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मंगलवार, जून 21, 2011

संतरे के बीज...


आज अपनी  एक पुरानी पोस्ट देखी,  सोच रहा था कि क्या समय था वो भी, कैसी कैसी बातें होती थीं और हम थे कि मजे चुरा ही लेते थे। एक बार तो सोचा कि उसे ही धो-पोंछकर लगा देते हैं फ़िर से, लेकिन इरादा बदल दिया। आज सुनाते हैं आपको एक और किस्सा  - जवानी का एक अन-रोमांटिक किस्सा:)

वो कॉलेज में हमारे साथ पढ़ता था। बहुत कम बोलने वाला, और जब बोलता भी तो इतने नपे तुले और सॉफ़्ट तरीके से कि  ऐसा लगता था मुँह से फ़ूल झड़ रहे हों। मेरे ग्रुप के दो लड़कों का स्कूल टाईम का साथी था, यकीनन वो उसके बारे में मुझसे ज्यादा जानते थे। उन्होंने  इतना बता रखा था कि बंदा है बहुत ऑब्जर्वर टाईप का। हर चीज को हर उपलब्ध एंगल से जाँचकर कुछ फ़ैसला लेता है।

खैर, यूँ ही वक्त गुजर रहा था कि एक दिन वो मेरे घर आया। अपने को शुरू से ही पढ़ाई करने के लिये एक कमरा छत पर अलग मिला हुआ था,  खाने के लिये फ़्रूट वगैरह लेकर बड़ी श्रद्धा से हाथ-मुँह धोकर हम उसमें प्रवेश किया करते थे। बिना  तैयारी के हम कुछ नहीं करते थे,  घर भर में ढिंढोरा पिट जाता था कि पढ़ाई करने जा रहे हैं और यही हमारा मुख्य उद्देश्य होता था। रेडियो सुनो, टेप रिकार्डर सुनो, डायरी लिखो, कुछ प्लानिंग करो – कोई डिस्टर्ब नहीं करने आता था। तो हमारा मित्र आया और बैठ गया। थोड़ी बहुत बात चीत करते रहे और संतरे खाते रहे।

कुछ देर बाद वो कहने लगा, “यार, एक बात बता। मैं देख रहा हूँ कि जबसे हम संतरे खा रहे हैं, तूने इनके बीज बाहर नहीं फ़ेंके?” 

बताया न कि बहुत तगड़ा ऑबजर्वर था, पकड़ ली मेरी आदत। जब से कहानी पढ़ी थी   ’seventeen oranges’ मैं भी ट्राई करता रहता था कि कभी वैसी  नौबत आने पर मैं कैसे रियैक्ट करूँगा।  अब आदत पड़ गई थी और उससे   कैसे कहता कि कसैली चीजें और उनके साथ खेलना मुझे अच्छा लगता है? ये आदत तो अब मेरी बन ही चुकी थी  कि मैं संतरे के बीज बहुत देर तक मुँह में रखता था, चुभलाता रहता था। अपनी कमी को छुपाने के लिये वही फ़ार्मूला अपनाया जो यहाँ भी चलता है, सामने वाले पर फ़ायरिंग चालू कर दो:)
मैंने उससे हैरान होकर पूछा, “तू फ़ेंक देता है?”
“और क्या करूँगा?”
“अबे, तेरे घर में कोई रोकता टोकता नहीं?”
“क्यों रोकेंगे भाई?”
“कैसे आदमी हो यार तुम?

संतरे की बीजों के चिकित्सीय गुणों पर एक अच्छा सा भाषण पिलाया, जिसमें जातिवाद\प्रांतवाद जैसे मुद्दे भी मिक्स कर दिये। दस मिनट के भाषण के बाद उसको समझ आ गई कि उसके परिवार के सदस्यों के रंग दबे होने के पीछे, कद-सेहत आदि हमारे मुकाबले उन्नीस होने की एक ही वजह है कि उन्हें संतरे के बीजों के गुण नहीं मालूम और वो मलयगिरी के भीलों की तरह चंदन का मूल्य न समझने वाला काम कर रहे हैं। उसे बताया कि सीज़न न रहने पर हम तो पंसारी के यहाँ से संतरे के बीज  खरीद कर भी लाते हैं। इफ़ैक्ट लाने के लिये खरबूजे के मगज़, तरबूज के मगज़  की याद दिलाई और वो मान भी गया कि ये सब तो वो भी खरीद कर लाते रहे हैं।

अगले दिन कॉलेज में उसके पहुँचने से पहले मैंने अपने दोस्तों को वैसे ही ये बात बता दी। उसके पुराने सहपाठी कहने लगे, वो तेरी बातों पर यकीन ही नहीं करेगा। वो आया, और थोड़ी देर बाद अतुल को लेकर साईड में चला गया। लौटा तो अतुल ने आँख मारी, ’देखा, कन्फ़र्म कर रहा था।’ एक एक करके  जितने पंजाबी पुत्तर थे, उसने सबसे पूछा और सबने अपने अपने तरीके से उल्टे उसे ही धमकाया, "कैसी बेहूदा बात पूछ रहा है, तुझे ये भी नहीं मालूम?"

