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बुधवार, अगस्त 25, 2010

बड़े लोग और बड़ी बातें, अपन छोटे ही भले!

एक होता है ग्रह और एक होता है पूर्वाग्रह। होने को तो एक दूसरा गॄह भी होता है और उपग्रह भी होते हैं, और भी इस टाईप के शब्द होते होंगे  लेकिन आज का बिना राशन का हमारा भाषण पूर्वाग्रह पर केन्द्रित है। बचपन से ही देख रहा हूँ कि लोग पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं, अब तो ऐसा लगता है कि यदि कोई इससे बचा हुआ है तो हमें  शक ही होने लगता है कि वो इंसान भी है कि नहीं?  तो जी, बचपन से जो प्रचलित पूर्वाग्रह महसूस किये, उनमें लोगों का बड़ों के आगे झुकने और अपने से छोटों को लतियाने का पूर्वाग्रह सबसे टॉप पर दिखा। अब टॉप से मतलब चिट्ठाजगत के टॉप से भी न लेना और स्कर्ट के साथ पहने जाने वाले टॉप से भी नहीं। अब हम भी जब इसी दुनिया में रहते हैं, यहीं सांस लेते हैं तो हम इस मायाजाल से कैसे बच सकते थे? हमने  भी सोचा कि चलो हम भी हो लेते हैं  ग्रस्त इस से। हो गये जी। जब इत्ते वड्डे वड्डे बंदे अपील करते हैं तो हमने भी सोच लिया कि हम भी अपनी आत्मा फ़ात्मा की आवाज़ को दबा देंगे। 
जितने भी प्रेरणा देने वाले महापुरुष या स्त्रियां हुईं हों, सभी ने जोर दिया इस बात पर कि ’थिंक बिग’।  किंग खान बेचारा पीठ दर्द से परेशान होते हुये भी लोगों को ’डोंट बी संतुष्ट’ का उपदेश देता रहा, चेहरे पर दर्द देखिये कभी उस समय। ये कम त्याग की बात नहीं है जी। हे भगवान, हम तो चालीस साल तक अपराध ही करते रहे। लगा कि गलत थे हम जो ’स्माल इज़ बिग’ का फ़ार्मूला पकड़े बैठे थे और जकड़े बैठे थे। मानव जीवन पता नहीं कितनी योनियों के बाद मिला है, और हमने अपना बचपन, अपनी जवानी मिट्टी कर दी इस संतुष्ट रहने की आदत से।
बड़े बनने के चक्कर में हमने अपनी सुकून वाली जिन्दगी में जैसे आग लगा दी, खुद अपने ही हाथों। जब छोटे थे तो ये सोचते थे कि यार किसी का दिल न दुख जाये कहीं अपने किसी काम से, अब कोई भी काम करने लगें तो पहले दिमाग में आता है कि इस काम में मेरा फ़ायदा कैसे होगा और क्या होगा? पहले सोचते थे कि जो भी होगा, साथी लोगों के साथ मिलजुलकर बाँट लेंगे और अब सोचते हैं कि अपना घर भरना चाहिये और बाकी जायें भाड़ में। पहले लगता था कि दूसरे की इज्जत अपनी इज्जत से बढ़कर है और अब कोशिश रहती है कि दूसरे की बेइज्जती कर सकें तभी अपनी इज्जत में चार चाँद लगेंगे। ये इस दुनिया के दस्तूर अपने से नहीं निभाये जाते जी। रह रहकर ’तीसरी कसम’ के हीरामन की याद भी आती है और ’जब जब फ़ूल खिले’ के राजा शिकारे वाले की भी।  