उसने सर उठाकर देखा, प्रीत अपने क्यूबिकल में बैठी थी। बाहर भी मौसम खराब था और ऑफ़िस के अंदर भी। सुबह से बारिश की झड़ी लगी है, ग्राहक कौन आता? शायद आज आठवीं बार उसने फ़ोन मिलाया और फ़िर प्रीत ने फ़ोन काट दिया। उसने अपनी डायरी निकाली और लिखना शुरू किया। कब पांच बजे, नहीं मालूम चला। देखा तो प्रीत भी अभी बैठी थी, शायद बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी। उसने डायरी से पेज फ़ाड़ा, तह किया और लिफ़ाफ़े में डालकर कोट की जेब में रख लिया। ब्रीफ़केस उठाया और चल दिया, मनोज ने कहा भी कि रुक जाओ, अभी बारिश है लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। प्रीत के पास जाकर ठिठका, लिफ़ाफ़ा उसके सामने रखा और बिना देखे, बिना बोले बाहर निकल गया। भीगना कोई नई बात नहीं थी उसके लिये, जब तब खूब भीगा है वो बारिश में, आज भी सही। इक्का दुक्का स्कूटर या मोटरसाईकिल वाले थे जो सड़क पर दिखाई दे रहे थे, पैदल चलता तो वो अकेला ही था।
घर पहुंचकर कपड़े बदले, काफ़ी बनाई और मोबाईल स्विच-ऑफ़ करके बिस्तर में घुस गया। न रहेगा बाँस और न बजेगी बांसुरी। खाना बनाने की हिम्मत नहीं थी या खाने की इच्छा नहीं थी, खुद ही नहीं तय कर पाया। रह रहकर आंखों के सामने प्रीत का भावशून्य चेहरा आ रहा था। एक जरा सी बात पर कोई इतना पत्थरदिल कैसे हो सकता है? इतने महीनों का सामीप्य कैसे भुला सकती है वो? ठीक है, अगर उसे जिद है तो यही सही। रात भर नींद तो नहीं ही आई, खुली आँखों के सामने देखे अनदेखे ख्वाब जरूर नाचते रहे। सुबह चार बजे के बाद कहीं आँख लगी उसकी।
प्रीत को घर पहुंचने में आज देर हो गई थी। आज खाने का मन नहीं था, सो मना कर दिया। खुद ही जाकर काफ़ी बनाई और बिस्तर में घुस गई। काम करना बंद कर सकता है कोई, खाना स्किप किया जा सकता है एकाध टाईम, आंखें भी बंद की जा सकती हैं लेकिन ये जो मन होता है, ये निठल्ला नहीं बैठता। जेहन में बार बार अमर का चेहरा आ रहा था। आज बहुत गुस्सा दिलाया उसने, क्या जरूरत थी उसे उसकी हर बात में दखल देने की? दूधपीती बच्ची तो नहीं वो, जो किसी बात को हैंडल नहीं कर सकती। बहुत सर चढ़ा लिया मैंने ही, आज बच्चू को अपनी हैसियत मालूम चल ही गई दिन में दस बार फ़ोन किया होगा। इतनी तो हिम्मत थी नहीं कि आमने सामने आकर बुला ले। दस गज की दूरी है, महाशय जी फ़ोन मिलाते हैं। अच्छा हुआ आज दिल मजबूत करके बैठी रही, नहीं किया फ़ोन अटैंड। और शाम को कैसे ब्रीफ़केस उठाकर बारिश में बाहर निकल गया, जैसे फ़िल्मी हीरो हो। सोचता होगा कि अभी प्रीत रास्ता रोक लेगी जैसे सत्तर की फ़िल्मों में हीरोईन अपनी कसम देकर हीरो को रोक लेती थी, हुंह। अरे, ध्यान आया एक चिट्ठी दे गया था जाते जाते। देखूं तो क्या प्रेम कहानी लिख गया है। बैग से कागज निकाला और पढने लगी।
’प्रीत, (मेरी प्रीत लिखने की हिम्मत नहीं हो रही)
जानता हूँ आज तुम नाराज हो, हक है तुम्हें। वैसे ये पहली बार नहीं कि तुम नाराज हुई हो मुझसे, ऐसा जरूर पहली बार हुआ कि मैंने आज तुम्हें मनाने की कोशिश की है। नहीं तो तुम बिगड़ती थी और मैं अकड़ा रहता था, थोड़ी देर में तुम ही हँसकर मना लेती थी मुझे। और मनाना भी क्या मनाना था, सिर्फ़ आकर बात करना शुरू कर देती तुम और मैं छोटे बच्चे की तरह सब भूल जाता था। मैं बदल रहा हूँ खुद को, नहीं तो रूठकर मानना और रूठों को मनाना कभी नहीं करता था मैं। आज तुम्हें मुझपर गुस्सा आया, मैंने एक दो बार नहीं आठ बार तुम्हें कॉल किया और तुमने हर बार फ़ोन काट दिया। प्रीत, ऐसा क्या हो गया हमारे बीच? तुमने ही तो मेरे जीवन में आकर मेरे होने को एक वजह दी थी, वरना मैं जिन्दा थोड़े ही था? सिर्फ़ साँस चलते