रविवार, जून 07, 2015

रिश्तेदारियाँ

एक स्टाफ़ के घर हमें जाना था, बैंक से लगभग 40 km का रास्ता था।  हमारे मैनेजर साहब ने सुझाव दिया कि उनकी कार में ही चला जाये।  जब हम चार जने तैयार हो गये तो उन्होंने अपनी बात पूरी की, "कॉंट्रीब्यूट कर लेंगे। बस और रिक्शा किराया जितना दोगे,  लगभग उतना ही इधर योगदान बनेगा।" कार में जाने की  हाँ तो खैर हम पहले ही भर चुके थे, योगदान की भी हामी भर दी। उनका मोटरसाईकिल चलाते हुये ३-४ बार एक्सीडेंट पहले हो चुका था। इसका पता हमें कैसे चला, इसकी भी अलग कहानी है। एक बार कद के बारे में उनके दावे को झुठलाने के लिये मुझे और उन्हें अगल-बगल में खड़ा किया गया तो देखने वालों ने बताया कि मैनेजर साहब मुझसे कम से कम २ इंच छोटे हैं। तब उन्होंने ३-४ एक्सीडेंट वाली बात बताई थी कि इत्ते एक्सीडेंट होने के बाद कम से कम ३-४ इंच तो वो डाक्टरों द्वारा छीले छांटे ही जा चुके हैं, इसलिये वो weightage भी लेते हुये उन्होंने खुद के मुझसे बड़े होने का निर्णय सुनाया था। खैर, जाने से पहले  मैंने उनसे पूछा कि क्या कार भी उसी मोटरसाईकिल वाले स्टाईल में चलाते हैं? उन्होंने बताया कि बिल्कुल नहीं, एकदम सेफ़ चलाते हैं। सबूत के तौर पर उन्होंने बताया कि मोटरसाईकिल से कई बार गिरे हैं लेकिन कार से आज तक नहीं गिरे। जैसे तैसे कारवां चल पड़ा।
चलने के तुरंत बाद ही उनकी ड्राईविंग देखकर हम बाकी तीन भक्त प्रह्लाद बन गये।  इस बात पर भी संतोष जताया गया कि हमारे कर्म चाहे जैसे भी रहे हों, ये अच्छा है कि मार्च का महीना चल रहा है। इस महीने में नौकरीपेशा लोगों की  LIC की कोई किस्त बकाया नहीं रहती है। मैनेजर साहब ने पूरे रास्ते हाईवे को अंटार्कटिका और अपनी कार को स्लेज गाड़ी समझ कर चलाया। आगे से और पीछे से आती हरियाणा रोडवेज़ की बसों को यमदूतों की तरह आते देखकर  पीछे बैठे दोनों मित्र चीखते चिल्लाते रहे और हम ये सोचकर मूंगफ़ली खाते रहे  कि मरना तो है ही खा पीकर मरें। कैसे न कैसे रास्ता कट ही गया।
अब वापिसी का सफ़र शुरु हुआ। अंधेरा छाने लगा था और सरजी की बैट्री चार्ज थी, पोज़ीशन हो गई पहले से भी ज्यादा शानदार। एक टाटा 407 से छोटी सी प्यार भरी पप्पी ली/दी लेकिन वो पूरी टक्कर दे नहीं पाया और उसका रोडपतन हो गया। वो साईड में गाड़ी रोककर अपना डैमेज चैक करने लगा और हमारे सरजी ने गाड़ी भगा दी। पीछे वाले साथी अब लिहाज छोड़कर गुस्से में जोर जोर से बोलने लगे। इसके बाद हुआ वो, जिसके लिये आपको ये सब कहानी बताई।
पुलिस का नाका लगा हुआ था, गाड़ी साईड में लगवा ली गई।
"कागज़? इंश्योरेंस?"
"कागज़ तो जी बैंक में रह गये।"
"गाड्डी के कागज़ बैंक में के करें थे?"
"हवलदार साहब, मैं  .......... बैंक में मैनेजर हूँ। जल्दी में कहीं जाना पड़ा तो गलती से कागज वहीं रह गये।"
"लाईसेंस द्खा दयो"
"भाई साब वो भी दराज में ही रखा रह गया।"
"बैंक का आई कार्ड तो होयेगा?"
"वो भी न है जी, अभी तो"
"नीचे उतर आओ, साहब बैठे हैं उनसे ही बात कर लो।"
वो ले गया जी अपने इंचार्ज के पास और जाकर सारी बात बता दी। इंचार्ज साहब शक्ल से ही खूंखार लग रहे थे या फ़िर हमारे बहुत सारे फ़ाल्ट थे इसलिये हमें ऐसे लगे हों। मैनेजर साहब उन इंचार्ज साहब से बात करने लगे और हम तीन ये चर्चा करने लगे कि हमारे कांट्रिब्यूशन में यो खर्चा भी जुडेगा या नहीं। इतने में इंचार्ज साहब की आवाज सुनाई दी, "दारू थमने पी रखी है। गाड्डी का एक कागज़  धोरे कोणया। लाईसेंस भी कोणी। हमने कहो हो कि बैंक मुलाजिम हो, थोड़ा लिहाज करें। करण लाग रहे हां लिहाज मैनेजर साहब, कम ते कम आईकार्ड तो दिखा दे?" 
अब मैनेजर साहब क्या रिक्वेस्ट करते? हमने भी सोचा कि अब तो कम से कम हजार का फ़टका लग गया। मैनेजर साहब फ़िर बोले, "जी, बलबीर सिंह मेरा रिश्तेदार है। इसी थाने में लग रहा है।"
"बलबीर दो सैं म्हारे धोरे, एक जाट सै अर दूसरा ......।  कुण सा बलबीर है थारा रिश्तेदार?"
"जी दूसरे वाला, मुंशी है जो।"
"जाण दे भाई इन्हांने। ध्यान रख्या करो भाई, कागज पत्तर पूरे रख्या करो साथ।"
फ़ोकट में छूटने की हमें बड़ी खुशी हुई लेकिन ऐसा लगा कि उससे ज्यादा हैरानी उस हवलदार को हुई होगी।  इतनी कमियाँ और फ़ोकट में छोड़ देने का इन कड़क साहब का फ़ैसला, उसने थोड़ा झिझकते हुये पूछा, "जाण दूँ साहब?"
"जा लेण दे भाई। पैली बार कोई फ़ेटया(मिला) है जिसने मुंशी को रिश्तेदार बताया है वरना कोई सा छोरी@# डीएसपी से तले की रिस्तेदारी न बताता है। जा लेण दे इन्हांने।"  