यहाँ बड़ों की दुनिया के ऐसे ऐसे दस्तूर पता चलते हैं कि एक दूसरे के नाम के कुत्ते तक पाले जाते हैं। ताव ताव में मैंने भी अपने एक दोस्त को कह दिया कि अगर ऐसा न हो तो मेरे नाम का कुत्ता पाल लियो, मुँह पर तो उसने कुछ नहीं कहा कि लेकिन मन में तो हँसा ही होगा कि खुद को क्या समझ रहा हूँ। मन से तो मैं चाहता रहा कि ऐसा न हो और  इस शर्त में मैं हार जाऊँ। सोच रहा हूँ कि भौं-भौं हिन्दी में ठीक रहेगी या पंजाबी में?
आज की बातें ज्यादा बहकी-बहकी लगें तो जी हमारा कसूर कम और हालात का ज्यादा मानना। मुझे भी अभी ही समझ आई है कहानी।  आज सुबह से ही  मन जाने कैसा कैसा हो रहा था, सारा दिन ऑफ़िस में भी एकदम बुझा बुझा सा रहा। जबकि आज का दिन तो बहुत खास दिन था, यूँ भी त्यौहार का दिन और दिल की ऐसी कैफ़ियत? लेकिन जैसी नीयत होती है वैसी ही नियति होती है। आज ऑफ़िस में ही सात बज गये और फ़िर भी काम बीच में ही छोड़कर आना पड़ा। दोपहर दो बजे तक कनैक्टिविटी न रहने के कारण बिल्कुल खाली बैठना पड़ा और उस के बाद जो काम करना शुरू किया तो इस कामी की भी बस हो गई।
लौटते समय  रास्ते में एक ही सीन दो अलग  अलग जगह देखा, सड़क के बीच में हाथापाई करते और लड़ते-भिड़ते दो गुट। रास्ता जाम हो रहा है तो हो, पर बड़ा कौन की जिद में सड़क पर तमाशा करते बड़े लोग। दिमाग में सचमुच बहुत कन्फ़यूज़न होने लगे थे। क्या यारों, त्यौहार के दिन भी। रास्ता तो जाम था ही, बाईक साईड में लगाकर आराम से देखने लगा इधर उधर। दिल जैसे डूबा जा रहा था। फ़िर बचपन में पढ़ा रक्षा-बंधन का निबंध याद आया, श्रावण पूर्णिमा…..। अनायास ही ध्यान ऊपर आसमान की ओर चला गया, पूनम का चाँद। और याद आने लगी अपनी ही एक बेमतलब सी पोस्ट। और याद आने लगा कि बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि पूरे चांद का अपराधियों, आध्यात्मिक और मानसिक रूप से संवेदनशील लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। घर आकर खाये छप्पन भोग और नेट खंगाला। कई स्टडीज़ पर नज़र पड़ी। एक पोस्ट  के अनुसार प्रत्यक्ष असर देखना हो तो कुछ घंटों तक चांद को निहारें, असर खुद ही दिखने लगेगा।
