  8. हम 25 किलोमीटर का सफर तीन घण्टे में तय करते थे अपनी गाँव की पोस्टिंग से अपने घर तक का. बस स्टैण्ड का एक चाय-नाश्ते वाला मेरी सीट खिड़की के पास सुरक्षित रखता था. बस में भीड़ और मेरे बगल में एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बैठ गया. कुछ लोग खड़े थे. एक मूँछों वाले सज्जन मेरी सीट के सामने खड़े, मेरे बगल वाले व्यक्ति को घूरे जा रहे थे. उनके घूरने में भाव यह था कि अबे सीट छोड़ता है कि नहीं. और जब बस करीब आधे घण्टे का सफर तय कर चुकी तो उन्होंने उस व्यक्ति का हाथ पकड़कर उठा दिया और छूटते ही एक शानदार सी गाली देते हुए बोले, "हरामी! ...... होकर सीट पर बैठता है और .... लोग खड़ा रहेगा!"
    वो व्यक्ति ऐसे सीट छोड़कर उठ गया जैसे ताजिरातेहिन्द के तहत कोई भयंकर अपराध किये हो!
    अपने बैंक में भी किसी न होने वाले काम के लिये किसी को मना करें तो उसका पहला बयान यही होता है कि हम फलाना जात के हैं ना एही से मना कर दिये अगर अमुक होते त कोई मना नहीं करता!
    मेरा प्रदेश तो इस रोग से बुरी तरह ग्रसित है. लोग आपक नाम पूछेंगे और अगर आपने पहला नाम बताया, तो पूरा नाम पूछेंगे, पूरे नाम में अगर कुमार, प्रसाद, नारायण लगा हो तो उपनाम पूछेंगे ताकि जाति का अन्दाज़ा लग सके, वो भी अगर सिंह, सिन्हा जैसा कॉमन सरनेम हुआ तो मूल निवास पूछेंगे. आप भोले बनकर गिनाते जाइये और तब भी पहेली नहीं सुलझी तो सीधा पूछ बैठेंगे कि आप ........ हैं! ऊ गाँव में तो बहुत सा घर .... हैं!
    हमारे प्रदेश में सालों भर चलने वाला और देश में चुनावों के समय सिर उठाने वाले इस दैत्य का "क़ौमी तराना" सुनकर बहुत कुछ फिर से याद आ गया! ताज्जुब इसलिये नहीं हुआ कि यही देखते हुये पले-बढे हैं!!

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    1. सन इक्यानवे की बात है, सहकर्मी आठ किलोमीटर दूर से साईकिल पर आते थे जबकि बैंक से कर्जा लेकर खरीदा स्कूटर घर पर जंग खा रहा था। बहुत बार कुरेदने पर एक बार बताने लगे कि गाँव के कुछ लड़कों ने धमकाया था कि स्साले हम ठाकुर होके साईकिल चलाकर जाते हैं और तुम .. इस्कूटर से धुंआ उड़ाओगे? ऐसा नहीं कि शोषण नहीं था लेकिन वही काम करते दूसरे लोग दिखें तो थोड़ा अजीब लगता है। फ़टी बिवाई वाले पैरों को तो पराई पीर और भी अच्छे से समझनी चाहिये।

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  9. एक और बात याद आ गई जो मैं हमेशा अपने दोस्तों से कहता रहता हूँ.. हमारे प्रदेश के मुख्य मंत्री की जाति पता लगानी हो तो सचिवालय चले जाइये! जितने उच्चाधिकारियों के कमरों में नामपट्ट लगे हों, सबको ध्यान से पढिये. आपको एक पैटर्न दिखाई देगा. वही पैटर्न बताता है कि आपका मुख्य मंत्री किस जाति का शिरोमणि है!!!

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  10. इंशाअल्लाह, परिवर्तन होगा। हो रहा है!

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  11. बिल्कुल सही नब्ज पर हाथ रखा है आपने. जातिवाद सचमुच जहर है. मैं उम्मीद करता हूँ एक दिन ऐसा जरुर आएगा जब जाति के नाम पर न तो वोट डाले जायेंगे और न किसी को नीचा दिखाया जाएगा.

    मेरा विचार है कि जाति के साथ साथ आप धर्म का ज़िक्र भी कर देते तो रचना और भी ज्यादा प्रासंगिक और समसामयिक हो जाती. धर्म के नाम पर भी बहुत नफ़रत फैला रखा है राजनैतिक पार्टियों ने समाज में.

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  12. जातिवाद का जहर मैने बड़े होने पर ही देखा..बचपन दिल्ली में बीता ..पत्रकार पिता के घर..जाति होती है ये पता था...पर उसका दंश कहीं नहीं था..80 के दशक में ही माता-पिता ने सिखाया जो भी बड़ा घर आए उसके पैर छूने अनिवार्य है...जाति का कोई मतलब नहीं...खाना भी साथ खाया जाता था...मगर जब नौकरी की दुूनिया में आया तब पता चला कि जाती क्या होती है

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