रहना, दिल का ध़ड़कते रहना ये जीवन थोड़े ही होता है। अब तो मेडिकल साईंस ने भी जिन्दगी और मौत की परिभाषा बदल दी है। वही नौकरी, वही मैं, वही सबकुछ पहले भी था – एक तुम मेरी जिन्दगी में बरबस ही समाती चली गई और सब बदल गया। याद है तुम्हें, कैसे पहली ही मुलाकात में हम एकदम से अनौपचारिक महसूस करने लगे थे? मैं तो चुप्पा, घुन्ना और जाने क्या क्या नामों से जाना जाता था, और तुम्हारे साथ ऐसी कॉमपैटिबिलिटी बनी थी कि कभी लगा ही नहीं कि हम एक दूसरे की आदतों को न जानते हों। सच कहूँ, तो तुमने ही मुझे जीना सिखाया। इतना सम्मान दिया, इतना अपनापन कि मैं खुद से ही रश्क करने लगा था। मैंने कुछ कहने में बेशक समय लगा दिया हो, तुमने मानने में एक पल नहीं लगाया। मैं ही ठिठक ठिठक कर कुछ कहता था, आदत नहीं रही थी मुझे कि मेरा कुछ कहना ही किसी के लिये पत्थर की लकीर बन सकता है। झूठ नहीं कहा तुमसे, हमेशा अकेला नहीं रहा मैं भी, कई बार हमसफ़र मिले लेकिन जिसे अपनी माना हो वो आजतक एक ही मिली, तुम सिर्फ़ तुम। वरना तो किसी के साथ दो कदम चलकर और किसी के साथ दो बात करके ही मन भर जाता था। तुमसे जितना बात हो जाए, लगता ही नहीं कि बस्स बहुत हो गया। मुझे ऐसी ही मंजिल की तलाश थी जिसे पाकर भी सफ़र मुकम्मल न हो। तुमसे मैंने कई बार कहा कि आंख बंदकर मुझपर भी भरोसा मत करो, और तुम कहती थी कि भगवान से भी ज्यादा भरोसा है मुझपर। कहाँ खो गया वो भरोसा?
खैर जाने दो, मैं तो पहले भी खुद को तुम्हारे लायक नहीं मानता था और आज भी नहीं मानता। बीच में जरूर कुछ समय ऐसा लगा था कि पिछले समय में जो कुछ झेला, भुगता था मैंने उसीकी वजह से खुद को अंडर एस्टिमेट कर रहा था, नहीं तो तुम जिसे चाहो, वो मामूली इंसान नहीं हो सकता। लेकिन ये एक भ्रम ही था, तुम्हारी आँखों पर ही शायद चाहत का चश्मा चढ़ा था, या मेरे सितारे अच्छे थे उन दिनों। बुरे समय के बाद अच्छा समय आता है तो और भी अच्छा लगता है लेकिन जब फ़िर से वही गम की भरी रातें और तनहाईयां आ घेरती हैं तो साँस लेना भी दुश्वार लगता है।
कई दिन से मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरी बातें तुम्हें नागवार गुजर रही हैं। तुम भी शायद ऐसा महसूस कर रही होगी। आज सारा दिन मुझ पर कैसे गुजरा है, मैं जानता हूँ। लेकिन अब मैं शांत हूँ। अगर हम दिल से एक नहीं हो सकते तो क्या जरूरत है ऐसे सपने देखने की? सोच देखना, आज शाम और रात तुम्हारे पास है। कल सुबह तुम्हारे फ़ैसले का मुझे इंतज़ार रहेगा। मोबाईल स्विच-ऑफ़ कर दूंगा आज रात, कहीं मैं ही कमजोर न पड़ जाऊं और तुम्हें फ़िर से फ़ोन मिला बैठूँ। देखता हूँ कल की सुबह मेरे लिये सुबह बनकर आती है या ……? इतना जान लो, मेरे लिये अब जिन्दगी में या तुम हो या फ़िर कोई नहीं। बस शोर शराबा मुझे पसंद नहीं, भले ही हम एक साथ हों कि न हों, जो भी फ़ैसला हो आराम से बता देना।
तुम्हारा अमर
कागज पढ़कर फ़ाड़ दिया प्रीत ने और बड़बड़ा रही थी. “ओह, देवदास जी, बड़ा आया इमोशनल करने वाला। देख लूँगी इसे तो।” कागज पेन लेकर अब वो बैठ गई थी, रात के एक बजे। नींद न आए तो कुछ तो करना ही था।
अगले दिन ऑफ़िस में सब वैसा ही चल रहा था जैसे एक आम ऑफ़िस में होता है। दोनों में आज हाय-हैलो भी नहीं हुई। साढ़े बारह बजे होंगे, प्रीत आई और एक कागज अमर की मेज पर रखकर चली गई। धड़कते दिल से अमर ने कागज खोला, एक गोला बनाकर उसके अंदर लिखा था ’अमरप्रीत’ और नीचे सिर्फ़ एक पंक्ति .”मेरे होने वाले पति जी, आज मैं लंच नहीं लाई हूँ। ’गेलार्ड’ में लंच करवाओगे न? स्साला नौटंकीमास्टर कहीं का, हा हा हा”
अमर की आँखें भीग आईं थीं, एक जमाने के बाद। भीगी आंखों का भी अपना ही आनंद होता है।