उस दोपहर मैं तो जरूरी काम होने के कारण घर को खिसक लिया, बाकी मुस्टंडे उसे लेकर बाजार गये। पांच-छह पंसारियों के पास जाकर उसे आगे कर देते थे, “ढाई सौ ग्राम संतरे के बीज देना।” अगले दिन बता रहे थे कि जिस नजर से दुकानदार देख रहे थे, बस कल्पना ही कर सकते हैं।

बाद में जब कभी  इस बात का जिक्र छिड़ता तो भी  वो हौले से मुस्कुरा देता था। दो तीन कंपीटिशन के एग्ज़ाम देने हम साथ साथ गये थे, मैं पास हो जाता था और वो रह जाता था। मुझे सच में तकलीफ़ होती थी, उसने भूले से भी कभी इस बात का  अफ़सोस नहीं जताया जबकि उसे नौकरी की मुझसे ज्यादा जरूरत थी और वो ज्यादा तैयारी भी करता था।  अपनी तरफ़ से उसकी मदद भी की, लेकिन सरकारी नौकरी नहीं मिलनी थी तो नहीं ही मिली। 

अतुल, जिसका जिक्र ऊपर किया वो प्राईवेट जॉब में ही था लेकिन जगह उसकी प्रभावशाली थी। उसके पीछे पड़ा रहा मैं भी और वो खुद भी इसका कुछ करना चाहता था,अतुल ने उसे  एक फ़ाईव-स्टार होटल में एकाऊंट्स के काम के लिये लगवा दिया था। उसके घर उसे बताने गये थे हम दोनों, कहकर उसकी बहन से चाय बनवाई और बाहर जाकर उससे पैसे निकलवाकर देवानंद बने, वो तो एकदम सूफ़ी था – सच में बहुत खुश थे हम दोनों उस दिन और वो  वैसा ही, मंद मंद मुस्कुराता हुआ। दो तीन दिन रोज उसके ऑफ़िस के हाल पूछने उसके घर जाते थे कि कोई दिक्कत तो नहीं है? बताता था, "कुछ काम तो है नहीं, घंटा भर ऑफ़िस में बैठना होता है फ़िर निकल जाता हूँ कभी स्विमिंग पूल की तरफ़ और कभी किसी और तरफ़।"  और हम हँसते थे कि अच्छे से ऑब्जर्व करने का, आँखें सेंकने का  मौका मिला है तुझे।    हफ़्ते भर बाद पता चला कि उसने नौकरी छोड़ दी है। सिर पीट कर रह गया अतुल भी, "कोई दिक्कत थी तो बताता तो सही?"
और वो वैसे ही  हौले से बोला, “क्या बताता? ऐसी कोई दिक्कत थी ही नहीं, मन घुटा घूटा सा रहता था वहाँ, अनकम्फ़र्टेबल सा लगता था।”  ठीक है भाई, रह ले अपने कम्फ़र्ट एरिया में।

कुछ साल पहले ट्रेन में मिला मुझे, कहीं प्राईवेट जॉब ही कर रहा है। पिछली बातें छेड़ीं तो अपने अंदाज में मुस्कुराता रहा, बिल्कुल नहीं बदला है। उसी नौकरी में खुश है, इतना तो अब मैं भी जान ही चुका हूँ कि असली सुख पैसे, नौकरी,पद,  सत्ता में नहीं है। जो सरल है, सहज है  वही प्रसन्न भी रह सकता है।  मैंने संतरे वाली  बात के लिये सॉरी बोली, तो वो हँसने लगा कि ये तो साधारण सी बात थी बल्कि और बातों के लिये मुझे धन्यवाद कहने लगा।      कह रहा था कि अपने बीबी बच्चों को भी बता चुका है ये किस्सा, उसके घर जाऊँगा कभी तो उसकी बीबी  पहचान लेगी मुझे।  

“अबे जा,   मुझे पहले मैं तो पहचान जाऊँ। आता हूँ किसी दिन”….. :) मेरा सारा  अपराध बोध खत्म हो गया था। सुख दुख मन की अवस्थायें ही हैं, वही चीज कभी सुख देने  लगती है तो कभी दुख।

ठीक कह रहा हूँ, मान लो। इत्ता उपदेश तो झेलना ही पड़ेगा:)