तो जी खटौला बिछाया हमने बाहर और एकटक निहारा किये चमकते  चांद को बहुत देर तक। सच में अजब मंजर दिखा - कभी चमकता चांद तो कभी टूटा तारा,  आलाप भरते गुलाम अली, आगाज़ और अंज़ाम की बातें, आबादी और बर्बादी की सूरतें….। बच्चे भी अजीब नजरों से देख रहे थे, हा हा हा। सुला दिया है बच्चों को प्यार से समझाकर। अब कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा रात भर। और लगा  अच्छा ही हुआ कि तीन दिन पहले भीगकर मोबाईल भी खराब हो गया, अपनी मर्जी से कभी नंबर या नाम दिखा देता है कभी नहीं। रख दिया है इसे भी परमानैंट साईलेंस मोड पर। लगता है इसके सिम पर भी चांद की कलाओं का असर पड़ता है, बढ़िया है, कितने सामान कर लिये थे पैदा। अपन तो ठीक नहीं करवाने वाले इसे, जब नहीं था तब भी तो चल ही रही थी जिन्दगी, नहीं रहेगा तब भी चलेगी। निर्भरता कम कर लेनी है जी अब तकनीकी चीजों पर।    अपन पहले जैसे छोटे ही भले और भला अपना शिकारा।
तो जी, लब्बो लुआब ये है कि सच में चांद का मन पर बहुत असर पड़ता है, खासतौर पर अपने जैसे हिलेले, सरकेले लोगों पर। चाँद अलबत्ता वैसा ही निर्दोष और निष्कलुष है, और यही उसका  थोड़ा सा दोष है, अगर है तो। ज्यादा  दोषी है तो अपना मन। अगर चाँद भी कभी कभी सूरज की तरह तेज दिखा पाता तो होती क्या अपनी हिम्मत इतनी बात कहने की, सुनाने की? तो बड़े लोगों, तुम्हारी बड़ी-बड़ी बातें तुम्हें मुबारक, अपन अपनी फ़ाकामस्ती में मस्त हैं। जब तक मन चाहेगा, जैसा मन चाहेगा, लिखेंगे। बस ये चाँद चमकता दमकता दिखता रहे, बहुत है अपने लिये। महीने में एक बार ही सही, निहारेंगे जरूर। सिम तो अपनी भी सेंसिटिव ही है।
आज तक तो सीरियसली नहीं सोचा था, लेकिन आज रिटायरमेंट के बाद की लाईफ़ के बारे में कुछ प्लानिंग कर ली है। कोई सीनियर सिटीजन टाऊनशिप या हाऊसिंग सोसायटी नहीं, तलाश शुरू करते हैं किसी human behaviour institute(हिंदी में बोले तो मंटो के टोबा टेक सिंह) की, जहाँ रहने खाने की सुविधा हो, एडवांस बुकिंग करने पर कोई छूट वगैरह हो तो बेहतर है नहीं तो देखी जायेगी।  आपको ऐसे किसी संस्थान की जानकारी हो तो कृपया बताईयेगा जरूर, बतायेंगे न? 
:)  फ़त्तू सबको एक आंख से ही देखता था सो उसके ब्याह में अड़चन आ रही थी। एक जगह जुगाड़ भिड़ाकर फ़ेरों के समय लाईट गायब करवा दी ताकि कोई उसकी कमी न पकड़ ले। पंडित जी ने फ़ेरों के लिये आवाज लगाई कि कन्या को भेजा जाये। उधर से जवाब आया कि कन्या तो सो गई है। तुरंत ही उपाय निकाला गया कि उसके मामा उसे उठाये उठाये फ़ेरे लगवा देंगे और ऐसा ही किया गया। फ़ेरे पूरे होते ही फ़त्तू के पक्ष से औरतों ने मंगल गीत गाने शुरू किये,                               “ब्याह लियो रै म्हारो काणियो”
कन्या पक्ष से फ़ौरब जवाब आया,           “म्हारी चाल पड़े जब जाणियो।”
इब दोनूं मिलकर ’मेरी दोस्ती मेरा प्यार’ गावैं सैं।(with  50% ph)