थानेदार साहब ने जो कहा, वो सही था या नहीं?  
रेल में, बस में, भीड़ में, मेले में जब कहीं किसी से  थोड़ी लंबी बात हुई तो पता चलता है कि सामने वाले का कोई न कोई अंकल हमारे बैंक में बड़ी ऊंची पोस्ट पर है। आप भी याद करके देखियेगा, आपको पिछली बार कब कोई ऐसा मिला था जो आपके ऑफ़िस के किसी क्लर्क या चपरासी का रिश्तेदार था? गारंटी देता हूँ कोई न मिला होगा। 
नौकरी और ट्रांसफ़र का चोली दामन का साथ है। नौकरी चल रही है, ट्रांसफ़र होते रहते हैं। लोग मिलते रहते हैं, बिछुड़ते रहते हैं। कुछ किस्से हमें याद आते रहते हैं, कभी हमारे किस्से कोई और लिखेगा।  अपना ट्रांसफ़र फ़िर से दिल्ली में हो गया है।  सोचा आपको बता भी दिया जाये और इस बहाने ब्लॉग पर हाजिरी भी लग जायेगी। नोटिस कर लिया न कि अब हम दिल्ली में आ गये हैं? अच्छा किया, वरना आप जान लीजिये कि हमारे एक अंकल ...................................................

13 टिप्‍पणियां:

  1. आज की ब्लॉग बुलेटिन बांग्लादेश समझौता :- ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. ये बात तो सही कहा आपने। रिश्ते और तो निकल ही आते हैं। अगली बार से कागज वगैरह का ध्यान रखियेगा। परिचय नहीं निकला तो।

    यहाँ भी पधारें
    http://chlachitra.blogspot.in/
    http://cricketluverr.blogspot.com

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  3. बहुत दिन बाद अच्छी ब्लॉगपोस्ट पढी अपनी पसन्द की
    फत्तू को कहां गुमा दिया.. ;-)
    प्रणाम

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  4. भाई मेरे ! मंगल सनीचर न मनेजर की मोटर में बैठना हो त पहलां ए हनुमान जी पे रोट चढ़ा दिया करो अर कीसे ओर दिन इसा हो त पैया डोडे पी लिया करो I म्हारा भी एक छोरा बैंक में लागन आला स I तन्ने कोए काम हो ते बता दिए I कह दें गे I अर एक बात ओर माडा सा तावला तावला लिखा कर I

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    1. दादा राम राम :)
      हनुमान जी त सदा ए सहाय रहे हैं हम पर, यो रोट आला फ़ार्मूला और ध्यान राखांगे। रही बात डोडेयां आली, त उड़ै की तो इब टाल ही समझी जाये। पैल्लम ही कसूते नशे हो लिये :)
      भाई आ लेगा बंक में तो काम तो निकड़ेगा ही, देयांगे तकलीफ़।
      तावला तावला लिखन आली बात तो यो सै दादा कि किम्मै तो सफ़र ने तोड़ राख्या सै अर किम्मे ये कम्पूटर के वायरस ने, आपकी दया रई तो इब कीबोर्ड पीटते ई रांगे :)

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  5. बहुत ही मजेदार व्यंग्य . पढ़ते हुए बरबस ही हँसी आती रही . .

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  6. थानेदार साहब से मुठभेड़ के बाद सुधरे, या वैसे ही झूम कर इधर उधर की गाड़ियों से छेड-छाड़ करते हुए चलते रहे?
    ख़ुशी हुई जान कर कि आप जान माल के नुकसान से बचे रहे!
    बचे ही नहीं रहे, जानदार व्यंग्य भी लिख पाए...

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    1. इस वाकये के कुछ समय बाद चुनाव ड्यूटी निभाकर आधी रात में मोटरसाईकिल पर उन्हीं मैनेजर साहब के साथ......धड़ाम्म्म्म्म्म्म।
      वो कहानी फ़िर सही :)

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  7. अंकल जी से आपके बारे में पूछा, बे तो नाट गए

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    1. नाट गये न? हमने पहले ही कह रखी थी अंकल जी से, उंगली पकड़ा दी तो सिफ़ारशी पहुँचा पकड़ लेंगे इसलिये बिना हमारी चिट्ठी लिये कोई पूछे तो नाट जाना। :)

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  8. अच्छे लगे बलबीर मुंशी।

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  9. माने अगली बार दिल्ली आना हुआ तो हम भी बता सकते हैं कि हमारे ब्लॉग-रिश्ते में हैं एक बैंक में :)

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    1. न न,
      मने ये है कि अगली बार दिल्ली आने से पहले सूचित करना ही होगा, न तो कोई रिश्ता विश्ता नहीं। सीरियसली।

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