सबक: फ़त्तू जैसों के भी फ़ूफ़ा इस दुनिया में हैं।


गाना सुनो-देखो जी हमारी पसंद का और chill मारो, हमारी  देखी  जायेगी।


गुरुवार, जून 17, 2010

पूर्णिमा का चांद, श्वान बिरादरी और शांति दूत

                                       आभारी हूँ दोस्त तुम्हारा,  कि इतनी पुरानी पोस्ट को भी याद रखा और एकदम मैचिंग मूड  की तस्वीर  बिना कहे ही ढूंढ कर दी।

सलाम नमस्ते,
हमें सलाम नमस्ते करनी पड़ रही है, इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं  कि समय कैसा चल रहा है हमारा।  न तो था एक जमाना कि हम लिया भी नहीं करते थे नमस्ते वमस्ते किसी की। ये हिन्दी की सेवा करने का व्रत जो न करवा दे थोड़ा है। वैसे भी जब बाजार में उतर ही गये हैं बिकने के लिये तो मार्केटिंग का तकाजा है कि बिकने लायक दिखोगे तभी कोई भाव देगा। अच्छे कूदे भाई इस ब्लॉगिंग की दुनिया में। न दिन को चैन, न रातों का करार।  सपना भी देखें तो लगता है कि कोई फ़ॉलोवर अपनी गलती सुधारने के नाम पर हमें अकेला छोड़ कर लौट गया है। और तो और अखबार भी देख लें कभी मजबूरी में तो आंखें स्टिंग आपरेशन में लगी रहती हैं कि कोई खबर दिख जाये ऐसी कि हमारी एक पोस्ट का मैटीरियल तो बन जाये। तो साहेबानों, कदरदानों और बन्धु-बांधवों, आज की पोस्ट का श्रेय जाता है 8 जून के दैनिक हिन्दुस्तान में छपी एक लघुकथा के लेखक विजय कुमार सिंह जी को(नाम शायद यही है, एकदम पक्का याद  नहीं है)।
एक लघुकथा पढ़ी, मुझे बहुत पसंद आयी। सार कुछ इस तरह से था:-
रात घिर आने के बाद आसमान में पूर्णिमा का चांद अपने पूरे आकार और चमक के साथ दैदीप्यमान था। मनुष्य तो जितने भी थे, सभी उसकी निर्मलता और आलौकिकता के आगे नतमस्तक हो गये और मौन को प्राप्त हुये।  सिर्फ़ कुत्ते थे जो सर उठाकर भौंक रहे थे, बस एक को छोड़कर। जब बहुत देर तक उनका शोर बन्द नहीं हुआ तो जो अब तक चुप था, वह शुरू हो गया। कहने लगा कि तुम सब कितना ही सर उठा कर शोर मचा लो लेकिन ये चांद तुम्हारे लिये जमीन पर नहीं उतरने वाला है। अब सारे बिरादर चुप हो गये, सिर्फ़ वही भौंकता रहा सारी रात। शांति बनाये रखने की अपील करते हुये वह शांति दूत सारी रात शोर मचाता रहा।
अब अपनी बात शुरू।  अगर खुद  को श्वान बिरादरी का सक्रिय कार्यकर्ता मानें तो अपनी कैफ़ियत है कि पता है चांद का मेरे लिये जमीन पर  उतरना असंभव है, अपन तो इस लिये जोर जोर से भौंक रहे थे कि कहीं ये चांद किसी और के लिये नीचे न उतर आये। अपना अपना स्टाईल है जी, मुकेश ने इसी बात को ’तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी’ अपनी खूबसूरत आवाज में गाकर कह दिया, हमारे पास भौं भौं है तो हम अपनी भाषा में गा रहे थे।
वैसे हम सारे खुद ही हाकिम बने रहते हैं और फ़ैसले सुनाते रहते हैं।  होती कोई ग्रह-उपग्रह-जूनियर ग्रह उपग्रह एसोसियेशन, तो शायद चांद को भी अपनी इच्छा बताने का हक मिल जाता।  बनेगी जरूर कभी न कभी चांद तारों की यूनियन भी,  देख लेना।
:) फ़त्तू को तैयार देखकर पंडित जी ने पूछा, “घणा चस(चमक) रया सै भाई, कित की तैयारी सै?”
 फ़त्तू:   हरद्वार जाऊं सूं, गंगा नहान का विचार सै।
पंडित जी ने मस्तक रेखायें देखीं और कहने लगे कि तेरी किस्मत में तो गंगा स्नान है ही नहीं। अब फ़त्तू का इरादा और पक्का हो गया। स्टेशन पर गया तो गाड़ी कैंसिल, बस स्टैंड पर गया तो हड़ताल। जैसे जैसे परेशानी बढ़ रही थी फ़त्तू के दिल में ज़िद भी बढ़ रही थी। कहीं पैदल चलके, कहीं लिफ़्ट लेकर, कहीं बैलगाड़ी में चढ़्कर आखिर अठारह दिन में फ़त्तू हरिद्वार में पहुंच ही गया। चैन उसे पड़ा घाट पर पहुंच कर ही। फ़िर मिलाया उसने फ़ोन पंडित जी को और सारी यात्रा क विवरण दिया।  आखिरी वाक्य आप भी सुन लीजिये।
फ़त्तू:  दादा, देख लै। तन्नै कही थी कि मेरी किस्मत में गंगा नहान की है नहीं। बेशक अठारह दिन लग गये. पर यो रही गंगा मेरी आंखों के सामने। तन्नै झूठा साबित करना हो तो बीस बार नहा लूं, पर जा दादा, तू भी के याद करेगा, नहीं नहाता जा।